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 04 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *आत्मा को शुद्ध और वायुमंडल को शांत बनाया ?*

 

➢➢ *स्वर्ग की रचना में विघन रूप तो नहीं बने ?*

 

➢➢ *मन - बुधी की स्वच्छता द्वारा यथार्थ निर्णय किया ?*

 

➢➢ *सदा श्रेष्ठ और शुद्ध संकल्प इमर्ज किये ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे ब्रह्मा बाप के संस्कारों में बेहद का त्याग और बेहद की तपस्या देखी। हर संकल्प में यही रहा कि बेहद का कल्याण कैसे हो। *ऐसे बेहद के तपस्वी बनो। दो चार घण्टे के तपस्वी नहीं लेकिन हर सेकंड तपस्या-स्वरूप, तपस्वी मूर्त। मूर्त और सूरत से त्याग, तपस्या और सेवा-साकार रूप में प्रत्यक्ष करो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं राजयोगी, श्रेष्ठ योगी आत्मा हूँ"*

 

✧  राजयोगी, श्रेष्ठ योगी आत्मायें हो ना? *साधारण जीवन से सहजयोगी, राजयोगी बन गये। ऐसी श्रेष्ठ योगी आत्मायें सदा ही अतीइन्द्रिय सुख के झूले में झूलती हैं।* हठयोगी योग द्वारा शरीर को ऊंचा उठाते हैं और उड़ने का अभ्यास करते हैं। वास्तव में आप राजयोगी ऊंची स्थिति का अनुभव करते हो। इसको ही कापी करके वो शरीर को ऊंचा उठाते हैं।

 

  लेकिन आप कहाँ भी रहते ऊंची स्थिति में रहते हो, इसलिए कहते हैं - योगी ऊंचा रहते हैं। तो मन की स्थिति का स्थान ऊंचा है। क्योंकि डबल लाइट बन गये हो। वैसे भी फरिश्तों के लिए कहा जाता कि फरिश्तों के पांव धरनी पर नहीं होते। *फरिश्ता अर्थात् जिसका बुद्धि रूपी पांव धरती पर न हो, देहभान में न हो। देहभान से सदा ऊंचे - ऐसे फरिश्ते अर्थात् राजयोगी बन गये।*

 

  अभी इस पुरानी दुनिया से कोई लगाव नहीं। सेवा करना अलग चीज है लेकिन लगाव न हो। योगी बनना अर्थात् बाप और मैं, तीसरा न कोई। *तो सदा इसी स्मृति में रहो कि हम राजयोगी, सदा फरिश्ता हैं। इस स्मृति से सदा आगे बढ़ते रहेंगे। राजयोगी सदा बेहद का मालिक हैं, हद के मालिक नहीं। हद से निकल गये। बेहद का अधिकार मिल गया - इसी खुशी में रहो। जैसे बेहद का बाप है, वैसे बेहद की खुशी में रहो, नशे में रहो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  रूहानी ड्रिल जनते हो? जैसे शारीरिक ड्रिल के अभ्यासी एक सेकण्ड में जहाँ और जैसे अपने शरीर को मोडने चाहे वहाँ मोड सकते हैं, ऐसे रूहानी ड्रिल करने के अभ्यासी एक सेकण्ड में बुद्धि को जहाँ चाहो, जब चाहो उसी स्टेज पर, उसी परसेन्टेज से स्थित कर सकते हो? *ऐसे एवररेडी रूहानी मिलिट्री बने हो?*

 

✧  अभी - अभी आर्डर हो अपने सम्पूर्ण निराकारी, निरअहंकारी, निर्विकारी स्टेज पर स्थित है जाओ तो क्या स्थित हो सकते हो वा साकार शरीर, साकारी सृष्टि वा विकारी संकल्प न चाहते हुए भी आपने तरफ आकर्षित करेंगे। *इस देह के आकर्षण से परे एक सेकण्ड में हो सकते हो?* हार और जीत का आधार एक सेकण्ड होता है। तो एक सेकण्ड की बाजी जीत सकते हो?

 

✧  ऐसी विजयी अपने आप को समझते हो? *ऐसे सर्व शक्तियों के सम्पत्तिवान अपने को समझते हो वा अभी तक सम्पूर्ण सम्पत्तिवान बनना हैं?* दाता के बच्चे सदा सर्व सम्पत्तिवान होते हैं, ऐसे अपने को समझते हो वा अभी तक 63 जन्मों के भक्त - पन वा भिखारी - पन के संस्कार कब इमर्ज होते हैं?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  एवररेडी अर्थात् अभी-अभी किसी भी परिस्थिति व वातावरण में आर्डर मिले व श्रीमत मिले कि एक सेकण्ड में सर्व-कर्मेन्द्रियों की अधीनता से न्यारे हो कर्मेन्द्रिय-जीत बन एक समर्थ संकल्प में स्थित हो जाओ, तो श्रीमत मिलते हुए मिलना और स्थित होना साथ-साथ हो जाये। *बाप ने बोला और बच्चों की स्थिति ऐसी ही उस घड़ी बन जाये उसको कहते हैं एवररेडी।* जो पहले बातें सुनाई समानता की जिससे ही समीपता की स्टेज बनती है - ऐसे सब बातों में कहाँ तब समान बने है? यह चैकिंग करो। ऐसे तो नहीं डायरेक्शन को प्रेक्टिकल में लाने में एक सेकण्ड के बजाय एक मिनट लग जाये। *एक सेकेण्ड के बजाय एक मिनट भी हुआ तो फस्र्ट डिवीजन में पास नहीं होंगे, चढ़ते, उतरते व स्वयं को सैट करते फस्र्ट डिवीजन की सीट को गंवा देंगे। इसलिए सदा एवररेडी, सिर्फ एवररेडी भी नहीं, सदा एवररेडी।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- श्रीमत पर पवित्र बन धर्मराज की सजाओं से छूट जाना"*

 

_ ➳   मैं आत्मा मनमत, परमत पर चलते हुए दुखों के गर्त में डूबते गई और पतित कलियुगी दुनिया में पहुँच गई... पतित पावन को पुकारते इधर-उधर भटक रही थी... इस पतित दुनिया से पावन दुनिया में ले जाने के लिए स्वयं पतित पावन शिवबाबा इस धरा पर उतर आये... *प्यारे बाबा ने अपनी गोद में लेकर मुझे अपना वारिस बनाया... शिक्षक बन शिक्षाएं देकर सर्व शक्तियों, सर्व खजानों की मालिक बना रहे हैं... मुझे पावन बनाने के लिए श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ, ऊँचे से ऊँचा मत दे रहे हैं...*

 

   *धर्मराज की सजाओ से छूटने, हीरे जैसा पवित्र बनने की श्रीमत देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वरीय मत पर चलकर जीवन को अनन्त सुखो की जागीर बना दो... मीठे बाबा संग यादो में डूबकर पवित्रता से सज जाओ तो... हीरे जैसा खुबसूरत जीवन सहज ही पाओगे... *ईश्वरीय ज्ञान रत्नों से इस कदर स्वयं को भरपूर कर लो कि... विकारो का विष सहज ही धूमिल हो जाए... और पावन बन विश्व की शोभा बनो.."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी दृष्टि से निहाल होकर खुशहाल जीवन पाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपकी यादो में कितनी प्यारी और पवित्र बन मुस्करा रही हूँ... *श्रीमत को पाकर तो जीवन ही सुखो की खान हो गया है...* प्यारे बाबा... आपने अपनी प्यार भरी पलको में बिठाकर मुझ आत्मा को कौड़ी से हीरे जैसा बना दिया है..."

 

   *ज्ञान अमृत पिलाकर विष से छुड़ाकर कमाल करते हुए मीठे जादूगर बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... सदा ईश्वरीय ज्ञान रत्नों की खनक में खोये रहो... विकारो रुपी विष से मुक्ति के लिए ईश्वरीय ज्ञान अमृत को प्रतिपल पीते रहो... सदा श्रीमत की बाँहों में सुरक्षित रह... *जीवन को हीरे जैसा धवल, चमकीला बनाओ... और पवित्रता की किरणों से विश्व नभ् पर प्रकाशित हो जाओ..."*

 

_ ➳   *अँधेरे से निकल प्रकाश की दुनिया में मालामाल होकर चमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा ईश्वरीय राहो पर चलकर आत्मिक मूल्यों से सज संवर गयी हूँ...* विकारो की कालिमा में किस कदर निष्प्राण थी, आज आपकी यादो में पावनता से निखर कर जियदान पा ली हूँ... कितनी प्यारी और खुबसूरत मै आत्मा हो गयी हूँ..."

 

   *अपनी शुभ शिक्षाओं, शुभ आशीषों से काया कल्प करते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... श्रीमत की सुखदायी राहो पर चलकर... सदा धर्मराज की सजाओ से बेफिक्र रहो... ईश्वरीय मत को दिल से अपनाकर, देवताई वजूद से पुनः निखर जाओ... *पवित्रता की बाँहों में, सुख शांति को सहज ही आलिंगन करो... ऐसे खुबसूरत जीवन के मालिक बनकर, विश्व धरा पर मदमस्त से इठलाओ..."*

 

_ ➳   *मैं आत्मा विकारों के पिंजरे से मुक्त होकर आजाद पंछी बन आकाश में उड़ते हुए कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी प्यार भरी छत्रछाया में हर सजा से मुक्त हूँ... *पवित्र बन विश्व धरा पर बेमिसाल सौंदर्य से छलक रही हूँ... और पावनता की लहर में हर दिल को रंग रही हूँ... अपनी ईश्वरीय अदाओ से हर दिल को ईश्वरीय मत का दीवाना बना रही हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप की श्रीमत पर सम्पूर्ण पावन बनने की प्रतिज्ञा करनी है*"

 

_ ➳  भगवान के साथ सर्व सम्बन्धो का सुख सारे कल्प में केवल इस समय ही मिलता है इसका प्रेक्टिकल अनुभव करती हुई मैं नन्ही सी परी बन अपने खुदा दोस्त के साथ स्वयं को एक बहुत खूबसूरत दुनिया में देख रही हूँ। *इस खूबसूरत दुनिया मे रंग बिरंगे खुशबूदार फूलों के एक अति सुंदर बगीचे में अपने खुदा दोस्त के साथ टहलते हुए मैं उनसे मीठी - मीठी बातें कर रही हूँ*। मेरे खुदा दोस्त मेरे साथ अनेक प्रकार से खेल पाल कर रहें है। उनके साथ मैं इस खूबसूरत दुनिया के खूबसूरत नज़ारे देख रही हूँ। 

 

_ ➳  मन को लुभाने वाली इस बहुत निराली और अद्भुत पिकनिक का आनन्द लेने के बाद मैं जैसे ही अपनी स्व स्वरूप में स्थित होती हूँ, *मैं अनुभव करती हूँ कि अपने जिस सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप में मैं पहली बार अपने परमधाम घर से इस कर्मभूमि पर आई थी, उसी सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप को पुनः पाने के लिए, पवित्रता के सागर, मेरे पतित पावन परम पिता परमात्मा मुझे अपने पास बुला रहें हैं*। यह अनुभव करते ही मैं देखती हूँ जैसे पतित पावन मेरे शिव बाबा अव्यक्त ब्रह्मा बाबा के लाइट के तन में विराजमान होकर मेरे सामने आ गए हैं और मेरा हाथ थामने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा रहे हैं।

 

_ ➳  अपने भगवान उस्ताद के हाथ मे हाथ देते ही मैं महसूस करती हूँ जैसे एक बहुत तेज करेन्ट मेरे सारे शरीर मे दौड़ने लगा है। *पवित्रता की किरणों का अनन्त प्रवाह बापदादा के हाथों से मेरे शरीर के अंग - अंग में प्रवाहित हो रहा है*। शक्तियों का यह तीव्र प्रवाह शरीर के भान को जैसे समाप्त कर रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरा शरीर प्रकाश का बन गया है और इतना हल्का हो गया है कि धरती के आकर्षण को छोड़ ऊपर उड़ने लगा है। *अपने उस्ताद के हाथ मे हाथ देकर, इस दुनिया से मैं बहुत दूर ऊपर आकाश में आ गई हूँ*। 

 

_ ➳  नीचे धरती के नजारों को देखते हुए, इस खूबसूरत यात्रा का आनन्द लेते - लेते मैं आकाश को भी पार करके अपने उस्ताद के साथ अब उनके अव्यक्त वतन में पहुँच गई हूँ। *अपने ही समान लाइट के शरीर वाले फरिश्तो को मैं इस वतन में यहाँ वहाँ उड़ते हुए देख रही हूँ जो अपने उस्ताद की इस खूबसूरत दुनिया में मेरे ही समान उनके पास मिलन मेला मनाने आये हैं*। अपने इस अव्यक्त वतन के सुंदर नजारो को देखते - देखते अब मैं स्वयं को पवित्रता की शक्ति से भरपूर करने के लिए बापदादा के सामने जा कर बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  अपनी पावन दृष्टि से मुझे निहारते हुए मेरे उस्ताद पवित्रता की किरणें मुझ में प्रवाहित कर रहें हैं। ऐसा लग रहा है जैसे बापदादा की पावन दृष्टि से पवित्रता का झरना बह रहा है जिससे निकल रही पवित्र फुहारें मुझ पर बरस रही हैं। *बाबा के मस्तक से आ रही पवित्रता की तेज लाइट मुझे गहराई तक छूकर, पवित्रता की शक्ति से मुझे भरपूर कर रही है*। अपने उस्ताद से पवित्रता का बल अपने अंदर भरकर अब मैं अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान अनादि स्वरूप का अनुभव करने के लिए अपने लाइट के आकारी शरीर को इस अव्यक्त वतन में छोड़, अपने निराकारी स्वरूप को धारण कर निराकारी वतन की ओर चल पड़ती हूँ।

 

_ ➳  आत्माओं की इस निराकारी दुनिया मे मैं बिंदु आत्मा अब अपने पतित पावन बिंदु बाप के बिल्कुल समीप जा कर बैठ जाती हूँ। *बिंदु बाप से आ रही पवित्रता की अनन्त किरणें मुझ बिंदु आत्मा पर पड़ रही हैं और मुझ आत्मा पर चढ़ी विकारों की कट को भस्म कर मुझे पावन बना रही है*। मेरा पवित्रता का औरा बढ़ता जा रहा है। मैं रीयल गोल्ड बनती जा रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा पवित्रता की खुराक खिलाकर मुझे बहुत शक्तिशाली बना रहे हैं। 

 

_ ➳  रीयल गोल्ड के समान शुद्ध बन कर अब मैं आत्मा वापिस साकार वतन में लौटती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, सम्पूर्ण पावन बनने के अपने लक्ष्य को पाने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपने अनादि सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप को पुनः प्राप्त करने के लिए और उसी स्वरूप में वापिस अपने घर जाने के लिए, अपना बुद्धि रूपी हाथ उस्ताद के हाथ मे देकर, उनकी याद से अब मैं स्वयं को पावन बना रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मन बुद्धि की स्वच्छता द्वारा यथार्थ निर्णय करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सफलता सम्पन्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा श्रेष्ठ और शुद्ध संकल्प इमर्ज करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा व्यर्थ स्वतः मर्ज होते अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं सदा समर्थ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  सदा रूहानियत की खुशबू फैलाने वाले सच्चे-सच्चे रूहानी गुलाब:- *सभी बच्चे- सदा रूहानी नशे में रहने वाले सच्चे रूहानी गुलाब हो ना? जैसे रूहे गुलाब का नाम बहुत मशहूर है वैसे आप सभी आत्मायें रूहानी गुलाब हो। रूहानी गुलाब अर्थात् चारों ओर रूहानियत की खुशबू फैलाने वाले।* ऐसे अपने को रूहानी गुलाब समझते हो? सदा रूह को देखते और रूहों के मालिक के साथ रूह-रूहान करते यही रूहानी गुलाब की विशेषता है। सदा शरीर को देखते रूह अर्थात् आत्मा को देखने का पाठ पक्का है ना! इसी रूह को देखने के अभ्यासी रूहानी गुलाब हो गये। *बाप के बगीचे के विशेष पुष्प हो क्योंकि सबसे नम्बरवन रूहानी गुलाब हो। सदा एक की याद में रहने वाले अर्थात् एक नम्बर में आना है, यही सदा लक्ष्य रखो।*

 

✺  *"ड्रिल :- सदा रूहानियत की खुशबू फैलाने वाले सच्चे-सच्चे रूहानी गुलाब बनकर रहना*"

 

_ ➳  *मैं रूह रुई की तरह हलकी होकर हवा में उड़ती अपनी ही धुन में झूमती हुई पहुँच जाती हूँ रूहों के मालिक सुप्रीम रूह के पास...* मैं रूह सुप्रीम रूह को निहार रही हूँ... सुप्रीम रूह मुझ रूह को बड़े प्यार से देख रहे हैं... मैं सुप्रीम रूह के प्यार में समा रही हूँ... सुप्रीम रूह के संग के रंग में रंगती जा रही हूँ... रुहानी खुशबू को धारण कर रुहानी गुलाब बन रही हूँ...

 

_ ➳  *मैं रूहानी गुलाब सदा सुप्रीम रूह की छत्र छाया में ही रहती हूँ...* मेरी दृष्टि में सदा सुप्रीम रूह समाया हुआ रहता है... मैं सदा सुप्रीम रूह के साथ कम्बाइन्ड रहती हूँ... सदा इसी नशे में रहती हूँ कि सुप्रीम रूह मेरा और मैं सुप्रीम रूह की... *मैं रूहे गुलाब सदा सुप्रीम रूह को देखती, उनसे रूह-रूहान करती रहती हूँ...*

 

_ ➳  *मैं रूहानी नशे में रहने वाली रूहानी रूहे गुलाब चारों ओर अपनी खुशबू महका रही हूँ...* चारों ओर के वायुमंडल को सुगन्धित बना रही हूँ... मेरी रूहानियत की खुशबू से चारों ओर की तमोप्रधान प्रकृति सतोप्रधान बन रही है... मैं रूह सदा रूहों को देखती हूँ... उनके शरीर को नहीं देखती... सभी रूहें मेरे आत्मा भाई हैं... सभी अलग-अलग अपना पार्ट बजा रहे हैं... *मुझ रुहे गुलाब को देह वा देह की दुनिया, वस्तु, व्यक्ति देखते हुए भी नहीं दिखाई देते हैं...* पुरानी दुनिया भी रुहानी दुनिया, फरिश्तों की दुनिया दिखाई देती है...

 

_ ➳  *मुझ रूह का करावनहार सुप्रीम रूह है... मैं करनहार हूँ...* मैं हर संकल्प, बोल और कर्म सुप्रीम रूह की श्रीमत के आधार पर करती हूँ... वह चला रहा है, मैं चल रहीं हूँ... अब मैं आत्मा सदा रुहानी खुशबू में अविनाशी और एकरस रहती हूँ... *अब मैं आत्मा सदा एक की याद में रहकर एक नम्बर में आने का लक्ष्य रखकर चलती हूँ...*

 

_ ➳  *मैं रूहे गुलाब सदा इसी रुहानी भावना में रहती हूँ कि सर्व रूहें भी सुप्रीम रूह के वर्से के अधिकारी बन जायें...* मैं रुहानी गुलाब सुप्रीम रूह से सर्व गुणों, शक्तियों को धारण कर सर्व को भी गुण, शक्तियों का दान करती हूँ... सुख, शांति की शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना के साथ सर्व रूहों की रुहानी सेवा करती हूँ... *मैं रूह नम्बर वन खुशबूदार रुहे गुलाब बन दूर दूर तक रुहानी खुशबू फैलाने वाली सच्ची-सच्ची रूहानी गुलाब हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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