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 04 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *दान भी पात्र देखकर किया ?*

 

➢➢ *अविनाशी ज्ञान रतनो को धारण किया ?*

 

➢➢ *हर कर्म में बाप को साथी रूप में अनुभव किया ?*

 

➢➢ *विशेषताओं को ही देखा और विशेषताओ का ही वर्णन किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *फरिश्ता स्थिति का अनुभव करने के लिए किसी भी प्रकार के व्यर्थ और निगेटिव संकल्प, बोल वा कर्म से मुक्त बनो। व्यर्थ वा निगेटिव-यही बोझ सदाकाल के लिए डबल लाइट फरिश्ता बनने नहीं देता।* तो ब्रह्मा बाप पूछते हैं-इस बोझ से सदा हल्के फरिश्ते बने हो?

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं राजयोगी आत्मा हूँ"*

 

  एक सेकेण्ड में अशरीरी स्थिति का अनुभव कर सकते हो? या टाइम लगेगा? *आप राजयोगी हो, राजयोगी का अर्थ क्या है? राजा हो ना। तो शरीर आपका क्या है? कर्मचारी है ना! तो सेकेण्ड में अशरीरी क्यों नहीं हो सकते? र्डर करो- अभी शरीर-भान में नहीं आना है; तो नहीं मानेगा शरीर?*

 

  राजयोगी अर्थात् मास्टर सर्वशक्तिवान। मास्टर सर्वशक्तिवान कर्मबन्धन को भी नहीं तोड़ सकते तो मास्टर सर्वशक्तिवान कैसे कहला सकते? *कहते तो यही हो ना कि हम मास्टर सर्वशक्तिवान हैं। तो इसी अभ्यास को बढ़ाते चलो। राजयोगी अर्थात् राजा बन इन कर्मेन्द्रियों को अपने र्डर में चलाने वाले। क्योंकि अगर ऐसा अभ्यास नहीं होगा तो लास्ट टाइम 'पास विद् नर' कैसे बनेंगे!*

 

  धक्के से पास होना है या 'पास विद् नर' बनना है? जैसे शरीर में आना सहज है, सेकेण्ड भी नहीं लगता है! क्योंकि बहुत समय का अभ्यास है। ऐसे शरीर से परे होने का भी अभ्यास चाहिए और बहुत समय का अभ्यास चाहिए। *लक्ष्य श्रेष्ठ है तो लक्ष्य के प्रमाण पुरुषार्थ भी श्रेष्ठ करना है। सारे दिन में यह बार-बार प्रैक्टिस करो-अभी-अभी शरीर में हैं, अभी-अभी शरीर से न्यारे अशरीरी हैं! लास्ट सो फास्ट और फर्स्ट आने के लिए फास्ट पुरुषार्थ करना पड़े।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *आवाज से परे अपनी श्रेष्ठ स्थित को अनुभव करते हो?* वह श्रेष्ठ स्थिति सर्व व्यक्त आकर्षण से परे शक्तिशाली न्यारी और प्यारी स्थिति है। *एक सेकण्ड भी इस श्रेष्ठ स्थिति में स्थित हो जाओ तो उसका प्रभाव सारा दिन कर्म करते हुए भी स्वयं में विशेष शान्ति की शक्ति अनुभव करेंगे।* 

 

✧  इसी स्थिति को - कर्मातीत स्थिति, बाप समान सम्पूर्ण स्थिति कहा जाता है। इसी स्थिति द्वारा हर कार्य में सफलता का अनुभव कर सकते हो। ऐसी शक्तिशाली स्थिति का अनुभव किया है? *ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है - कर्मातीत स्थिति को पाना।* तो लक्ष्य को प्राप्त करने के पहले अभी से इसी अभ्यास में रहेंगे तब ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।

 

✧  *इसी लक्ष्य को पाने के लिए विशेष स्वयं में समेटने की शक्ति, समाने की शक्ति आवश्यक है।* क्योंकि विकारी जीवन वा भक्ति की जीवन दोनों में जन्म-जन्मांतर से बुद्धि का विस्तार में भटकने का संस्कार बहुत पक्का हो गया है। इसलिए *ऐसे विस्तार में भटकने वाली बुद्धि को सार रूप में स्थित करने के लिए इन दोनों शक्तियों की आवश्यकता है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ बाप तो कहते हैं बेगर बनो। यह शरीर रूपी घर भी मेरा नहीं। यह लोन मिला हुआ है। सिर्फ ईश्वरीय सेवा के लिए बाबा ने लोन दे करके 'ट्रस्टी' बनाया है। यह ईश्वरीय अमानत है। *आपने तो सब कुछ तेरा कह करके बाप को दे दिया। यह वायदा किया ना वा भूल गये हो? वायदा किया है या आधा तेरा आधा मेरा। अगर तेरा कहा हुआ मेरा समझ कार्य में लगाते हो तो क्या होगा। उससे सुख मिलेगा? सफलता मिलेगी?* इसलिए अमानत समझ तेरा समझ चलते तो बालक सो मालिकपन के खुशी में नशे में स्वतः ही रहेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  ज्ञान योग को धारण कर, फिर आसामी देखकर दान करना"*

 

_ ➳  झील के किनारे बेठी हुई मै आत्मा... प्रकर्ति के सौंदर्य को देख... रचनाकार पिता की स्मर्तियो में खो जाती हूँ...जिसने मेरे जीवन में आकर... जीवन को श्रेष्ठता से भर, दिव्य बना दिया है... आज ज्ञान रत्नों की अमीरी से मै आत्मा... कितनी धनवान् भाग्यवान बन गयी हूँ... मीठे बाबा के असीम उपकारों को याद करती मै आत्मा... मीठे बाबा के पास सूक्ष्म वतन में पहुंच जाती हूँ... *मीठे बाबा मुझे देख आनन्दित होकर कहते है... आओ मेरे मीठे बच्चे... मै आपकी ही प्रतीक्षा में हूँ..*..

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को विश्व का महाराजा बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *मीठे बाबा जैसा रूप और बसन्त बनकर इस विश्व धरा पर गुणो और शक्तियो के फूल हर दिल पर खिलाओ.*.. ईश्वरीय रंगत की मुस्कान हर अधरों पर सजाओ... ज्ञान के अमूल्य मणियो को सही पात्र की झोली में भर आओ... ईश्वरीय ज्ञान धन का दान, सदा योग्यता को देखकर ही करो... यह खजाना सच्चे मन को ही अर्पित करो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की श्रीमत को दिल में समाकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे...मै आत्मा *आपकी मीठी यादो के साये में, सुखो से खिलती जा रही हूँ.*.. देवताई घराने की अधिकारी बनती जा रही हूँ... ज्ञान धन के रत्नों को पाकर, इस जहान में सबसे अमीर होती जा रही हूँ... और इस अमीरी को सुपात्र पर ही लुटा रही हूँ...

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान खजानो की खान सौंपते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वरीय धन सम्पदा को पाने वाले महान भाग्यशाली हो... सदा यादो की छत्रछाया में रहकर ज्ञान रत्नों के खजाने को बुद्धि में गिनते रहो... और आप समान सच्चा दिल देखकर ही...  इस धन का दान करो... *यह ईश्वरीय दौलत बहुत कीमती है, इसे दिलवाले को ही देकर आओ..*."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के अनन्त खानों खजानो को अपनी बाँहों में भरते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे दुलारे बाबा... *आपने मुझे अपनी फूलो भरी गोद में बिठाकर... तो रूप बसन्त बना दिया है.*.. योग की खुशबु और ज्ञान रत्नों की खनक लिए... मै आत्मा विश्व धरा पर घूम रही हूँ... सच्चे दिलो को आपके दिल के करीब ला रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को देवताई सुखो का अधिकारी बनाते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... सदा ईश्वरीय यादो में आबाद रहो... मीठे बाबा की तरह रूप और बसन्त बन मुस्कराते रहो... *सदा ज्ञान रत्नों के मनन में मगन रहो, और यह दौलत चाहत भरे दिलो में बाँट आओ..*. ज्ञान और योग की धारणा कर, अपने गुणो का सबको दीवाना बनाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के अखूट खजानो को अपने बुद्धि दिल में भरते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... *आपकी श्रीमत को, ज्ञान धन को, जीवन में धारण कर मै आत्मा... खुशनुमा जीवन को मालकिन हो गयी हूँ.*.. और यह खुशियो भरे रत्न सच्चे आसामी को देखकर लुटाती जा रही हूँ... सच्चे रत्नों का व्यापार करने वाली मै आत्मा मा रत्नागर बन गयी हूँ..." प्यारे बाबा से मीठी रुहरिहानं कर मै आत्मा... अपने कर्मक्षेत्र पर आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- हर बात में अपना समय सफल करना है*"

 

_ ➳  "समय आपका शिक्षक बने, इससे पहले आप स्वयं ही स्वयं के शिक्षक बन जाओ" इन ईश्वरीय महावाक्यों पर विचार सागर मंथन करते करते एक पार्क में मैं टहल रही हूँ। टहलते - टहलते वही कोने में रखे एक बैंच पर मैं बैठ जाती हूँ और इधर उधर देखने लगती हूँ। तभी सामने सड़क पर लगे एक बोर्ड पर मेरी निगाह जाती है, जिस पर बड़े बड़े शब्दों में एक स्लोगन लिखा हुआ है *"समय की पुकार को सुनो" इस स्लोगन को पढ़ते ही मन फिर से विंचारो में खो जाता है और ऐसा अनुभव होता है जैसे मेरे कानों में कोई इन्ही शब्दो को बार बार दोहरा रहा है*। मैं इधर उधर देखती हूँ कि आखिर मेरे कानों में ये आवाज कहाँ से आ रही है।

 

_ ➳  फिर महसूस होता है कि ये आवाज तो ऊपर से आ रही है। मैं जैसे ही ऊपर की और देखती हूँ एक तेज प्रकाश मुझे अपने ऊपर अनुभव होता है। *मैं देख रही हूं अपने सिर के ऊपर महाज्योति शिव बाबा को जिनसे निकल रही प्रकाश की किरणे मुझ पर पड़ रही हैं और मैं देह के भान से मुक्त स्वयं को एक दम हल्का अनुभव कर रही हूं*। अपने शरीर को मैं देख रही हूं जो शिव बाबा की लाइट और माइट पा कर एकदम लाइट का बन गया है। अब शिवबाबा ब्रह्माबाबा के आकारी रथ में विराजमान हो कर धीरे धीरे नीचे आ रहें हैं। अपने बिल्कुल समीप बैंच पर बापदादा की उपस्थिति को मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  बापदादा मेरा हाथ अपने हाथ मे ले कर मुझे शक्तिशाली दृष्टि दे रहें हैं। बाबा की सम्पूर्ण शक्ति स्वयं में भरने के लिए मैं गहराई से बाबा के नयनो में देख रही हूँ। शक्ति लेते लेते एक विचित्र दृश्य देख कर मैं हैरान रह जाती हूँ। *एक पल के लिए मैं देखती हूँ दिल को दहलाने वाला दुनिया के विनाश का विनाशकारी दृश्य और दूसरे ही पल बाबा के नयनो में समाए अपने प्रति असीम स्नेह और बाबा की अपने प्रति वो आश जिसे बाबा जल्दी से जल्दी पूरा होते हुए देखना चाहते हैं*। अब मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूं कि बाबा ने एक पल के लिए मुझे दिव्य दृष्टि से विनाश का साक्षात्कार करा कर समय की समीपता की ओर ईशारा किया है।

 

_ ➳  इस रोमांचकारी दृश्य का अनुभव करवाकर बापदादा अदृश्य हो जाते हैं और मैं फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट आती हूँ और फिर से उसी स्लोगन पर नजर डालते हुए विचार करती हूं कि *संगमयुग का एक एक  सेकेण्ड मेरे लिए बहुमूल्य है। एक भी सेकेंड व्यर्थ गया तो बहुत बड़ा घाटा पड़ जायेगा*। यह विचार करते करते मैं घर लौट आती हूँ और संगमयुग के अनमोल पलो को सफल करने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपने हर सेकेंड, संकल्प, बोल और कर्म की वैल्यू को स्मृति में रख अब मैं उन्हें ईश्वरीय याद और सेवा में सफल कर रही हूँ* ।

 

_ ➳  हर श्वांस में अपने प्यारे मीठे बाबा की यादों को समाये अपनी बुद्धि को अविनाशी ज्ञान रत्नों से भरपूर करके अब मैं *इन ज्ञान रत्नों को उन आत्माओं को दान कर रही हूं जो इस दान की पात्र आत्मायें हैं*। अपने वरदानी स्वरूप में स्थित हो कर, वरदानी बोल द्वारा उन्हें मुक्ति जीवनमुक्ति पाने का रास्ता बता रही हूं। *परखने की शक्ति का उचित प्रयोग करके, अपने सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को परख कर, पात्र देख कर ज्ञान दान देते हुए उन आत्माओं का कल्याण करने के साथ साथ स्व - पुरुषार्थ करते हुए हर बात में मैं अपने समय को सफल कर रही हूं*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं हर कर्म में बाप का साथ साथी रूप में अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सिद्धि स्वरूप आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं विशेष आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव विशेषता को ही देखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा विशेषता का ही वर्णन करती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  एक हैं - आत्माओं को बाप का परिचय दे बाप के वर्से के अधिकारी बनाने के निमित्त सेवाधारी और दूसरे हैं - यज्ञ सेवाधारी। तो इस समय आप सभी यज्ञ सेवा का पार्ट बजाने वाले हो। यज्ञ सेवा का महत्व कितना बड़ा है - उसको अच्छी तरह से जानते हो?  *यज्ञ के एक-एक कणे का कितना महत्व हैएक-एक कणा मुहरों के समान है। अगर कोई एक कणें जितना भी सेवा करते हैं तो मुहरों के समान कमाई जमा हो जाती है। तो सेवा नहीं की लेकिन कमाई जमा की।*

➳ _ ➳  सेवाधारियों को - वर्तमान समय एक तो मधुबन वरदान भूमि में रहने का चांस का भाग्य मिला और दूसरा सदा श्रेष्ठ वातावरण उसका भाग्य और तीसरा सदा कमाई जमा करने का भाग्य। तो कितने प्रकार के भाग्य सेवाधारियों को स्वत: प्राप्त हो जाते हैं। इतने भाग्यवान सेवाधारी आत्मायें समझकर सेवा करते हो? इतना रूहानी नशा स्मृति में रहता है या सेवा करते करते भूल जाते हो?  *सेवाधारी अपने श्रेष्ठ भाग्य द्वारा औरों को भी उमंग उल्लास दिलाने के निमित्त बन सकते हैं।*

✺   *"ड्रिल :- यज्ञ सेवा के महत्व को समझना।"*


➳ _ ➳  रंग बिरंगी किरणें मेरे मस्तिष्क से निकलते हुए मैं अपने आपको देख रही हूं... मेरे चारों तरफ सफेद प्रकाश का औरा चमक रहा है... *मैं फरिश्ता रूप में आते हुए अपनी मन बुद्धि में उमंगों के पंख लगा कर उड़ी जा रही हूं... अपने वतन में... मेरे बाबा वतन में मेरा इंतजार कर रहे है... चारों तरफ लाल सुनहरा प्रकाश हीरों सी चमकती हुई आत्मा को अपने पास बुला रही है... उनके बीच में मैं अपने आप को देखती हूँ...* और सामने मेरे पास ज्योतिस्वरूप के रुप में अपनी रंग बिरंगी अद्भुत किरणें बिखेरते हुए... मुझे अपनी शक्तिशाली किरणों से नहला रहे हैं... बाबा की इन शक्तियों को अपने अंदर भरते हुए चली आती हूं मैं... सूक्ष्मवतन में... यहां मैं ब्रह्मा बाबा के तन में शिव बाबा को विराजमान अनुभव करती हूं...

➳ _ ➳  अब मैं अनुभव करती हूं... बापदादा मेरे सामने खड़े होकर मुझे अपनी बाहों में झूला झुलाने को आतुर हो रहे हैं... मैं दौड़कर अपने बाबा के पास जाती हूं... और अपने आपको बापदादा की छत्रछाया में अनुभव करती हूं... बापदादा की बाहों के झूले झूलने पर... मैं अपने आपको इस दुनिया की सबसे शक्तिशाली और भाग्यशाली आत्मा अनुभव करती हूं... मैं फ़रिश्ता स्वरूप  में बापदादा से मिलन मना रही हूं... *बापदादा मुझे अपनी बाहों के झूले झुलाते हुए मुझे अपने शुद्ध कर्मों का और कर्तव्यों का ध्यान दिला रहे है... मेरे बाबा मुझसे कहते हैं... मेरे मीठे बच्चे- तुम्हें ज्ञान रत्नों से सजाकर धनवान बना रहा हूं... तुम्हारा कर्तव्य भी अन्य आत्माओं को ज्ञान रत्नों से सजाना है...* बाबा के इन वाक्यों को सुनकर मेरा मन गदगद हो रहा है...

➳ _ ➳  अब कुछ देर बाद बाबा मुझे अपने साथ एक ऐसे स्थान पर ले जाते हैं... जहां चारों तरफ सफेद वस्त्र धारण किये हुए आत्माएं फ़रिश्ते की भांति घूम रही है... *मैं उन्हें उनकी सेवा करते बड़े ध्यान से देख रही हूं... और यह अनुभव करती हूं... कि इनका यह महान सौभाग्य है... कि जिन्होंने अपने सेवा का स्थान मधुबन पाया... यहाँ पर ये हर कदमों में पदमों की कमाई जमा कर रहे हैं... हर एक आत्मा श्रीमत की लकीर के अंदर रहकर काम कर रही है... और मैं यह देखती हूं... कि यह आत्माएं ज्ञान रत्नों से सुसज्जित होकर अपने आस पास रहने वाले सभी आत्माओं को ध्यान रखने से सजाने की सेवा कर रही हैं...* उनका यह कर्म मुझे नया संदेश दे रहा है... मैं उसी समय अपने आप से और बाबा से अंदर ही अंदर अपनी मन बुद्धि के तारों से यह वादा करती हूं... कि मैं ब्राह्मण आत्मा अपने आप को अन्य ब्राह्मण आत्माओं के सामने एक सैंपल आत्मा बनकर दिखाऊंगी...

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा अपने आप को फूल की कली के अंदर अनुभव करती हूं... और परमात्मा रुपी सूर्य की किरणों से धीरे-धीरे उन फूल की कलियों से बाहर निकलते हुए अनुभव करती हूं... जैसे-जैसे मैं बाहर आती हूं... वैसे ही मुझे उस फूल के सेवा भाव के बारे में जानकारी प्राप्त होती है कि... यह छोटी सी कली परमात्मा रूपी सूर्य की किरणों से नहाकर अपने आपको खिले हुए फूल की भांति बनाकर इस पूरे संसार में पवित्र किरणों रूपी खुशबू फैला रही है... तभी मुझे अपने सामने कुछ फरिश्तों सी घूमती हुई आत्माएं नजर आती है... और मैं आत्मा उन फरिश्तों रूपी आत्माओं से अपनी मन बुद्धि के तारों को जोड़ते हुए कहती हूँ... *हे आत्माओं आप की सेवा इस फूल की भांति है... जो अपने परमपिता से योग लगाकर इस संसार में अन्य आत्माओं को भी इस रुद्र ज्ञान यज्ञ का ज्ञान दे रहे हैं...*

➳ _ ➳  अब मैं बनकर फरिश्ता चली जा रही हूं अन्य आत्माओं की रूहानी सेवा करने... मैं इस पृथ्वी के ऊपर अपने बाबा के साथ बैठी हूं... और इस संसार की सभी आत्माओं को बाबा से पवित्र और शांति की किरणें लेकर देती जा रही हूं... और मैं अनुभव कर रही हूं कि... इस सृष्टि की सभी आत्माएं शांति की अवस्था का आनंद ले रही है... उनको इस स्थिति में देख मुझे गहन शांति का अनुभव होता है... और *मुझे सभी ब्रह्माकुमार, ब्रह्माकुमारी की सेवा के बारे में और गहराई से ज्ञान प्राप्त होता है... और अपने भाग्य का भी स्मरण होता है... मुझे अहसास होता है कि मेरी एक एक कण की सेवा भी मेरी पदमों की कमाई है...* ऐसी भावना को आगे बढ़ाते हुए जुट जाती हूँ... अपनी बेहद की सेवा में...  और परमात्मा की छत्रछाया में...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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