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 04 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *श्रीमत पर भारत को पावन बनाने की सेवा की ?*

 

➢➢ *साक्षी होकर हर एक एक्टर का पार्ट देखा ?*

 

➢➢ *स्वमान द्वारा अभिमान को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *स्नेह द्वारा सहज याद का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जब आप अपनी बीजरूप स्थिति में स्थिति रहेंगे तो अनेक आत्माओं में समय की पहचान और बाप की पहचान का बीज पड़ेगा। अगर बीजरूप स्थिति में स्थित न रहे सिर्फ विस्तार में चले गये तो ज्यादा विस्तार से वैल्यु नहीं रहेगी, व्यर्थ हो जायेगा* इसलिए बीजरूप स्थिति में, बीजरूप की याद में स्थित हो फिर बीज डालो। फिर देखना उस बीज का फल कितना अच्छा और सहज निकलता है।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं पद्मापद्म भाग्यवान हूँ"*

 

✧  अपने को पद्मापद्म भाग्यवान समझते हो? हर कदम में पद्मों की कमाई जमा हो रही है? तो कितने पद्म जमा किये हैं? अनगिनत हैं? *क्योंकि जानते हैं कि जमा करने का समय अब है। सतयुग में जमा नहीं होगा। कर्म वहाँ भी होंगे लेकिन अकर्म होंगे। क्योंकि वहाँ के कर्म का सम्बन्ध भी यहाँ के कर्मे के फल के हिसाब में है। तो यहाँ है करने का समय और वहाँ है खाने का समय।* तो इतना अटेन्शन रहता है? कितने जन्मों के लिये जमा करना है? (84) जमा करने में खुशी होती है ना? मेहनत तो नहीं लगती? क्यों नहीं मेहनत महसूस होती है?

 

✧  क्योंकि प्रत्यक्षफल भी मिलता है। प्रत्यक्षफल मिलता है कि भविष्य के आधार पर चल रहे हो? भविष्य से भी प्रत्यक्षफल अति श्रेष्ठ है। सदा ही श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ प्रत्यक्षफल मिलने का साधन है कि सदा ये याद रखो कि 'अब नहीं तो कब नहीं'। जैसे नाम है डबल फारेनर्स, तो डबल का टाइटिल बहुत अच्छा है। *तो सबमें डबल-खुशी में, नशे में, पुरुषार्थ में, सबमें डबल। सेवा में भी डबल। और रहते भी सदा डबल हो, कम्बाइन्ड, सिंगल नहीं। कभी डबल होने का संकल्प तो नहीं आता?* कम्पनी चाहिये या कम्पैनियन चाहिये? चाहिये तो बता दो। ऐसे नहीं करना कि वहाँ जाकर कहो कम्पैनियन चाहिये। कितने भी कम्पैनियन करो लेकिन ऐसा कम्पैनियन नहीं मिल सकता। कितने भी अच्छे कम्पैनियन हो लेकिन सब लेने वाले होंगे, देने वाले नहीं। इस वर्ल्ड में ऐसा कम्पैनियन कोई है? अमेरिका, आस्ट्रेलिया, आफ्रीका आदि में थोड़ा ढूंढ कर आओ, मिलता है! क्योंकि मनुष्यात्मायें कितने भी देने वाले बनें फिर भी देते-देते लेंगे जरूर।

 

✧  *तो जब दाता कम्पैनियन मिले तो क्या करना चाहिये? कहाँ भी जाओ, फिर आना ही पड़ेगा। ये सब जाने वाले नहीं हैं। कोई कमजोर तो नहीं हैं? फोटो निकल रहा है। फिर आपको फोटो भेजेंगे कि आपने कहा था। कहो यह होना ही नहीं है। बापदादा भी आप सबके बिना अकेला नहीं रह सकता।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अपने देह भान से न्यारा - जैसे *साधारण दुनियावी आत्माओं को चलते-फिरते, हर कर्म करते स्वतः और सदा देह का भान रहता ही है,* मेहनत नहीं करते कि मैं देह हूँ न चाहते भी सहज स्मृति रहती ही है।

 

✧  *ऐसे कमल-आसनधारी ब्राह्मण आत्मायें भी इस देहभान से स्वतः ही ऐसे न्यारे रहें* जैसे अज्ञानी आत्म-अभिमान से न्यारे हैं। है ही आत्म-अभिमानी। शरीर का भान अपने तरफ आकर्षित न करें।

 

✧  जैसे ब्रह्मा बाप को देखा, चलते-फिरते फरिश्ता रूप वा देवता रूप स्वतः स्मृति में रहा। ऐसे *नैचुरल देहीअभिमानी स्थिति सदा रहे - इसको कहते हैं देहभान से न्यारे।* देहभान से न्यारा ही *परमात्म-प्यारा* बन जाता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ बापदादा ने आप ब्राह्मण आत्माओं को परिवर्तन किस आधार पर किया? सिर्फ स्मृति दिलाई कि *आप आत्मा हो, न कि शरीर। इस स्मृति ने कितना अलौकिक परिवर्तन कर लिया! सब-कुछ बदल गया ना!* कितनी छोटी-सी बात का परिवर्तन किया कि तुम शरीर नही आत्मा हो - *इस परिवर्तन होते ही आत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान होने कारण स्मृति आते ही समर्थ बन गई। अब यह समर्थ जीवन कितना प्यारा लगता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- फूल बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा फूलों के सुन्दर बगीचे में बैठ रंग-बिरंगे फूलों को देख मन्त्रमुग्ध हो रही हूँ... रंग-बिरंगे फूलों पर बैठ रंग-बिरंगी तितलियाँ भी मुस्कुरा रही हैं... चारों ओर का वातावरण भी सुगन्धित फूलों की खुशबू से महक उठा है...* जन्म-जन्मान्तर से मुझ आत्मा में चुभे हुए विकारों रूपी काँटों को निकाल मुझे भी खुशबूदार फूल बनाने वाले मीठे बागबान बाबा का आह्वान करती हूँ... फूलों को देखते हुए प्यारे बाबा मुझसे रूह-रिहान करते हैं...

 

  *मुझ पर फूलों की बारिश कर रूहानी सुगंध भरते हुए प्यारे बागबान बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... अब दुखदायी कांटे क्रोध को छोड़ मीठे बाबा संग मधुरता के पर्याय बनो... और *अपने दिव्य गुणो की खुशबु से सबके जीवन में खुशियो के फूल खिलाओ... सारे विश्व को अपनी ईश्वरीय दिव्यता पवित्रता का मुरीद बना आओ...*

 

_ ➳  *फूलों की रानी बन चारों ओर अपनी रूहानियत को फैलाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आप संग मिलकर तो पारस हो गई हूँ... *हर दिल आत्मा को आपसे पाये मीठे प्यार और गुणो की झलक दिखा रही हूँ... कौन मुझे मिला है और किसने इतना खुबसूरत फूल मुझे बनाया है... यह खुशबु पूरे जहान में फैला रही हूँ...*

 

  *उमंगो के पंख लगाकर मेरे मन में खुशियों के पुष्प बरसाते हुए मीठा बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... महान भाग्य को पाकर ईश्वर पुत्र जो बन गए हो तो बाप समान स्वरूप की अदा सारे विश्व में दिखाओ... *सबको प्रेम वर्षा से सिंचित कर रूहानियत के फूल खिला आओ... ईश्वरीय छत्रछाया में विकारो से मुक्त होकर सुंदर देवताई स्वरूप से सज जाओ... प्यार के मोती सबके दामन में सजा आओ...*

 

_ ➳  *विकारों से मुक्त होकर देवताई गुणों के सौंदर्य से महकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में तो क्रोध के जहरीले कांटे से मीठा महकता प्यार का फूल बन गई हूँ... *हर दिल को दुखो से दूर कर ईश्वरीय प्यार से सींचने वाली ज्ञान गंगा बन मुस्करा रही हूँ... रूहानी गुलाब बन चारो ओर खुशबु फैला रही हूँ...*

 

  *स्नेह प्यार की मीठी रिमझिम कर मुझे पावनता से सजाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... विश्व पिता के प्यार भरी छाँव में रूखेपन को छोड़ रूहानियत से भर जाओ... *मीठे पिता की यादो के सुनहरे संग में स्वयं को निखार कर अपने निखरे स्वरूप की झलक से सबके दुःख दूर करने वाले दुखहर्ता बन जाओ... सच्चे सच्चे फूल बन मुस्कराओ...*

 

_ ➳  *खुशियों के रंगों से अपने बेरंग जीवन को सजाकर आनंद के सागर में लहराते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा जो कभी मिठास क्या होता है... सच्चा प्रेम क्या होता है जानती ही न थी... *आज ईश्वरीय यादो में कितना प्यारा मीठा महकता फूल बन मुस्करा रही हूँ... सुख का पर्याय बन पूरे विश्व में सुख की लहर फैला रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- श्रीमत पर भारत को पावन बनाने की सेवा करनी है*"

 

_ ➳  जिस स्वर्णिम दुनिया की स्थापना करने के लिए भगवान इस धरा पर आये हैं वो दुनिया कितनी खूबसूरत होगी, *यह विचार करते - करते उस श्रेष्ठ भारत की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है जिसके लिए इतिहास में भी गायन है "जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा"*। अपने आने वाले उसी श्रेष्ठ भारत की सुंदर तस्वीर को मन बुद्धि के दिव्य नेत्र से मैं देख रही हूँ, वो भारत जिसमे हर मनुष्य दैवी गुण धारी होगा। सुख, शान्ति, सम्पन्नता से भरपूर होगा। *लेकिन भारत को ऐसा बनाने का सपना तभी सच होगा जब ईश्वरीय मत पर चल, भारत को श्रेष्ठ और मानव मात्र को दैवी गुणधारी बनाने का श्रेष्ठ संकल्प हर ब्राह्मण बच्चे का होगा*।

 

_ ➳  इन्ही श्रेष्ठ विचारों के साथ, श्रेष्ठ भारत का स्वप्न देखती मैं बाबा को वचन देती हूँ कि डायरेक्ट उनकी मत पर चल भारत को श्रेष्ठ और मानव मात्र को दैवी गुणधारी बनाने के उनके ईश्वरीय कार्य मे मैं तन - मन - धन हर प्रकार से सहयोगी अवश्य बनूँगी। *सबको परमात्म परिचय देने और उन्हें आप समान बनाने की नई - नई युक्तियाँ सोचते हुए, स्वयं को परमात्म बल से भरपूर करने के लिए अपने प्यारे प्रभू की याद में मैं बैठ, अपने मन और बुद्धि को अपने मस्तक के बीच भृकुटि पर एकाग्र कर, अपने प्वाइंट ऑफ लाइट स्वरूप में स्थित होती हूँ* और आत्म पँछी बन एक पल में ही देह रूपी वृक्ष की डाली को छोड़, एक ऊँची उड़ान भर कर, आत्म पंछियों की उस झिलमिलाती दुनिया में पहुंच जाती हूँ। जहाँ अनन्त परमात्म शक्तियाँ, अखुट खजाने हैं।

 

_ ➳  परमपिता परमात्मा के इस दिव्य लोक में जहाँ परमात्मा रहते हैं इस दिव्य धाम में चारों ओर फैली अथाह शान्ति मन को एक ऐसी तृप्ति का अनुभव करवा रही है जैसे आत्मा को जो चाहिए था वो मिल गया हो। *वो कम्प्लीट सैटिस्फैक्शन पाकर मुझ आत्मा को अथाह सुकून की अनुभूति हो रही है। यह अनुभूति मुझे सम्पूर्णता की स्थिति में स्थित कर रही है*। अपनी अनादि, सम्पूर्ण निरसंकल्प अवस्था में, एकटक अपने पिता परमात्मा को निहारते हुए मैं धीरे - धीरे उनके समीप जा रही हूँ। *अथाह शक्तियों के पुंज उस महाज्योति अपने पिता परमात्मा से निकल रही शक्तियां मुझे ऐसे दिखाई दे रही है जैसे किसी ऊँचे पहाड़ की चोटी से पानी का झरना अपने फुल फोर्स के साथ नीचे गिर रहा हो*।

 

_ ➳  अपने शिव पिता से आ रही सर्वशक्तियों की रंग बिरंगी किरणो के अति सुंदर, मनमोहक झरने के नीचे आकर, अब मैं सर्वशक्तियों की शीतल फुहारों का आनन्द ले रही हूँ। *एक - एक किरण को निहारते, असीम आनन्द का अनुभव करते, इन रिम - झिम फ़ुहारों के झरने के नीचे स्नान करके मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे ऊपर चढ़ी विकारों की मैल धीरे - धीरे उतर रही है और मेरा स्वरूप बहुत ही तेजोमय होता जा रहा है*। अपने इस अति तेजोमय स्वरूप को और अपने पिता परमात्मा के अनन्त प्रकाशमय स्वरूप को मैं मन्त्र मुग्ध होकर निहार रही हूँ और साथ - साथ परमात्म शक्तियों का बल स्वयं में भरकर शक्तिशाली भी बन रही हूँ। 

 

_ ➳  अपने पिता परमात्मा के साथ दिव्य मंगल मिलन मना कर और परमात्म बल स्वयं में भरकर अब मैं आत्मा परमात्म कर्तव्य में सहयोगी बन, उस कर्तव्य को पूरा करने के लिए वापिस साकारी दुनिया की ओर लौट आती हूँ। *अपने साकारी तन में मैं आत्मा आकर फिर से अपने अकाल तख्त पर बैठ जाती हूँ* और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, भारत को श्रेष्ठ और मानव मात्र को दैवी गुणधारी बनाने की परमात्म सेवा में सहयोग देने के लिए मैं डायरेक्ट ईश्वर की मत पर चल कर, अपने संकल्प, बोल और कर्म को श्रेष्ठ और दिव्य बना कर सबको आप समान बनाने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। 

 

_ ➳  *हर घर मंदिर बन जाये, और हर मानव देव बन जाये इसी शुभ - भावना और शुभ - कामना के साथ, अपने साकारी और आकारी दोनों स्वरूपो द्वारा, सबको परमात्म ज्ञान देकर मैं भारत को श्रेष्ठ और सबको दैवी गुणधारी बनाने की सेवा अब निरन्तर कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं स्वमान द्वारा अभिमान को समाप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा निर्मान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा स्नेह को ही सहज याद का साधन बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा स्नेही रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा सर्व को स्नेही बनाती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *सेवा में सफलता नहीं मिलती तो दिलशिकस्त मत बनो कुछ भी सेवा करो चाहे जिज्ञासू कोर्स वाले आवे या नहीं आवे लेकिन स्वयंस्वयं से सन्तुष्ट रहो।* निश्चय रखो कि अगर मैं सन्तुष्ट हूँ तो आज नहीं तो कल यह मैसेज काम करेगाकरना ही है। इसमें थोड़ा सा उदास नहीं बनो। खर्चा तो किया.... प्रोग्राम भी किया.... लेकिन आया कोई नहीं। *स्टूडेन्ट नहीं बढ़ेकोई हर्जा नहीं आपने तो किया ना। आपके हिसाब-किताब में जमा हो गया* और उन्हों को भी सन्देश मिल गया। तो टाइम पर सभी को आना ही हैइसलिए करते जाओ। *खर्चा बहुत हुआउसको नहीं सोचो। अगर स्वयं सन्तुष्ट हो तो खर्चा सफल हुआ।* घबराओ नहींपता नहीं क्या हुआ!

 

 _ ➳  कई बच्चे ऐसे कहते हैं मेरा योग ठीक नहीं थातभी यह हुआ। किससे योग थाऔर कोई है क्या जिससे योग था? *योग है और सदा रहेगा। बाकी कोई सीजन का फल हैकोई हर समय का फल है। तो अगर आया नहीं तो सीजन का फल है, सीजन आयेगी। दिलशिकस्त नहीं बनो।* क्योंकि श्रीमत को तो माना ना। श्रीमत प्रमाण कार्य किया। इसीलिए *श्रीमत को मानना यह भी एक सफलता है। बढ़ते जाओकरते जाओ l* और ही पश्चाताप करके आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कहा हमने नहीं माना। यहाँ ही आप देवियां बनेंगी। आपके पांव पर पड़ेंगेतभी तो भक्ति में भी पांव पड़ेंगे ना। तो वह टाइम भी आना है जो सब आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कितना अच्छा हमारा कल्याण किया।

 

 _ ➳  *जिस समय थकावट फील हो ना तो कहाँ भी जाकर डांस शुरू कर दो।* चाहे बाथरूम में। क्या है इससे मूड चेंज हो जायेगी। चाहे मन की खुशी में नाचोअगर वह नहीं कर सकते हो तो स्थूल में गीत बजाओ और नाचो। फारेन में डांस तो सबको आता है। डांस करने में तो होशियार हैं। फरिश्ता डांस तो आता है। अच्छा।

 

✺   *ड्रिल :-  "निश्चय और सन्तुष्टता से सेवा करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा सफलता का चमकता सितारा हूँ*... मैं आत्मा अपना फरिश्ता रूप धारण कर... उड़ कर पहुँच जाती हूँ... ज्ञान के सागर प्यारे बापदादा के पास... *उनसे ज्ञान की गुह्य से गुह्य बातों को अपने में धारण कर रही हूँ*... मैं आत्मा ज्ञान की देवी विश्व के ग्लोब पर विराजमान होकर... सारे विश्व की आत्माओं को... श्रेष्ठ ज्ञान का प्रकाश बांट रही हूँ...

 

 _ ➳  मैं ज्ञान का फरिश्ता बन कर पहुँच जाती हूँ बाबा के प्रोग्राम में... और वहाँ पर मैं आत्मा जिज्ञासुओं को कोर्स करवा रही हूँ... इसमें कोई रेग्युलर स्टूडेंट नहीं भी बनता है... तो मैं आत्मा *दिलशिकस्त नहीं होती हूँ... क्योंकि बाबा ने समझाया है कि बच्चे... जो सीजन का फल है वो सीजन में ही आता है*... और कोई सदाबहार यानी हर समय का फल है... तो अगर नहीं आया माना सीजन का फल है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपनी सेवा श्रीमत के अनुसार कर रही हूँ... और *श्रीमत को मानना भी सफलता ही है*... और मैं आत्मा अपनी सेवा से सम्पूर्ण संतुष्ट हूँ... मुझे इस बात का सम्पूर्ण निश्चय है कि... *जो ज्ञान का बीज बोया है वो जरूर फलीभूत होगा...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपनी सेवा करते हुए निरंतर आगे बढ़ती जा रही हूँ... बाबा ने कहा है कि *बच्चे ऐसा दिन आएगा की सभी भक्त आत्‍माएँ... आप देवियों के पांव पड़ेंगे*... और वह समय आ गया है... मुझ आत्मा के सामने कुछ आत्माएँ पश्चाताप कर रही है... और मेरे पास आकर खड़ी है... मुझसे कह रही है... *आप ने हमें सत्य मार्ग दिखाया था... लेकिन हमने नहीं माना*... आप ने हमारा कितना अच्छा कल्याण किया है... कि आप ने हमें अपने परमपिता से मिला दिया... सारी भक्त आत्माएँ मेरा धन्यवाद कर रही है... और मैं बाबा का धन्यवाद कर रही हूँ कि... उन्होंने मुझ आत्मा को इतना ऊंचा उठा दिया...

 

 _ ➳  *मैं आत्मा दृढ़ निश्चय और सन्तुष्टता से सदा सफलता प्राप्त कर रही हूँ*... जब भी मैं आत्मा मैं थकावट महसूस करती हूँ... तो मैं आत्मा अपने मूड को चेंज करने के लिए... डांस करने लगती हूँ... या मन का डांस करती हूँ... या कोई अच्छा बाबा का गीत सुनती हूँ... जिससे मुझ आत्मा का मूड फट से चेंज हो जाता है... और थकावट भी नहीं रहती है... मैं आत्मा अब समझ चुकी हूँ... *सेवा में सदा सफलता के लिए... एक ही मंत्र है "बाबा में निश्चय और सेवा से सन्तुष्टता"*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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