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 04 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कोई भी चीज़ छिपाकर तो नहीं ली ?*

 

➢➢ *अशुद्ध अहंकार का त्याग किया ?*

 

➢➢ *सूक्षम संकल्पों के बंधन से भी स्वयं को मुक्त किया ?*

 

➢➢ *देहि अभिमानी स्थिति द्वारा तन और मन की हलचल को समाप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जब आप अपनी बीजरूप स्थिति में स्थिति रहेंगे तो अनेक आत्माओं में समय की पहचान और बाप की पहचान का बीज पड़ेगा। अगर बीजरूप स्थिति में स्थित न रहे सिर्फ विस्तार में चले गये तो ज्यादा विस्तार से वैल्यु नहीं रहेगी, व्यर्थ हो जायेगा* इसलिए बीजरूप स्थिति में, बीजरूप की याद में स्थित हो फिर बीज डालो। फिर देखना उस बीज का फल कितना अच्छा और सहज निकलता है।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं पद्मापद्म भाग्यवान हूँ"*

 

✧  अपने को पद्मापद्म भाग्यवान समझते हो? हर कदम में पद्मों की कमाई जमा हो रही है? तो कितने पद्म जमा किये हैं? अनगिनत हैं? *क्योंकि जानते हैं कि जमा करने का समय अब है। सतयुग में जमा नहीं होगा। कर्म वहाँ भी होंगे लेकिन अकर्म होंगे। क्योंकि वहाँ के कर्म का सम्बन्ध भी यहाँ के कर्मे के फल के हिसाब में है। तो यहाँ है करने का समय और वहाँ है खाने का समय।* तो इतना अटेन्शन रहता है? कितने जन्मों के लिये जमा करना है? (84) जमा करने में खुशी होती है ना? मेहनत तो नहीं लगती? क्यों नहीं मेहनत महसूस होती है?

 

✧  क्योंकि प्रत्यक्षफल भी मिलता है। प्रत्यक्षफल मिलता है कि भविष्य के आधार पर चल रहे हो? भविष्य से भी प्रत्यक्षफल अति श्रेष्ठ है। सदा ही श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ प्रत्यक्षफल मिलने का साधन है कि सदा ये याद रखो कि 'अब नहीं तो कब नहीं'। जैसे नाम है डबल फारेनर्स, तो डबल का टाइटिल बहुत अच्छा है। *तो सबमें डबल-खुशी में, नशे में, पुरुषार्थ में, सबमें डबल। सेवा में भी डबल। और रहते भी सदा डबल हो, कम्बाइन्ड, सिंगल नहीं। कभी डबल होने का संकल्प तो नहीं आता?* कम्पनी चाहिये या कम्पैनियन चाहिये? चाहिये तो बता दो। ऐसे नहीं करना कि वहाँ जाकर कहो कम्पैनियन चाहिये। कितने भी कम्पैनियन करो लेकिन ऐसा कम्पैनियन नहीं मिल सकता। कितने भी अच्छे कम्पैनियन हो लेकिन सब लेने वाले होंगे, देने वाले नहीं। इस वर्ल्ड में ऐसा कम्पैनियन कोई है? अमेरिका, आस्ट्रेलिया, आफ्रीका आदि में थोड़ा ढूंढ कर आओ, मिलता है! क्योंकि मनुष्यात्मायें कितने भी देने वाले बनें फिर भी देते-देते लेंगे जरूर।

 

✧  *तो जब दाता कम्पैनियन मिले तो क्या करना चाहिये? कहाँ भी जाओ, फिर आना ही पड़ेगा। ये सब जाने वाले नहीं हैं। कोई कमजोर तो नहीं हैं? फोटो निकल रहा है। फिर आपको फोटो भेजेंगे कि आपने कहा था। कहो यह होना ही नहीं है। बापदादा भी आप सबके बिना अकेला नहीं रह सकता।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अपने देह भान से न्यारा - जैसे *साधारण दुनियावी आत्माओं को चलते-फिरते, हर कर्म करते स्वतः और सदा देह का भान रहता ही है,* मेहनत नहीं करते कि मैं देह हूँ न चाहते भी सहज स्मृति रहती ही है।

 

✧  *ऐसे कमल-आसनधारी ब्राह्मण आत्मायें भी इस देहभान से स्वतः ही ऐसे न्यारे रहें* जैसे अज्ञानी आत्म-अभिमान से न्यारे हैं। है ही आत्म-अभिमानी। शरीर का भान अपने तरफ आकर्षित न करें।

 

✧  जैसे ब्रह्मा बाप को देखा, चलते-फिरते फरिश्ता रूप वा देवता रूप स्वतः स्मृति में रहा। ऐसे *नैचुरल देहीअभिमानी स्थिति सदा रहे - इसको कहते हैं देहभान से न्यारे।* देहभान से न्यारा ही *परमात्म-प्यारा* बन जाता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ बापदादा ने आप ब्राह्मण आत्माओं को परिवर्तन किस आधार पर किया? सिर्फ स्मृति दिलाई कि *आप आत्मा हो, न कि शरीर। इस स्मृति ने कितना अलौकिक परिवर्तन कर लिया! सब-कुछ बदल गया ना!* कितनी छोटी-सी बात का परिवर्तन किया कि तुम शरीर नही आत्मा हो - *इस परिवर्तन होते ही आत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान होने कारण स्मृति आते ही समर्थ बन गई। अब यह समर्थ जीवन कितना प्यारा लगता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस दुनिया से ममत्व मिटाना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एकांत में घर में बाबा के कमरे में बैठी हूँ... इस देह और देह की दुनिया से अपना सारा ध्यान हटाकर भृकुटी के मध्य केन्द्रित करती हूँ... भृकुटी के भव्य सिंहासन पर बैठी मैं हीरे जैसे चमकती हुई मणि हूँ...* अविनाशी आत्मा हूँ... परमधाम में रहने वाले परमपिता परमात्मा की संतान हूँ... धीरे-धीरे फ़रिश्ता स्वरुप धारण कर आकाश मार्ग से होते हुए इस विनाशी दुनिया से परे सूक्ष्म वतन में पहुँच जाती हूँ... बापदादा के पास... और उनकी गोद में बैठ जाती हूँ... *प्यारे बाबा मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए प्यारी शिक्षाएं देते हैं...*

 

  *अपने प्यार की बरसात में मुझे भिगोते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *अब ईश्वर पिता का मखमली हाथ थाम कर जो देह के मटमैलेपन से बाहर निकले हो तो इस मीठे भाग्य की मधुरता में खो जाओ... ईश्वर पिता से प्यार कर फिर देह की दुनिया की ओर रुख न करो...* इन मधुर यादो में खोकर अपना सुनहरा सतयुगी भाग्य सजाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा की मीठी यादों में डूबकर बाबा से कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके हाथ और साथ को पाकर नये पवित्र जन्म को पा ली हूँ... *आपकी मीठी सी यादो में... देह की अपवित्र दुनिया से निकल कर सतयुगी खुबसूरत सुखो की मालकिन सी सज संवर रही हूँ...*

 

  *मेरे हर श्वांस में अपना नाम लिखते हुए आप समान बनाते हुए मीठा बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... कितने मीठे भाग्य से सज गए हो... मीठे बाबा की पसन्द बनकर धरा पर खुशनुमा इठला रहे हो... *इन प्यारी यादो में इस कदर खो जाओ कि... सिवाय बाबा के जेहन में कोई भी याद शेष न हो... ऐसे गहरे दिल के तार ईश्वर पिता से जोड़ लो कि वही दिल पर हमेशा छाया रहे...*

 

_ ➳  *विनाशी दुनिया से जीते जी मरकर अविनाशी सुखों में उड़ते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा दुखो की दुनिया से निकल कर सच्चे प्यार की छाँव में आ गयी हूँ... *प्यारे बाबा आपकी सुखभरी छत्रछाया मे पुरानी दुनिया से मरकर नये ब्राह्मण जन्म को पा गयी हूँ...* और यहाँ से घर चलकर सुखो की नगरी में आने का मीठा भाग्य पा रही हूँ..."

 

  *इस दुनिया से न्यारी बनाकर अपनी मीठी गोद की छत्र छाया में बिठाकर मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अब पुरानी दुनिया की हर बात से उपराम होकर सच्ची यादो में अंतर्मन को छ्लकाओ... *सच्चे प्यार से सदा का नाता जोड़कर उसके प्रेम में प्रति पल भीग जाओ... इन यादो में इतने गहरे डूब जाओ कि... बस उसके सिवाय दुनिया भूली सी हो...*

 

_ ➳  *मेरा तो एक शिव बाबा- इस स्वमान में टिककर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार में रोम रोम से भीगकर... *सच्चे प्रेम को जीने वाली महान भाग्य की धनी हो गयी हूँ... मीठे बाबा अब आप ही मेरा सच्चा सहारा हो...* और आपके संग साथी बनकर ही मुझे अपने घर चलना है..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक बाप के सिवाय दूसरा कोई भी याद ना पड़े, यही पुरुषार्थ करना है*"

 

_ ➳  "यादें तुम्हारी बाबा देती सुकून दिल को" मन ही मन ये गीत गुनगुनाते हुए बाबा की मीठी दिल को सुकून देने वाली याद में मैं खो जाती हूँ और अपने मीठे प्यारे बाबा के स्वरूप पर अपने मन और बुद्धि को पूरी तरह एकाग्र कर देती हूँ। *परमधाम में मेरे ज्ञान सूर्य शिव बाबा का शक्तियों की अनन्त किरणे बिखेरता हुआ सुन्दर मनोहर स्वरूप मेरी आँखों के सामने स्पष्ट दिखाई देने लगता है*। सूर्य के समान चमकते उस सुन्दर सलौने स्वरूप का आकर्षण मुझे सहज ही अपनी और खींचने लगता है और अपने प्यारे बाबा के उस सुन्दर स्वरूप को अपने नयनो में बसाये मैं अति शीघ्र उनके पास जाने की रूहानी यात्रा पर स्वत: ही चल पड़ती हूँ। *मन बुद्धि की एक ऐसी यात्रा जिसमें देह और देह से जुड़ी किसी भी वस्तु की कोई आवश्यकता नही केवल अपने निराकार स्वरूप में स्थित होकर मन बुद्धि के विमान पर बैठ अपने स्वीट साइलेन्स होम में जाना ही अपनी मंजिल को पाना है*।

 

_ ➳  अपनी उस मंजिल अर्थात अपने स्वीट साइलेन्स होम में जाने के लिए अब मैं सभी बातों से किनारा कर अपने मन और बुद्धि को हर संकल्प, विकल्प से हटा लेती हूँ और अपने ध्यान को मस्तक के सेन्टर में एकाग्र कर, अपने स्वरूप पर केंद्रित कर लेती हूँ। *अपने स्वरूप में स्थित होते ही मन बुद्धि का कनेक्शन अब देह और देह की दुनिया से हट कर मेरे प्यारे पिता के साथ जुड़ जाता है और मन स्वत: ही उनकी तरफ खिंचने लगता है*। उनके प्यार के एहसास की मधुर स्मृति मुझे देह और देह की दुनिया से पूरी तरह उपराम कर देती हैं और मैं अनुभव करती हूँ जैसे परमधाम से मेरे प्यारे पिता की सर्वशक्तियों की लाइट सीधी मुझ आत्मा के साथ आ कर कनेक्ट हो गई है। 

 

_ ➳  परमात्म शक्तियों का तेज करेन्ट मुझ आत्मा में प्रवाहित होकर मुझे ऊपर अपनी ओर खींचने लगा है। इस लाइट के साथ मैं आत्मा अब देह से निकल कर ऊपर की ओर जा रही हूँ। 5 तत्वों की बनी साकारी दुनिया को पार करके फरिश्तो की आकारी दुनिया से होती हुई अब मैं आत्माओं की निराकारी दुनिया मे प्रवेश कर चुकी हूँ और देख रही हूँ इस अन्तहीन ब्रह्माण्ड को जहाँ चारो और शान्ति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स फैले हुए हैं। *इस अन्तहीन ब्रह्माण्ड में जगमग करती चैतन्य मणियो में बीच अखण्ड ज्योतिर्मय शक्तियों के पुंज ज्ञानसूर्य अपने शिव पिता को मैं देख रही हूँ। उनकी सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ कर मैं उनकी सारी शक्तियों को अपने अंदर भर रही हूँ*। देह भान में आने के कारण, मुझ आत्मा की बैटरी जो डिसचार्ज हो गई थी वो परमात्म शक्तियों के बल से पुनः चार्ज हो रही है।

 

_ ➳  परमात्म लाइट मेरे अंदर समाती जा रही हैं और मैं स्वयं बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा अपनी सारी शक्तियाँ मेरे अंदर भरकर मुझे ऊर्जा का भण्डार बना रहें हैं। सर्वशक्तियों से सम्पन्न, ऊर्जावान बन कर अब मैं वापिस साकारी लोक में आ कर अपने साकारी तन में विराजमान हो कर इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर फिर से अपना पार्ट बजा रही हूँ। *किन्तु देह और देह की दुनिया में रहते हुए भी निरन्तर अपने प्यारे पिता की याद की धुन में ही अब मैं सदैव मगन रहती हूँ। सृष्टि का यह नाटक अब पूरा हो रहा है और मुझे वापिस अपने धाम जाना है इस बात को सदैव स्मृति में रख, देह और देह की दुनिया से स्वयं को उपराम रखने का मैं पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ*।

 

_ ➳  बाबा की मीठी याद की धुन में खोई स्वयं को उनके प्यार से मैं हर समय भरपूर अनुभव करने लगी हूँ इसलिए हर पल उनके प्यार के झूले में झूलते हुए, सर्व सम्बन्धो का सुख उनसे लेते हुए मैं देह और देह की दुनिया से अब नष्टोमोहा बनने लगी हूँ। *देह और देह के सम्बन्धियों के बीच रहते, उनसे तोड़ निभाते, बुद्धि का योग अपने शिव पिता के साथ जोड़, मन बुद्धि से ऊपर वास करते हुए अब मैं स्वयं को सदा परमात्म शक्तियों की छत्रछाया के नीचे अनुभव करती हूँ*। सदा बाबा की याद की धुन में रहने से बाबा की याद सुरक्षा कवच बन कर मुझे माया के हर वार से अब बचा कर रखती है। *बाबा की याद रूपी सेफ्टी के किले के अन्दर, हर पल बाबा के साथ रहते हुए, सदैव अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करते हुए, परमात्म प्यार के झूले में झूलते, परमात्म पालना में पलने का सुखद अनुभव अब मैं निरन्तर कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सूक्ष्म संकल्पों के बंधन से भी मुकत रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं ऊंची स्टेज का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निर्बंधन आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव देही अभिमानी स्थिति में स्थित हूँ  ।*

   *मैं आत्मा तन और मन की हलचल को समाप्त करती हूँ  ।*

   *मैं अचल आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *सेवा में सफलता नहीं मिलती तो दिलशिकस्त मत बनो कुछ भी सेवा करो चाहे जिज्ञासू कोर्स वाले आवे या नहीं आवे लेकिन स्वयंस्वयं से सन्तुष्ट रहो।* निश्चय रखो कि अगर मैं सन्तुष्ट हूँ तो आज नहीं तो कल यह मैसेज काम करेगाकरना ही है। इसमें थोड़ा सा उदास नहीं बनो। खर्चा तो किया.... प्रोग्राम भी किया.... लेकिन आया कोई नहीं। *स्टूडेन्ट नहीं बढ़ेकोई हर्जा नहीं आपने तो किया ना। आपके हिसाब-किताब में जमा हो गया* और उन्हों को भी सन्देश मिल गया। तो टाइम पर सभी को आना ही हैइसलिए करते जाओ। *खर्चा बहुत हुआउसको नहीं सोचो। अगर स्वयं सन्तुष्ट हो तो खर्चा सफल हुआ।* घबराओ नहींपता नहीं क्या हुआ!

 

 _ ➳  कई बच्चे ऐसे कहते हैं मेरा योग ठीक नहीं थातभी यह हुआ। किससे योग थाऔर कोई है क्या जिससे योग था? *योग है और सदा रहेगा। बाकी कोई सीजन का फल हैकोई हर समय का फल है। तो अगर आया नहीं तो सीजन का फल है, सीजन आयेगी। दिलशिकस्त नहीं बनो।* क्योंकि श्रीमत को तो माना ना। श्रीमत प्रमाण कार्य किया। इसीलिए *श्रीमत को मानना यह भी एक सफलता है। बढ़ते जाओकरते जाओ l* और ही पश्चाताप करके आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कहा हमने नहीं माना। यहाँ ही आप देवियां बनेंगी। आपके पांव पर पड़ेंगेतभी तो भक्ति में भी पांव पड़ेंगे ना। तो वह टाइम भी आना है जो सब आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कितना अच्छा हमारा कल्याण किया।

 

 _ ➳  *जिस समय थकावट फील हो ना तो कहाँ भी जाकर डांस शुरू कर दो।* चाहे बाथरूम में। क्या है इससे मूड चेंज हो जायेगी। चाहे मन की खुशी में नाचोअगर वह नहीं कर सकते हो तो स्थूल में गीत बजाओ और नाचो। फारेन में डांस तो सबको आता है। डांस करने में तो होशियार हैं। फरिश्ता डांस तो आता है। अच्छा।

 

✺   *ड्रिल :-  "निश्चय और सन्तुष्टता से सेवा करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा सफलता का चमकता सितारा हूँ*... मैं आत्मा अपना फरिश्ता रूप धारण कर... उड़ कर पहुँच जाती हूँ... ज्ञान के सागर प्यारे बापदादा के पास... *उनसे ज्ञान की गुह्य से गुह्य बातों को अपने में धारण कर रही हूँ*... मैं आत्मा ज्ञान की देवी विश्व के ग्लोब पर विराजमान होकर... सारे विश्व की आत्माओं को... श्रेष्ठ ज्ञान का प्रकाश बांट रही हूँ...

 

 _ ➳  मैं ज्ञान का फरिश्ता बन कर पहुँच जाती हूँ बाबा के प्रोग्राम में... और वहाँ पर मैं आत्मा जिज्ञासुओं को कोर्स करवा रही हूँ... इसमें कोई रेग्युलर स्टूडेंट नहीं भी बनता है... तो मैं आत्मा *दिलशिकस्त नहीं होती हूँ... क्योंकि बाबा ने समझाया है कि बच्चे... जो सीजन का फल है वो सीजन में ही आता है*... और कोई सदाबहार यानी हर समय का फल है... तो अगर नहीं आया माना सीजन का फल है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपनी सेवा श्रीमत के अनुसार कर रही हूँ... और *श्रीमत को मानना भी सफलता ही है*... और मैं आत्मा अपनी सेवा से सम्पूर्ण संतुष्ट हूँ... मुझे इस बात का सम्पूर्ण निश्चय है कि... *जो ज्ञान का बीज बोया है वो जरूर फलीभूत होगा...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपनी सेवा करते हुए निरंतर आगे बढ़ती जा रही हूँ... बाबा ने कहा है कि *बच्चे ऐसा दिन आएगा की सभी भक्त आत्‍माएँ... आप देवियों के पांव पड़ेंगे*... और वह समय आ गया है... मुझ आत्मा के सामने कुछ आत्माएँ पश्चाताप कर रही है... और मेरे पास आकर खड़ी है... मुझसे कह रही है... *आप ने हमें सत्य मार्ग दिखाया था... लेकिन हमने नहीं माना*... आप ने हमारा कितना अच्छा कल्याण किया है... कि आप ने हमें अपने परमपिता से मिला दिया... सारी भक्त आत्माएँ मेरा धन्यवाद कर रही है... और मैं बाबा का धन्यवाद कर रही हूँ कि... उन्होंने मुझ आत्मा को इतना ऊंचा उठा दिया...

 

 _ ➳  *मैं आत्मा दृढ़ निश्चय और सन्तुष्टता से सदा सफलता प्राप्त कर रही हूँ*... जब भी मैं आत्मा मैं थकावट महसूस करती हूँ... तो मैं आत्मा अपने मूड को चेंज करने के लिए... डांस करने लगती हूँ... या मन का डांस करती हूँ... या कोई अच्छा बाबा का गीत सुनती हूँ... जिससे मुझ आत्मा का मूड फट से चेंज हो जाता है... और थकावट भी नहीं रहती है... मैं आत्मा अब समझ चुकी हूँ... *सेवा में सदा सफलता के लिए... एक ही मंत्र है "बाबा में निश्चय और सेवा से सन्तुष्टता"*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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