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 04 / 12 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कोई भी बहाना न कर बाप की श्रीमत पर चलते रहे ?*

 

➢➢ *"हमारा ऊंचे ते उंच घराना है" - यह भूले तो नहीं ?*

 

➢➢ *ब्राह्मण जीवन की विशेषता और विचित्रता को स्मृति में रख सेवा की ?*

 

➢➢ *जीवन में निर्माणता और अथॉरिटी का बैलेंस रख बेपरवाह बादशाह बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  *जैसे अनेक जन्म अपने देह के स्वरूप की स्मृति नेचुरल रही है वैसे ही अपने असली स्वरूप की स्मृति का अनुभव थोड़ा समय भी नहीं करेंगे क्या?* यह पहला पार्ट कम्पलीट करो तब अपनी आत्म-अभिमानी स्थिति द्वारा सर्व आत्माओं को साक्षात्कार कराने के निमित्त बनेंगे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सर्व प्रप्तियों से भरपूर आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को सर्व प्राप्तियों से भरपूर अनुभव करते हो? कभी खाली तो नहीं हो जाते? क्योंकि बाप ने इतनी प्राप्तियां कराई हैं, अगर सर्व प्राप्ति अपने में जमा करो तो कभी भी खाली नहीं हो सकते। इस जन्म की तो बात ही नहीं है लेकिन अनेक जन्म भी यहां की भरपूरता साथ रहेगी। तो जब इतना दिया है जो भविष्य में भी चलना है, तो अभी खाली कैसे होंगे? *अगर बुद्धि खाली रही तो हलचल रहेगी। कोई भी चीज अगर फुल भरी नहीं होती तो उसमें हलचल होती है। तो भरपूर होने की निशानी है कि माया को आने की मार्जिन नहीं है। माया ही हिलाती है।*

 

  तो माया आती है या नहीं? *संकल्प में भी आती है, माया के राज्य में तो आधाकल्प अनुभव किया और अभी अपने राज्य में जा रहे हो। जब मायाजीत बनेंगे तब फिर अपना राज्य आयेगा और मायाजीत बनने का सहज साधन - सदा प्राप्तियों से भरपूर रहो। कोई एक भी प्राप्ति से वंचित नहीं रहो। सर्व प्राप्ति हो।*

 

  ऐसे नहीं - यह तो है, एक बात नहीं तो कोई हर्जा नहीं। अगर जरा भी कमी होगी तो माया छोड़ेगी नहीं, उसी जगह से हिलायेगी। तो माया को आने की मार्जिन ही न हो। आ गई, फिर भगाओ तो उसमें टाइम जाता है। तो मायाजीत बने हो? यह नहीं सोचो- 2 वर्ष या 3 वर्ष में हो जायेंगे। *ब्राह्मणों के लिए स्लोगन है - 'अब नहीं तो कभी नहीं'। अब समय की रफ्तार के प्रमाण कोई भी समय कुछ भी हो सकता है। इसलिए तीव्र पुरुषार्थी बनो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *अभी-अभी अशरीरी हुए या युद्ध में, मेहनत करते-करते टाइम पूरा हो गया?* सेकण्ड में बन सकते हो! बहुत काम है फिर भी बन सकते हो? मुश्किल नहीं है? यू.एन. में बहुत भाग दौड कर रही हो और अशरीरी बनने की कोशिश करो, होगा?

 

✧  अगर यह अभ्यास समय प्रति समय करेंगे तो ऐसे ही नेचुरल हो जायेगा जैसे शरीर भान में आना, मेहनत करते हो क्या? मैं फलानी हूँ यह मेहनत करते हो? नेचुरल है। तो यह भी नेचुरल हो जायेगा। *जब चाहो अशरीरी बनो, जब चाहो शरीर में आओ।*

 

✧  अच्छा काम है आओ इस शरीर का आधार लो लेकिन आधार लेने वाली मैं आत्मा हूँ वह नहीं भूले। करने वाली नहीं हूँ, कराने वाली हूँ जैसे दूसरों से काम कराते हो ना। उस समय अपने को अलग समझते हो ना! वैसे *शरीर से काम कराते हुए भी कराने वाली मैं आत्मा अलग हूँ यह प्रैक्टिस करो तो कभी भी बॉडी कान्सेस की बातों में नीच-ऊपर नहीं होंगे।* समझा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *अभी यह साकार से अव्यक्त रूप का पार्ट क्यों हुआ? सबको अव्यक्त स्थिति में स्थित कराने। क्योंकि अब तक उस स्टेज तक नहीं पहुँचे हैं। अभी अन्तिम पुरुषार्थ यह रह गया है। इसी से ही साक्षात्कार होंगे।* साकार स्वरूप के नशे की प्वाइन्ट्स तो बहुत हैं कि मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ और मैं शक्ति हूँ। इस स्मृति से तो आपको नशे और खुशी का अनुभव होगा। लेकिन जब तक इस अव्यक्त स्वरूप में, लाइट के कार्ब में स्वयं को अनुभव न किया है, तब तक औरों को आपका साक्षात्कार नहीं हो सकेगा। *क्योंकि जो दैवी स्वरूप का साक्षात्कार भक्तों को होगा वह लाइट रूप की कार्ब में चलते-फिरते रहने से ही होगा।* साक्षात्कार भी लाइट के बिना नहीं होता है। स्वयं जब लाइट रूप में स्थित होंगे, आपके लाइट रूप के प्रभाव से ही उनको साक्षात्कार होगा। *जैसे शास्त्रों में दिखाते हैं कि कंस ने कुमारी को मारा तो वह उड़ गई, साक्षात् रूपधारी हो गई और फिर आकाशवाणी की। वैसे ही आप लोगों का साक्षात्कार होगा, तो ऐसा अनुभव होगा कि मानो यह देवी द्वारा आकाशवाणी हो रही है।* वह सुनने को इच्छुक होंगे कि यह देवी या शक्ति मेरे प्रति क्या आकाशवाणी करती है। *आप में अब यह नवीनता दिखाई दे। साधारण बोल नज़र न आयें, ऊपर से आकाशवाणी हो रही है, बस ऐसा अनुभव हो।* इसलिए कहा कि अब ज्वालामुखी बनने का समय है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

*✺ "ड्रिल :- एवर प्योर बनने रूहानी योग करना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा बगीचे में पौधों को पानी देते हुए फूल पर बैठी तितली को देख रही हूँ... उसके रंग-बिरंगे पंख मन को भा रहे हैं... सुंदर-सुंदर प्यारी तितली एक-एक फूल के कानों में जा धीरे से कुछ कहती है... कलियाँ खुश हो रही हैं... फूल भी मुस्कुरा रहे हैं... तितली रानी इस डाली से उस डाली पर उड़-उड़कर फूल-फूल का रस ले रही है... एक जगह ठहरती नहीं, किसी के भी हाथ नहीं आती है... *मैं आत्मा मेरे जीवन में रंग भरकर, सर्व संबंधों का रस पान कराने वाले प्यारे बाबा के पास... रूहानी सैर करने तितली बन उड़ जाती हूँ...*

 

  *प्यारे बाबा मुझे गुप्त रूहानी याद की यात्रा कराते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वर पिता की यादो में ही सच्ची कमाई है... इन मीठी यादो में हर साँस संकल्प को पिरो दो... *यह मीठी यादे ही सतयुग के सुनहरी सुखो को जीवन में बहार सा खिलाएंगी... इसलिए हर साँस में ईश्वर पिता को प्यार कर लो...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपना बुद्धि योग एक बाबा की याद में डुबोकर प्यार से कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा आपकी मीठी महकती यादो में एवरहेल्दी बनती जा रही हूँ... अपार सुखो में, आनन्द के झूलो में झूलने वाली सौभाग्यशाली बन रही हूँ...* सच्ची कमाई करने वाली सबसे अमीर हो गई हूँ...

 

  *मीठे बाबा मुझ आत्मा तितली को याद प्यार के रंग बिरंगी पंखों से सजाते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... इंसानी यादो ने खोखला कर बेवफाई से सिला देकर ठगा है... सच्चे प्रेम और वफादारी का पर्याय... प्यार के सागर बाबा से बेपनाह मोहब्बत कर लो... *इस प्रेम के रंग में रंगकर आत्मा को अनन्त सुख और कमाई से भर कर सदा का मुस्कराओ... इस यात्रा में कभी रुकना नहीं...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा गोपी वल्लभ की सच्ची सच्ची गोपिका बन उसकी यादों में प्रेममय होकर कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा ईश्वरीय प्यार को पाकर रोम रोम से पुलकित हूँ... *इतना प्यारा बाबा साथी पाकर मै आत्मा सदा की निश्चिन्त हो गई हूँ... और बाबा की यादो में खजाने लूट रही हूँ... सच्ची कमाई को पाने वाली खुबसूरत आत्मा बन गयी हूँ...*

 

  *मेरे बाबा अपने स्नेह के शीतल छीटों की फुहारों से मुझे महकाते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *यह गुप्त रूहानी यात्रा ही सच्चे सुखो का आधार है... ईश्वर पिता की याद से ही अपना खोया ओज और तेज पा कर पुनः विश्व धरा पर चमकेंगे...* अपनी खुबसूरत सतोप्रधान अवस्था को पाकर... अथाह मीठे सुखो से भरे जीवन में खिलखिलायेंगे...

 

_ ➳  *मैं आत्मा ज्ञान सिंधु परमात्मा की यादों की लहरों में लहराते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपने मीठे भाग्य को देख देख निहाल हूँ... वफ़ा की बून्द की प्यासी आज प्यार का समन्दर बाँहों में लिए मुस्करा रही हूँ... *मीठे बाबा के प्यार में मगन होकर आनन्द के गीत गा रही हूँ... यादो में मालामाल मैं आत्मा ख़ुशी के गगन में झूम रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- निश्चयबुद्धि बनना और बनाना है*"

 

_ ➳  मेरा यह ब्राह्मण जीवन पुरुषार्थी जीवन है जिसमे मुझे तीव्र पुरुषार्थ कर सम्पूर्ण बनने के अपने उस ऊंच लक्ष्य को पाना है जो लक्ष्य मेरे लिए मेरे परम पिता परमात्मा शिव बाबा ने निर्धारित किया है। *अपने उसी ऊंच लक्ष्य को स्मृति में ला कर, ऐसा ऊंच लक्ष्य देने वाले अपने शिव पिता परमात्मा को मैं याद करती हूँ और उनकी मीठी याद का आधार ले कर, ज्ञान और योग के पंख लगा कर मैं आत्मा उड़ने लगती हूँ*। सभी हद के किनारों का सहारा छोड़, सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि बन केवल अपने शिव की पिता की याद का सहारा ले कर अब मैं आत्मा जा रही हूँ उनके पास उस निराकारी धाम में जहां देह और देह की दुनिया का कोई बोध नही।

 

_ ➳  आत्माओं की इस निराकारी दुनिया मे मैं देख रही हूँ चारों और चमकती मणियों को जो सितारों की भांति चमक रही हैं। *सामने हैं महाज्योति शिव बाबा जो एक ज्योति पुंज के रूप में सुशोभित हो रहें हैं*। आत्माओं और परमात्मा के मंगल मिलन को मैं मन बुद्धि के नेत्रों से स्पष्ट देख रही हूँ। महाज्योति शिव परम पिता परमात्मा की अनन्त ज्योति के प्रकाश से हर चैतन्य दीपक की चमक तेजी से बढ़ रही है। *ऐसा लग रहा है जैसे कोई बहुत बड़ी दीपमाला है। सामने दीपराज और उनके सामने जगमग करते असंख्य चैतन्य दीपक*। इस खूबसूरत दृश्य को देख मैं मन ही मन आनन्दित हो रही हूँ।

 

_ ➳  गहन आनन्द की अनुभूति करके मैं चैतन्य दीपक अब परमधाम से नीचे फरिश्तो की आकारी दुनिया में प्रवेश करती हूँ। चमकीली फ़रिशता ड्रेस धारण कर मैं बापदादा के सम्मुख पहुंचती हूँ। *बापदादा के अति शोभनीय लाइट माइट स्वरूप को मैं मन बुद्धि के नेत्रों से निहार रही हूँ और साथ ही साथ बापदादा की लाइट माइट को स्वयं में समा कर बापदादा के समान लाइट माइट बन रही हूँ*। बापदादा की लाइट माइट पा कर मेरी चमकीली फ़रिशता ड्रेस और भी चमकीली हो गई है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंग - अंग से श्वेत रश्मियां फव्वारा बन कर फूट रही है और चारों और फैलती जा रही हैं।

 

_ ➳  अपने इस अति सुंदर, अति प्रकाशित स्वरूप को देख मैं आनन्द में गदगद हो रही हूँ। अपने इस अति चमकीले, अति प्रकाशवान स्वरूप में मैं अब सूक्ष्म लोक से नीचे साकार लोक की और आ रही हूँ। *मंदिरों, गुरुद्वारों, और अनेक धार्मिक स्थानों के ऊपर से गुजरते हुए मैं भगवान की भक्ति में डूबे भक्तों को देख रही हूँ*। अपने ईष्ट देव और ईष्ट देवी के  साक्षात्कार की आश में कठिन से कठिन उपाय कर रहें हैं। उनके एक दर्शन मात्र के लिए कितने कर्मकांड कर रहें हैं। उनकी इस मनोकामना को पूर्ण करता, उनके इष्ट देव के रूप में उनकी साक्षात्कार की आश को पूरा करता हुआ मैं फ़रिशता अब पहुंच गया साकारी लोक में और अपने अति उज्ज्वल सूक्ष्म फ़रिशता स्वरूप के साथ अपने साकारी शरीर मे प्रवेश कर रहा हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं उन बेचारे भक्तो के बारे में सोच रही हूँ जो इस बात से सर्वथा अनजान है कि भगवान के या इष्ट देव/देवी के साक्षात्कार हो जाना कोई प्राप्ति नही है। *प्राप्ति तो परमात्म पालना में है और वही परमात्म पालना देने के लिए भगवान स्वयं इस धरती पर आए हैं*। अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य पर मुझे शुद्ध अभिमान हो रहा है कि कोटो में कोई, कोई में भी कोई वो सौभाग्यशाली आत्मा हूँ मैं, जिसका हर पल प्रभु प्रेम के पालने में कट रहा है।

 

_ ➳  *साक्षात्कार की मेरे मन मे कोई आश ही नही क्योकि भगवान स्वयं सम्मुख आ कर अपने प्रेम की शीतल छांव में हर पल मुझे झुला रहा है और उसके प्रेम की यही शीतल छांव और परमात्म पालना की अनुभूति मुझे निश्चय बुद्धि बना रही है*। निश्चय बुद्धि बन, अपने पुरुषार्थ को तीव्र कर अब मैं निरन्तर आगे बढ़ती जा रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ब्राह्मण जन्म की विशेषता और विचित्रता को स्मृति में रख सेवा करने वाली साक्षी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं जीवन में निर्माणता और अथॉरिटी का बैलेंस रखने वाला बेपरवाह बादशाह हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा ने मैजारिटी बच्चों का वर्ष का पोतामेल देखा। क्या देखा होगामुख्य एक कारण देखा। बापदादा ने देखा कि *'मिटाने और समानेकी शक्ति कम है।* मिटाते भी हैंउल्टा देखना, सुनना, सोचना, बीता हुआ भी मिटाते हैं लेकिन जैसे आप कहते हो ना कि एक है कान्सेस दूसरा है -सबकान्सेस। मिटाते हैं लेकिन मन की प्लेट कहोस्लेट कहोकागज कहोकुछ भी कहोपूरा नहीं मिटाते। क्यों नहीं मिटा सकते? उसका कारण है - समाने की शक्ति पावरफु नहीं है। *समय अनुसार समा भी लेते लेकिन फिर समय पर निकल आता।* इसलिए जो चार शब्द बापदादा ने सुनायेवह सदा नहीं चलते। अगर मानों *मन की प्लेट वा कागज पूरा साफ नहीं हुआ, पूरा नहीं मिटा तो उस पर अगर बदले में आप और अच्छा लिखने भी चाहो तो स्पष्ट होगा?* अर्थात् सर्व गुणसर्व शक्तियां धारण करने चाहो तो सदा और फुल परसेन्ट में होगाबिल्कुल *क्लीन भी हो, क्लीयर भी हो तब यह शक्तियां सहज कार्य में लगा सकते हो।*

 

 _ ➳  कारण यही हैमैजारिटी की स्लेट क्लीयर और क्लीन नहीं है। थोड़ा-थोड़ा भी *बीती बातें या बीती चलनव्यर्थ बातें वा व्यर्थ चाल-चलन सूक्ष्म रूप में समाई रहती हैं* तो फिर समय पर साकार रूप में आ जाती हैं। तो समय अनुसार पहले चेक करो,  *अपने को चेक करना दूसरे को चेक करने नहीं लग जाना* क्योंकि दूसरे को चेक करना  सहज लगता हैअपने को चेक करना मुश्किल लगता है। तो चेक करना कि हमारे मन की प्लेट व्यर्थ से और बीती से बिल्कुल साफ है?  *सबसे सूक्ष्म रूप है - वायब्रेशन के रूप में* रह जाता है। फरिश्ता अर्थात् बिल्कुल क्लीन और क्लीयर। *समाने की शक्ति से निगेटिव को भी पाजिटिव रूप में परिवर्तन कर समाओ।* निगेटिव ही नहीं समा दोपाजिटिव में चेंज करके समाओ तब नई सदी में नवीनता आयेगी।

 

✺   *ड्रिल :-  "मन की स्लेट को क्लीन और क्लीयर रखना"*

 

 _ ➳  मैं सर्व श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा अपने प्यारे बापदादा की यादो में खोई हुई हूँ... मेरे सामने बापदादा आकर खडे है... ब्रह्माबाबा के मस्तक में चमक रहे है महाज्योति शिवबाबा... *बापदादा को देखते ही उनमें खो गई... वाह बाबा वाह... आप कितने मधुर हो...* जैसे भक्ति में गायन है वैसे ही मधुर मधुर महसूस हो रहे है... बिलकुल वही गीत याद आ रहा है... अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्... ह्दयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्... *बापदादा मुस्कुराते हुए एक किताब देते है* मेरे हाथ में और कहते है... बच्चे:- ये रहा *आपका पूरे वर्ष का पोतामेल...* बापदादा ने हर एक शक्ति के मार्क्स लिखे है...

 

 _ ➳  मुझे ये देखकर बहुत खुशी हुई की *एक वर्ष में मैने असीम ऊंचाइयों को छुआ है...* दिनों दिन मेरी शक्ति बढती ही गई है... मैं आत्मा निरंतर चढती कला में जा रही हूँ... *लेकिन सर्व गुण और शक्तियां फुल परसेन्ट में नहीं है...* फिर मेरा ध्यान उस पर गया जहाँ पर मेरे मन की बातें साफ साफ लिखी है... मैंने देखा की अभी भी वो पुरानी बातें जो मैं समझती थी की मैं बिलकुल भूल चूकी हूँ वो भी लिखी है... मैं सोचने लगी की यह तो मैंने मिटा दिया था यह कहाँ से आया ? तो बापदादा ने कहा की आपने पूरा नहीं मिटाया... इसलिए अभी भी *मन की स्लेट क्लीन और क्लीयर नहीं... कान्सेस में तो मिटा दिया लेकिन सबकान्सेस में तो दिखाई दे रहा* है... मैं बापदादा से पूछती हूँ इसका कारण क्या है ? और निवारण क्या है ?

 

 _ ➳  बापदादा ने कहा की मन की स्लेट पूरी क्लीन नहीं हुई *क्योंकि समाने की शक्ति पावरफुल नहीं है...* समय अनुसार समा भी  लेते लेकिन फिर समय पर निकल आता... इसलिए सर्व गुण और शक्तियों को फुल परसेन्ट में धारण करने की कितनी भी कोशिश करो लेकिन होती नही है... और सहज कार्य में भी नहीं लगा पाते हो... इसलिए मन की स्लेट बिल्कुल क्लीयर होनी चाहिए... बापदादा को सुनते ही मैं तपस्वी ब्राह्मण आत्मा *स्वयं को चेक करने में लग जाती* हूँ... जैसे ही मैंने *स्वदर्शनचक्र फिराना शुरू किया तो सारी समस्याएं और समस्याओं का निवारण समझ आने* लगा... मैंने इस बात को साफ-साफ देखा कि किस तरह व्यर्थ और बीती चाल चलना सूक्ष्म से साकार रूप लेती जा रही थी...

 

 _ ➳  मेरे देखने में स्वयं की भूल आते ही *मुझे पश्चाताप हुआ की किस तरह माया मुझे अपनी जाल मे फंसा रही थी...* किस तरह परदर्शन और परचिंतन में फंसा रही थी... और अपने अंश को वंश किए जा रही थी... अगर इसको मैंनेे *पहले ही संपूर्ण रूप से समा लिया होता तो माया की ताकत नहीं थी जो मुझे हरा सके...* यह जानने के बाद अब मुझे माया के भिन्न भिन्न सूक्ष्म रूप भी दिखाई देने लगे है... शुक्रिया बाबा आपका पद्मापद्म गुणा शुक्रिया... आप मेरे सच्चे सतगुरू हो... जो हमेशा सच्ची राह दिखाते हो... न जाने इससे पहले भी कई बार आपने मेरी रक्षा कि है और विघ्नों से बचाया है... बापदादा ने बिल्कुल *सूक्ष्म रूप में भी व्यर्थ* दिखाया की किस तरह वो *वायब्रेशन के रूप में* रह गया है...

 

 _ ➳  अब *स्वदर्शन करते ही मुझ आत्मा के पुरुषार्थ की गति एकदम तीव्र हो गई है...* पुरुषार्थ की स्पीड सतोप्रधान हो गई है... *बापदादा ने अपना वरदानी हाथ मेरे मस्तक पर रखा* और मेरे मन में जो भी सूक्ष्म में व्यर्थ था वो अपने हाथो से खींच लिया... और साथ ही साथ *लाल रंग की शक्तियों की किरणों से भी भरपूर कर दिया... समाने की शक्ति को पूरी तरह से भर दिया...* अब तो मुझे बिल्कुल हल्कापन महसूस हो रहा है... एकदम खुशी की अनुभूति हो रही है... इसके कारण *मन एकदम क्लीन और क्लियर हो गया* है... ये हल्कापन मुझे *फरिश्तेपन की और* ले जा रहा है... अब मैं सर्व शक्तियों से संपन्न फरिश्ता हूँ... अब मेरे सामने जो भी *निगेटिव आ रहा है सब समा कर पाजिटिव में चेंज* करता जा रहा हूँ... और बापदादा भी यह नवीनता देखकर बहुत खुश हो रहे हैं... शुक्रिया बाबा... शुक्रिया...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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