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 05 / 01 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *पढाई पर पूरा ध्यान दे स्थायी ख़ुशी का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *साधारणता को अलोकिकता में परिवर्तित किया ?*

 

➢➢ *हर सेकंड के हर संकल्प का महत्व जानकार जमा का खाता भरपूर किया ?*

 

➢➢ *"शरीर से न्यारी मैं आत्मा" - स्वयं को इस रूप में स्थित कर हर कार्य किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे हठयोगी अपने श्वांस को जितना समय चाहें उतना समय रोक सकते हैं। आप सहजयोगी, स्वत: योगी, सदायोगी, कर्मयोगी, श्रेष्ठयोगी अपने संकल्प को, श्वांस को प्राणेश्वर बाप के ज्ञान के आधार पर जो संकल्प, जैसा संकल्प जितना समय करना चाहो उतना समय उसी संकल्प में स्थित हो जाओ।* अभी-अभी शुद्ध संकल्प में रमण करो, अभी-अभी एक ही लगन अर्थात् एक ही बाप से मिलन की, एक ही अशरीरी बनने के शुद्ध-संकल्प में स्थित हो जाओ।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सर्व श्रेष्ठ परमात्म दिलतख्तनशीन आत्मा हूँ"*

 

  *संगमयुग पर ब्राह्मणों का विशेष स्थान है- बापदादा का दिलतख्त-सभी अपने को बापदादा के दिलतख्त नशीन अनुभव करते हो? ऐसा श्रेष्ठ स्थान कभी भी नहीं मिलेगा।*

 

✧  सतयुग में हीरे सोने का मिलेगा लेकिन दिलतख्त नहीं मिलेगा। *तो सबसे श्रेष्ठ आप 'ब्राह्मण' और आपका श्रेष्ठ स्थान 'दिलतख्त'। इसलिए ब्राह्मण चोटी अर्थात् ऊंचे ते ऊंचे हैं।* इतना नशा रहता है कि हम तख्तनशीन हैं?

 

  ताज भी हैं, तख्त भी है, तिलक भी है। तो सदा ताज, तख्त, तिलकधारी रहते हो, स्मृति भव का अविनाशी तिलक लगा हुआ है ना? *सदा इसी नशे में रहो कि सारे कल्प में हमारे जैसा कोई भी नहीं। यही स्मृति सदा नशे में रहेगी और खुशी में झूमते रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सेवा के लिए साधन है क्योंकि विश्व कल्याण करना है तो यह भी साधन सहयोग देते हैं। *साधनों के वश नहीं होना। लेकिन साधन को सेवा में यूज करना।* यह बीच का समय है जिसमें साधन मिले हैं। आदि में भी कोई इतने साधन नहीं थे और अंत में भी नहीं रहेंगे। यह अभी के लिए हैं।

 

✧  सेवा बढ़ाने के लिए हैं। लेकिन यह साधन हैं, साधना करने वाले आप हो। *साधन के पीछे साधना कम नहीं हो।* बाकी बापदादा खुश होते हैं। बच्चों की सीन देखते हैं। फटाफट काम कर रहे हैं। बापदादा आपके ऑफिस का भी चक्कर लगाते हैं। कैसे काम कर रहे हैं।

 

✧  बहुत बिजी रहते हैं ना। अच्छी तरह से ऑफिस चलती है ना! जैसे एक सेकण्ड में साधन यूज करते हो ऐसे ही बीच-बीच में कुछ समय साधना के लिए भी निकाली। सेकण्ड भी निकालो। *अभी साधन पर हाथ है और अभी-अभी एक सेकण्ड साधना, बीच-बीच में अभ्यास करो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् बेहद में रहने वाले।* सारे ज्ञान का वा इस पढ़ाई के चारों ही सबजेक्ट का मूल सार यही एक बात 'बेहद' है। *बेहद शब्द के स्वरूप में स्थित होना यही फस्र्ट और लास्ट का पुरुषार्थ है।* पहले बाप का बनना अर्थात् मरजीवा बनना। इसका भी आधार है - देह की हद से बेहद देही स्वरूप में स्थित होना और लास्ट में फ़रिश्ता स्वरूप बन जाना है। इसका भी अर्थ है - सर्व हद के रिश्ते से परे फ़रिश्ता बनना। तो आदि और अन्त पुरुषार्थ और प्राप्ति, लक्षण और लक्ष्य, स्मृति और समर्थी दोनों ही स्वरूप में क्या रहा? बेहद'। आदि से लेकर अन्त तक किन-किन प्रकार की हदें पार कर चुके हो वा करनी हैं? इस लिस्ट को तो अच्छी तरह से जानते हो ना! *जब सर्व हदों से पार बेहद स्वरूप में, बेहद घर, बेहद के सेवाधारी, सर्व हदों के ऊपर विजय प्राप्त करने वाले विजयी रत्न बन जाते तब ही अन्तिम कर्मातीत स्वरूप का अनुभव स्वरूप बन जाते।* हद हैं अनेक, बेहद है एक। अनेक प्रकार की हदें अर्थात् अनेक - मेरा मेरा। एक मेरा बाबा दूसरा न कोई, इस बेहद के मेरे में अनेक मेरा समा जाता है। विस्तार सार स्वरूप बन जाता है। विस्तार मुश्किल होता है या सार मुश्किल होता है? तो आदि और अन्त का पाठ क्या हुआ? - बेहद। *इसी अन्तिम मंज़िल पर कहाँ तक समीप आये हैं, इसको चेक करो।* हद की लिस्ट सामने रख देखो कहाँ तक पार किया है!

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपने को आत्मा समझ आत्मा भाई से बात करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन डायमंड हाल में सभी फरिश्तों के बीच बैठी हूँ... अपने सभी भाई-बहनों के साथ बाबा मिलन की घड़ियों का इन्तजार करती... कितनी भाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो की इतनी बड़ी ईश्वरीय फैमिली मिली है... मेरे शिव बाबा ने मुझे एडाप्ट करके अपना बनाया है...* बेहद के बाबा ने अपना बनाकर बेहद का अलौकिक परिवार गिफ्ट में दिया है... इन्तजार की घड़ियों को ख़तम करते हुए अव्यक्त बापदादा दादी के तन में आकर मुझे मीठी प्यारी शिक्षाएं और समझानी देते हैं... 

 

   *प्यारे बाबा अपनी दृष्टि से निहाल कर मेरा अलौकिक श्रृंगार करते हुए कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वरीय राहो में पवित्रता से सजधज कर देवताई श्रृंगार को पाकर... अनन्त सुखो के मालिक बन इस विश्व धरा पर मुस्कराओ... *ईश्वर पिता की सन्तान आपस में सब भाई भाई हो... इस भाव में गहरे डूबकर पावनता की छटा बिखेर... धरा पर स्वर्ग लाने में सहयोगी बन जाओ..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा पवित्रता के सागर से पवित्र किरणों को लेकर चारों ओर फैलाते हुए कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में दिव्य गुणो की धारणा और पवित्रता की ओढनी पहन कर निखर उठी हूँ... *मै आत्मा विश्व धरा को पवित्र तरंगो से आच्छादित कर रही हूँ... शरीर के भान से परे होकर आत्मिक स्नेह की धारा बहा रही हूँ..."*

 

   *बुझी हुई ज्योति को जगाकर आत्मदर्शन कराकर मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *अपने खुबसूरत सत्य स्वरूप को स्मृति में रखकर, सच्चे प्रेम की लहरियां पूरे विश्व की हवाओ में फैला दो... आत्मा भाई भाई और ब्राह्मण भाई बहन के सुंदर नातो से पवित्रता की खुशबु चारो ओर फैलाओ...* विकारो से परे आत्मिक भावो से भरे सम्बन्धो से, विश्व को सजा दो..."

 

_ ➳  *स्वदर्शन कर अपने सत्य स्वरुप के स्वमान में टिकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा देह के मटमैले पन से निकल अब आत्मिक भाव् से भर गयी हूँ... *अपने अविनाशी सत्य स्वरूप को जान, विकारो को सहज ही त्याग रही हूँ... सम्पूर्ण पवित्रता को अपनाकर पवित्र तरंगे बिखरने वाली सूर्य रश्मि हो गयी हूँ..."*

 

   *मेरे अंतर के नैनों को खोल अमृत रस पान कराते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे...  *अपनी दृष्टि वृत्ति और कृति को पावनता के रंग से सराबोर करो... दिव्यता और पवित्रता को विश्व धरा पर छ्लकाओ...* विकारो की कालिमा से निकल खुबसूरत दिव्यता को बाँहों में भरकर मुस्कराओ... आत्मिक सच्चे प्यार की सुगन्ध से विश्व धरा महकाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्रभु मिलन कर परमानन्द को पाकर प्यारे बाबा से कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा सबके मस्तक में आत्मा मणि को निहार रही हूँ... और सच्चा सम्मान देकर गुणो और शक्तियो से भरपूर हो रही हूँ...* मनसा वाचा कर्मणा पावनता से सजधज कर मै आत्मा हर दिल पर यह दौलत लुटा रही हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आसुरी गुणों को निकाल दैवी गुण धारण कर आस्तिक बनना है*"

 

_ ➳  एकांत में अंतर्मुखी बन कर बैठी मैं ब्राह्मण आत्मा विचार करती हूँ कि मेरा यह जीवन जो कभी हीरे तुल्य था आज रावण की मत पर चलने से कैसा कौड़ी तुल्य बन गया है! *दैवी गुणों से सम्पन्न थी मैं आत्मा और आज आसुरी अवगुणों से भर गई हूँ। रावण रूपी 5 विकारों की प्रवेशता ने मेरे दैवी गुण छीन कर मेरे अंदर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहँकार पैदा कर मेरे जीवन को ही श्रापित कर दिया है और अब जबकि स्वयं भगवान आकर मेरे इस श्रापित जीवन से मुझे छुड़ा कर फिर से पूज्य देवता बना रहे हैं तो मेरा भी यह परम कर्तव्य बनता है कि उनकी श्रेष्ठ मत पर चल कर, अपने जीवन मे दैवी गुणों को धारण कर अपने जीवन को पलटा कर भविष्य जन्म जन्मान्तर के लिए सुख, शांति और पवित्रता का वर्सा उनसे ले लूँ*। मन ही मन इन्ही विचारो के साथ अपने दैवी गुणों से सम्पन्न स्वरूप को मैं स्मृति में लाती हूँ और अपने उस अति सुन्दर दिव्य स्वरूप को मन बुद्धि के दिव्य चक्षु से निहारने मे मगन हो जाती हूँ।

 

_ ➳  दैवी गुणों से सजा मेरा पूज्य स्वरूप मेरे सामने है। लक्ष्मी नारायण जैसे अपने स्वरूप को देख मैं मन ही मन आनन्दित हो रही हूँ। अपने सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप में मैं बहुत ही शोभायमान लग रही हूँ। *मेरे चेहरे की हर्षितमुखता, नयनो की दिव्यता, मुख मण्डल पर पवित्रता की दिव्य आभा मेरे स्वरूप में चार चांद लगा रही है। अपने इस अति सुन्दर स्वरूप का भरपूर आनन्द मैं ले रही हूँ । मन ही मन अपनी इस ऐम ऑब्जेक्ट को बुद्धि में रख, ऐसा बनने की मन मे दृढ़ प्रतिज्ञा कर, अपने जीवन को पलटाने के लिए दैवी गुणों को धारण करने का संकल्प लेकर, पुजारी से पूज्य बनाने वाले अपने परमपिता परमात्मा का दिल की गहराइयों से मैं शुक्रिया अदा करती हूँ* और 63 जन्मो के आसुरी अवगुणों को योग अग्नि में दग्ध करने के लिए अपने प्यारे पिता की याद में अब सम्पूर्ण एकाग्रचित होकर बैठ जाती हूँ।

 

 

_ ➳  एकाग्रता की शक्ति जैसे - जैसे बढ़ने लगती है मेरा वास्तविक स्वरूप मेरे सामने पारदर्शी शीशे के समान चमकने लगता है और अपने स्वरूप का मैं आनन्द लेने में व्यस्त हो जाती हूँ। एक चमकते हुए बहुत ही सुन्दर स्टार के रूप में मैं स्वयं को देख रही हूँ। *उसमे से निकल रही रंगबिरंगी किरणें चारों और फैलते हुए बहुत ही आकर्षक लग रही हैं। उन किरणों से मेरे अंदर समाये गुण और शक्तियों के वायब्रेशन्स जैसे - जैसे मेरे चारों और फैल रहें है, एक सतरंगी प्रकाश का खूबसूरत औरा मेरे चारो और बनता जा रहा है*। प्रकाश के इस खूबसूरत औरे के अंदर मैं स्वयं को ऐसे अनुभव कर रही हूँ जैसे किसी कीमती खूबसूरत जगमगाती डिब्बी के अंदर कोई बहुमूल्य हीरा चमक रहा हो और अपनी तेज चमक से उस डिब्बी की सुंदरता को भी बढ़ा रहा हो।

 

_ ➳  सर्वगुणों औऱ सर्वशक्तियों की किरणें बिखेरते अपने इस सुन्दर स्वरूप का अनुभव करके और इसका भरपूर आनन्द लेकर अब मैं चमकती हुई चैतन्य शक्ति देह की कुटिया से निकल कर, स्वयं को कौड़ी से हीरे तुल्य बनाने वाले अपने प्यारे शिव बाबा के पास उनके धाम की ओर चल पड़ती हूँ। *प्रकाश के उसी खूबसूरत औरे के साथ मैं ज्योति बिंदु आत्मा अपनी किरणे बिखेरती हुई अब धीरे - धीरे ऊपर उड़ते हुए आकाश में पहुँच कर, उसे पार करके, सूक्ष्म वतन से होती हुई अपने परमधाम घर मे पहुँच जाती हूँ*। आत्माओं की इस निराकारी दुनिया में चारों और चमकती जगमग करती मणियों के बीच मैं स्वयं को देख रही हूँ। चारों और फैला मणियो का आगार और उनके बीच मे चमक रही एक महाज्योति। ज्ञानसूर्य शिव बाबा अपनी सर्वशक्तियों की अनन्त किरणे फैलाते हुए इन  चमकते हुए सितारों के बीच बहुत ही लुभावने लग रहे हैं। *उनकी सर्वशक्तियों की किरणों का तेज प्रकाश पूरे परमधाम घर मे फैल रहा है जो हम चैतन्य मणियों की चमक को कई गुणा बढ़ा रहा है*।

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता के इस सुंदर मनमनोहक स्वरूप को देखते हुए मैं चैतन्य शक्ति धीरे - धीरे उनके नजदीक जाती हूँ और उनकी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में ऐसे समा जाती हूँ जैसे एक बच्चा अपनी माँ के आंचल में समा जाता है। मेरे पिता का प्यार उनकी अथाह शक्तियों के रूप में मेरे ऊपर निरन्तर बरस रहा है। *मेरे पिता के निस्वार्थ, निष्काम प्यार का अनुभव, उनका प्यार पाने की मेरी जन्म - जन्म की प्यास को बुझाकर मुझे तृप्त कर रहा है। परमात्म प्यार से भरपूर होकर योग अग्नि में अपने विकर्मों को दग्ध करने के लिए अब मैं बाबा के बिल्कुल समीप जा रही हूँ और उनसे आ रही जवालास्वरूप शक्तियों की किरणों के नीचे बैठ, योग अग्नि में अपने पुराने आसुरी स्वभाव संस्कारों को जलाकर भस्म कर रही हूँ*। बाबा की शक्तिशाली किरणे आग की भयंकर लपटों का रूप धारण कर मेरे चारों और जल रही है, जिसमे मेरे 63 जन्मो के विकर्म विनाश हो रहें हैं और मैं आत्मा शुद्ध पवित्र बन रही हूँ।

 

_ ➳  सच्चे सोने के समान शुद्ध और स्वच्छ बनकर अपने प्यारे पिता की श्रेष्ठ मत पर चल कर, अब मैं अपने जीवन को पलटाने और श्रेष्ठ बनाने के लिए स्वयं में दैवी गुणों की धारणा करने के लिए फिर से साकार सृष्टि पर लौट आती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर पूज्य बनने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपने आदि पूज्य स्वरूप को सदा स्मृति में रखते हुए, बाबा की याद से पुराने आसुरी स्वभाव संस्कारों को दग्ध कर, नए दैवी संस्कार बनाने का पुरुषार्थ करते हुए अब मैं स्वयं का परिवर्तन बड़ी सहजता से करती जा रही हूँ*

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं हर सेकण्ड के हर संकल्प का महत्व जान कर जमा का खाता भरपूर करने वाली समर्थ आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺  *हर बोल, हर कर्म की अलौकिकता ही पवित्रता है, मैं साधारणता को अलौकिकता में परिवर्तन कर देने वाली पवित्र आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सारे दिन में गलती नहीं की लेकिन समय, संकल्प, सेवा, सम्बन्ध-सम्पर्क में स्नेहसंतुष्टता द्वारा जमा कितना किया? *कई बच्चे सिर्फ यह चेक कर लेते हैं - आज बुरा कुछ नहीं हुआ। कोई को दुःख नहीं दिया। लेकिन अब यह चेक करो कि सारे दिन में श्रेष्ठ संकल्पों का खाता कितना जमा कियाश्रेष्ठ संकल्प द्वारा सेवा का खाता कितना जमा हुआ?* कितनी आत्माओं को किसी भी कार्य से सुख कितनों को दिया? योग लगाया लेकिन योग की परसेन्टेज किस प्रकार की रहीआज के दिन दुआओं का खाता कितना जमा किया?      

 

 _ ➳  *कोई कितना भी हिलावे, हिलना नहीं अखण्ड गुणदानी, अटलकोई कितना भी हिलावेहिलना नहीं।* हरेक एक दो को कहते होसभी ऐसे हैंतुम ऐसे क्यों अपने को मारता हैतुम भी मिल जाओ। कमजोर बनाने वाले साथी बहुत मिलते हैं। लेकिन *बापदादा को चाहिए हिम्मतउमंग बढ़ाने वाले साथी। तो समझा क्या करना है? सेवा करो लेकिन जमा का खाता बढ़ाते हुए करोखूब सेवा करो। पहले स्वयं की सेवाफिर सर्व की सेवा।*

 

✺   *ड्रिल :-  "दुआओं का खाता जमा करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा भृकुटी सिंहासन में विराजमान बैठी हूँ... मैं मन-बुद्धि द्वारा आसमान की ओर उड़ती हूँ... धीरे-धीरे आसमान की तरफ उड़कर मैं एक सफेद प्रकाश की दुनिया सूक्षमवतन में पहुँच जाती हूँ...* वहाँ एकदम साइलेंस की दुनिया हैं... एक तिनके तक की आवाज़ नहीं हैं... एकदम सन्नाटा हैं... वहाँ ब्रह्मा बाबा शिव बाबा का इंतज़ार कर रहे है...

 

 _ ➳  सूक्ष्मवतन में शिव बाबा ब्रह्मा बाबा के तन में आते हैंं और उनके आते ही वहाँ का वातावरण फ़ूलों से भर जाता हैं... फ़ूलों की धीमी-धीमी खुशबू आने लगती हैं... बाबा मुझ आत्मा पर सुनहरी किरणें डाल रहे हैं... *मैं उन किरणों में खो चुकी हूँ... मुझ आत्मा का माँ वैष्णो देवी का स्वरूप इमर्ज हो रहा हैं... मुझ आत्मा के इस माँ वैष्णो देवी के स्वरूप से बाबा की किरणें भक्तों पर न्यौछावर हो रही हैं...*

 

 _ ➳  सभी भक्त बहुत ख़ुशी से झूम रहे हैं... उन्हें ऐसा लग रहा हैं मानों जैसे उनकी सभी मुरादे पूरी हो चुकी हैं... वह सब आसमान की ओर देखकर मन ही मन मुझ पूज्य स्वरूप का शुक्रिया कर रहे हैं... *उन करोड़ों आत्माओं की दुआएं मुझ आत्मा तक पहुँच रही हैं... अब मेरे मन मे श्रेष्ठ संकल्प ही चलते हैं... योग में भी वृद्धि हो रही हैं... मुझ आत्मा का दुआओं का खाता जमा होता जा रहा हैं...*

 

 _ ➳  अब कोई कितना भी बाबा से दूर करने की कोशिश करें, कोई भी कहे कि तुम कहाँ फँस चुके हो परन्तु मैं हिलती नहीं हूँ... मुझ आत्मा में हिम्मत बढ़ चुकी हैं... मैं किसी की उल्टी बातों पर ध्यान नहीं देती हूँ... *अब मैं सेवा तो करती हूँ परन्तु साथ-साथ जमा के खाते को बढ़ाकर करती हूँ... मैं आत्मा बाबा से वादा करती हूं कि मैं योग और ज्ञान से सर्व आत्माओं का कल्याण करूँगी...*

 

 _ ➳  *अपनी दिनचर्या में मैं आत्मा अब समय बरबाद नहीं करती हूँ... मुझ आत्मा के लौकिक व अलौकिक सम्बन्धों में स्नेह बढ़ता जा रहा है और मैं सदा संतुष्ट रहती हूँ... सभी के प्रति शुभभावना और शुभकामना रखती हूँ...* अब मैं सवेरे-सवेरे उठते ही पहले स्व को ज्ञान रत्नों से भरपूर करके स्व की सेवा स्वमान लेकर, अमृतवेला करकें और मुरली सुनकर करती हूँ... फिर सर्व आत्माओं की सेवा करती हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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