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 05 / 01 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *लोकिक बन्धनों से तोड़ निभाया ?*

 

➢➢ *पतित पावन बाप से योग लगाया ?*

 

➢➢ *कमजोरियों को फुलस्टॉप देकर अपने संपन्न स्वरुप को प्रख्यात किया ?*

 

➢➢ *अपने अनादि और आदि गुणों को स्मृति में रख उन्हें स्वरुप में लाये ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे हठयोगी अपने श्वांस को जितना समय चाहें उतना समय रोक सकते हैं। आप सहजयोगी, स्वत: योगी, सदायोगी, कर्मयोगी, श्रेष्ठयोगी अपने संकल्प को, श्वांस को प्राणेश्वर बाप के ज्ञान के आधार पर जो संकल्प, जैसा संकल्प जितना समय करना चाहो उतना समय उसी संकल्प में स्थित हो जाओ।* अभी-अभी शुद्ध संकल्प में रमण करो, अभी-अभी एक ही लगन अर्थात् एक ही बाप से मिलन की, एक ही अशरीरी बनने के शुद्ध-संकल्प में स्थित हो जाओ।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सर्व श्रेष्ठ परमात्म दिलतख्तनशीन आत्मा हूँ"*

 

  *संगमयुग पर ब्राह्मणों का विशेष स्थान है- बापदादा का दिलतख्त-सभी अपने को बापदादा के दिलतख्त नशीन अनुभव करते हो? ऐसा श्रेष्ठ स्थान कभी भी नहीं मिलेगा।*

 

✧  सतयुग में हीरे सोने का मिलेगा लेकिन दिलतख्त नहीं मिलेगा। *तो सबसे श्रेष्ठ आप 'ब्राह्मण' और आपका श्रेष्ठ स्थान 'दिलतख्त'। इसलिए ब्राह्मण चोटी अर्थात् ऊंचे ते ऊंचे हैं।* इतना नशा रहता है कि हम तख्तनशीन हैं?

 

  ताज भी हैं, तख्त भी है, तिलक भी है। तो सदा ताज, तख्त, तिलकधारी रहते हो, स्मृति भव का अविनाशी तिलक लगा हुआ है ना? *सदा इसी नशे में रहो कि सारे कल्प में हमारे जैसा कोई भी नहीं। यही स्मृति सदा नशे में रहेगी और खुशी में झूमते रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सेवा के लिए साधन है क्योंकि विश्व कल्याण करना है तो यह भी साधन सहयोग देते हैं। *साधनों के वश नहीं होना। लेकिन साधन को सेवा में यूज करना।* यह बीच का समय है जिसमें साधन मिले हैं। आदि में भी कोई इतने साधन नहीं थे और अंत में भी नहीं रहेंगे। यह अभी के लिए हैं।

 

✧  सेवा बढ़ाने के लिए हैं। लेकिन यह साधन हैं, साधना करने वाले आप हो। *साधन के पीछे साधना कम नहीं हो।* बाकी बापदादा खुश होते हैं। बच्चों की सीन देखते हैं। फटाफट काम कर रहे हैं। बापदादा आपके ऑफिस का भी चक्कर लगाते हैं। कैसे काम कर रहे हैं।

 

✧  बहुत बिजी रहते हैं ना। अच्छी तरह से ऑफिस चलती है ना! जैसे एक सेकण्ड में साधन यूज करते हो ऐसे ही बीच-बीच में कुछ समय साधना के लिए भी निकाली। सेकण्ड भी निकालो। *अभी साधन पर हाथ है और अभी-अभी एक सेकण्ड साधना, बीच-बीच में अभ्यास करो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् बेहद में रहने वाले।* सारे ज्ञान का वा इस पढ़ाई के चारों ही सबजेक्ट का मूल सार यही एक बात 'बेहद' है। *बेहद शब्द के स्वरूप में स्थित होना यही फस्र्ट और लास्ट का पुरुषार्थ है।* पहले बाप का बनना अर्थात् मरजीवा बनना। इसका भी आधार है - देह की हद से बेहद देही स्वरूप में स्थित होना और लास्ट में फ़रिश्ता स्वरूप बन जाना है। इसका भी अर्थ है - सर्व हद के रिश्ते से परे फ़रिश्ता बनना। तो आदि और अन्त पुरुषार्थ और प्राप्ति, लक्षण और लक्ष्य, स्मृति और समर्थी दोनों ही स्वरूप में क्या रहा? बेहद'। आदि से लेकर अन्त तक किन-किन प्रकार की हदें पार कर चुके हो वा करनी हैं? इस लिस्ट को तो अच्छी तरह से जानते हो ना! *जब सर्व हदों से पार बेहद स्वरूप में, बेहद घर, बेहद के सेवाधारी, सर्व हदों के ऊपर विजय प्राप्त करने वाले विजयी रत्न बन जाते तब ही अन्तिम कर्मातीत स्वरूप का अनुभव स्वरूप बन जाते।* हद हैं अनेक, बेहद है एक। अनेक प्रकार की हदें अर्थात् अनेक - मेरा मेरा। एक मेरा बाबा दूसरा न कोई, इस बेहद के मेरे में अनेक मेरा समा जाता है। विस्तार सार स्वरूप बन जाता है। विस्तार मुश्किल होता है या सार मुश्किल होता है? तो आदि और अन्त का पाठ क्या हुआ? - बेहद। *इसी अन्तिम मंज़िल पर कहाँ तक समीप आये हैं, इसको चेक करो।* हद की लिस्ट सामने रख देखो कहाँ तक पार किया है!

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मुख से कभी भी हे ईश्वर, हे बाबा शब्द नहीं निकालना"*

 

_ ➳ *एक दौर था वो भी, जब  खुद को भूले, खुदा को भूले, मगर झाँझ मंजीरे खूब बजाये, क्या कहिए उसकी रहनुमाई, कि, जो फिर खुद ही चलकर वो चौखट तक मेरी आये*, *वो आये, अपना परिचय देने, क्योकि न बाप का परिचय था न खुद का, बस देहभिमान की माया में लिपटे बिन एम ऑब्जेक्ट के ही उस रब के करीब होने की गफलत में थी मैं आत्मा*... माया के रूपों में उलझी, मैं शिवशक्ति... अधिकारी से भिखारी हो गयी और माया ने खबर भी न होने दी, मगर *दूर देश का वो मुसाफिर उतर आया है मेरी खातिर इस पतित दुनिया में... और सम्मुख बैठकर मुझे अपनी पहचान देकर, हर गफलत से निकाल, माया से सावधानी दे रहा है*...

 

  *सूर्यवंशी राजधानी में एयरकंडीशन टिकट दिलाने की गारन्टी देने वाले बापदादा मुझ आत्मा से बोले:-* "मेरी सूर्यवंशी बच्ची... मैने ही आप आत्मा को, आपके और बाप के सच्चे स्वरूप की पहचान दी हैमगर अपनी सूर्यवंशी राजधानी में *एयरकन्डीशन टिकट लेने का आधार भी क्या आपने बुद्धि में धारण किया है* ? क्या अपना सब कुछ बाप को अर्पण किया है? *हूबहू कल्प पहले की तरह से तुम फिर से अपनी सूर्यवंशी राजधानी में उच्च पद पाने के लिए सम्मुख पढ रहे हो? क्या आप बच्ची की बुद्धि में यह पूरा- पूरा निश्चय है?..."*

 

_ ➳  *इस संगम युगी हीरें तुल्य जन्म को पाकर, ज्ञानरत्नों से खेलने वाली निश्चय बुद्धि मैं आत्मा, जानी जाननहार बापदादा से बोली:-* "मीठे बाबा... अपनी मंजिल और खुद से भी अनजानी सी मैं आत्मा, भक्ति मार्ग की आडी टेढी पगडंडियों पर खूब भटकी, मगर न खुद को पाया न खुदा को, अब आपने मेरे हर सफर को मुकाम दिया है... बेआरामियों का था ये सफऱ बाबा, आकर आपने जन्मों -जन्मों का आराम दिया है... मन्मनाभव की चाबी आपने मुझे देकर बाबा सब खजानों का मालिक बनाया है... *अब हर पल बुद्धि में राजधानी भी रहती है और एयर कंडीशन का टिकट लेने का आधार श्रीमत भी...निश्चय की डोर पकडे मैं आत्मा हर पल ऊपर और ऊपर ही उडी जा रही हूँ..."*

 

  *ज्ञान रत्नो की खानियाँ मुझ पर लुटाने वाले ज्ञानसागर बाप मुझ आत्मा से बोले:-* "ज्ञान रत्नों का मनन कर, इसे अपना बनाने वाली मेरी ज्ञानी तू आत्मा बच्ची... *जैसे इस ज्ञान का मनन कर आपने अपनी बुद्धि को दिव्य बुद्धि बनाया है, वैसे ही हर एक को ज्ञानमुक्तक चुगने वाला मानसरोवर का हंस बनाओं*, परचिन्तन से मुक्त हो कर हर आत्मा को विचार सागर मन्थन का महत्तव समझाओं... *बुद्धि को दिव्य बना कर अब सबको मायाजीत बनाओ, मनन सुमिरन में बुद्धि को बिजी कर विकारों की शैय्या पर निश्चिंत खुद के विष्णु रूप का स्वरूप बनाओं..."*

 

_ ➳  *बाप के आशीर्वादों की छत्र छाया में श्रीमत की फूलों भरी राहों पर चलने वाली मैं आत्मा, बापदादा से बोली:-* "ज्ञान सागर से गुणों के मोती चुन- चुन कर मुझ आत्मा ने इस जीवन का श्रृंगार किया है बाबा!... *समय स्वाँस और संकल्पों को समर्पित कर, गुणों का दान कर, मैं आत्मा साहूकार बन रही हूँ*... ज्ञान मनन की पतवार से जैसे आपने माया की गफलत से मुझ आत्मा को निकाला है वैसे ही मैं हर आत्मा को ज्ञान घास जुगाली की युक्तियाँ सिखा रही हूँ... *कर्मों के बोझ में दबी हर आत्मा को उडती कला सिखा रही हूँ... जड मूर्तियों के सामने हाथ फैलाने वालों को दाता बना रही हूँ..."*

 

*स्वपरिवर्तन से विश्वपरिवर्तन की अलख जगाने वाले बापदादा मुझ आत्मा से बोले:-* "तेजी से बदलते समय चक्र के साथ खुद के संस्कारों को बदलने वाली मेरी विश्वपरिवर्तक बच्ची... शुभभावनाओ को इमर्ज कर स्थापना के कार्य में तेजी लाओं, *समय के महत्व को समझो अब, और शुभभावो से हर एक को दिव्यगुणो की धारणा कराओं..  बदला लेने की भावना वाली हर आत्मा को बदलकर दिखाओं..."*

 

_ ➳ *बाप के स्नेह पर बलिहारी मैं आत्मा माया की गुलामी से छुडाने वाले बापदादा से बोली:-* "मेरे बाबा... *ज्ञान मोतियों का मनन कर जैसे मुझ आत्मा को आपने मायजीत बनाया है, वैसे ही देखों मेरे शुभसंकल्पों से सभी आत्माए माया जीत बन रही है*... अष्ठशक्तियों का किला हर पल और भी मजबूत होता जा रहा है, ड्रामा में माया का भी पार्ट बदल रहा है अब माया आती है बस झुककर सलामी देने के लिए... और *इसकी वजह बस आपके वरदानों की शक्ति है और श्रीमत का आधार है... हुई दिव्य बुद्धि मेरी, और बुद्धि में ज्ञान का सार है..."*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  कयामत के समय सम्पूर्ण पावन बनना है*"

 

_ ➳  भगवान के साथ सर्व सम्बन्धो का सुख सारे कल्प में केवल इस समय ही मिलता है इसका प्रेक्टिकल अनुभव करती हुई मैं नन्ही सी परी बन अपने खुदा दोस्त के साथ स्वयं को एक बहुत खूबसूरत दुनिया में देख रही हूँ। *इस खूबसूरत दुनिया मे रंग बिरंगे खुशबूदार फूलों के एक अति सुंदर बगीचे में अपने खुदा दोस्त के साथ टहलते हुए मैं उनसे मीठी - मीठी बातें कर रही हूँ*। मेरे खुदा दोस्त मेरे साथ अनेक प्रकार से खेल पाल कर रहें है। उनके साथ मैं इस खूबसूरत दुनिया के खूबसूरत नज़ारे देख रही हूँ। 

 

_ ➳  मन को लुभाने वाली इस बहुत निराली और अद्भुत पिकनिक का आनन्द लेने के बाद मैं जैसे ही अपनी स्व स्वरूप में स्थित होती हूँ, *मैं अनुभव करती हूँ कि अपने जिस सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप में मैं पहली बार अपने परमधाम घर से इस कर्मभूमि पर आई थी, उसी सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप को पुनः पाने के लिए, पवित्रता के सागर, मेरे पतित पावन परम पिता परमात्मा मुझे अपने पास बुला रहें हैं*। यह अनुभव करते ही मैं देखती हूँ जैसे पतित पावन मेरे शिव बाबा अव्यक्त ब्रह्मा बाबा के लाइट के तन में विराजमान होकर मेरे सामने आ गए हैं और मेरा हाथ थामने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा रहे हैं।

 

_ ➳  अपने भगवान उस्ताद के हाथ मे हाथ देते ही मैं महसूस करती हूँ जैसे एक बहुत तेज करेन्ट मेरे सारे शरीर मे दौड़ने लगा है। *पवित्रता की किरणों का अनन्त प्रवाह बापदादा के हाथों से मेरे शरीर के अंग - अंग में प्रवाहित हो रहा है*। शक्तियों का यह तीव्र प्रवाह शरीर के भान को जैसे समाप्त कर रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरा शरीर प्रकाश का बन गया है और इतना हल्का हो गया है कि धरती के आकर्षण को छोड़ ऊपर उड़ने लगा है। *अपने उस्ताद के हाथ मे हाथ देकर, इस दुनिया से मैं बहुत दूर ऊपर आकाश में आ गई हूँ*। 

 

_ ➳  नीचे धरती के नजारों को देखते हुए, इस खूबसूरत यात्रा का आनन्द लेते - लेते मैं आकाश को भी पार करके अपने उस्ताद के साथ अब उनके अव्यक्त वतन में पहुँच गई हूँ। *अपने ही समान लाइट के शरीर वाले फरिश्तो को मैं इस वतन में यहाँ वहाँ उड़ते हुए देख रही हूँ जो अपने उस्ताद की इस खूबसूरत दुनिया में मेरे ही समान उनके पास मिलन मेला मनाने आये हैं*। अपने इस अव्यक्त वतन के सुंदर नजारो को देखते - देखते अब मैं स्वयं को पवित्रता की शक्ति से भरपूर करने के लिए बापदादा के सामने जा कर बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  अपनी पावन दृष्टि से मुझे निहारते हुए मेरे उस्ताद पवित्रता की किरणें मुझ में प्रवाहित कर रहें हैं। ऐसा लग रहा है जैसे बापदादा की पावन दृष्टि से पवित्रता का झरना बह रहा है जिससे निकल रही पवित्र फुहारें मुझ पर बरस रही हैं। *बाबा के मस्तक से आ रही पवित्रता की तेज लाइट मुझे गहराई तक छूकर, पवित्रता की शक्ति से मुझे भरपूर कर रही है*। अपने उस्ताद से पवित्रता का बल अपने अंदर भरकर अब मैं अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान अनादि स्वरूप का अनुभव करने के लिए अपने लाइट के आकारी शरीर को इस अव्यक्त वतन में छोड़, अपने निराकारी स्वरूप को धारण कर निराकारी वतन की ओर चल पड़ती हूँ।

 

_ ➳  आत्माओं की इस निराकारी दुनिया मे मैं बिंदु आत्मा अब अपने पतित पावन बिंदु बाप के बिल्कुल समीप जा कर बैठ जाती हूँ। *बिंदु बाप से आ रही पवित्रता की अनन्त किरणें मुझ बिंदु आत्मा पर पड़ रही हैं और मुझ आत्मा पर चढ़ी विकारों की कट को भस्म कर मुझे पावन बना रही है*। मेरा पवित्रता का औरा बढ़ता जा रहा है। मैं रीयल गोल्ड बनती जा रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा पवित्रता की खुराक खिलाकर मुझे बहुत शक्तिशाली बना रहे हैं। 

 

_ ➳  रीयल गोल्ड के समान शुद्ध बन कर अब मैं आत्मा वापिस साकार वतन में लौटती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, सम्पूर्ण पावन बनने के अपने लक्ष्य को पाने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपने अनादि सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप को पुनः प्राप्त करने के लिए और उसी स्वरूप में वापिस अपने घर जाने के लिए, अपना बुद्धि रूपी हाथ उस्ताद के हाथ मे देकर, उनकी याद से अब मैं स्वयं को पावन बना रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं कमजोरियों को फुलस्टॉप लगाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अपने सम्पन्न स्वरूप को प्रख्यात करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं साक्षात्कारमूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव अपने अनादि और आदि गुणों को स्मृति में रखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व गुणों का स्वरूप हूँ  ।*

   *मैं आत्मा स्मृति स्वरूप हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सारे दिन में गलती नहीं की लेकिन समय, संकल्प, सेवा, सम्बन्ध-सम्पर्क में स्नेहसंतुष्टता द्वारा जमा कितना किया? *कई बच्चे सिर्फ यह चेक कर लेते हैं - आज बुरा कुछ नहीं हुआ। कोई को दुःख नहीं दिया। लेकिन अब यह चेक करो कि सारे दिन में श्रेष्ठ संकल्पों का खाता कितना जमा कियाश्रेष्ठ संकल्प द्वारा सेवा का खाता कितना जमा हुआ?* कितनी आत्माओं को किसी भी कार्य से सुख कितनों को दिया? योग लगाया लेकिन योग की परसेन्टेज किस प्रकार की रहीआज के दिन दुआओं का खाता कितना जमा किया?      

 

 _ ➳  *कोई कितना भी हिलावे, हिलना नहीं अखण्ड गुणदानी, अटलकोई कितना भी हिलावेहिलना नहीं।* हरेक एक दो को कहते होसभी ऐसे हैंतुम ऐसे क्यों अपने को मारता हैतुम भी मिल जाओ। कमजोर बनाने वाले साथी बहुत मिलते हैं। लेकिन *बापदादा को चाहिए हिम्मतउमंग बढ़ाने वाले साथी। तो समझा क्या करना है? सेवा करो लेकिन जमा का खाता बढ़ाते हुए करोखूब सेवा करो। पहले स्वयं की सेवाफिर सर्व की सेवा।*

 

✺   *ड्रिल :-  "दुआओं का खाता जमा करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा भृकुटी सिंहासन में विराजमान बैठी हूँ... मैं मन-बुद्धि द्वारा आसमान की ओर उड़ती हूँ... धीरे-धीरे आसमान की तरफ उड़कर मैं एक सफेद प्रकाश की दुनिया सूक्षमवतन में पहुँच जाती हूँ...* वहाँ एकदम साइलेंस की दुनिया हैं... एक तिनके तक की आवाज़ नहीं हैं... एकदम सन्नाटा हैं... वहाँ ब्रह्मा बाबा शिव बाबा का इंतज़ार कर रहे है...

 

 _ ➳  सूक्ष्मवतन में शिव बाबा ब्रह्मा बाबा के तन में आते हैंं और उनके आते ही वहाँ का वातावरण फ़ूलों से भर जाता हैं... फ़ूलों की धीमी-धीमी खुशबू आने लगती हैं... बाबा मुझ आत्मा पर सुनहरी किरणें डाल रहे हैं... *मैं उन किरणों में खो चुकी हूँ... मुझ आत्मा का माँ वैष्णो देवी का स्वरूप इमर्ज हो रहा हैं... मुझ आत्मा के इस माँ वैष्णो देवी के स्वरूप से बाबा की किरणें भक्तों पर न्यौछावर हो रही हैं...*

 

 _ ➳  सभी भक्त बहुत ख़ुशी से झूम रहे हैं... उन्हें ऐसा लग रहा हैं मानों जैसे उनकी सभी मुरादे पूरी हो चुकी हैं... वह सब आसमान की ओर देखकर मन ही मन मुझ पूज्य स्वरूप का शुक्रिया कर रहे हैं... *उन करोड़ों आत्माओं की दुआएं मुझ आत्मा तक पहुँच रही हैं... अब मेरे मन मे श्रेष्ठ संकल्प ही चलते हैं... योग में भी वृद्धि हो रही हैं... मुझ आत्मा का दुआओं का खाता जमा होता जा रहा हैं...*

 

 _ ➳  अब कोई कितना भी बाबा से दूर करने की कोशिश करें, कोई भी कहे कि तुम कहाँ फँस चुके हो परन्तु मैं हिलती नहीं हूँ... मुझ आत्मा में हिम्मत बढ़ चुकी हैं... मैं किसी की उल्टी बातों पर ध्यान नहीं देती हूँ... *अब मैं सेवा तो करती हूँ परन्तु साथ-साथ जमा के खाते को बढ़ाकर करती हूँ... मैं आत्मा बाबा से वादा करती हूं कि मैं योग और ज्ञान से सर्व आत्माओं का कल्याण करूँगी...*

 

 _ ➳  *अपनी दिनचर्या में मैं आत्मा अब समय बरबाद नहीं करती हूँ... मुझ आत्मा के लौकिक व अलौकिक सम्बन्धों में स्नेह बढ़ता जा रहा है और मैं सदा संतुष्ट रहती हूँ... सभी के प्रति शुभभावना और शुभकामना रखती हूँ...* अब मैं सवेरे-सवेरे उठते ही पहले स्व को ज्ञान रत्नों से भरपूर करके स्व की सेवा स्वमान लेकर, अमृतवेला करकें और मुरली सुनकर करती हूँ... फिर सर्व आत्माओं की सेवा करती हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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