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 05 / 02 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *किसी भी देहधारी में लगाव तो नहीं रखी ?*

 

➢➢ *ज्ञान की पॉइंट्स को बुधी में धारण किया ?*

 

➢➢ *सच्चे साफ़ दिल के आधार से नंबरवन लेने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *सर्व के प्रति और शुभ चिंतन और शुभ कामना रखी ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे स्थूल एक्सरसाइज से तन तन्दरूस्त रहता है। ऐसे चलते-फिरते अपने 5 स्वरूपों में जाने की एक्सरसाइज करते रहो। जब ब्राह्मण शब्द याद आये तो ब्राह्मण जीवन के अनुभव में आ जाओ। फरिश्ता शब्द कहो तो फरिश्ता बन जाओ। तो सारे दिन में यह मन की ड्रिल करो।* शरीर की ड्रिल तो शरीर के तन्दरूस्ती के लिए करते हो, करते रहो लेकिन साथ-साथ मन की एक्सरसाइज बार-बार करो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विश्व के अन्दर विशेष पार्ट बजाने वाला हीरो एक्टर हूँ"*

 

  सभी अपने को विश्व के अन्दर विशेष पार्ट बजाने वाले हीरो एक्टर समझकर पार्ट बजाते हो? (कभी-कभी) बापदादा को बच्चों का कभी -कभी शब्द सुनकर आश्चर्य लगता है। *जब सदा बाप का साथ है तो सदा उसकी ही याद होगी ना।* बाप के सिवाए और कौन है जिसको याद करते हो? औरों को याद करते-करते क्या पाया और कहाँ पहुँचे? इसका भी अनुभव है।

 

  *जब यह भी अनुभव कर चुके तो अब बाप के सिवाए और याद आ ही क्या सकता? सर्व सम्बन्ध एक बाप से अनुभव किया है या कोई रह गया है?*

 

  *जब एक द्वारा सर्व सम्बन्ध का अनुभव कर सकते हो तो अनेक तरफ जाने की आवश्यकता ही नहीं। इसको ही कहा जाता है - 'एक बल एक भरोसा'।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *जो भी कमी हो, उस कमी को मुक्ति दो, क्योंकि जब तक मुक्ति नहीं दी है ना, तो मुक्तिधाम में बाप के साथ नहीं चल सकेंगे।* तो मुक्ति देंगे? मुक्ति वर्ष मनायेंगे?

 

✧  जो मनायेगा वह ऐसे हाथ करे। मनायेंगे? एक-दो को देख लिया ना, मनायेंगे ना! अच्छा है।

*अगर मुक्ति वर्ष मनाया तो बापदादा जौहरातों से जडी हुई थालियों में बहुत-बहुत मुबारक, ग्रीटिंग्स, बधाइयाँ देंगे।*

 

✧  अच्छा है, *अपने को भी मुक्त करो। अपने भाई-बहनों को भी दु:ख से दूर करो।* बिचारों के मन से यह तो खुशी का आवाज निकले - हमारा बाप आ गया। ठीक है। अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  जितना बुद्धि की सफाई होगी उतना ही योगयुक्त अवस्था में रह सकेंगे। यह व्यर्थ संकल्प और विकल्प जो चलते हैं वह अव्यक्त स्थिति होने में विघ्न हैं। *बार-बार इस शरीर के आकर्षण में आ जाते हैं, उसका मूल कारण है बुद्धि की सफाई नहीं है। बुद्धि की सफाई अर्थात् बुद्धि को जो महामन्त्र मिला हुआ है उसमें बुद्धि मगन रहे।* यहाँ से जब जाओ तो ऐसे ही समझकर जाना कि हम इस शरीर में अवतरित हुए हैं - ईश्वरीय सेवा के लिए। अगर यह स्मृति रखकर जायेंगे तो आपकी हर चलन में अलौकिता देखने में आयेगी। *ऐसे ही समझकर चलना कि निमित मात्र इस शरीर का लोन लेकर ईश्वरीय कार्य के लिए, थोड़े दिन के लिए अवतरित हुये हैं, कार्य समाप्त करके फिर चले जायेंगे। यह स्मृति लक्ष्य रखकर के, ऐसी स्थिति बनाकर फिर चलना।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- एक बाप की याद में रह पास विद आनर होना"*

➳ _ ➳ *84जन्म.... 84मात पिता... अनेक मते... जिन पर चलती चलती मैं आत्मा गोरी से काली बन पड़ी... फिर आप आए... इतना निरहंकारीपन, कि स्वयं धोबी बन पड़े...* इस अंतिम जन्म आपके श्रीमत पर चल मैं आत्मा श्याम से सुंदर बन रही हूं बाबा... अब यह महसूसता आती जाती है बाबा, पहले क्या थे! और अब क्या बनते जा रहे हैं... *यह अलौकिक जीवन अच्छा लगने लगा है... अभी ही आपने मुझ आत्मा को... अलौकिक सीट की पहचान कराई... मैं आत्मा भृकुटि के मध्य विराजमान हूं!...* अब कुछ भी हो जाए बाबा यह सीट न छोड़ने की... माया जीत जगतजीत बनने की, 8 माला में आने की, पास विद आनर होने की मुझ आत्मा की दृढ़ प्रतिज्ञा बन गई है... क्योंकि अब इच्छा है तो विजय निश्चित है...

❉ *मीठे बाबा अपनी प्यार भरी गोद में मीठी सी थपकी देते हुए बोलते हैं:- "रूहानी बच्चे... 84 जन्म तुमने 84 बाप बदले... मनमत परमत पर चली हो... अभी इस जन्म जो पिताओं का पिता मिला, अब उसकी मत पर चलो और 21 जन्मों के लिए अविनाशी कमाई जमा करो...* देखो कमाई के समय निंद्रा फिट जाती है, तो अब स्वयं को निंद्रा से मुक्त अब कमाई करो... जागो... *अब समय है तकदीर जगाने का..."*

➳ _ ➳ *मीठे बाबा की गोद में प्यार भरे अनुभव में डूबी मैं आत्मा बाबा से बोली:- "हां मेरे रूहानी बाबा... अब तक तकदीर को लकीर लगी हुई थी....* आत्मा की ज्योति उझाई हुई थी... मगर अब आपकी याद रूपी घृत से मैं आत्मा फिर से जाग उठी हूं... *जीवन पहले जैसी नहीं... अब रातों को सोती हूं तो तुम्हारी ही मीठी यादों में... उठती हूं तो पहले पहले तुम ही याद आते हो..."*

❉ *मीठे बाबा मीठी लाडली मुस्कान देते हुए मुझ आत्मा से बोले:- "लाडली बच्ची... जीवन में बदलाव तो आएगा ही... जितना जितना तुम मेरी याद में रहे श्रीमत पर चल मेरा कहना मानोगी,* बदलाव तो आएंगे ही... बाप भी हर्षित होते हैं तुम्हारे इस नए मरजीवा जीवन को देख... *बाप को भी खुशी होती है बच्चे लायक बन रहे हैं और बाप को क्या चाहिए..."*

➳ _ ➳ *प्यार के सागर की लहरों की गहराइयों में खोते हुए मैं आत्मा बाबा से बोली:- "मीठे बाबा... सच में मैं कितनी ही भाग्यवान आत्मा हूं जो परमात्म दुआओं की पात्र बनी...* स्वयं भगवान मुझ पर हर्षित हो प्यार लुटा रहे हैं, सचमुच बाबा अब यह बदलाव मुझ आत्मा को और ही दृढ़ करता जा रहा है... *सपूत बच्चा बन तुम्हारी आशा को पूरा करने का दीपक ज्वालामुखी रूप ले चुका है... अब नहीं तो कभी नहीं..."*

❉ *मीठे बाबा सन्मुख बैठे शक्तिशाली दृष्टि देते हुए बोले:- "मीठी बच्चे... दुनिया में देखो कैसे, चाहे कोई भी प्राइम मिनिस्टर हो अपनी सीट को छोड़ने नहीं चाहते... विनाशी कुर्सी के लिए कितनी मेहनत करते... अब तुम्हें तो अविनाशी कुर्सी मिली है,* स्मृति आई है मैं आत्मा स्वराज्य अधिकारी हूं, तो अब इस सीट को नहीं छोड़ अविनाशी पद का... भविष्य में चक्रवर्ती महाराजा महारानी बनो..."

➳ _ ➳ *मीठे बाबा की शिक्षाओं को स्वयं में धारण करते मैं आत्मा बाबा से बोली:- "हां मीठे बाबा... अब तो पास विद ऑनर की ट्रॉफी पर नज़र टिकी हुई है...* लक्ष्य सामने है... मैं आत्मा लक्ष्य स्वरूप हो गई हूं... स्मृति सो समर्थी मैं आत्मा स्व के साथ-साथ विश्व की सर्विस भी करती जा रही हूं... *विश्व कल्याणकारी मैं आत्मा स्वयं को एक जिम्मेवार सपूत बच्चे के रूप में देख रही हूं..."*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  किसी भी देहधारी से लगाव नही रखना है*"

➳ _ ➳ 
इस नश्वर देह और इस देह से जुड़ी हर वस्तु के चिंतन से मैं जैसे ही अपने मन बुद्धि को हटा कर अपने वस्तविक सत्य स्वरूप के बारे में विचार करती हूँ तो मन बुद्धि स्वत: ही मेरे उस सत्य स्वरूप पर एकाग्र होने लगते है और मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्रों से अपने उस अति सुंदर स्वरूप को देख कर आनन्द विभोर हो उठती है। *आहा! कितना सुंदर, चमकता हुआ, जगमग करता हुआ, दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप है मेरा*। अपने इस अति सुन्दर सलौने स्वरूप को मैं ज्ञान के दिव्य चक्षु से देख रही हूँ और इसमें समाये अपने सातों गुणों और अष्ट शक्तियों का गहराई तक अनुभव कर रही हूँ।

➳ _ ➳ 
मैं देख रही हूँ मुझ आत्मा के सातों गुण सतरंगी किरणों के रूप में चारों ओर फैल कर अपनी अद्भुत छटा बिखरते हुए आस पास के वायुमण्डल को भी सतोगुणी बना रहे हैं। *किरणों का प्रवाह मुझ आत्मा से मेरे पूरे शरीर मे होता हुआ अब धीरे - धीरे बाहर तक फैलने लगा है*। एक दिव्य आलौकिक रूहानी मस्ती चारों और फैलती जा रही है। *चारों और अपने गुणों की किरणें फैलाता हुआ मुझे मेरा यह सतोगुणी स्वरूप एक सतरंगी खिले हुए रूहे गुलाब की तरह दिखाई दे रहा है जिसमे से निकल रही रूहानियत की खुशबू पूरे वायुमण्डल को रूहानी सुगन्ध से भर रही है*।

➳ _ ➳ 
ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे मैं किसी सुगन्धित फूंलो के खिले हुए उपवन में पहुँच गई हूँ जहां चारों ओर फैली दिव्यता मन बुद्धि को दिव्य बना कर, *देह और देह की दुनिया से किनारा कराए, उस दिव्य लोक की ओर ले कर जा रही है जो मुझ आत्मा का वास्तविक घर है, मेरे पिता परमात्मा का घर है*। जहां से मैं आत्मा अपने सत्य स्वरूप के साथ सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने के लिए आई थी और पार्ट बजाते - बजाते अपने सत्य स्वरूप को ही भूल गई थी। किन्तु मेरे शिव पिता परमात्मा ने आ कर मुझे मेरा वास्तविक परिचय दे कर मुझे मेरे उस सत्य स्वरूप का अनुभव करवा दिया।

➳ _ ➳ 
अपने उस सत्य स्वरूप का अनुभव अपने घर में, अपने शिव पिता परमात्मा के सम्मुख करने के लिए मैं आत्मा अब अपने घर परमधाम की ओर चल पड़ती हूँ। मन बुद्धि के विमान पर सवार हो कर सेकण्ड में मैं आकाश को पार कर जाती हूँ और उससे भी परें अपने परमधाम घर में पहुँच जाती हूँ अपने शिव परम पिता परमात्मा के पास। *बीजरूप शिव पिता की मास्टर बीजरूप सन्तान मैं आत्मा स्वयं को देख रही हूँ आत्माओं की अति सुंदर निराकारी दुनिया में*। मेरे सामने बिंदु रूप में मेरे शिव पिता परमात्मा और उनके सामने मैं बिंदु आत्मा। कितना सुखद दृश्य हैं। बिंदु बाप और बिंदु बच्चे का यह मंगल मिलन चित को चैन और मन को आराम दे रहा है ।

➳ _ ➳  5
तत्वों के पार लाल सुनहरी प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया कितनी निराली और असीम शांति से भरपूर करने वाली है। चारों और गहन शांति ही शांति का अनुभव हो रहा है। संकल्पो की हलचल मात्र भी यहां नही है। *इस बीजरूप अवस्था में अपने ओरिजनल स्वरूप में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के सानिध्य में मैं अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ* । बीजरूप बाबा से आती सर्वशक्तियों रूपी किरणों की बौछारें मुझे असीम बल प्रदान कर रही हैं। बाबा से आती सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं शक्तियों का पुंज बन गई हूँ और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ।

➳ _ ➳ 
शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर अब मैं पुनः लौट रही हूँ जीवात्माओं की साकारी दुनिया में। फिर से अपने साकार तन में, साकार दुनिया मे, साकार सम्बन्धो के बीच अपने ब्राह्मण स्वरुप में मैं स्थित हूँ। *देह और देह की दुनिया मे रह कर मैं अपना पार्ट बजा रही हूँ*। किन्तु देह और देहधारियों के बीच में रहते हुए भी अपने सत्य स्वरूप में टिक कर अपनी दिव्यता और रूहानियत का अनुभव मुझे इस नश्वर दुनिया से वैराग्य दिला रहा है। स्वयं को मैं इस दुनिया से उपराम अनुभव कर रही हूँ। *बुद्धि को देहधारियों से निकाल, अपने सत्य स्वरूप में अपने सत्य बाप के साथ सर्व सम्बन्धों का सुख लेते हुए मैं हर पल अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं सच्चा साफ दिल रखने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं नम्बरवन लेने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं दिलाराम पसन्द आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ *मैं आत्मा सर्व के प्रति शुभ चिन्तन और शुभ कामना रखती हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा सच्चा परोपकार करती हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा शुभ चिंतक हूँ ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  आप हर एक अपनी विशेषताओं को जानते हो? अगर हाँ तो एक हाथ उठाओ। बहुत अच्छा। उस विशेषताओं को क्या करते हो? जानते हो बहुत अच्छा, मानते हो बहुत अच्छा लेकिन उन विशेषताओं को क्या करते हो? (सेवा में लगाते हैं) और रीति से यूज तो नहीं करते ना? *यह विशेषतायें परमात्म-देन है। परमात्म-देन सदा विश्व सेवा में अर्पण करनी है।* विशेषतायें अगर निगेटिव रूप में यूज किया तो अभिमान का रूप बन जाता है क्योंकि *ज्ञान में आने के बाद, ब्राह्मण जीवन में आने के बाद बाप द्वारा विशेषतायें बहुत प्राप्त होती हैं क्योंकि बाप का बनने से विशेषताओं के खजाने के अधिकारी बन जाते हो। एक दो विशेषतायें नहीं हैं, बहुत विशेषतायें हैं।* जो यादगार में भी आपकी विशेषताओं का वर्णन है - 16 कला सम्पन्न, तो सिर्फ 16 नहीं है, *16 माना सम्पूर्ण। सर्व गुण सम्पन्न।* सम्पूर्ण निर्विकारिता का डिटेल है। कहने में आता है सम्पूर्ण निर्विकारी लेकिन सम्पूर्ण में कई डिटेल हैं। तो विशेषतायें तो बाप द्वारा हर ब्राह्मण को वर्से में प्राप्त होती ही हैं। लेकिन उन विशेषताओं को धारण करना और फिर सेवा में लगाना।

 

 _ ➳  *मेरी यह विशेषता है, नहीं, परमात्म-देन है। परमात्म-देन समझने से विशेषता में परमात्म शक्तियाँ भर जाती हैं। मेरी कहने से अभिमान और अपमान दोनों का सामना करना पड़ता है।* किसी भी प्रकार का अभिमान, चाहे ज्ञान का, चाहे योग का, चाहे सेवा का, चाहे बुद्धि का, चाहे कोई गुण का, *जिसमें भी अभिमान होगा उसकी निशानी है - उसको अपमान बहुत जल्दी फील होगा। तो विशेष आत्मायें हो अर्थात् परमात्म-देन के अधिकारी हो।*

 

✺   *ड्रिल :-  "विशेष आत्मा, परमात्म-देन के अधिकारी होने का अनुभव करना"*

 

 _ ➳  *वाह मैं खुशनसीब आत्मा... स्वयं भगवान मुझे मिल गये हैं... परमात्मा स्वयं मुझे विशेषताओं से सजाने के लिए... रोज अमृतवेला मुझसे मिलने आते हैं...* मैं आत्मा प्यारे शिवबाबा की गोद में पालना ले रही हूँ... उनके सम्मुख बैठी हूँ... वो मुझ पर अपने प्रेम की बरसात कर रहे हैं... बाबा ने मेरे मस्तक पे अपना हाथ रख रहे हैं... जिससे मुझ आत्मा के सारे अवगुण दूर हो रहे हैं... *बाबा ने मेरे हाथों को अपने हाथों में ले रहे हैं... और अपनी सारी विशेषताएं, सारे गुण, मुझमें ट्रान्सफर कर रहे हैं... मुझ आत्मा को अपने जैसा गुणवान और विशेषताओं से भरपूर बना रहे हैं...* अष्ट शक्तियों का मालिक बना रहे हैं... मैं आत्मा बाबा से परमात्मा विशेषताएँ धारण कर रही हूँ... ये विशेषताएँ परमात्मा की देन हैं... और मुझे इनका यूज लोक - कल्याण के लिए करना है... *मैं आत्मा इन विशेषताओं के साथ उड़ कर पहुँच जाती हूँ... विश्व - ग्लोब के ऊपर...*

 

 _ ➳  मैं विशेषताओं का फरिश्ता विश्व - ग्लोब पे बैठा हूँ... *मैं आत्मा परमात्मा से प्राप्त विशेषताओं को सिर्फ विश्व - कल्याण अर्थ और सेवा अर्थ ही यूज कर रही हूँ...* अपने लिए यूज नहीं कर रही हूँ... क्योंकि यह विशेषतायें परमात्म-देन है... इसलिए मैं आत्मा परमात्म-देन को सदा विश्व सेवा में अर्पण कर रही हूँ... अगर मैं आत्मा इन विशेषताओं को निगेटिव रूप में यूज करती हूँ तो यह अभिमान का रूप ले लेती है... *मुझ फरिश्ते ने परमात्मा से वादा किया है कि आप से प्राप्त शक्तियों का सही कार्य में ही यूज करूँगा... सदा विश्व सेवा के लिए इनको यूज करूँगा...*

 

 _ ➳  जब से मुझ आत्मा को परमात्म - ज्ञान मिला है... और ब्राह्मण जीवन मिला है... तब से बाबा द्वारा बहुत विशेषतायें प्राप्त हुई है... समाने की विशेषता, लौकिक को अलौकिक में बदलने की विशेषता और ना जाने कितनी ही विशेषताओं का मालिक बनी हूँ... *जैसे मेरे परमपिता ने मुझ आत्मा को विशेषताओं से संपन्न बनाया है... वैसे ही मैं आत्मा विश्व की सारी आत्माओं को इन विशेषताओं से संपन्न बना रही हूँ... जिसको जो कुछ भी चाहिए उसको उस शक्ति से, उस गुण से संपन्न बना रही हूँ...* सारी आत्माएँ इन शक्तियों और विशेषताओं को प्राप्त कर बहुत खुशी और आनंद का अनुभव कर रही है... जिस तरह मैं आत्मा बाप का बनते ही विशेषताओं के खजाने की अधिकारी बन रही हूँ... एक दो विशेषताओं की अधिकारी नहीं... बहुत सारी विशेषताओं की अधिकारी बन रही हूँ... उसी तरह *मैं आत्मा विश्व की सारी आत्माओं को परमात्मा की विशेषताओं की अधिकारी बना रही हूँ... सबको गुणों का दान दे रही हूँ...*

 

 _ ➳  मैं 16 कला संपन्न आत्मा हूँ... सिर्फ कहने मात्र नहीं हूँ... मैं इन विशेषताओं का स्वरूप बन रही हूँ... इसलिए *आज भी मेरे यादगार स्वरूप में मेरे भक्‍त, मेरे 16 कला सम्पूर्ण स्वरूप की वंदना कर रहे हैं... सर्व गुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारिता का ये मेरा ये स्वरूप आज भी भक्तों को सम्पूर्ण निर्विकारिता का एहसास करा रहा है...* मैं आत्मा बाप द्वारा प्राप्त इन विशेषताओं को धारण कर सिर्फ परमात्म - सेवा में लगा रही हूँ...

 

 _ ➳  मुझ आत्मा में जो भी विशेषता है... वो परमात्म-देन समझ कर ही चल रही हूँ... *जैसे ही मैं आत्मा परमात्म-देन समझती हूँ वैसे ही मेरी विशेषताओं में परमात्म शक्तियाँ भर रही है...* इन विशेषताओं को कभी भी मैं आत्मा अपना नहीं कह रही हूँ... जब - जब भी अभिमान के वश होकर इन विशेषताओं को अपना समझा है... तब - तब मुझ आत्मा को अपमान का सामना करना पड़ रहा है... लेकिन जैसे ही मुझ आत्मा को अपने ईष्ट देवी स्वरूप की स्मृति आती है तो मेरा अभिमान, स्वमान में परिवर्तित हो रहा है... *अब मैं आत्मा समझ चुकी हूँ किसी भी प्रकार का अभिमान... चाहे ज्ञान का... चाहे योग का... चाहे सेवा का... चाहे बुद्धि का... चाहे कोई गुण का... जिसमें भी अभिमान होगा उसको अपमान का बहुत सामना करना पड़ेगा...* मैं आत्मा तो विशेष आत्मा हूँ अर्थात् परमात्म-देन की अधिकारी हूँ... तो मुझे अपनी विशेषताओं को सिर्फ परमात्म - सेवा के लिए यूज करना है... *अब मैं विशेष आत्मा अपनी विशेषताओं को सिर्फ आत्माओं के कल्याण के लिए ही यूज कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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