━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 05 / 03 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *मतभेद में तो नहीं आये ?*

 

➢➢ *रूहानी सेवा दिल से की ?*

 

➢➢ *पुराने संस्कार और संसार के रिश्तों की आकर्षण से मुक्त रहे ?*

 

➢➢ *शांति की शक्ति द्वारा सर्व आत्माओं की पालना की ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  *परमात्म-प्यार के अनुभवी बनो तो इसी अनुभव से सहजयोगी बन उड़ते रहेंगे।* परमात्म-प्यार उड़ाने का साधन है। उड़ने वाले कभी धरनी की आकर्षण में आ नहीं सकते। *माया का कितना भी आकर्षित रूप हो लेकिन वह आकर्षण उड़ती कला वालों के पास पहुँच नहीं सकती।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं बाप के साथ और सहयोग लेने वाली विशेष आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को बाप के साथ रहने वाले सदा के सहयोग लेने वाली आत्मायें समझते हो? सदा साथ का अनुभव करते हो? *जहाँ सदा बाप का साथ है वहाँ सहज सर्व प्राप्तियों हैं। अगर बाप का साथ नहीं तो सर्व प्राप्ति भी नहीं क्योंकि बाप है सर्व प्राप्तियों का दाता। जहाँ दाता साथ है वहाँ प्राप्तिया भी साथ होंगी।*

 

  *सदा बाप का साथ अर्थात् सर्व प्राप्तियों के अधिकारी। सर्व प्राप्ति स्वरूप आत्मायें अर्थात् भरपूर आत्मायें सदा अचल रहेंगी। भरपूर नहीं तो हिलते रहेंगे। सम्पन्न अर्थात् अचल।*

 

  *जब बाप साथ दे रहा है तो लेने वालों को लेना चाहिए ना। दाता दे रहा है तो पूरा लेना चाहिए, थोड़ा नहीं। भक्त थोड़ा लेकर खुश हो जाते लेकिन ज्ञानी अर्थात् पूरा लेने वाले।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  आज बापदादा सभी बच्चों को मुबारक के साथ-साथ यही इशारा देते हैं कि *यह रहा हुआ संस्कार समय पर धोखा देता भी है और अंत में भी धोखा देने के निमित बन जायेगा। इसलिए आज संस्कार का संस्कार करो।* हर एक अपने संस्कार को जानता भी है, छोडने चाहता भी है, तंग भी है लेकिन सदा के लिए परिवर्तन करने में तीव्र पुरुषार्थी नहीं है। पुरुषार्थ करते हैं लेकिन तीव्र पुरुषार्थी नहीं है।

 

✧  कारण? तीव्र पुरुषार्थ क्यों नहीं होता? कारण यही है, जैसे रावण को मारा भी लेकिन सिर्फ मारा नहीं, जलाया भी। ऐसे मारने के लिए पुरुषार्थ करते हैं, थोडा बेहोश भी होता है संस्कार, लेकिन जलाया नहीं तो बेहोशी से बीच-बीच में उठ जाता है। *इसके लिए पुराने संस्कार का संस्कार करने के लिए इस नये वर्ष में योग अग्नि से जलाने का, दृढ़ संकल्प का अटेन्शन रखो।* पूछते हैं ना इस नये वर्ष में क्या करना है?

 

✧  सेवा की तो बात अलग है लेकिन पहले स्वयं की बात है - योग लगाते हो, बापदादा बच्चों को योग में अभ्यास करते हुए देखते हैं। अमृतवले भी बहुत पुरुषार्थ करते हैं लेकिन योग तपस्या, तप के रूप में नहीं करते हैं। *प्यार से याद जरूर करते हैं, रूहरिहान भी बहुत करते हैं, शक्ति भी लेने का अभ्यास करते हैं लेकिन याद को इतना पॉवरफुल नहीं बनाया है, जो संकल्प करो विदाई, तो विदाई हो जाए।* योग को योग अग्नि के रूप में कार्य में नहीं लगाते। इसलिए योग को पॉवरफुल बनाओ।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  *आवाज से परे रहने का अभ्यास बहुत आवश्यक है। आवज में आकर जो आत्माओं की सेवा करते हो, उससे अधिक आवाज से परे स्थिति में स्थित होकर सेवा करने से सेवा का प्रत्यक्ष प्रमाण देख सकेंगे।* अपनी अव्यक्त स्थिति होने से अन्य आत्माओं को भी अव्यक्त स्थिति का एक सेकण्ड में अनुभव कराया तो वह प्रत्यक्ष फल-स्वरूप आपके सम्मुख दिखायी देगा। *आवज से परे स्थिति में स्थित हो फिर आवाज में आने से वह आवाज,आवाज नहीं लगेगा । लेकिन उस आवाज में भी अव्यक्ती वायब्रेशन का प्रवाह किसी को भी बाप की तरफ आकर्षित करेगा।* जैसे इस साकार सृष्टि में छोटे बच्चों को लोरी देते हैं, वह भी आवाज होता है लेकिन वह आवाज, आवाज से परे जाने का साधन होता है। ऐसे ही अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर आवाज में आओ आवाज से परे होने का अनुभव करा सकते हो। *एक सेकण्ड की अव्यक्त स्थिति का अनुभव आत्मा को अविनाशी सम्बन्ध में जोड सकता है। सदैव अपने को कम्बाइण्ड समझ, कम्बाइण्ड रूप की सर्विस करो अर्थात अव्यक्त स्थिति और फिर आवाज ।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   "ड्रिल :- पढाई कभी मिस नहीं करना"

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा के कमरे में बैठ नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनने की पढाई पढने के लिए सज धज कर तैयार होती हूँ... मैं आत्मा इस देहभान से निकल अपने आत्मिक स्वरुप में टिक जाती हूँ...* अपने जगमगाते, चमचमाते अत्यंत सुन्दर सजीले स्वरुप में सजकर मैं आत्मा इस स्थूल दुनिया को छोड़ सुन्दर प्रकाश के विमान में बैठकर पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन मेरे प्यारे बाबा के पास...

 

   *प्यारा बाबा मेरे जीवन की बगिया को अपने ज्ञान रत्नों और प्यार से महकाते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... इस धरा पर खेल को जो उतरे तो सब कुछ भूल गए कौन हो किसके हो कहां के हो... सब कुछ भूल गए हो... *अब सत्य पिता ज्ञान रत्नों से फिर से सजा रहा और देवताओ सा सुखद जीवन दामन में खिला रहा है... यह ईश्वरीय पढ़ाई ही सतयुगी सुखो का आधार है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा वरदाता का साथ और श्रीमत का हाथ पकडकर कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मुझ आत्मा ने कितना प्यारा भाग्य पाया है कि स्वयं ईश्वर पिता मुझे पढ़ा रहा... *मेरा खोया हुआ सौंदर्य लौटाकर मुझे देवताओ सा खुबसूरत सजा रहा... मै आत्मा मीठे बाबा से पढ़कर प्रतिपल निखर रही हूँ...*

 

   *मीठे बाबा मेरी तकदीर जगाकर ज्ञान रत्नों से सराबोर करते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *ईश्वरीय पढ़ाई को मन बुद्धि के रोम रोम में भर लो... यही ज्ञान रत्न सुखो के रत्नों में बदल जीवन को शांति और आनन्द से भरपूर कर जाएँगे...* ईश्वर पिता ने गोद में बिठाकर सारे ज्ञान खजाने नाम कर दिए है उन कीमती अमूल्य रत्नों को सहेज लो...

 

 ➳ _ ➳  *मैं आत्मा कई जन्मों के पुण्यफल से भगवान् को सम्मुख पाकर अपने भाग्य पर इठलाती हुई कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा ईश्वरीय रत्नों को पाने वाली महान भाग्यशाली आत्मा हूँ... भक्ति में कितनी खाली हो गई थी मै आत्मा ईश्वरीय सानिध्य में ज्ञान रत्नों से मालामाल हो गयी हूँ...* और सुंदर देवता बनने का राज जानकर मुस्करा उठी हूँ...

 

   *मेरे बाबा मुझ आत्मा को इस ऊँची पढाई से दैवीय गुणों से भरपूर कर पावन श्रेष्ठाचारी बनाते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *सारा मदार इस ईश्वरीय पढ़ाई पर ही है... यह पढ़ाई ही विश्व का मालिक बनाकर विश्वधरा पर सजायेंगी... इसलिए इस पढ़ाई को रग रग में धारण करलो...* जिन अल्पकाल के क्षणिक सुख के पीछे खप रहे थे कभी... यह पढ़ाई देवताई सुखो के अम्बार लगाकर जीवन खुशनुमा बना देगी...

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्वर्णिम विश्व के रंगमंच पर देवता बन फिर से पार्ट बजाने का पुरुषार्थ करते हुए कहती हूँ:-*  हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा सारे सुखो के गहरे राज आप पिता से जान चुकी हूँ... और जीवन को साधारण मनुष्य से असाधारण देवता बनाने के प्रयासों में जीजान से जुटी हूँ...* मीठे बाबा से सारे सुख अपने नाम लिखवा रही हूँ और शान से मुस्करा रही हूँ...

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- उल्टी सुल्टी बातों में आकर पढ़ाई से मुख नही मोड़ना है*"

 

 _ ➳  स्वयं भगवान परमशिक्षक बन परमधाम से हर रोज मुझे पढ़ाने आते हैं यह स्मृति मेरे अंदर एक अदबुत रूहानी जोश और उमंग भर देती है। *मन ही मन अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सराहना करते हुए मैं उन खूबसूरत पलों को याद करती हूँ जब निराकार भगवान साकार में आकर शिक्षक बन अविनाशी ज्ञान रत्नों के अखुट खजाने हम पर लुटाते हैं*। उस सीन की मधुर स्मृति मुझे परमात्मा की अवतरण भूमि मधुबन के उस डायमंड हाल में ले जाती हैं जहाँ भगवान साकार में आकर, अपने बच्चों के समुख बैठ बाप बन उनकी पालना करते हैं, टीचर बन उन्हें पढ़ाते हैं और सतगुरु बन अपनी श्रेष्ठ मत उन्हें देकर उनका कल्याण करते हैं। *मन बुद्धि से पहुँची मधुबन के डायमंड हाल मैं बैठी परमात्म मिलन का मैं आनन्द ले रही हूँ और अपने परमशिक्षक के मुख कमल से उच्चारे महावाक्यों को सुन कर मन ही मन हर्षित हो रही हूँ*।

 

 _ ➳  यह विचार कि "मैं गॉडली स्टूडेंट हूँ" और स्वयं भगवान मुझे पढ़ाने के लिए आये हैं, जैसे मुझ पर एक नशा चढ़ा रहा है। मनुष्य से देवता, नर से नारायण बनाने वाली अपने परमशिक्षक शिव भगवान द्वारा पढ़ाई जा रही इस पढ़ाई को मुझे ना केवल अच्छी रीति पढ़ना है बल्कि इसे जीवन मे धारण कर, औरों को भी यह पढ़ाई पढा कर उन्हें भी आप समान बनाना है। *मन ही मन यह विचार कर, स्वयं से मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि चाहे कुछ हो जाये किन्तु कभी भी किसी से रूठ कर भी, अपने परमशिक्षक से पढ़ना  मैं नही छोडूंगी। जब तक मेरे परमशिक्षक  शिवबाबा मुझे पढ़ाते रहेंगे तब तक इस संगमयुग के अंत तक मैं इस पढ़ाई को अच्छी रीति पढ़ती रहूँगी और अपने प्यारे बाबा की अनमोल शिक्षाओं को अपने जीवन मे धारण कर अपने जीवन को श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ करती रहूँगी*।

 

 _ ➳  अपने परमशिक्षक से पढाई को अच्छी रीति पढ़ने की प्रतिज्ञा कर मैं मन बुद्धि के विमान पर बैठ वापिस अपने सेवाक्षेत्र पर लौट आती हूँ और मन ही मन अपने प्यारे भगवान बाप का दिल से शुक्रिया अदा कर उनकी याद में अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करके बैठ जाती हूँ। हर संकल्प, विकल्प से अपने मन बुद्धि को हटाकर, अपना सम्पूर्ण ध्यान मैं अपने मस्तक पर एकाग्र करती हूँ और अपने सत्य स्वरूप में स्वयं को टिकाने का प्रयास करती हूँ। *एकाग्रता की शक्ति द्वारा मैं सहज ही और अतिशीघ्र अपने सत्य स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ। स्वयं को मैं भृकुटि के बीच मे चमकते हुए एक अति सूक्ष्म स्टार के रूप में देख रही हूँ। मुझ से निकल रहा भीना - भीना प्रकाश मेरे चारों और फैल रहा है और मन को गहन सुकून का अनुभव करवा रहा है*। इस प्रकाश में समाये गुणों और शक्तियों के वायब्रेशन्स इस प्रकाश के साथ अब धीरे - धीरे चारों और फैल रहें हैं। जो वायुमण्डल को गहन सुखमय और शांतमय बना रहे हैं।

 

 _ ➳  अपने अंदर समाये गुणों और शक्तियों का अनुभव करके, असीम आनन्द लेते हुए मैं आत्मा अब अपने परमशिक्षक शिव पिता से मिलन मनाने उनकी निराकारी दुनिया की ओर जा रही हूँ। *भृकुटि के भव्यभाल से उतर कर, मैं प्वाइंट ऑफ लाइट, चैतन्य शक्ति धीरे - धीरे ऊपर आकाश की ओर चल पड़ी हूँ। प्रभु प्रेम के रंग में रंगी मैं आत्मा सेकण्ड में साकार और सूक्ष्म वतन को पार कर अब पहुँच गई हूँ अपने शिव पिता के पास उनके निर्वाणधाम घर में जो वाणी से परें हैं*। साइलेन्स की यह दुनिया मेरा स्वीट साइलेन्स होम जहां आकर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ। देख रही हूँ महाज्योति अपने शिव पिता, अपने परमशिक्षक को अपने बिल्कुल सामने। *ऐसा लग रहा है जैसे सर्व शक्तियों की अनन्त किरणे बिखेरते मेरे प्यारे पिता अपनी किरणों रूपी बाहों में मुझे समाने के लिए मेरा आह्वान कर रहें हैं*।

 

 _ ➳  सर्वशक्तियों की रंग बिरंगी किरणे बिखेरता मेरे पिता का यह सुन्दर सलौना स्वरूप मुझे सहज ही अपनी और खींच रहा है। *मैं चमकती हुई जगमग करती चैतन्य ज्योति अब धीरे - धीरे महाज्योति अपने प्यारे पिता के समीप पहुँचती हूँ और जा कर जैसे ही उनकी किरणों को स्पर्श करती हूँ उनसे आ रही सर्वशक्तियों की अनन्त किरणे मुझे अपने आगोश में ले लेती हैं*। बाबा की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में समाकर मैं ऐसा अनुभव कर रही हूँ जैसे एक अद्भुत शक्ति मेरे अंदर भरती जा रही है। बाबा से आ रही सर्वशक्तियों का बल मुझे भी उनके समान शक्तिशाली और तेजोमय बना रहा है। *शक्तियों से सम्पन्न अपने अति चमकदार और लुभावने स्वरूप को देख मैं मंत्रमुग्ध हो रही हूँ  जो रीयल गोल्ड की तरह दिखाई दे रहा है*।

 

_ ➳  सर्वशक्ति सम्पन्न स्वरूप बनकर अब मैं आत्मा परमधाम से नीचे, साकार सृष्टि पर कर्म करने के लिए वापिस लौट आती हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, अपने परमशिक्षक शिव पिता के फरमान पर चल, उनकी शिक्षायों को अपने जीवन मे धारण कर, अब मैं श्रेष्ठ बनने का पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ*। स्वयं भगवान मुझे पढ़ाते हैं इस बात को सदा स्मृति में रखकर, रुठ कर पढ़ाई छोड़ने का संकल्प भी अपने मन मे ना उठाते हुए, अपने परमशिक्षक प्यारे बाबा से मिलने वाले अविनाशी ज्ञान रत्नों से हर रोज अपनी बुद्धि रूपी झोली को भरकर मैं औरो को भी इन ज्ञान रत्नों से सम्पन्न बना कर उनका भी कल्याण अब हर समय कर रही हूँ।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं पुराने संस्कार और संसार के रिश्तों की आकर्षण से मुक्त्त रहने वाली डबल लाइट फरिश्ता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं शांति की शक्ति द्वारा सर्व आत्माओं की पालना करने वाला रूहानी सोशल वर्कर हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. *पुण्य का खाता एक का 10 गुणा फल देता है।*

 

 _ ➳  2. *मन्सा सेवा भी पुण्य का खाता जमा करती है।* वाणी द्वारा किसी कमजोर आत्मा को खुशी में लाना, परेशान को शान की स्मृति में लाना, दिलशिकस्त आत्मा को अपनी वाणी द्वारा उमंग-उत्साह में लाना, सम्बन्ध संपर्क से आत्मा को अपने श्रेष्ठ संग का रंग अनुभव कराना, इस विधि से पुण्य का खाता जमा कर सकते हो। *इस जन्म में इतना पुण्य जमा करते हो जो आधाकल्प पुण्य का फल खाते हो और आधाकल्प आपके जड़ चित्र पापी आत्माओं को वायुमण्डल द्वारा पापों से मुक्त करते हैं।* पतित-पावनी बन जाते हो।

 

✺   *ड्रिल :-  "पुण्य का खाता जमा करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अमृतवेला की परम सुहानी बेला में... 'लाडले बच्चे, मीठे बच्चे जागो' की मीठी मधुर ध्वनि सुनते ही मैं आत्मा जग जाती हूँ... आंखें खोलते ही देखती हूँ... यह तो मेरे मीठे बाबा की आवाज है... मेरे बाबा मेरे सामने खड़े हैं... बड़े प्यार से मुझे जगा रहे हैं... अपने प्यारे बाबा की मोहिनी मुस्कान मुझे सर्व खुशियों की सौगात दे रही है... *भगवान बाँहें फैलाये सामने खड़े हैं... मेरे लिए स्वर्ग की बादशाही सौगात में लेकर आए हैं... मैं आत्मा उठते ही अपने बाबा के गले लग जाती हूँ... तहे दिल से बाबा का उनकी हर देन, हर उपकार के लिए शुक्रिया करती हूँ...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा चिंतन करती हूँ... यह अमृतवेला का समय बाबा ने खास हम बच्चों के लिए ही तो बनाया है... *इस समय भोला भंडारी बाबा बच्चों की झोलियां भरने खुद आते हैं...* इस समय मैं जो चाहूं वह वरदान अपने बाबा से ले सकती हूँ... अपनी भूलों के लिए क्षमा ले सकती हूँ... *इस समय मुझ आत्मा के दोनों एकाउंट्स साथ साथ चलते हैं... एक तरफ मेरा पुण्य का खाता बढ़ता जाता है, दूसरी तरफ मेरे पाप कर्मों का खाता घटता जाता है... ऐसे सुंदर श्रेष्ठ समय में मैं आत्मा सोती हुई कैसे रह सकती हूँ...* हे आत्मा जाग! अपने बाबा से अपने जन्म जनम का भाग्य ले ले!

 

 _ ➳  बाबा की पवित्रता की, शक्तियों की किरणों में मैं आत्मा भीग रही हूँ... मेरा पुण्य का खाता बढ़ता जा रहा है... *यह पुण्य का खाता निराला है जो एक का दस गुणा फल देता है...* बाबा की शक्तिशाली ज्वाला स्वरुप किरणों में नहाते हुए मैं आत्मा अनुभव कर रही हूँ... कि मेरे पाप कर्म तेजी से दग्ध होते जा रहे हैं... मेरे श्रेष्ठ कर्मों की पूंजी बढ़ती जा रही है... *बाबा द्वारा मिले ज्ञान, शक्तियों और गुणों के खजानों से भरपूर होकर मैं आत्मा... इन खजानों को विश्व की सर्व आत्माओं को दे रही हूँ...* उन सभी आत्माओं का बाबा से मिलन कराने के निमित्त बन रही हूँ... *इस श्रेष्ठ मनसा सेवा से मेरा पुण्य का खाता जमा होता जा रहा है...*

 

 _ ➳   मैं अपने मन वचन कर्म को ईश्वरीय सेवाओं में सफल कर रही हूँ... वाणी से मीठे शक्तिशाली बोल द्वारा कमजोर, अशक्त आत्माओं को खुशी प्रदान कर रही हूँ... *मेरी शक्तिशाली स्थिति दु:खी परेशान आत्माओं को उनके श्रेष्ठ स्वरुप की स्मृति दिला रही है...* दिल शिकस्त आत्माओं को अपनी वाणी द्वारा मैं उमंग उत्साह प्रदान कर रही हूँ... *संबंध संपर्क में आने वाली हर आत्मा को रूहानियत के रंग में रंग रही हूँ...*

 

 _ ➳  इस प्रकार से मुझ आत्मा का पुण्यों का खाता जमा होता जा रहा है... संगम के इस अमूल्य समय में जितना चाहे मैं पुण्यों का खाता जमा कर सकती हूँ... *अभी का जमा किया हुआ खाता सारे कल्प मेरे साथ साथ चलता है...* आधाकल्प सतयुग त्रेता में इसी पुण्य के बल पर मैं सुख भोगती हूँ... आधाकल्प मेरे जड़ चित्र भक्तों को पुण्य कर्म करने की प्रेरणा देते हैं... पापी आत्माओं को पापों से मुक्त करते हैं... *मेरे जड़ चित्र पतितों को पावन करने के निमित्त बन जाते हैं... मैं आत्मा पूरा अटेंशन देकर पुण्य का खाता जमा करती जा रही हूँ...*

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━