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 05 / 04 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कर्म - अकर्म - विकर्म की गति को जान सदा श्रेष्ठ कर्म किये ?*

 

➢➢ *योग से अपनी काय निरोगी बनायी ?*

 

➢➢ *स्वमान में स्थित रह विश्व द्वारा सम्मान प्राप्त किया ?*

 

➢➢ *जैसा समय वैसे अपने को मोल्ड किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *योग का प्रयोग अर्थात् अपने शुद्ध संकल्पों का प्रयोग तन पर, मन पर, संस्कारों पर अनुभव करते आगे बढ़ते जाओ, इसमें एक दो को नहीं देखो। यह क्या करते, यह नहीं करते, पुराने करते वा नहीं करते, यह नहीं देखो। पहले मैं इस अनुभव में आगे आ जाऊं क्योंकि यह अपने आन्तरिक पुरूषार्थ की बात है।* जब ऐसे व्यक्तिगत रूप में इसी प्रयोग में लग जायेंगे, वृद्धि को पाते रहेंगे तक एक एक के शान्ति की शक्ति का संगठित रूप में विश्व के सामने प्रभाव पड़ेगा।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं संगमयुगी अलौकिक जीवन वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

✧   सदा अपना अलौकिक जन्म, अलौकिक जीवन, अलौकिक बाप, अलौकिक वर्सा याद रहता है? *जैसे बाप अलौकिक है तो वर्सा भी अलौकिक है। लौकिक बाप हद का वर्सा देता, अलौकिक बाप बेहद का वर्सा देता। तो सदा अलौकिक बाप और वर्से की स्मृति रहे।* कभी लौकिक जीवन के स्मृति में तो नहीं चले जाते?

 

✧  *मरजीवा बन गये ना। जैसे शरीर से मरने वाले कभी भी पिछले जन्म को याद नहीं करते, ऐसे अलौकिक जीवन वाले, जन्म वाले, लौकिक जन्म को याद नहीं कर सकते। अभी तो युग ही बदल गया। दुनिया कलियुगी है, आप संगमयुगी हो, सब बदल गया।* कभी कलियुग में तो नहीं चले जाते।

 

  यह भी बार्डर है। बार्डर क्रास किया और दुश्मन के हवाले हो गये। तो बार्डर क्रास तो नहीं करते? *सदा संगमयुगी अलौकिक जीवन वाली श्रेष्ठ आत्मा है, इसी स्मृति में रहो। अभी क्या करेंगे? बड़े से बड़ा बिजनेस मैन बनो। ऐसा बिजनेस मैन जो एक कदम से पदमों की कमाई जमा करनेवाले। सदा बेहद के बाप के हैं, तो बेहद की सेवा में, बेहद के उमंग-उत्साह से आगे बढ़ते रहो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी के अन्दर सुनने का संकल्प है। बापदादा के अन्दर क्या है? बापदादा सुनने सनाने से परे ले जाते है। एक सेकण्ड में आवाज से परे होना आता है? *जैसे आवाज में कितना सहज और जल्दी आ जाते हो वैसे ही आवाज से परे भी सहज और जल्दी जा सकते हो*? अपने को क्या कहलाते हो?

 

✧  मास्टर सर्वशक्तिवान। अब मास्टर सर्वशक्तिवान का नशा कम रहता है, इसलिए *एक सेकण्ड में आवाज में आना, एक सेकण्ड म़े आवाज से परे हो जाना इस शक्ती की प्रैक्टिकल झलक चेहरे पर नहीं देखते*। जब ऐसी अवस्था हो जायेगी, अभी - अभी आवाज में, अभी - अभी आवाज से परे। यह अभ्यास सरल और सहज हो जायेगा तब समझो सम्पूर्णता आई है।

 

✧  सम्पूर्ण स्टेज की निशानी यह है। सर्व पुरुषार्थ सरल होगा। पुरुषार्थ म़े सभी बातें आ जाती है। याद की यात्रा, सर्वीस दोनों ही पुरुषार्थ में आ जाते हैं। *जब दोनों में सरल अनुभव हो तब समझो सम्पूर्णता की अवस्था प्राप्त होने वाली है*। सम्पुर्ण स्थिति वाले पुरुषार्थ कम करेंगे, सफलता अधिक प्राप्त करेंगे। अभी पुरुषार्थ अधिक करना पडता है उसकी भेंट में सफलता कम है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  एक - सोल-कान्सेस व आत्म-अभिमानी बनने का निशाना और दूसरा है साकारी। *तो निराकारी और निर्विकारी - यह हैं दो निशानी।* सारा दिन पुरुषार्थ योगी और पवित्र बनने का करते हो ना। *जब तक पूरी रीति आत्म-अभिमानी न बने हैं। तो निर्विकारी भी नहीं बन सकते। तो निर्विकारीपन का निशाना और निराकारीपन का निशाना, जिसको फरिश्ता कहो, कर्मातीत स्टेज कहो।* लेकिन फरिश्ता भी तब बनेंगे जब कोई भी इमप्योरिटी अर्थात् पाँच तत्वों की आकर्षण आकर्षित नहीं करेगी। *जरा भी मन्सा संकल्प भी इमप्योअर अर्थात अपवित्रता का न हो, तब फरिश्तेपन की निशानी में टिक सकेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मोस्ट बिलवेड बाप को प्यार से याद करना"*

 

_ ➳  *अपनी शीतल चांदनी के आँचल से आंगन को ढककर आसमान में चांद मुस्कुरा रहा है... अमृतवेले के इस रूहानी समय में मैं आत्मा घर के आंगन में... धीमें-धीमें चलती हवाओं के साथ... शीतल चांदनी का आंनद लेती हुई मीठे बाबा को याद करती हूँ...* आसमान से ज्ञान सूर्य बाबा नीचे उतरकर मेरे सामने आ जाते हैं... ज्ञान सूर्य बाबा को देख चाँद भी खुशियों में झूम रहा है... फिर बाबा मुझे आंगन में लगे झूले में बिठाकर... ज्ञान के झूले में झुलाते हैं...

 

  *नींद को जीतकर रात को जागकर ज्ञान चिंतन करने की समझानी देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... जनमो की भटकन के बाद जो ईश्वर पिता मिला है, तो उसके प्यार में और अथाह ज्ञान रत्नों की प्राप्ति के आनंद में खो जाओ... *प्यार भरी यादो में इस कदर खो जाओ की आखों से नींद भी ओझल हो जाए... इतनी दौलत से भर कर सदा की खुशियो मे मुस्कराओ..."*

 

_ ➳  *मोस्ट बिलेवड बाप को अपने यादों की कोठरी में बंद कर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा ईश्वरीय यादो में खोयी खोयी सी सारी सुधबुध भूली हुई हूँ... *मन की अंखियो में आपको बसाकर नींद भी काफूर हो गई है... पल पल आपकी यादो में झूम रही हूँ... और ज्ञान रत्नों से प्रतिपल खेल रही हूँ..."*

 

  *निद्रा जीत भव, देही अभिमानी भव का वरदान देते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... सच्चे प्यार की गहराइयो में रोम रोम से भीग जाओ... *खुशियो के खजानो को बाँहों में भरकर, सारे विश्व पर विजय पताका लहराओ... सच्चे ज्ञान की खनक से सदा गुंजन करो... और रात को जागकर प्रियतम की यादो में स्वयं को डुबो दो..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा ज्ञान मंथन कर अपने हर स्वांस को सफल करते हुए कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मैं आत्मा आपको पाकर अनन्त खुशियो के आसमान में उड़ रही हूँ... आपको पाकर सब कुछ मैंने सहज ही पा लिया है...* जीवन खुशियो, उमंगो और ईश्वरीय नशे से भर गया है... रत्नों की खाने ही मेरी हो गई है..."

 

  *ज्ञान गंगा में डुबोकर मुझे पावन बनाते हुए ज्ञान सागर मेरे प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... सदा यादो में खोये हुए खुबसूरत जीवन के मालिक बन, विश्व धरा का राज्य पाओ... ज्ञान रत्नों की झनकार से जीवन मूल्यों का पर्याय बनकर, ईश्वरीय अदा की झलक जमाने को दिखाओ... *रात को जागकर, अपनी श्रेष्ठ कमाई में खो जाओ... और खुशहाली की दस्तक जीवन में लाओ..."*

 

_ ➳  *ज्ञान सूर्य की किरणों में ज्ञान सितारा बन अपने सत्य स्वरूप में चमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सच्चे रत्नों को पाकर कौड़ी से हीरे तुल्य हो गई हूँ... मीठे बाबा... *आपकी प्यारी सी यादो में खो रही हूँ... और रातो को जागकर दीवानो सी, यादो की खुमारी में, अतुलनीय दौलत से आबाद हो रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को ध्यान में रख सदा श्रेष्ठ कर्म करने हैं*

 

_ ➳ कर्मो की जिस गुह्य गति का ज्ञान भगवान से मुझे मिला है उस कर्म - अकर्म - विकर्म की गति को बुद्धि में रख अब मुझे अपने हर कर्म पर अटेंशन देते हुए इस बात का पूरा ध्यान रखना है कि अनजाने में भी मुझ से ऐसा कोई कर्म ना हो जो विकर्म बने। *अपने हर कर्म को श्रेष्ठ बनाने के लिए सबसे पहले मुझे अपने हर संकल्प को शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना है। और इसके लिये अपने प्यारे पिता की आज्ञाओं को अपने जीवन मे धारण कर कदम - कदम श्रीमत पर चलने का मुझे पूरा अटेंशन रखना है*। मन ही मन स्वयं से बातें करती मैं अपने आप से और अपने प्यारे बाबा से प्रोमिस करती हूँ कि बिना सोचे समझे कोई भी कर्म अब मैं कभी नही करूँगी। हर कर्म करने से पहले चेक करूँगी कि वो श्रीमत प्रमाण है या नही!

 

_ ➳  कर्म - अकर्म - विकर्म की गति को बुद्धि में रख अपने हर कर्म को श्रेष्ठ बनाने की प्रतिज्ञा अपने प्यारे पिता से करके अब मैं कर्मो की अति गुह्य गति का ज्ञान देने वाले ज्ञानसागर अपने शिव बाबा की अति मीठी याद में मन बुद्धि को स्थिर करके बैठ जाती हूँ और अपने मन बुद्धि का कनेक्शन परमधाम में रहने वाले अपने पिता से जोड़ लेती हूँ। *जैसे बिजली का स्विच ऑन करते ही सारे घर मे प्रकाश फैल जाता है ऐसे ही स्मृति का स्विच ऑन करते ही परमधाम से परमात्म शक्तियों की लाइट सीधी मुझ आत्मा के ऊपर पड़नी शुरू हो जाती है और मेरे चारों तरफ एक अद्भुत दिव्य अलौकिक प्रकाश फैल जाता है*। इस सतरंगी प्रकाश के खूबसूरत झरने के नीचे बैठी मैं महसूस करती हूँ जैसे धीरे - धीरे मैं शरीर के भान से मुक्त होकर एक बहुत ही न्यारी लाइट स्थिति में स्थित होती जा रही हैं। स्वयं को मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  ये हल्केपन का निराला अनुभव मुझे देह के हर बंधन से मुक्त कर रहा है। देह रूपी डाली का आधार छोड़ मैं आत्मा पँछी बड़ी आसानी से ऊपर की ओर उड़ान भर रही हूँ और देह से निकल कर चमकती हुई अति सूक्ष्म ज्योति बन अपनी किरणों को बिखेरती हुई आकाश की ओर उड़ती जा रही हूँ। *देह और देह की इस साकारी दुनिया को पार कर, मैं आकाश से ऊपर अब फरिश्तों की आकारी दुनिया से होकर अपनी निराकारी दुनिया में पहुँच गई हूँ*। आत्माओं की इस निराकारी दुनिया अपने इस शान्तिधाम घर मे आकर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ। *कुछ क्षणों के लिए गहन शांति के गहरे अनुभवों में खोकर, अब मैं शांति के सागर, सुख के सागर, प्रेम और पवित्रता के सागर अपने पिता के पास पहुँच कर, मन बुद्धि के नेत्रों से उन्हें निहार रही हूँ*।

 

_ ➳  अपने पिता के अति सुन्दर मनभावन स्वरूप को मैं देख रही हूँ जो मेरे ही समान एक प्वाइंट ऑफ लाइट, एक अति सूक्ष्म बिंदु हैं किंतु गुणों में वो सिंधु हैं। उनके सानिध्य में, उनसे आ रही सर्वशक्तियों की किरणों के फव्वारे के नीचे बैठ मैं स्वयं को उनकी शक्तियों से भरपूर कर रही हूँ। *अपने परमधाम घर में अपने परमपिता परमात्मा शिव बाबा के सामने निराकारी, निर्विकारी और निर्संकल्प स्थिति में स्थित हो कर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ*। बाबा से सर्वगुणों और सर्वशक्तियों की अनन्त सतरंगी किरणे निकल कर मुझ आत्मा में समा रही हैं और मैं स्वयं में इन गुणों और शक्तियों को भरकर स्वयं को सर्वगुण और सर्वशक्तिसम्पन्न 

बना रही हूँ। *बीज रूप अवस्था की मैं गहन अनुभूति कर रही हूँ जो मुझे अतीन्द्रिय सुख प्रदान कर रही है*।

 

_ ➳  अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने का भरपूर आनन्द लेकर और शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर अब मैं पुनः लौट रही हूँ फिर से देहधारियों की साकारी दुनिया में। फिर से अपने साकार तन में, साकार दुनिया मे, साकार सम्बन्धो के बीच अपने ब्राह्मण स्वरुप में मैं स्थित होकर देह और देह की दुनिया मे फिर से अपना पार्ट बजा रही हूँ।*किन्तु देह और देहधारियों के बीच में रहते हुए भी अपने सत्य स्वरूप में टिक कर अपनी दिव्यता और रूहानियत का अनुभव करते हुए अब मैं उपराम स्थिति में स्थित होकर, कर्म - अकर्म - विकर्म की गुह्य गति को बुद्धि में रख कर ही हर कर्म कर रही हूँ*। कर्म - अकर्म - विकर्म की गति बुद्धि में रहने से अब हर कर्म मैं सोल कॉन्शियस होकर कर रही हूँ इसलिये मेरा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ बनता जा रहा है।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं स्वमान में स्थित रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं देह-अभिमान मुक्त्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा जैसा समय वैसे अपने को मोल्ड कर लेती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा रीयल गोल्ड हूँ  ।*

   *मैं आत्मा साक्षी दृष्टा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  सच्चे ब्राह्मणों के तकदीर की लम्बी लकीर - 21 जन्मों के लिए:- *कितने भाग्यवान हो जो भगवान के साथ पिकनिक कर रहे हो! ऐसा कब सोचा था - कि ऐसा दिन भी आयेगा जो साकार रूप में भगवान के साथ खायेंगे, खेलेंगे, हसेंगे...* यह स्वप्न में भी नहीं आ सकता लेकिन इतना श्रेष्ठ भाग्य है जो साकार में अनुभव कर रहे हो। कितनी श्रेष्ठ तकदीर की लकीर है - जो सर्व प्राप्ति सम्पन्न हो।

 

✺  *"ड्रिल :- भगवान के साथ खाने, खेलने, हंसने का अनुभव"*

 

_ ➳  *मीठे बच्चे ये मीठी मधुर वाणी सुन मैं आत्मा नन्हा फ़रिश्ता बन... उड़ चलती हूँ प्यारे बाबा के पास... मुझ आत्मा को प्यारे बाबा हाथ पकड मधुबन के पीस पार्क में ले जाते हैं...* मैं नन्हा फ़रिश्ता प्यारे बाबा के साथ लुका छिपी का खेल, खेल रही हूँ... कभी मैं फरिश्ता छिप जाती हूँ... बाबा मुझे ढूंढते हैं... कभी प्यारे बाबा पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं... मैं फरिश्ता बाबा को ढूंढकर उनकी गोदी चढ़ जाती हूँ...

 

_ ➳  *मैं नन्हा फ़रिश्ता प्यारे बाबा की गोदी में बैठकर झूला झूल रही हूँ...* फिर मैं आत्मा प्यारे बाबा के साथ फूलों से खेल रही हूँ... प्यारे बाबा मुझ फरिश्ते पर फूल बरसा रहे हैं... मैं फ़रिश्ता बाबा के कदमों को फूलों से सजा रही हूँ... बाबा के गले में फूलों का हार पहनाकर बाबा के गले लग जाती हूँ... मैं फरिश्ता बाबा के गले का हार बन रही हूँ...

 

_ ➳  *फिर प्यारे बाबा बगीचे से फल तोड़-तोड़कर मुझ फरिश्ते को खिला रहे हैं... मैं नन्हा फ़रिश्ता बाबा को खिला रही हूँ...* खेल-खेल में ही मीठे बाबा मुझ आत्मा को ज्ञान अमृत पिला रहे हैं... ज्ञान की बातें सुनाकर मुझ फरिश्ते को गुण, शक्तियों से भरपूर कर रहे हैं... *सर्व खजानों से सम्पन्न बना रहे हैं...* मैं आत्मा 21 जन्मों के लिए अपना भाग्य बना रही हूँ...

 

_ ➳  *फिर मैं फ़रिश्ता प्यारे बाबा के साथ नक्की झील में नाव में बैठकर झील की सैर करते हुए आनंदित हो रही हूँ...* फिर मुझ फ़रिश्ते को प्यारे बाबा बर्फीले पहाड़ियों पर ले जाते हैं... *बर्फ के गोले बनाकर मैं नन्हा फरिश्ता प्यारे बाबा के साथ खेल रही हूँ...* मैं आत्मा बाबा से रूह-रिहान कर अपने दिल की सारी बातें शेयर कर रही हूँ... और बोझमुक्त होकर बहुत हलका अनुभव कर रही हूँ...

 

_ ➳  *मैं कितनी ही भाग्यवान आत्मा हूँ... जो सर्वशक्तिमान भगवान के साथ खाती हूँ, पीती हूँ, हंसती हूँ, गाती हूँ... हर पल मौज मनाती रहती हूँ...* रात को जब थक जाती हूँ... तो प्यारे बाबा लोरी सुनाकर अपनी गोदी में सुलाते हैं... *कितना श्रेष्ठ भाग्य है मुझ ब्राह्मण आत्मा का जो भगवान के साथ रोज पिकनिक मनाती हूँ...* लक्ष्मी-नारायण भी ऐसी पिकनिक नहीं मना पायेंगे... जो स्वप्न में भी नहीं सोचा था... वो मैं आत्मा साकार में परमात्म प्यार का अनुभव कर रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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