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 05 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बाप और वर्से को याद किया ?*

 

➢➢ *प्रशनचित न रह प्रसन्नचित बनकर रहे ?*

 

➢➢ *संतुष्टमणि बनकर रहे ?*

 

➢➢ *मन बुधी सस्कार ने आपका आर्डर माना ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जब योग में बैठते हो तो समाने की शक्ति सेकण्ड में यूज करो।* सेवा के संकल्प भी समा जाएं इतनी शक्ति हो जो स्टॉप कहा और स्टॉप हो जाए। *फुल ब्रेक लगे, ढीली ब्रेक नहीं। अगर एक सेकण्ड के बजाए ज्यादा समय लग जाता है तो समाने की शक्ति कमजोर कहेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं दिलवाले बाप को दिल देने वाली अचल आत्मा हूँ"*

 

  आपका इस आबू पर्वत पर कौन सा यादगार है? अचलगढ़ कौन बन सकता है? जिसने दिलाराम को अपना बना लिया, वही अचल बन सकता है। इसलिए दोनों ही यादगार बहुत कायदे प्रमाण बने हुए हैं। अगर दिलवाला बाप को अपना नहीं बनाया तो अचल की बजाए हलचल होती है। कोई भी चीज में हलचल होती रहे तो वह टूट जायेगी और जो अचल होगी वो सदा कायम रहेगी। *तो सदैव ये स्मृति में रखो कि हम दिलवाला बाप को दिल देने वाली अचल आत्मायें हैं। ये मेरा यादगार है - हरेक अनुभव करे। ऐसे नहीं - ये ब्रह्मा बाप का या महारथियों का है। नहीं, मेरा यादगार है।* देखो ड्रामानुसार अपने यादगार स्थान पर ही पहुँच गये। नहीं तो पाकिस्तान से आबू में आना - यह तो स्वपन में भी नहीं आ सकता था। लेकिन ड्रामा में यादगार यहीं था तो कैसे पहुँच गये हैं। अपने ही यादगार को देख हर्षित होते रहते हो।

 

  *अचल रहना - कोई मुश्किल बात नहीं है। कोई भी चीज को हिलाते रहो तो मेहनत भी और मुश्किल भी। सीधा रख दो तो वह सहज है। ऐसे ही मन-बुद्धि द्वारा हलचल में आना कितना मुश्किल होता है और मन बुद्धि एकाग्र हो जाती है तो कितना सहज होता है। अभी हलचल में आना पसन्द ही नहीं करेंगे। अच्छा नहीं लगेगा।* आधाकल्प हलचल में आते थक गये। तन की भी हलचल, मन की भी हलचल, धन की भी हलचल। तन से भी भटकते रहे। कभी किस मन्दिर में। कभी किस यात्रा पर, तो कभी किस यात्रा पर और मन परेशानियों में, हलचल में आते रहा और धन में तो देखो- कभी लखपति तो कभी कखपति। तो अनेक जन्मों की हलचल का अनुभव होने के कारण अभी अचल अवस्था अति प्रिय लगती है। इसीलिए दूसरों के ऊपर रहम आता है। शुभ भावना, शुभ कामना उत्पन्न होती है कि ये भी अचल हो जाये।

 

  अचल स्थिति वालों का विशेष गुण होगा - रहमदिल। सदा हर एक आत्मा के प्रति दातापन की भावना। ऐसे मास्टर दाता बने हो कि दूसरे को देखकर घृणा आती है? रहम आता है, दया भाव आता है, दातापन की स्मृति आती है? या क्यों क्या उत्पन्न है? *आप सबका विशेष टाइटल है - विश्व कल्याणकारी। जो विश्व कल्याणकारी है उसको हर आत्मा के प्रति कल्याण की भावना होगी। उसके अन्दर स्वत: ही किसी आत्मा के प्रति भी घृणा भाव, द्वेष भाव, ईर्ष्या भाव या ग्लानि का भाव कभी उत्पन्न नहीं होगा। इसको कहा जाता है विश्व कल्याणकारी आत्मा।* तो ऐसे हो? या कभीकभी दूसरे भाव भी आ जाते हैं? बस, सदा कल्याण का भाव हो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जैसे आजकल साइन्स के साधनों द्वारा सब चीज़ें समीप अनुभव होती जाती है - दूर की आवाज़ टेलिफोन के साधन द्वारा समीप सुनन में आती है, टी . वि. (दूरदर्शन) द्वारा दूर का दृश्य समीप दिखाई देता है, ऐसे ही *साइलन्स की स्टेज द्वारा कितने भी दूर रहती हुई आत्मा को सन्देश पहुँचा सकते हो?*

 

✧  वो ऐसे अनुभव करेंगे जैसे साकार में सम्मुख किसी ने सन्देश दिया है। *दूर बैठे हुए भी आप श्रेष्ठ आत्माओं के दर्शन और प्रभु चरित्रों के दृश्य ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि सम्मुख देख रहे हैं।*

     

✧ *संकल्प द्वारा दिखाई देगा अर्थात आवाज से परे संकल्प की सिद्धि का पार्ट बजाएंगे।* लेकिन इस सिद्धि की विधि ज्यादा - से - ज्यादा अपने शान्त स्वरूप में स्थित होना है। इसलिए कहा जाता है - 'साइलन्स इज गोल्ड', यही गोल्डन ऐजड स्टेज कही जाती है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सिर्फ यह भी स्मृति रहे तो कितनी मीठी जीवन का अनुभव करेंगे। *हम इस मृत्युलोक के नहीं लेकिन अवतार हैं। सिर्फ यह छोटी-सी बात याद रहे तो उपराम हो जायेंगे। अगर अपने को अवतार न समझ गृहस्थी समझते हो तो गृहस्थी की गाड़ी कीचड़ में फंसी रहती। गृहस्थी है ही बोझ की स्थिति और अवतार बिल्कुल हल्का। वह फैसा हुआ है वह बिल्कुल न्यारा। कभी अवतार कभी गृहस्थी यह चक्कर अगर चलता रहता तो संगमयुगी श्रेष्ठ जीवन का, सुहावने सुख के जीवन का कभी-कभी अनुभव होगा, सदा नहीं।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- संतुष्टमणि के श्रेष्ठ आसन पर आसीन होने निश्चिन्त आत्मा बनना*

 

_ ➳  *हृदय में बाबा की मीठी यादें संजोए हुए... मैं आत्मा मधुबन के प्रांगण में हूँ... दिल में एक दिलाराम बाबा की याद है... नैनों में दिला राम की मूरत समाई हुई है...* मधुबन के प्रांगण में बिल्कुल शांति है... कम्पलीट सायलेंस है... मैं आत्मा सहज ही हिस्ट्री होल की ओर बढ़ती जा रही हूँ... यहां आते ही मैं देखती हूँ... *मेरे मीठे बाबा ब्रह्मा बाबा के तन में विराजमान है... पूरा हॉल बाबा की शक्तिशाली किरणों से चार्ज हो गया है...* मुझे देखते ही सतगुरु बाबा कहते हैं... आओ मेरे लाडले बच्चे... मैं आत्मा बाबा के सामने बैठ जाती हूँ... बाबा की शक्तिशाली दृष्टि से मुझ आत्मा पर... अनवरत रूप से शक्तियां बरसती जा रही हैं...

 

  *अपनी मीठी मीठी शिक्षाओं से मेरे जीवन को संवारते हुए सतगुरु बाबा कहते हैं:-* "मीठे फरमानबरदार बच्चे... अब संपूर्ण स्थिति को प्राप्त करना ही है... संपन्न बने बिना आत्मा कर्मातीत बनकर बाप के साथ नहीं जा सकेगी... *तुम्हें शिव की बारात में पीछे पीछे नहीं आना... शिव के साथ साथ चलना है तो अब अपनी संपन्न स्थिति का आह्वान करो... बाप समान बनने वाले बच्चे ही बाप के साथ जाएंगे..."*

 

_ ➳  *बाबा की शिक्षाओं को जीवन में धारण करती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्यारे सतगुरु बाबा... मैं आत्मा हर कदम में फॉलो फादर कर रही हूँ... ब्रह्मा बाबा ने संपूर्ण बनने का जो पुरुषार्थ किया... मैं आत्मा भी बाबा के नक्शे कदम पर चल रही हूँ... *ब्रह्मा बाबा को फॉलो करते करते... मैं बाप समान संपन्न और संपूर्ण बनने की यात्रा पर... तीव्र गति से आगे बढ़ती जा रही हूँ..."*

 

  *योग ज्वाला में मुझ आत्मा की अलाय को जला सच्चा सोना बनाने वाले पारसनाथ बाबा कहते हैं:-* "मेरे प्यारे फूल बच्चे... क्या अपने पुरुषार्थ की गति से संतुष्ट हो... क्या संबंध संपर्क में आने वाली आत्माओं से... संतुष्टता का सर्टिफिकेट मिल गया है... जो भी सेवा करते हो क्या उस से आप संतुष्ट हो... *यथार्थ विधि से ही सिद्धि प्राप्त होती है... संपन्न बनने वाली आत्मा स्वयं से संतुष्ट होगी... और सर्व आत्माएं भी उससे संतुष्ट होंगी... ऐसी अपनी सूक्ष्म में चेकिंग करो..."*

 

_ ➳  *पारसनाथ बाबा द्वारा दी गई एक एक कसौटी पर स्वयं को कसकर खरा सोना बनती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मीठे प्यारे बाबा... आप करावनहार हो... हम बच्चे तो निमित्त मात्र कर्म कर रहे हैं... *यज्ञ सेवाओं से मैं आत्मा असीम खुशी... अतींद्रिय सुख को प्राप्त करती हुई... सर्व आत्माओं को आप का संदेश दे रही हूँ... ज्ञानगंगा बनकर आप का ज्ञान सबको सुनाती हुई... मैं पूर्ण रूप से संतुष्ट हूँ... व हर्षित स्थिति का अनुभव कर रही हूँ..."*

 

  *अपने हाथ में मेरा हाथ थामे मुझे सतयुगी  दुनिया की सैर कराते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे बच्चे... *राजधानी में ब्रह्मा बाप के साथ साथ आप बच्चों को आना है... बात तो न्यारा और प्यारा ही होगा...* अपने राज्य की वैराइटी प्रकार की आत्माओं को... राज्य अधिकारी, रॉयल फैमिली की अधिकारी, रॉयल प्रजा की अधिकारी, साधारण प्रजा की अधिकारी... *क्या सर्व प्रकार की... वैराइटी आत्माओं को तैयार कर लिया है... ऐसा करने के लिए संपूर्ण पवित्र व निरंतर योगी बनो..."*

 

_ ➳  *सतयुग में कृष्ण के साथ रास रचाती, झूमती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे मीठे प्यारे बाबा... मैं आत्मा निरंतर आपकी यादों में समाए हुए हूँ... निरंतर योगयुक्त स्थिति में हूँ... करावनहार बाप की स्मृति में... ट्रस्टी बनकर सेवा किए जा रही हूँ... मैं आत्मा देख रही हूँ... *निमित्त बन कर की गई सेवा से सब आत्माएं संतुष्ट हैं... और मैं आत्मा स्वयं भी हलकी व खुश हूँ... निरंतर उड़ती कला में जाते हुए... मैं संपन्न और संपूर्ण मूर्त बनती जा रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- प्रश्नचित न बन प्रसन्नचित रहना*

 

_ ➳  भगवान द्वारा रचे इस रुद्र ज्ञान यज्ञ को संभालने के निमित बनी, यज्ञ स्नेही *अपनी प्यारी दीदी, दादियों की अचल, अडोल स्थिति के बारे में सोचते ही मैं मन बुद्धि से पहुँच जाती हूँ मधुबन की उस परम पवित्र भूमि पर जहाँ का कण - कण उन महान आत्माओं के श्रेष्ठ कर्मो की खुशबू से आज भी महक रहा है*। उनके श्रेष्ठ कर्मो के यादगार के रूप में बने स्मृति स्थल आज भी जैसे उनकी साकार पालना का आभास कराते हैं औऱ उनके जैसा बनने की प्रेरणा देते हैं। 

 

_ ➳  मन बुद्धि के विमान पर बैठ, दीदी, दादियों के मधुबन में बने सभी यादगार स्थलों की सैर करते हुए मैं *मन ही मन स्वयं से उनके जैसा बनने और किसी भी परिस्थिति में क्यों, क्या के संकल्प से आंसू ना गिराने की, उनके जैसी अचल, अडोल, एकरस स्थिति बनाने की स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, अपने आप से की प्रतिज्ञा को दृढ़ता के साथ पूरा करने के लिए अपने कर्मक्षेत्र पर लौट आती हूँ*। प्यारे बापदादा का वरदानी हाथ और यज्ञ स्नेही अपनी प्यारी दीदी, दादियों का दुआयों भरा हाथ अपने सिर के ऊपर अनुभव करते हुए, एक अद्भुत शक्ति का संचार अपने अंदर होते हुए मैं महसूस करती हूँ और इस शक्ति के बल से सेकेण्ड में अपने निराकार लाइट स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने प्वाइंट ऑफ लाइट स्वरूप में स्थित होकर, स्वयं को देह से एकदम न्यारा अनुभव करते हुए, इस देह और देह से जुड़ी *हर चीज को साक्षी होकर देखते हुए, अब मै इन सबसे किनारा कर ऊपर आकाश की ओर उड़ जाती हूँ और एक खूबसूरत रूहानी यात्रा पर चलते हुए, आकाश को पार कर, उससे ऊपर सूक्ष्म वतन को भी पार कर, मैं पहुँच जाती हूँ आत्माओं की उस निराकारी दुनिया में जो मेरे पिता का निवास स्थान है*। शांति की यह दुनिया जहाँ शांति के अथाह वायब्रेशन्स चारों और फैले हुए है, इन वायब्रेशन्स को अपने अंदर समाकर गहन शान्ति की अनुभूति करते हुए, अपने इस शांतिधाम घर की सैर करते - करते मैं शांति के सागर अपने शिव पिता के पास पहुँचती हूँ।

 

_ ➳  अपने जिस परम पिता परमात्मा से मैं पूरा कल्प बिछड़ी रही उन्हें अपने सामने पाकर मैं महसूस कर रही हूँ जैसे कि जिस मंजिल की तलाश में मैं भटक रही थी वो मंजिल मुझे कितनी सहज रीति मिल गई है। *अपने बिल्कुल सामने, शांति, सुख, प्रेम, आनन्द, शक्ति, ज्ञान और पवित्रता के सागर अपने शिव पिता को अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों को फैलाये, अपना आह्वान करते हुए मैं देख रही हूँ*। धीरे - धीरे आगे बढ़ कर उनकी किरणो रूपी बाहों में मैं जाकर समा जाती हूँ। अपनी सर्वशक्तियों की किरणो रूपी बाहों में बड़े प्यार से समाकर बाबा मुझमें अपनी सारी शक्ति भर रहें हैं। 

*स्वयं को मैं बहुत ही बलशाली, बहुत ही एनर्जेटिक अनुभव कर रही हूँ*। 

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता के सर्व गुणों और सर्व शक्तियाँ को स्वयं में समाकर, बाप समान शक्तिशाली बन कर अब मैं वापिस साकार लोक की ओर लौट रही हूँ। *दीदी, दादियों जैसी एकरस, अचल, अडोल स्थिति में सदा स्थित रहने के लिए मैं उनके द्वारा किये श्रेष्ठ कर्मो को स्मृति में रख उनके समान अपने कर्मो को, बाबा की श्रेष्ठ मत पर चल श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ कर रही हूँ*। बापदादा के साथ की स्मृति से, स्वयं को सदा बापदादा के साथ कम्बाइंड अनुभव करते हुए, शक्तिशाली बन हर परिस्थिति को अपनी स्व स्थिति से अब मैं हँसते - हँसते पार कर रही हूँ। *किसी भी परिस्थिति में क्यों क्या के संकल्प से आंसू ना गिराने की स्वयं से की हुई प्रतिज्ञा को दृढ़ता के साथ पूरा करने के लिए ड्रामा की हर सीन को साक्षी होकर देखने का अभ्यास पक्का करने का मैं पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं हर संकल्प, बोल और कर्म द्वारा पुण्य कर्म करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं दुआओ की अधिकारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा एक बाप की कम्पनी में रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा बाप को अपना कम्पैनियन बना लेती हूँ  ।*

   *मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ सदा सन्तुष्टता का फल खाते और खिलाते रहेंगे। तो मैं निमित्त हूँ- इससे न्यारा और बाप का प्यारा अनुभव करेंगे। मैंने किया यह भी कभी वर्णन नहीं करेंगे। मैं शब्द समाप्त हो जायेगा। *मैं'' के बजाए बाबा बाबा''। तो बाबाबाबा कहने से सबकी बुद्धि बाप की तरफ जायेगी। जिसने निमित्त बनाया उसके तरफ बुद्धि लगने से आने वाली आत्माओं को विशेष शक्ति का अनुभव होगा क्योंकि सर्वशक्तिवान से योग लग जायेगा।* शक्ति स्वरूप का अनुभव करेंगे। नहीं तो कमजोर ही रह जाते हैं। तो निमित्त समझकर चलना यही सेवाधारी की विशेषता है। देखो - सबसे बड़े ते बड़ा सेवाधारी बाप है लेकिन उनकी विशेषता ही यह है - जो अपने को निमित्त समझा। मालिक होते हुए भी निमित्त समझा। निमित्त समझने के कारण सबका प्रिय हो गया।

➳ _ ➳ तो निमित्त हूँ, न्यारी हूँ, प्यारी हूँ, यही सदा स्मृति में रखकर चलो। *सेवा तो सब कर रहे हो, यह लाटरी मिल गई लेकिन इस मिली हुई लाटरी को सदा आगे बढ़ाना या कहाँ तक रखना यह आपके हाथ में है। बाप ने तो दे दी, बढ़ाना आपका काम है। भाग्य सबको एक जैसा बांटा लेकिन कोई सम्भालता और बढ़ाता है, कोई नहीं। इसी से नम्बर बन गये।* तो सदा स्वयं को आगे बढ़ाते, औरों को भी आगे बढ़ाते चलो। औरों को आगे बढ़ाना ही बढ़ना है। जैसे बाप को देखो, बाप ने माँ को आगे बढ़ाया फिर भी नम्बरवन नारायण बना। वह सेकण्ड नम्बर लक्ष्मी बनी। लेकिन बढ़ाने से बढ़ा। बढ़ाना माना पीछे होना नहीं, बढ़ाना माना बढ़ना।

✺ *"ड्रिल :- मैं निमित हूँ" - इस स्थिति का अनुभव करना*

➳ _ ➳ मैं आत्मा एकांत में बैठ मास्टर सर्वशक्तिवान के स्वमान में स्थित होकर सर्वशक्तिवान से योग लगाती हूं *मैं आत्मा इस दुनिया से न्यारी होती हुई सर्वशक्तिवान की किरणों की रोशनी में रुहानी यात्रा करती हुई पहुंच जाती हूं अपने प्यारे बाबा के पास* शक्तियों के सागर में डुबकी लगाती हुई मैं आत्मा सर्व शक्तियों को स्वयं में ग्रहण कर रही हूं मैं आत्मा सारी कमी कमजोरियों से मुक्त होकर शक्ति स्वरूप का अनुभव कर रही हूं

➳ _ ➳ अब मुझ आत्मा से मैं मेरे मन की भावना खत्म हो रही है... शक्तियों के सागर में मैं शब्द को डुबोकर समाप्त कर दी हूं... अब मैं आत्मा सिर्फ बाबा बाबा करती रहती हूं... *अपने को निमित्त समझकर सच्चे सेवाधारी की विशेषता को ग्रहण कर रही हूं...* प्यारे बाबा मालिक होते हुए भी अपने को बच्चों का सेवाधारी कहते हैं... मैं आत्मा बाप के गुणों को धारण कर अपने को सेवाधारी बाप समान निमित्त समझ कर चल रही हूं...

➳ _ ➳ *अब मैं आत्मा अल्पकाल के नाम मान शान के लिए कभी भी सेवा का वर्णन नहीं करती हूं... निस्वार्थ भाव से अपने को निमित समझ सेवा कर रही हूं... करावनहार करा रहा है मैं बस कर रही हूँ...* अब मैं आत्मा अपना बुद्धि योग सिर्फ प्यारे बाबा से लगाती हूं... किसी भी देहधारी से नहीं जिससे मैं आत्मा विशेष शक्तियों का स्वयं में अनुभव कर रही हूं... और आने वाली आत्माओं को भी विशेष शक्ति का अनुभव करवा रही हूँ...

➳ _ ➳ *मैं आत्मा निमित्त हूँ, न्यारी हूँ, प्यारी हूँ, सदा इसी स्मृति में रहकर सेवा करती हूं... बाबा से मिले श्रेष्ठ भाग्य के खजानों को स्वयं में धारण कर संभाल रही हूं और समय प्रमाण यूज कर बढ़ाती जा रही हूं...* मैं आत्मा बाप समान बनकर औरों को आप समान बना रही हूं... स्वयं भी आगे बढ़ रही हूं और औरों को भी आगे बढ़ाती जा रही हूं... जैसे ब्रह्मा बाप ने माँ को आगे बढ़ाकर नम्बरवन नारायण बने... वैसे ही मैं आत्मा ब्रह्मा बाप सामान सर्व के कल्याण की भावना से सर्व को आगे बढ़ा रही हूं और स्वतः आगे बढ़ती जा रही हूं और नंबर वन बन रही हूं...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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