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 05 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *याद और सेवा में लगन में आगे बड़ते रहे ?*

 

➢➢ *सदैव उडती कला का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *आत्माओं को अपने इष्ट देव स्वरुप का साक्षातकार करवाया ?*

 

➢➢ *बहुतकाल के पुरुषार्थ का अभ्यास किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *इस देह की दुनिया में कुछ भी होता रहे, लेकिन फरिश्ता ऊपर से साक्षी हो सब पार्ट देखते सकाश देता रहे।* आप सब बेहद विश्व कल्याण के प्रति निमित्त हो तो साक्षी हो सब खेल देखते सकाश अर्थात् सहयोग देने की सेवा करो। *सीट से उतर कर सकाश नहीं देना। ऊंची स्टेज पर स्थित होकर देना तो किसी भी प्रकार के वातावरण का सेक नहीं आयेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं परमात्मा-शमा का परवाना हूँ"*

 

  सभी अपने को परमात्म-शमा के परवाने समझते हो? *परवाने दो प्रकार के होते हैं-एक हैं चक्र लगाने वाले और दूसरे हैं सेकेण्ड में फिदा होने वाले। तो आप सभी कौनसे परवाने हो? फिदा हो गये हो या होने वाले हो? या अभी थोड़ा सोच रहे हो? सोचना अर्थात् चक्र लगाना।* फिदा होने के बाद फिर चक्र नहीं काटना पड़ेगा। सभी हो गये?

 

  जब कोई अच्छी चीज मिल जाती है और समझ में आता है कि इससे अच्छी चीज कोई है ही नहीं-तो सोचने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे ही सौदा किया है ना। बापदादा को भी ऐसे निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों को देख हर्ष होता है। ज्यादा खुशी किसको होती है-बाप को या आपको? *बाप कहते हैं-बच्चों को ज्यादा खुशी है तो बाप को पहले है। बापदादा ने, देखो, कहाँ-कहाँ से चुनकर एक बगीचे के रूहानी गुलाब बना दिया। इसी एक परिवार का बनने में कितनी खुशी है!* इतना परिवार किसी का भी होगा? फालोअर्स हो सकते हैं लेकिन परिवार नहीं। कितनी

 

  *खुशियां हैं-बाप की खुशी, अपने भाग्य की खुशी, परिवार की खुशी! खुशियाँ ही खुशियाँ हैं ना। आंख खुलते ही अमृतवेले खुशी के झूले में झूलते हो और सोते हो तो भी खुशी के झूले में। अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो किससे पूछें? हर एक कहेगा-मेरे से पूछो।* यह शुद्ध नशा है, यह देह-भान का नशा नहीं है। हर एक आत्मा को अपना-अपना रूहानी नशा है। सिर्फ रूहानी नशे को हद का नशा नहीं बनाना।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी सदा प्रवृति में रहते भी न्यारे और बाप के प्यारे, ऐसी स्थिति में स्थित हो चलते हो? *जितने न्यारे होंगे उतने ही बाप के प्यारे होंगे।*

 

✧  तो हमेशा न्यारे रहने का विशेष अटेन्शन है? *सदा देह से न्यारे आत्मिक स्वरूप में स्थित रहना।* जो देह से न्यारा रहता है वह प्रवृति के बन्धन से भी न्यारा रहता है।

 

✧  *निमित मात्र डायरेक्शन प्रमाण प्रवृति में रह रहे हो, सम्भाल रहे हो* लेकिन अभी-अभी ऑर्डर हो कि चले आओ तो चले आयेंगे या बन्धन आयेगा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जैसे साकार में देखा बीच-बीच में कारोबार में रहते भी गुम अवस्था की अनुभूति होती थी ना।* सुनते-सुनाते डायरेक्शन देते अण्डरग्राउण्ड हो जाते थे। तो अभी इस अभ्यास की लहर चाहिए। *चलते-चलते देखें कि यह जैसे कि गायब है। इस दुनिया में है नहीं।* यह फरिश्ता इस देह की दुनिया और देह के भान से परे हो गये। *इसको ही सब साक्षात्कार कहेंगे। जो भी सामने आयेगा वह इसी स्टेज में साक्षात्कार का अनुभव करेगा।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- उडती कला का अनुभव करना"*

 

_ ➳  अमृतवेले आंख खुलते ही मैं आत्मा मीठे बापदादा को अपने सामने देखती हूँ... बापदादा बड़े प्यार से मीठे बच्चे- मीठे बच्चे कहकर मुझे जगाते हैं... बड़ी प्यार भरी दृष्टि दे रहे हैं... *बाबा के रूहानी नयन मुझ आत्मा को प्रभु प्यार में पूरी तरह लवलीन कर रहे हैं...* मैं आत्मा तहे दिल से अपने *मीठे बाबा का शुक्रिया करती हूँ...  जिन्होंने मेरे जीवन में आकर जीवन रूपी बगिया को खुशियों से महका दिया है... बापदादा से होने वाली असीम स्नेह की वर्षा से मैं आत्मा भीगती जा रही हूँ...*

 

  *अपनी मीठी मीठी शिक्षाओं से मेरे जीवन का श्रृंगार करते हुए बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे बच्चे... उड़ती कला का श्रेष्ठ साधन जानते हो... *उड़ती कला का अनुभव करने के लिए एक शब्द का परिवर्तन करना है... वह एक शब्द है सब कुछ तेरा... मेरा शब्द को बदल कर तेरा कर देना है...* यह शब्द सदा के लिए लाइट बना देता है और डबल लाइट बन जाने से सहज उड़ती कला वाला बन जाते हैं..."

 

_ ➳  *बाबा के मीठे बोल सुनकर गदगद होती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणेश्वर मीठे बाबा... आप हमें उड़ती कला में ले जाने की कितनी सहज युक्ति बता रहे हैं... अब मैं आत्मा हर *मेरे को तेरे में परिवर्तन* कर रही हूँ... *इस 'तेरा हूं' से आत्मा तो लाइट है ही और सब कुछ जिम्मेवारी तेरा कर देने से मैं हल्कापन अनुभव कर रही हूँ... डबल लाइट बन जाने से मैं आत्मा सहज ही उड़ती कला में जा रही हूँ..."*

 

  *अपने श्रेष्ठ और महान ब्राह्मण कुल की स्मृति दिलाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे-मीठे फूल बच्चे... सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कुल वाली आत्माओं का लक्ष्य है सदा महादानी और सदा पुण्य आत्मा बनना... *पुण्य आत्माएं कभी भी संकल्प में भी विकार के वश नहीं हो सकती... वे हर संकल्प में, बोल में, कर्म में सदा पुण्य आत्मा रहती हैं... जब पुण्य आत्मा बन गई तो पाप का नाम निशान भी नहीं रह सकता... तो सदा इसी स्मृति में रहो कि हम  ब्राह्मण आत्माएं सदा की पुण्य आत्मायें हैं..."*

 

_ ➳  *बाबा की शिक्षाओं को अपने जीवन में धारण करती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "सतगुरु मीठे बाबा... मैं आत्मा अब इसी स्मृति में स्थित हूँ कि *मैं सर्वश्रेष्ठ कुल वाली ब्राह्मण आत्मा हूँ...  पुण्य आत्मा हूँ...*  मैं आत्मा हर कर्म से पुण्य का खाता जमा करती जा रही हूँ... *हर आत्मा के प्रति सदैव श्रेष्ठ भावना और शुभ भावना रख रही हूँ... और अपनी पुण्य की पूंजी को बढ़ाती जा रही हूँ..."*

 

  *ज्ञान रत्नों से मेरा श्रृंगार करते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मेरे प्यारे बच्चे... पुण्य आत्माओं की निशानी जानते हो... पुण्य आत्मा कभी भी किसी भी आत्मा से *अल्पकाल की प्राप्ति की कामना नहीं रखती... वह कभी भी अपने पुण्य के बदले  प्रशंसा लेने की कामना भी नहीं रखती...* वे सदा अपने *हर बोल द्वारा औरों को खुशी, बाप के स्नेह, अतींद्रिय सुख, रूहानी आनन्दमय जीवन का अनुभव कराते हैं... तो ऐसे पुण्य आत्मा बनो..."*

 

_ ➳  *बाबा द्वारा कही गई एक एक बात का स्वरूप बनती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "नयनों के नूर मीठे बाबा... मैं आत्मा अपनी दातापन की स्थिति में स्थित हूँ... *हद की नाम मान शान की सभी कामनाओं से मुक्त हूँ... अपने हर बोल द्वारा आत्माओं को खुशी की खुराक दे रही हूँ... अपने हर कर्तव्य द्वारा सभी को सहयोग की अनुभूति करा रही हूँ... पुण्य आत्मा के सभी लक्षण, निशानियाँ स्वयं में धारण करती जा रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- याद और सेवा का बैलेंस रखना*

 

_ ➳  अपने अव्यक्त फ़रिश्ता स्वरूप में, अव्यक्त वतन में, अपने अति मीठे अति प्यारे अव्यक्त बापदादा के सम्मुख बैठ उनके नयनों की भाषा को समझने का मैं प्रयास कर रही हूँ। *अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा के नयनों में उनकी उस आश को मैं स्पष्ट महसूस कर रही हूँ जो बाबा को अपने हर ब्राह्मण बच्चे से है कि हर बच्चा कर्मयोगी, अथक सेवाधारी और वरदानी स्वरूप का प्रत्क्षय सैम्पल बन कर रहे ताकि हर बच्चे में बाप दिखाई दे*। बाबा के नयनों में समाई इस आश को पूरा करने की मन ही मन मैं स्वयं से प्रतिज्ञा करते हुए फिर से अपने प्यारे बापदादा की ओर देखती हूँ जो एकटक मुझे निहार रहें हैं जैसे मेरे मन की हर बात को जान गए हैं। *मन्द - मन्द मुस्कारते, स्वयं को निहारते हुए अपने प्यारे पिता को देख मैं मन ही मन प्रफुलित हो रही हूँ और अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सराहना कर रही हूँ*।

 

_ ➳  अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की स्मृति में खोई हुई मैं एक दृश्य देख रही हूँ। इस दृश्य में मुझे बाबा के दो स्वरूप दिखाई दे रहें हैं। एक बाबा का साकार स्वरूप जो बिल्कुल साधारण होते हुए भी विशेष है। *देख रही हूँ बाबा कैसे कर्मयोगी बन हर कर्म करते हुए एक दम लाइट स्थिति में स्थित है। स्वयं को निमित समझ हर कर्म करते हुए बाबा जैसे हर कर्म के बन्धन से मुक्त दिखाई दे रहें हैं*। एक दिव्य अलौकिक चमक बाबा के चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही है। कर्मयोगी के साथ अथक सेवाधारी बन बाबा हर सेवा निमित बन बिल्कुल हल्के रहकर करते जा रहें है। बस एक ही संकल्प की ये सेवा मेरी नही शिव बाबा की है। *सेवा में सम्पूर्ण समर्पणता का भाव ही बाबा को अथक बना कर हर सेवा में सहज ही सफलतामूर्त बना रहा है। वरदानी स्वरुप का प्रत्क्षय सैम्पल बाबा के साकार स्वरूप में मैं बाबा के हर कर्म और हर सेवा में देख रही हूँ*।

 

_ ➳  दूसरी तरफ मैं बाबा का अव्यक्त स्वरूप देख रही हूँ जो बहुत ही न्यारा और प्यारा है। बाबा का ये सम्पूर्ण स्वरूप देह के बन्धनों से परें बेहद की सेवा करता हुआ, विश्व की सर्व आत्माओं का कल्याण करता हुआ, अपने बच्चों को आप समान बनाने के लिए उन्हें अपना बल देकर आगे बढ़ाता हुआ और ज्ञान, गुण और शक्तियों के अखुट खजानो से अपने हर बच्चे को सदा भरपूर करता हुआ दिखाई दे रहा है। *बाबा के इस अव्यक्त स्वरूप में बाबा के बेहद सेवाधारी और महावरदानी स्वरुप को मैं देख रही हूँ। बाबा के साकार और अव्यक्त दोनों स्वरूपों को देख बाबा जैसा बनने की स्वयं से मैं फिर से प्रतिज्ञा करती हूँ और बाबा के सम्मुख बैठी अनुभव करती हूँ जैसे बाबा अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रखकर मुझे कर्मयोगी, अथक सेवाधारी और वरदानीमूर्त भव का वरदान दे रहें है*।

 

_ ➳  वरदान देकर अब बाबा मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल मेरे अंदर भर रहें हैं। शक्तियों की रंग बिरंगी सुनहरी किरणो को बाबा के वरदानी हस्तों से निकल कर अपने अंदर समाते हुए मैं महसूस कर रही हूँ। सर्वशक्तियों की किरणों की मीठी फुहारें मेरे मस्तक को स्पर्श करके सीधी मुझ आत्मा में प्रवाहित होकर मुझे बलशाली बना रही हैं। *ऐसा लग रहा है जैसे आप समान बनाने के लिए बाबा अपनी शक्तियों का समस्त बल मुझमें भर रहें हैं। एक विशेष दिव्य शक्ति मैं अपने अंदर अनुभव कर रही हूँ। यह शक्ति मुझे बहुत ही लाइट और माइट स्थिति में स्थित कर रही है*। अपने सम्पूर्ण लाइट माइट स्वरूप के साथ बाबा से की हुई प्रतिज्ञा और अपने प्यारे ब्रह्मा बाप की आश को पूरा करने के लिए अब मैं वापिस साकारी दुनिया मे लौट आती हूँ और आकर अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, अपने प्यारे ब्रह्मा बाप की आश को पूर्ण करने और परमात्म कार्य को सम्पन्न करने का पुरुषार्थ अब मैं दृढ़ता के साथ कर रही हूँ। *अपने कर्मो के दर्पण द्वारा सबको बाप का साक्षात्कार कराने और बाप समान अव्यक्त फ़रिश्ता बन कर्मयोगी का पार्ट बजाने की अपने प्यारे बाबा की आश को पूरा करने के लिए मैं कदम - कदम पर उन्हें फॉलो कर रही हूँ*। उनके एक - एक कर्म को कॉपी करते हुए, उनके समान कर्मयोगी, अथक सेवाधारी और वरदानी स्वरुप का प्रतक्ष्य सैंपल बनने का पुरुषार्थ पूरी लगन के साथ करते हुए उनकी अमूल्य पालना का रिटर्न देने का मैं हर सम्भव प्रयास कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं बाप की छत्रछाया की अनुभवी आत्मा हूँ।*

   *मैं विघ्न विनाशक आत्मा हूँ।*

   *मैं अनुभवी मूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा समय पर सहयोगी बनती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा एक का पदमगुणा फल प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सहयोगी हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

 

➳ _ ➳  सेवाधारियों को सदा बुद्धि में क्या याद रहता हैसिर्फ सेवा या याद और सेवा? *जब याद और सेवा दोनों का बैलेन्स होगा तो वृद्धि स्वत: होती रहेगी । वृद्धि का सहज उपाय ही है - बैलेन्स''। वर्तमान समय के हिसाब से सर्व आत्माओं को सबसे ज्यादा शान्ति की चाहना हैतो जहाँ भी देखो सर्विस वृद्धि को नहीं पातीवैसे की वैसे रह जाती - वहाँ अपने सेवाकेन्द्र के वातावरण को ऐसा बनाओ जैसे शान्ति-कुण्डहो।* एक कमरा विशेष इस वायुमण्डल और रूपरेखा का बनाओ जैसे बाबा का कमरा बनाते हो ऐसे ढंग से बनाओ जो घमसान के बीच में शान्ति का कोना दिखाई दे। ऐसा वायुमण्डल बनाने सेशान्ति की अनुभूति कराने से वृद्धि सहज हो जायेगी। म्यूजियम ठीक है लेकिन यह सुनने और देखने का साधन है। सुनने और जानने वालों के लिए म्यूजियम ठीक है लेकिन जो सुन-सुन करके थक गये हैं उन्हों के लिए शान्ति का स्थान बनाओ

 

➳ _ ➳  मैजारटी अभी यही कहते हैं कि आपका सब कुछ सुन लियासब देख लिया। लेकिन पा लिया है'' - ऐसा कोई नहीं कहता। अनुभव कियापाया यह अभी नहीं कहते हैं। *तो अनुभव कराने का साधन है - याद में बिठाओशान्ति का अनुभव कराओ। दो मिनट भी शान्ति का अनुभव कर लें तो छोड़ नहीं सकते। तो दोनों ही साधन बनाने चाहिए। सिर्फ म्यूजियम नहीं लेकिन शान्ति-कुण्डका स्थान भी।* जैसे आबू में म्यूजियम भी अच्छा है लेकिन शान्ति का स्थान भी आकर्षण वाला है। अगर चित्रों द्वारा नहीं भी समझते तो दो घड़ीयाद में बिठाने से इम्प्रेशन बदल जाता है। इच्छा बदल जाती है। समझते हैं कि कुछ मिल सकता है। प्राप्ति हो सकती है। जहाँ पाने की इच्छा उत्पन्न होती वहाँ आने के लिए भी कदम उठना सहज हो जाता। तो ऐसे वृद्धि के साधन अपनाओ।

 

✺   *"ड्रिल :- आत्माओं को शांति का अनुभव करवाना*"

 

➳ _ ➳  *देह रूपी सुन्दर सीपी में जगमगाती मैं मुक्तक मणि... मेरे दिव्य प्रकाश से सराबोर ये देह रूपी सीपी पारदर्शी होती जा रही है... जैसे किसी शीशे की डिबियाँ में बन्द कोई झिलमिलाती मणि...* मुझ आत्मा मणि की प्रकाश रश्मियाँ आसपास के वातावरण में फैलकर समस्त तमोप्रधानता को दूर कर रही है... मन और बुद्धि से मैं बैठ गयी हूँ शान्ति स्तम्भ पर, ज्योतिपुंज के ठीक सामने... ज्योतिपुंज से झलकता मेरे बाबा का रूहानी प्रतिबिबं... *(दृश्य चित्र बनाकर कुछ देर निहारें उस रूहानी नूर की बारिश करते उस चेहरें को)*...

 

➳ _ ➳  *वो आँखें जो निरन्तर शान्ति, प्रेम और पावनता की मधुशाला बन गयी है*... वो अपनापन बिखेरती मुस्कुराहट जो पल में आह्वान कर अपना बना लेती है दुखी अशान्त आत्माओं को... *कुछ पल के लिए पलकों के परदें गिराकर कैद कर ले शान्ति के झर-झर झरते उस असीम सौन्दर्य को और उतर जाने दे दिल की गहराईयों में आहिस्ता आहिस्ता*... हुए लबालब उर के पैमाने, मौन हुई संकल्पों की माला... रोम रोम में भरने मदिरा उन नैनों से निकली मधुशाला...

 

➳ _ ➳ अतिन्द्रिय सुख में डूबी हुई, मैं मुक्तक मणि अब नन्हें फरिश्तें की चमचमाती पोशाक में... *बापदादा की उँगली पकडकर नन्हें नाटे से कदमों से मन्द मन्द चलती हुई... जानबूझकर चलने में देरी करती हुई... बापदादा मेरे मन की बात जानकर कन्धे पर बैठा लेते है मुझे*... और मैं खुशी और नशे से झूमती हुई अपने सौभाग्य पर इतराती हुई बापदादा के गोद की अधिकारी आत्मा... *मेरे सौभाग्य का कोई सानी नही है आज... उमंगों से भरकर उड चली मैं बापदादा  के साथ विश्व सेवा पर*...

 

➳ _ ➳  सुन्दर शान्त झील का किनारा, गहरा नीला, मगर पारदर्शी स्वच्छ जल... *शान्त जल में हम दोनों का झलकता प्रतिबिम्ब*... बापदादा मुझे लेकर उतर गये है इसी झील के किनारें... खिले हुए सुन्दर कमल और कुमुदिनियों के समूह... बाबा मुस्कुराते हुए बता रहें है *बच्चे-देखो कितना शान्त है झील का पानी, कि हम दोनो का प्रतिबिम्ब स्वच्छ दर्पण की तरह से नजर आ रहा था इसमें... ऐसी ही शान्ति जब तुम्हारे अन्दर होती है तभी तुम अपने गुणों शक्तियों एवं सच्चे स्वरूप के दर्शन कर सकते हो*...

 

➳ _ ➳  देखों उस खिले कमलदल को... कितना बैलेन्स है उसके जीवन में... *जडें पूरी तरह पानी में है मगर फूल और पत्तियाँ पानी की नमी को खुद पर कभी हावी नही होने देती*... कमल-सा बैलेन्स जीवन में जरूरी है... मैं आँखों ही आँखों में सहमति जताता हुआ, बाबा का मौन इशारा पाकर उड चला बापदादा के पीछे पीछे...

 

➳ _ ➳  बाबा एक सुन्दर बगीचे के ऊपर से गुज़रते हुए... बच्चे, देख रहे हो बगीचे की शोभा को... खुशबू और रंगों का सन्तुलन है इसमें... तभी तो हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है... *हर पौधे की वृद्धि में धूप और पानी का बैलेन्स जरूरी है तभी तो पौधा वृद्धि को पाया... तो बच्चे, याद की धूप और जल-रूपी सेवा का सदा बैलैन्स रखना तभी सेवा और पुरूषार्थ में विधि पूर्वक वृद्धि होगी*...

 

➳ _ ➳  और बातों ही बातों मे विश्व को सकाश देते हुए बाबा की याद का ये सुहाना सफर कब पूरा हो गया पता ही नही चला... बापदादा समझानी देते हुए वापस पहुँच गये है शान्ति स्तम्भ पर... और ज्योति पुंज में समा गये है... ज्योति पुंज से शांति की किरणें निकल समस्त संसार में चारों ओर फैल रही हैं सभी आत्माओं के दुख अशांति समाप्त हो रही है सभी आत्माएं शांति का अनुभव करती पाना था सो पा लिया के गीत गा रही हैं... मैं मणि भी वापस उसी देह रूपी सीपी में समाँ जाती हूँ... *शान्ति रूपी बारिश की अनुभूति और शान्ति की लहरे शान्ति स्तम्भ से टकराती हुई संसार की सभी आत्माओं को शान्ति की गहन अनुभूति कराती हुई*...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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