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 05 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"हम आधारमूर्त हैं... पूरे विश्व की फाउंडेशन हैं" - यह स्मृति रही ?*

 

➢➢ *आत्माओं को इच्छा मातरम् अविधा स्थिति का अनुभव करवाया ?*

 

➢➢ *स्वयं को सर्व खजानों से संपन्न अनुभव किया ?*

 

➢➢ *"एक बाप दूसरा ना कोई" - यह अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *विशेष अमृतवेले पावरफुल स्थिति की सेटिंग करो।* पॉवरफुल स्टेज अर्थात् बाप समान बीजरूप स्थिति में स्थित रहने का अभ्यास करो। जैसा श्रेष्ठ समय है, वैसी श्रेष्ठ स्थिति होनी चाहिए। *साधारण स्थिति में तो कर्म करते भी रह सकते हो, लेकिन यह विशेष वरदान का समय है। इस समय को यथार्थ रीति यूज करो तो सारे दिन की याद की स्थिति पर उसका प्रभाव रहेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं प्रवृत्ति में रहते न्यारी और परमात्मा की प्यारी आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को प्रवृत्ति में रहते न्यारे और प्यारे अनुभव करते हो? कि प्रवृत्ति में रहने से प्रवृत्ति के प्यारे हो जाते हो, न्यारे नहीं हो सकते हो? *जो न्यारा रहता है वही हर कर्म में प्रभु प्यार अर्थात् बाप के प्यार का अनुभव करता है। अगर न्यारे नहीं रहते तो परमात्म प्यार का अनुभव भी नहीं करते और परमात्म प्यार ही ब्राह्मण जीवन का विशेष आधार है।* वैसे भी कहा जाता है कि प्यार है तो जीवन है, प्यार नहीं तो जीवन नहीं। तो ब्राह्मण जीवन का आधार है ही परमात्म प्यार और वह तब मिलेगा जब न्यारे रहेंगे। लगाव है तो परमात्म प्यार नहीं। न्यारा है तो प्यार मिलेगा। इसीलिये गायन है जितना न्यारा उतना प्यारा।

 

✧  वैसे स्थूल रूप में लौकिक जीवन में अगर कोई न्यारा हो जाये तो कहेंगे कि ये प्यार का पात्र नहीं है। *लेकिन यहाँ जितना न्यारा उतना प्यारा। जरा भी लगाव नहीं, लेकिन सेवाधारी। अगर प्रवृत्ति में रहते हो तो सेवा के लिये रहते हो। कभी भी यह नहीं समझो कि हिसाब-किताब है, कर्म बन्धन है .. लेकिन सेवा है। सेवा के बन्धन में बंधने से कर्म-बन्धन खत्म हो जाता है।* जब तक सेवा भाव नहीं होता तो कर्मबन्धन खींचता रहता है। बाप ने डायरेक्शन दिया है उसी श्रीमत पर रहे हुए हो, अपने हिसाब किताब से नहीं। कर्मबन्धन है या सेवा का बन्धन है .. उसकी निशानी है अगर कर्म बन्धन होगा तो दु:ख की लहर आयेगी और सेवा का बन्धन होगा तो दु:ख की लहर नहीं आयेगी, खुशी होगी।

 

✧  तो कभी भी किसी भी समय अगर दु:ख की लहर आती है तो समझो कर्मबन्धन है। कर्मबन्धन को बदलकर सेवा का बन्धन नहीं बनाया है। परिवर्तन करना नहीं आया है। विश्व सेवाधारी हैं, तो विश्व में जहाँ भी हो तो विश्व सेवा अर्थ हो। यह पक्का याद रहता है या कभी कर्मबन्धन में फंस भी जाते हो? सेवाधारी कभी फंसेगा नहीं। वो न्यारा और प्यारा रहेगा। समझते तो हो कि न्यारे रहना है लेकिन जब कोई परिस्थिति आती है तो उस समय न्यारे रहो। कोई परिस्थिति नहीं है, उस समय तो लौकिक में भी न्यारे रहते हो। *लेकिन अलौकिक जीवन में सदा ही न्यारे। कभी-कभी न्यारे नहीं, सदा ही न्यारे। कभी-कभी वाले तो राज्य भी कभी-कभी करेंगे। सदा राज्य करना है तो सदा न्यारा भी रहना है ना। इसलिए सदा शब्द को अन्डरलाइन करो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  हे शान्ति देवा श्रेष्ठ आत्मायें। इस शान्ति की शक्ति को अनुभव में लाओ। जैसे वाणी की प्रैक्टिस करते-करते वाणी के शक्तिशाली हो गये हो, ऐसे *शान्ति की शक्ति के भी अभ्यासी बनते जाओ।* आगे चल वाणी वा स्थूल साधनों के द्वारा सेवा का समय नहीं मिलेगा।

 

✧  ऐसे समय पर शान्ति की शक्ति के साधन आवश्यक होंगे। क्योंकि जितना जो *महान शक्तिशाली शस्त्र होता है वह कम समय में कार्य ज्यादा करता है।* और जितना जो महान शक्तिशाली होता है वह अति सूक्ष्म होता है। तो *वाणी से शुद्धसंकल्प सूक्ष्म हैं,* इसलिए सूक्ष्म का प्रभाव शक्तिशाली होगा।

 

✧  अभी भी अनुभवी हो, जहाँ वाणी द्वारा कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है तो कहते हो - यह वाणी से नहीं समझेंगे, *शुभ भावना से परिवर्तन होंगे।* जहाँ वाणी कार्य को सफल नहीं कर सकती, वहाँ *साइलेन्स की शक्ति का साधन शुभ-संकल्प, शुभ-भावना, नयनों की भाषा द्वारा रहम और स्नेह की अनुभूति कार्य सिद्ध कर सकती है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ बॉडी-कान्शियस होगा तो अभिमान आयेगा, *आत्म-अभिमानी होंगे तो अभिमान नहीं आयेगा लेकिन रूहानी फखुर होगा और जहाँ रूहानी फखुर होता है वहाँ विघ्न नहीं हो सकता।* या तो है फिक्र या है फखुर। दोनों साथ नही होते।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- नई दुनिया की तस्वीर का आधार वर्तमान श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन"*

 

_ ➳  *भोली -सी पथिक, और डगर अनजान... जब से मिले, वो, मै बनी, चतुर सुजान*... *संगम पर मेरे श्रेष्ठ भाग्य की अनोखी सी सौगात लेकर हाजिर हुए वो सच्चें- सच्चे रूहानी रत्नाकर*... मुझ आत्मा को सौदागरी सिखा रहे है... पदमापदम भाग्यशाली हूँ मैं आत्मा, मेरे भाग्य का दर्पण दिखा रहे है, और इस भाग्य के दर्पण में कोहिनूर की भाँति जगजगाती मैं आत्मा बैठी हूँ बापदादा के सम्मुख, *और दिलोजान से ग्रहण कर रही हूँ उनकी हर मीठी समझानी को*...

 

  *रत्नों के खजानों से मालामाल करने वाले चतुर सुजान बाप मुझ आत्मा से बोले:-* "दुनिया के हिसाब से भोली, मगर बाप को पहचानने की दिव्य नेत्रधारी मेरी बच्ची... आपने मेरा बाबा कहकर पदमों की कमाई का अधिकार पा लिया,.. *दिन रात ज्ञान रत्नों से खेलते आप बच्ची स्वयं का महत्व समझी हो, बापदादा आप बच्ची को जिस नजर से देखते है अब उन नजरों को साकार करों..."*

 

_ ➳  *मुझ आत्मा को सच्चा सौदा सिखा सौदागर बनाने वाले बाप से मैं दिव्य नेत्र धारी आत्मा बोली:-* "मीठे बाबा... *मुरीद हूँ मैं इन आँखों की, जिसने आपको पहचाना है, हर शुक्रिया आपको ही जाता है, क्योंकि ये आँखें भी तो आपका ही नजराना है*... मीठे बाबा, ये बुद्धि अब दिव्य हो गई है, जीवन ही दिव्यता में ढल रहा है, इस रूह के ताने बाने में आपके गुण और शक्तियों के रंग और भी गहरे हो गये है... देखो, मेरा हर संस्कार बदल रहा है... *आपकी आँखों मे मैं अपना सम्पूर्ण स्वरूप देखती हूँ बाबा और हर पल उसी का स्वरूप बन रही हूँ..."*

 

  *हर पल उमंगो की बरसात कर मेरे रोम- रोम को उमंगों से भरपूर करने वाले बापदादा बोले:-* "इनोसैन्ट से सैन्ट बनी मेरी राॅयल बच्ची... देखो, अनेक बातों को समझने वाले समझदार अरबों- खरबो की गिनती कर रहे है... समय स्वाँस और संकल्प का खजाना कौडियों के भाव लुटा घाटे का सौदा कर रहे है... *ये वैरी वैरी इनोसैन्ट परसन है जो खुद को बहुत समझू सयाने समझ रहे है... अब इन सबको भी आप समान सौदागर बनाओं... जो अपनी आँखों से पहचाना है उसकी पहचान इनको भी कराओं..."*

   

_ ➳  *अमृत वेले से अमृत का पान कर दिन भर ज्ञान रत्नों से खेलने वाली मैं आत्मा रत्नागर बाप से बोलीं:-* "मीठे बाबा... *उंमगों के उडनखटोले में आपने संग बैठाकर उडना सिखाया है... आपकी अनोखी पालना ने हर पल मुझे मेरे श्रेष्ठ भाग्य का अनुभव कराया है*... आपकी हर चाहत अब मेरी धडकन बन रही है... *बैक बोन बने आप निमित्त बन चला रहे हो, वैरी वैरी इनोसैन्ट इन आत्माओं को ज्ञान रत्नों का अनोखा खेल भाने लगा है*... सांइलेंस की जादूगरी से बाबा इनको खेल पदमों का समझ आने लगा है..."

 

  *हर प्रकार की माया से सेफ रख मायाजीत बनाने वाले रूहानी जादूगर मुझ आत्मा से बोले:-* "अपनी निर्विघ्न स्थिति द्वारा वायुमंडल को पाॅवर फुल बनाने वाली मेरी श्रेष्ठ ब्राह्मण बच्ची... *एकता और दृढता के बल से सर्व के प्रति शुभसंकल्पों की लहर फैलाओं, सब के प्रति शुभ संकल्पो से हर आत्मा को बदलकर अब बाप की प्रत्यक्षता का झंडा फहराओं...* संकल्पों के इस खजाने से अब हर आत्मा का परिचय कराओं... संगठन की एकता में अब बस शुभभावो की लहर फैलाओं..."

 

_ ➳ *बाप को कदम हर कदम फाॅलो करने वाली मैं मास्टरज्ञान सागर आत्मा, ज्ञान सागर बापदादा से बोली:-* "मीठे बाबा... संकल्पों की दृढतासंगठन की एकता और साइलेंस के बल से आत्माओं को आपका निरन्तर संदेश जा रहा है...* संगम युगी मुझ श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा का भाग्य देखकर हर आत्मा परम सुख पा, इस ओर आ रही है... बस *एक बाबा* कहकर *पदमो की कमाई का सुख पाकर अपने भाग्य की सराहना करने वाली ये भोली आत्माए बाप समान चतुर सुजान बनती जा रही है...* और बापदादा मुझे गले से लगाकर सफलता का वरदान दे रहे है..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- "हम आधारमूर्त हैं... पूरे विश्व की फाउंडेशन हैं" - इस स्मृति में रहना है*"

 

 _ ➳  सर्व आत्माओं के प्रति कल्याण की वृत्ति रखने वाले दया के सागर शिव परमपिता परमात्मा की सन्तान मैं आत्मा भी उनके समान सर्व आत्माओं पर रहम करने वाली मास्टर विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँइस स्मृति में स्थित हो कर विश्व की सर्व आत्माओं का कल्याण करने हेतू अपने लाइट के फ़रिशता स्वरूप को मैं धारण कर लेती हूँ और *स्वयं को सर्वशक्तियों से सम्पन्न करने के लिए सर्व गुणों और सर्वशक्तियों के दाता अपने शिव बाप के पास चल पड़ती हूँ*। अपने लाइट के सूक्ष्म शरीर में मैं स्वयं को साकारी देह से बिलकुल अलग एकदम हल्का और निर्बन्धन अनुभव कर रही हूँ। कितनी न्यारी और प्यारी अवस्था है। कोई भारीपन, कोई बोझ नही। हल्केपन की इस स्थिति में अब मैं धीरे - धीरे ऊपर उड़ रही हूँ।

 

 _ ➳  पूरी दुनिया का भ्रमण करते, इस कलयुगी दुनिया के दिल को दहलाने वाले करुण दृश्यों को मैं देखती जा रही हूँ। विकारों के वशीभूत हो कर सभी एक दूसरे को दुःख दे रहें हैं। क्षण भर की शान्ति की तलाश में दर - दर भटक रहे है किंतु शान्ति से कोसों दूर है। *रोती, बिलखती, दुःख से पीड़ित आत्माओं को देखता हुआ मैं फ़रिशता कलयुगी दुनिया से बाहर आ जाता हूँ औऱ आकाश को पार कर जाता हूँ*। उससे भी ऊपर और ऊपर उड़ते हुए मैं सफेद प्रकाश की एक अति सुंदर मन को लुभाने वाली दुनिया में प्रवेश करता हूँ जहाँ चारों और प्रकाश की काया वाले फ़रिश्ते ही फ़रिश्ते हैं। पाँच तत्वों से बनी कोई भी वस्तु यहाँ नही है। 

 _ ➳  अपने सामने मैं अव्यक्त बापदादा को देख रहा हूँ जो स्वागत की मुद्रा में अपनी दोनों बाहों को फैला कर खड़े हुए हैं। बाबा के अति तेजस्वी मुख मण्डल पर फैली दिव्य मुस्कराहट मुझे सहज ही अपनी और आकर्षित कर रही है। *बिना एक क्षण की भी देरी किये मैं दौड़ कर बापदादा के पास जाता हूँ और उनकी बाहों में समा जाता हूँ*। बाबा मुझे अपनी बाहों में भर लेते हैं और अपना असीम स्नेह मुझ पर लुटाने लगते हैं। अपनी सर्वशक्तियों से बाबा मुझे भरपूर कर देते हैं। *परमात्म बल मेरे अंदर भर कर मुझे असीम ऊर्जावान और शक्तिवान बना कर अब बाबा मुझे विश्व की सर्व आत्माओं का कल्याण करने कीजिम्मेवारी दे कर अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रख देते हैं*।

 

 _ ➳  परमात्म बल से भरपूर हो कर और बापदादा से वरदान ले कर मैं फ़रिशता विश्व की सर्व आत्माओं का कल्याण करने हेतु अब विश्व ग्लोब पर आ कर बैठ जाता हूँ और बापदादा का आह्वान करता हूँ। *बापदादा के साथ कम्बाइंड हो कर, बाबा से आ रही सर्वशक्तियों को स्वयं में भर कर इन शक्तियों को अब मैं विश्व ग्लोब पर बैठ पूरे विश्व मे फैला रहा हूँ*। विकारो की अग्नि में जलने के कारण दुखी और अशांत हो चुकी आत्माओं पर ये शक्तियाँ शीतल फुहारों के रूप में बरस रही हैं और उन्हें गहन शीतलता का अनुभव करवा रही है। शीतलता की अनुभूति करवाने के साथ - साथ अब मैं फ़रिशता उन आत्माओं को परमात्म परिचय दे कर उन्हें सदा के लिए दुःखो से छूटने का उपाय बता रहा हूँ। 

 

 _ ➳  परमात्मा का परिचय पाकर और परमात्म प्यार का अनुभव करके सभी आत्मायें प्रसन्न हो रही हैं। उनके चेहरों की मुस्कराहट वापिस लौट आई है। हर आत्मा का चेहरा रूहानियत से चमकने लगा है।  ईश्वरीय ज्ञान के महत्व को सर्व आत्मायें स्वीकार कर रही है। *परमात्म परिचय दे कर सर्व आत्माओं का कल्याण कर, अब मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ वापिस साकारी दुनिया मे लौट आती हूँ और अपने साकारी तन में विराजमान हो कर अपने ब्राह्मण स्वरुप में स्थित हो जाती हूँ*। सर्व आत्माओं के प्रति कल्याणकारी वृति रखते हुए, मास्टर विश्व कल्याणकारी बन अब मैं सबको बाप का परिचय दे कर उनका कल्याण हर समय करती रहती हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं एक बाप के लव में लवलीन रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा चढ़ती कला का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सफ़लतामूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं योगी तू आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव अंतर्मुखी हूँ  ।*

   *मैं आत्मा लाइट माइट रूप में सदा स्थित रहती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *बापदादा ने देखा कि सेवा वा कर्म और स्व-पुरूषार्थ अर्थात् योगयुक्त तो दोनों का बैलेन्स रखने के लिए  विशेष एक ही शब्द याद रखो - वह कौनसाबाप 'करावनहारहै और मैं आत्मा, (मैं फलानी नहीं) आत्मा 'करनहारहूँ।* तो करन-'करावनहार', यह एक शब्द आपका बैलेन्स बहुत सहज बनायेगा। स्व-पुरूषार्थ का बैलेन्स या गति कभी भी कम होती हैउसका कारण क्या? 'करनहारके बजाए मैं ही करने वाली या वाला हूँ, 'करनहारके बजाए अपने को 'करावनहारसमझ लेते हो। मैं कर रहा हूँजो भी जिस प्रकार की भी माया आती हैउसका गेट कौन सा है?  *माया का सबसे अच्छा सहज गेट जानते तो हो ही - 'मैं'।* तो यह गेट अभी पूरा बन्द नहीं किया है। ऐसा बन्द करते हो जो माया सहज ही खोल लेती है और आ जाती है। अगर 'करनहारहूँ तो कराने वाला अवश्य याद आयेगा। कर रही हूँकर रहा हूँलेकिन कराने वाला बाप है *बिना 'करावनहार' के 'करनहारबन नहीं सकते हैं।* डबल रूप से 'करावनहारकी स्मृति चाहिए। *एक तो बाप 'करावनहारहै और दूसरा मैं आत्मा भी इन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराने वाली हूँ।* इससे क्या होगा कि *कर्म करते भी कर्म के अच्छे या बुरे प्रभाव में नहीं आयेंगे। इसको कहते हैं - कर्मातीत अवस्था।*

 

 _ ➳  *सेवा के अति में नहीं जाओ। बस मेरे को ही करनी हैमैं ही कर सकती हूँ, नहीं। कराने वाला करा रहा हैमैं निमित्त 'करनहारहूँ।* तो जिम्मेवारी होते भी थकावट कम होगी। कई बच्चे कहते हैं - *बहुत सेवा की है ना तो थक गये हैंमाथा भारी हो गया है। तो माथा भारी नहीं होगा। और ही 'करावनहार' बाप बहुत अच्छा मसाज करेगा।* और माथा और ही फ्रेश हो जायेगा। थकावट नहीं होगीएनर्जी एकस्ट्रा आयेगी। जब साइन्स की दवाइयों से शरीर में एनर्जी आ सकथी हैतो क्या बाप की याद से आत्मा में एनर्जी नहीं आ सकती? और आत्मा में एनर्जी आई तो शरीर में प्रभाव आटोमेटिकली पड़ता है। अनुभवी भी होकभी-कभी तो अनुभव होता है। फिर चलते-चलते लाइन बदली हो जाती है और पता नहीं पड़ता है। जब कोई उदासी, थकावट या माथा भारी होता है ना फिर होश आता है, क्या हुआ? क्यों हुआलेकिन *सिर्फ एक शब्द 'करनहार' और 'करावनहार' याद करो।*

 

✺   *ड्रिल :-  "'करावनहार' की स्मृति से सेवा या कर्म करते सहज योगयुक्त रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मस्तक मणि मैं आत्मा... इस शरीर में विराजमान हूँ... एक दिव्य ज्योति पुंज समान मैं आत्मा... बैठी हूँ एक परमपिता परमात्मा की याद में... *मन बुद्धि रूपी मन के द्वार को एक शिवबाबा की ओर ही खोलती मैं आत्मा...* आह्वान करती हूँ... मेरे पिता परमेश्वर का... प्यार भरा आह्वान सुनकर मेरे पिता परमेश्वर अपने ब्रह्मा रथ में विराजमान  होकर पहुँच जाते हैं मेरे मन के पास... *मन के द्वार पर खड़ी मैं आत्मा... बापदादा का फूलों से स्वागत करती हूँ...* उनका हाथ पकड़कर मैं आत्मा उनको रत्नजड़ित सिंहासन पर बिठाती हूँ...  *बापदादा को प्यार से भोग की थाली अर्पण कर मैं आत्मा भावपूर्ण हो जाती हूँ...*

 

 _ ➳  *अपने हाथों से बापदादा मुझे भी भोग ख़िला रहे हैं...* और मैं आत्मा गदगद हो जाती हूँ... बापदादा से आती हुई वर्षा रूपी किरणों को अपने में धारण करती जा रही हूँ... जन्मों के विकारों को पिता को समर्पित कर मैं आत्मा हलकी फूल बनती जा रही हूँ... *संगमयुगी ब्राह्मण के कड़े विकार "मैं" और "मेरेपन" को संपूर्ण रूप से बापदादा को दान में दे रही हूँ....* और मंद मंद बापदादा मुस्कुरा रहे हैं... "मैं" और "मेरेपन" के सूक्ष्म संकल्पों को भी पूर्णतः त्याग करती मैं आत्मा... बापदादा की दिलतख्तनशीन बन जाती हूँ... *"करावनहार" सिर्फ एक बाप है और मैं आत्मा "करनहार" हूँ... इस स्मृति में झूमती मैं आत्मा...*

 

 _ ➳  अपने कलियुगी संस्कारों को एक बाप पर बलि चढ़ाती जा रही हूँ... और मैं आत्मा "करनहार" की स्मृति में अपना अलौकिक पार्ट बजा रही हूँ... *हर घड़ी हर पल "करावनहार" सिर्फ एक बाप की ही स्मृति से छलकती मैं आत्मा... सेवा या कर्म करते सहज योगयुक्त रहने का अनुभव कर रही हूँ...* अब तो हर पल... बापदादा को साथ साथ महसूस कर रही हूँ... मेरे को तेरे में बदलती... मेरेपन को तेरेपन में समर्पित करती मैं आत्मा... *बापदादा से... सेवा में... योग में... सफलतामूर्त का वरदानी तिलक लगवा रही हूँ...* बापदादा के हाथों से डबल ताज धारण करती हूँ... फूलों की माला से बापदादा द्वारा साज श्रृंगार होता देख रही हूँ...

 

 _ ➳  *कर्मातीत अवस्था की अधिकारी मैं आत्मा... कर्म के अच्छे या बुरे प्रभाव में नहीं उलझती हूँ...* जो पिता ने बोला वह किया... पिता ने जो करवाया वह मैं आत्मा अपने कर्मेन्द्रियों द्वारा करवा रही हूँ... हर कार्य को बापदादा को समर्पित करती मैं आत्मा.. *"मेरेपन" के रावण रूपी विकार को अग्निदाह दे... अशोक वाटिका रूपी देहाभिमानी स्थिति से मुझ सीता रूपी आत्मा से... एक रामरूपी शिवबाबा को प्रत्यक्ष करती रहती हूँ...* माया रूपी गेट को "करावनहार" रूपी चाबी से संपूर्ण लॉक करती मैं आत्मा... योग और सेवा को मेरेपन के विकारों से सुरक्षित रखती हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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