━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 05 / 12 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *दधिची ऋषि मिसाल सेवा करते विकारों पर विजय प्राप्त करने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *"एक बाप के सिवाए और कोई याद न आये" - ऐसा अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *बुधी को डायरेक्शन प्रमाण श्रेष्ठ स्थिति में स्थित किया ?*

 

➢➢ *"एक बल, एक भरोसे" के आधार पर किसी भी परिस्थिति को सहज पार किया ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  *किसी कमजोर आत्मा की कमजोरी को न देखो। यह स्मृति में रहे कि वैराइटी आत्मायें हैं। सबके प्रति आत्मिक दृष्टि रहे।* आत्मा के रुप में उनको स्मृति में लाने से पावर दे सकोगे। आत्मा बोल रही है, आत्मा के यह संस्कार हैं, *यह पार्ट पक्का करो तो सबके प्रति स्वत: शुभ भावना रहेगी।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✺  *"मैं बापदादा की छत्रछाया के अन्दर रहने वाली विशेष आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को सदा बाप की याद की छत्रछाया के अन्दर अनुभव करते हो? जितना-जितना याद में रहेंगे उतना अनुभव करेंगे कि मैं अकेली नहीं लेकिन बाप-दादा सदा साथ है। *कोई भी समस्या सामने आयेगी तो अपने को कम्बाइन्ड अनुभव करेंगे, इसलिए घबरायेंगे नहीं।* कम्बाइन्ड रूप की स्मृति से कोई भी मुश्किल कार्य सहज हो जायेगा। 

 

✧  कभी भी कोई ऐसी बात सामने आवे तो बाप-दादा की स्मृति रखते अपना बोझ बाप के ऊपर रख दो तो हल्के हो जायेंगे। क्योंकि बाप बड़ा है और आप छोटे बच्चे हो। बड़ों पर ही बोझ रखते हैं। *बोझ बाप पर रख दिया तो सदा अपने को खुश अनुभव करेंगे।* फरिश्ते के समान नाचते रहेंगे। दिन रात 24 ही घंटे मन से डाँस करते रहेंगे।

 

✧  देह अभिमान में आना अर्थात् मानव बनना। *देही अभिमानी बनना अर्थात् फरिश्ता बनना। सदैव सवेरे उठते ही अपने फरिश्ते स्वरूप की स्मृति में रहो और खुशी में नाचते रहो तो कोई भी बात सामने आयेगी उसे खुशी-खुशी से क्रास कर लेंगे।* जैसे दिखाते हैं - देवियों ने असुरों पर डाँस किया। तो फरिश्ते स्वरूप की स्थिति में रहने से आसुरी बातों पर खुशी की डाँस करते रहेंगे। फरिश्ते बन फरिश्तों की दुनिया में चले जायेंगे। फरिश्तों की दुनिया सदा स्मृति में रहेगी।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  आप सबका लक्ष्य क्या है? कर्मातीत बनना है ना! या थोडा-थोडा कर्मबन्धन रहा तो कोई हर्जा नहीं? रहना चाहिए या नहीं रहना चाहिए? कर्मातीत बनना है? *बाप से प्यार की निशानी है - कर्मातीत बनना।* तो करावनहार' होकर कर्म करो, कराओ, कर्मेन्द्रियाँ आपसे नहीं करावें लेकिन आप कर्मेन्द्रियों से कराओ।

 

✧  बिल्कुल अपने को न्यारा समझ कर्म कराना - यह कान्सेसनेस इमर्ज रूप में हो। मर्ज रूप में नहीं। मर्ज रूप में कभी करावनहार' के बजाए कर्मेन्द्रियों के अर्थात मन के, बुद्धि के, संस्कार के वश हो जाते हैं। कारण? *करावनहार' आत्मा हूँ मालिक हूँ विशेष आत्मा, मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा हूँ यह स्मृति मालिक-पन की स्मृति दिलाती है।*

 

✧  नहीं तो कभी मन आपको चलाता और कभी आप मन को चलाते। इसलिए सदा नेचुरल मनमनाभव की स्थिति नहीं रहती। मैं अलग हूँ बिल्कुल, और सिर्फ अलग नहीं लेकिन मालिक हूँ, *बाप को याद करने से मैं बालक हूँ और मैं आत्मा कराने वाली हूँ तो मालिक हूँ। अभी यह अभ्यास अटेन्शन में कम है।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  अब आपका गोपीपन का पार्ट समाप्त हुआ। महारथी जो आगे बढ़ते जा रहे हैं, उनका इस रीति सर्विस करने का पार्ट भी ऑटोमेटिकली बदली होता जाता है। *पहले आप लोग भाषण आदि करती थीं और कोर्स कराती थीं। अभी चेयरमैन के रूप में थोड़ा बोलती हो, कोर्स आदि आपके जो साथी हैं वह कराते हैं। अभी इस समय कोई को आकषर्ण करना, हिम्मत और हुल्लास में लाना, यह सर्विस रह गई है, तो फ़र्क आ जाता है ना? इससे भी आगे बढ़ कर यह अनुभव होगा जैसे कि आकाशवाणी हो रही है। कहेंगे यह कोई अवतार हैं और यह कोई साधारण शरीरधारी नहीं हैं।* अवतार प्रगट हुए हैं, जैसे कि साक्षात्कार में अनुभव करते-करते देवी प्रगट हुई है। महावाक्य बोले और प्राय: लोप। *अभी की स्टेज व पुरुषार्थ का लक्ष्य यह होना हैं।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

*✺ "ड्रिल :- यह बना-बनाया अनादि ड्रामा है, इसमें हर एक एक्टर की एक्ट फिक्स है"*

 

_ ➳  *मधुबन पाड़व भवन की बगियाँ में झूले पर बैठी मैं आत्मा मीठे रंगीले बाबा की रंगीली यादों में खो जाती हूँ... कि कैसे-कैसे रंगों से उसने मेरे बेरंग जीवन को रंगों से सजा कर खुबसूरत बनाया है... कितना उसने मुझे अपने बेपनाह प्यार से नवाजा है...* किस कदर उसने बेपनाह प्यार मुझ पर लुटाया है... कितना शानदार श्रेष्ठ मुझ आत्मा का भाग्य बनाया है... तभी अचानक रंगीले बाबा झुले पर रूबरू हो ज्ञान के रंग से मुझ आत्मा को रंगने लगते है

 

  *बेहद के महानायक मीठे बाबा ज्ञान की गोली देते हुए मुझ आत्मा से बोले :-* "मीठे लाडले बच्चे मेरे... ड्रामा का यह राज इस संगम पर आकर बाबा ने तुम्हें है समझाया... *इस ड्रामा के एक-एक पन्ने में है कल्याण समाया... इस ड्रामा में हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है यह गुह्य राज तुम बच्चों को है बताया इस राज को अब तुम प्रैक्टिकल जीवन में लाओ और इसका स्वरूप बन जाओ इसे बुद्धि में बिठाओ..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा से मिली इस ज्ञान की गोली को खाते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे ओ लाडले बाबा मेरे इस राज को जान कितना सुकुन मुझ आत्मा ने है पाया... *इस खेल में हर पार्टधारी का पार्ट एक दुसरे से जुदा है वाह बाबा इस राज ने मुझे बड़ा निश्चित बनाया है... इस राज को मुझ आत्मा ने बुद्धि में बिठाया है"*

 

  *ज्ञान की किरणों की रिमझिम बारिश करते हुए मीठे बाबा मुझ आत्मा से कहते है :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे मेरे बेहद बाबा की दृष्टि से तुम भी इस ड्रामा पर नजर फिराओ... *हर एक के अनादि पार्ट को जान अब तुम निश्चित अचल बन जाओ.."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा की हर बात को दिल में समाते हुए कहती हूँ :-* "मीठे ज्ञान सागर बाबा मेरे... *आपकी पनाहों में बैठ मैं आत्मा इस सृष्टि ड्रामा को आपकी नजर से देख रही हूँ...* और हर के अनादि अविनाशी पार्ट को समझ निश्चित अवस्था में टिक गयी हूँ..."

 

  *सर्व शक्तियों को मुझ आत्मा में भरते हुए मीठे बाबा मुझ आत्मा से कहते है :-* "मेरे प्यारे राजदुलारे बच्चे... सबके अविनाशी, अनादि पार्ट को जान... साक्षी हो आगे बढ़ते जाओ... नथिग न्यू के पाठ को प्रैक्टिकल में लाओ... *बनी बनाई बन बन रही है इस राज को जान अब सदा हर्षाओ हर सीन को देख वाह ड्रामा वाह के गीत गाओ..."*

 

_ ➳  *इस बेहद ड्रामा के राज को जान नशे से मैं आत्मा कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे-प्यारे बाबा मेरे... कितना सुंदर और शानदार रूप से आपने इस आनादि खेल के राज को है समझाया... *हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है इस राज को जान साक्षी भाव मुझ आत्मा में आया है... बेहद दृष्टि से देख रही इस ड्रामा को मैं आत्मा इसकी हर सीन में कल्याण समाया है...* आपकी सुंदर सरल समझानी ने मुझे नथिग न्यू का पाठ है पक्का कराया... इस गुह्य राज को जान और मान मुझ आत्मा का है मन हर्षाया..."

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ज्ञान की अच्छी धारणा के लिए पवित्रता के व्रत को अपनाना है*"

 

_ ➳  दिल को सुकून और चित को चैन देने वाली अपने प्यारे पिता की मीठी याद में मैं जैसे ही अपने मन बुद्धि को एकाग्र करती हूँ एक सुखद अनुभूति से भर उठती हूँ और *मन ही मन विचार करती हूँ कि आज दिन तक देह और देह के सम्बन्धियों को याद करके सिवाय दुख के और कुछ भी प्राप्त नही हुआ। स्वार्थ से भरे इन दैहिक सम्बन्धो में सारी दुनिया के मनुष्य मात्र सुख ढूंढने की कोशिश में लगे हुए हैं किंतु सुख इन दैहिक रिश्तों की याद में नही केवल एक प्यारे प्रभु की याद में हैं और इस बात का अनुभव मुझ आत्मा ने कर लिया है*। कितनी सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो मेरे प्यारे प्रभु ने स्वयं आकर याद की इस सच्ची रूहानी यात्रा पर मुझे चलना सिखाया और ऐसे अतीन्द्रीय सुख का अनुभव करवाया जो देवतायों के भाग्य में भी नही।

 

_ ➳  मन ही मन अपने प्यारे पिता का धन्यवाद करके, अपार सुख का अनुभव करने के लिए अपने मन बुद्धि को मैं *देह और देह की दुनिया के हर संकल्प, विकल्प से मुक्त करके, और सब संग तोड़, प्रीत की रीत अपने उस एक प्यारे पिता के साथ जोड़ उनकी मीठी याद में बैठ जाती हूँ और सेकेण्ड में उनके स्नेह की मीठी फुहारों को अपने ऊपर पड़ते हुए स्पष्ट अनुभव करते एक विशेष सुखद अनुभूति में खो जाती हूँ*। ऐसा लग रहा है जैसे मीठी - मीठी सुखद फ़ुहारों के रूप में सुख का झरना मेरे ऊपर बह रहा है और निरन्तर मेरे ऊपर बरसता हुआ मुझे अपार सुख दे रहा है। *एक ऐसे अवर्णनीय सुखमय संसार में मैं विचरण कर रही हूँ जहाँ देह और देह के दुख देने वाले सम्बन्ध नही, केवल एक निराकार के साथ जुड़ा ऐसा अटूट सम्बन्ध है जो सर्व सम्बन्धो का अविनाशी सुख प्रदान कर रहा है*।

 

_ ➳  ऐसे सुखमय संसार में विचरण करती मैं बिंदु आत्मा अपने सुख के सागर बिंदु पिता से मंगल मिलन मनाने अब देह का आधार छोड़ *अपने पिता के निराकारी वतन की ओर चल पड़ती हूँ जहाँ सुख के सागर की शीतल लहरे निरन्तर प्रवाहित होती है और सुख, शांति की तलाश में भटक रही आत्माओं को अपार सुख से भरपूर कर, उनकी जन्म - जन्म की प्यास बुझा देती हैं*। ऐसे सुख के सागर अपने सुखदाता बाप के पास जाने वाली मन बुद्धि की सुखमय यात्रा पर निरन्तर आगे बढ़ते हुए मैं धीरे - धीरे 5 तत्वों से पार, सूक्ष्म लोक से होती हुई उस दिव्य परमलोक, ब्रह्मलोक में प्रवेश करती हूँ जहाँ मेरे सुखदाता शिव पिता के सुख के गहन वायब्रेशन चारो ओर फैले हुए हैं।

 

_ ➳  सुख, शांति के गहरे अनुभवों का आनन्द लेती हुई मैं आत्मा धीरे - धीरे अपने प्यारे पिता के समीप पहुँच जाती हूँ और जा कर उन्हें टच करती हूँ। *बाबा से आ रही सर्वशक्तियों का तेज करेन्ट सीधा मुझ आत्मा में प्रवाहित होता है और मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारो की कट को भस्म कर, मुझे एकदम हल्का लाइट माइट बना देता है*। हर बोझ से मुक्त इस हल्की सुखदायी स्थिति में गहन अतीन्द्रीय सुख की अनुभूति करते हुए मैं जैसे अपने आप को ही भूल जाती हूँ और बाबा में समाहित बाबा का ही स्वरूप बन जाती हूँ। *सम्पूर्ण प्योर, सर्व गुणों, सर्वशक्तियो से भरपूर अपने इस स्वरूप के साथ अब मैं बाबा से अलग होकर वापिस अपनी साकारी दुनिया की ओर लौट आती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ*।

 

_ ➳  इस संपूर्ण पवित्र और सुखदाई स्वरूप को सदा ऐसे ही बनाये रखने के लिए अपने प्यारे पिता से मैं अपने ब्राह्मण जीवन को सदा पवित्र रखने का वचन देती हूँ और सब सँग तोड़, एक बाप के याद में रहने की अपने आप से दृढ़ प्रतिज्ञा करती हूँ। *अपनी इस प्रतिज्ञा का दृढ़ता से पालन करने के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पवित्रता को अपने जीवन में धारण करने का अब मैं पूरा अटेंशन दे रही हूँ। अपने हर संकल्प, बोल और कर्म को सम्पूर्ण पवित्र और शुद्ध बनाने के लिए, स्वयं को दैहिक भान से मुक्त रखसब सँग तोड़, एक बाप की याद में रहने का पुरुषार्थ करते हुए, अपने लक्ष्य को पाने की दिशा में मैं अब निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ*।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं बुद्धि को डायरेक्शन प्रमाण श्रेष्ठ स्थिति में स्थित करने वाली मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *एक बल, एक भरोसा- इस साधन से किसी भी परिस्थिति को सहज पार करने वाला मैं डबललाइट फरिश्ता हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  देखोबापदादा 'मैजारिटीशब्द कह रहा हैसर्व नहीं कह रहा हैमैजारिटी कह रहा है। तो दूसरी बात क्या देखीक्योंकि कारण को निवारण करेंगे तब नव-निर्माण होगा। तो दूसरा कारण - अलबेलापन भिन्न-भिन्न रूप में देखा। कोई-कोई में बहुत रायल रूप का भी अलबेलापन देखा। *एक शब्द अलबेलेपन का कारण - सब चलता है। क्योंकि साकार में तो हर एक के हर कर्म को कोई देख नहीं सकता हैसाकार ब्रह्मा भी साकार में नहीं देख सके लेकिन अब अव्यक्त रूप में अगर चाहे तो किसी के भी हर कर्म को देख सकते हैं*। जो गाया हुआ है कि परमात्मा की हजार आंखे हैंलाखों आंखें हैं,लाखों कान हैं। वह अभी निराकार और अव्यक्त ब्रह्मा दोनों साथ-साथ देख सकते हैं। कितना भी कोई छिपायेछिपाते भी रायल्टी से हैंसाधारण नहीं। तो *अलबेलापन एक मोटा रूप हैएक महीन रूप हैशब्द दोनों में एक ही है 'सब चलता हैदेख लिया है क्या होता है! कुछ नहीं होता। अभी तो चला लोफिर देखा जायेगा!यह अलबेलेपन के संकल्प हैं*।

 

 _ ➳  बापदादा चाहे तो सभी को सुना भी सकते हैं लेकिन आप लोग कहते हो ना थोड़ी लाज-पत रख दो। तो बापदादा भी लाज पत रख देते हैं लेकिन यह अलबेलापन पुरुषार्थ को तीव्र नहीं बनासकता। पास विद आनर नहीं बना सकता। जैसे स्वयं सोचते हैं ना'सब चलता है'। तो रिजल्ट में भी चल जायेंगे लेकिन उड़ेंगे नहीं। तो सुना क्या दो बातें देखी! परिवर्तन में किसी न किसी रूप सेहर एक में अलग-अलग रूप से अलबेलापन है। तो *बापदादा उस समय मुस्कराते हैंबच्चे कहते हैं देख लेंगे क्या होता है! तो बापदादा भी कहते हैं देख लेना क्या होता है!* तो आज यह क्यों सुना रहे हैं?क्योंकि चाहो या नहीं चाहोजबरदस्ती भी आपको बनाना तो है ही और आपको बनना तो पड़ेगा ही। आज थोड़ा सख्त सुना दिया है क्योंकि आप लोग प्लैन बना रहे होयह करेंगे, यह करेंगे... *लेकिन कारण का निवारण नहीं होगा तो टैम्प्रेरी हो जायेगाफिर कोई बात आयेगी तो कहेंगे बात ही ऐसी थी ना! कारण ही ऐसा था! मेरा हिसाब-किताब ही ऐसा है। इसलिए बनना ही पड़ेगा*। मंजूर है ना! 

 

✺   *ड्रिल :-  "'सब चलता है'- यह अलबेलापन समाप्त करना"*

 

 _ ➳  आलस्य, अलबेलेपन से मुक्त, तीव्र पुरुषार्थ द्वारा सदा चढ़ती कला का अनुभव करने वाली मैं आत्मा अपने शिव पिता परमात्मा की मधुर याद में बैठी, संगमयुग की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों का आनन्द लेते हुए स्वयं पर नाज कर रही हूं... और साथ ही साथ यह भी विचार कर रही हूं कि *कितनी बदनसीब हैं वो आत्मायें जो भगवान को पहचानने के बाद भी आलस्य अलबेलेपन में अपने समय को व्यर्थ गंवा रही हैं... यह सोच कर कि सब चलता है...* यही विचार करते करते मेरी आँखों के सामने एक दृश्य उभर आता है...

 

 _ ➳  मैं देख रही हूँ एक तरफ भविष्य नई दुनिया सतयुग का गेट और दूसरी तरफ़ संगमयुगी ब्राह्मण बच्चों की दुनिया... जहां *बाबा के वैरायटी ब्राह्मण बच्चे बाबा की श्रीमत अनुसार इस सतयुगी दुनिया के गेट का पास प्राप्त कर इस दुनिया मे ऊंच पद पाने का तीव्र पुरुषार्थ कर रहें हैं...* वही दूसरी ओर अनेक ब्राह्मण बच्चे ऐसे भी है जो आलस्य अलबेलेपन में संगमयुग के अनमोल पलो को व्यर्थ गंवा रहें हैं... गफलत कर रहें हैं... बड़े बड़े प्लैन बना रहें हैं कि यह करेंगे, वह करेंगे... लेकिन उस *प्लैन को दृढ़तापूर्वक प्रेक्टिकल में नही ला रहे...* फिर सोचते हैं कि "सब चलता है... अभी बाकी कौन से सम्पूर्ण बने हैं... लास्ट में बन जायेंगें..."

 

 _ ➳  ऐसे तीव्र पुरुषार्थ करने वाले, और आलस्य अलबेलेपन में समय व्यर्थ गवाने वाले वैरायटी ब्राह्मण बच्चो को मैं देख रही हूँ... इस दृश्य को देख कर मैं *मन ही मन स्वयं से प्रोमिस करती हूं कि मुझे आलस्य अलबेलेपन में भविष्य श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने वाले संगमयुग के बहुमूल्य पलो को व्यर्थ नही गंवाना है...* बल्कि अपना हर सेकेंड, हर श्वांस परमात्म याद और सेवा में रह कर सफल कर, अपनी श्रेष्ठ प्रालब्ध बनानी है...

 

 _ ➳  यही संकल्प करके अब मैं अशरीरी स्थिति में स्थित हो कर, अपने प्यारे मीठे शिव बाबा की याद में बैठ जाती हूँ... और *सेकण्ड में अपने सूक्ष्म आकारी शरीर को धारण कर, अव्यक्त फरिश्ता बन पहुंच जाती हूँ सूक्ष्म वतन में, बापदादा के पास...* यहां पहुंच कर एक और विचित्र दृश्य मैं देखती हूँ कि आज बापदादा की एक नही बल्कि हज़ारों आंखे हैं जिनसे वो अपने एक - एक ब्राह्मण बच्चे को देख रहें हैं...

 

 _ ➳  बाबा के मन के भावों को, बाबा की हजारों आंखों में जैसे मैं स्पष्ट पढ़ रही हूं... *जो बच्चे सोचते है कि अभी तो चला लो, कुछ नही होता, आगे देख लेंगे... बच्चो की इस बात को सुनकर, कि देख लेंगे क्या होता है, बापदादा भी जैसे मुस्करा रहें है कि देख लेना क्या होता है और चेतावनी दे रहें हैं कि आप चाहो ना चाहो जबरदस्ती भी आपको बनाना तो है और आपको बनना तो पड़ेगा ही...* इस दृश्य के समाप्त होते ही अब मैं देख रही हूं बाहें पसारे बापदादा का पहले जैसा लाइट माइट स्वरूप जो मुझे सहज ही अपनी ओर खींच रहा है... बाबा की बाहों में अब मैं फरिश्ता समा रहा हूँ... अपनी शक्तिशाली दृष्टि से बाबा मेरे अंदर आलस्य अलबेलेपन से सदा मुक्त रहने का बल भर रहें हैं...

 

 _ ➳  बापदादा से लाइट माइट ले कर, अब मैं अपने फरिश्ता स्वरूप को सूक्ष्म वतन में ही छोड़ कर, अपने निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप को धारण कर पहुंच जाती हूँ परमधाम अपने निराकार शिव पिता परमात्मा के पास उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर कर, स्वयं को शक्तिसम्पन्न बनाने... बिंदु स्वरूप में अब मैं स्वय को देख रही हूं अपने बिंदु बाप के बिल्कुल सामने... *उनसे निकल रही अनन्त शक्तियों की किरणें मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट को उतार कर मुझे शक्तिशाली बना रही हैं...* बाबा से आ रही एक एक किरण मेरे अंदर एक नई स्फूर्ति, एक नई ऊर्जा का संचार कर रही है...

 

 _ ➳  स्फूर्ति और एनर्जी से भरपूर हो कर अब मैं आत्मा अपने साकारी तन में अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूं... *बाबा की लाइट माइट ने मुझे डबल लाइट बना दिया है... मन पर अब किसी भी प्रकार का कोई बोझ नही... आलस्य, अलबेलेपन से मुक्त स्वयं को सदा बलशाली अनुभव करते हुए, उमंग उत्साह से आगे बढ़ते, औरों को भी आगे बढ़ाने का तीव्र पुरुषार्थ कर रही हूं...* दृढ़तापूर्वक हर प्लैन को प्रेक्टीकल में लाने से, कदम कदम पर परमात्म मदद का अनुभव मुझे सहज ही सफ़लतामूर्त बना रहा है... *"कर लेंगे, हो जायेगा" के बजाए "करना ही है" इस पाठ को पक्का कर बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनने के लक्ष्य की ओर अब मैं अपने कदम बढ़ा रही हूं...*

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━