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 06 / 02 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *एक बाप की अव्यभिचारी याद में रह देह भान को ख़तम किया ?*

 

➢➢ *ज्ञानी तू आत्मा बन औरों की सर्विस की ?*

 

➢➢ *मनसा शक्ति के अनुभव द्वारा विशाल कार्य में सदा सहयोगी रहे ?*

 

➢➢ *निर्भयता और नम्रता का गुण धारण किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जब बाप समान बनना है तो *एक है - निराकार और दूसरा है - अव्यक्त फरिश्ता। तो जब भी समय मिलता है सेकण्ड में बाप समान निराकारी स्टेज पर स्थित हो जाओ, फिर कार्य करते फरिश्ता बनकर कर्म करो, फरिश्ता अर्थात् डबल लाइट। कार्य का बोझ नहीं हो। तो बीच-बीच में निराकारी और फरिश्ता स्वरूप की मन की एक्सरसाइज करो तो थकावट नहीं होगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कर्मभोग पर विजय पाने वाले विजयी रत्न हूँ"*

 

  कर्मभोग पर विजय पाने वाले विजयी रत्न हो ना! *वे कर्मभोग भोगने वाले होते और आप कर्मयोगी हो। भोगने वाले नहीं हो लेकिन सदा के लिए भस्म करने वाले हो।* ऐसा भस्म करते हो जो 21 जन्म कर्मभोग का नाम निशान न रहे। आयेगा तब तो भस्म करेंगे?

 

  *आयेगा जरूर लेकिन आता है भस्म होने के लिए, न कि भोगना के लिए। विदाई लेने के लिए आता है।*

 

〰✧  *क्योंकि कर्मभोग को भी पता है कि हम अभी ही आ सकते हैं फिर नहीं आ सकते। इसलिए थोड़ा थोड़ा बीच में चाँस लेता है। जब देखते यहाँ तो दाल गलने वाली नहीं है तो वापस चला जाता।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी का लक्ष्य बाप समान बनने का है। तो *सारे दिन में यह ड़ि्ल करो - मन की ड़ि्ला शरीर की ड्रिल तो शरीर की तन्दरूस्ती के लिए करते हो, करते रहो क्योंकि आजकल दवाईयों से भी एक्सरसाइज आवश्यक है।*

 

✧  वह तो करो और खूब करो टाइम पर। *सेवा के टाइम एक्सरसाइज नहीं करते रहना। बाकी टाइम पर एक्सरसाइज करना अच्छा है।* लेकिन साथ-साथ मन की एक्सरसाइज बार-बार करो।

 

✧  *जब बाप समान बनना है तो एक है - निराकार और दूसरा है - अव्यक्त फरिश्ता तो जब भी समय मिलता है सेकण्ड में बाप समान निराकारी स्टेज पर स्थित हो जाओ, बाप समान बनना है तो निराकारी स्थिति बाप समान है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  ऐसे ही अगर आप सभी भी मस्तक के मणि को ही देखते रहो तो फिर यह दृष्टि और वृत्ति शुद्ध सतोप्रधान बन जायेगी। *दृष्टि जो चंचल होती है उसका मूल कारण यह है। मस्तक के मणि को न देख, शारीरिक रूप को देखते हो।* रूप को न देखो लेकिन मस्तक के मणि को देखी। *जब रूप को दूखते हो तो ऐसे ही समझो कि सांप को देख रहे हैं। सांप के मस्तक में मणि होती है ना। तो मणि को देखना है, न कि सांप को।* अगर शरीर-भान में देखते हो तो मानों सांप को देखते हो। *सांप को देखा और सांप ने काटा। सांप तो अपना कार्य करेगा। सांप में विष भी होता है।* बापदादा के सामने तो बहुत प्रतिज्ञाएं की हैं, लेकिन आज अपने आपसे प्रतिज्ञा करो कि - "अब से लेकर सिवाए मणि के और कुछ नहीं देखेंगे और खुद ही माला के मणि बनकर के सारी सृष्टि के बीच चमकेंगे। *जब खुद मणि बनेंगे तब चमकेगे। अगर मणि नहीं बनेंगे तो चमक नहीं सकेगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- विकारों का दान देना"*

➳ _ ➳ *मैं आत्मा सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठ बाबा का आह्वान करती हूँ... बाहरी सभी बातों से अपने मन को हटाकर एक बाबा में लगाने की कोशिश करती हूँ... धीरे-धीरे सभी कर्मेन्द्रियाँ शांत होती जा रही हैं... भटकता हुआ मन स्थिर होने लगा है... मैं आत्मा अपना बुद्धि योग एक बाबा से कनेक्ट करती हूँ...* इस शरीर को भी भूल एक बाबा की लगन में मगन होने लगती हूँ... बाबा मेरे सम्मुख आकर बैठ जाते हैं... मैं आत्मा गहन शांति की अनुभूति कर रही हूँ... मैं और मेरा बाबा बस और कोई भी नहीं...

❉ *कदम-कदम पर बाप की श्रीमत लेकर कर्म में आने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... मीठे से भाग्य ने जो ईश्वर पिता का साथ दिलवाया है... उस महान भाग्य को सदा का सुखो भरा सौभाग्य बना लो... *हर पल मीठे बाबा की श्रीमत का हाथ पकड़कर सुखी और निश्चिन्त हो जाओ... जिन विकारो ने हर कर्म को विकर्म बनाकर जीवन को गर्त बना डाला... श्रीमत के साये में उनसे हर पल सुरक्षित रहो...*

➳ _ ➳ *प्यारे बाबा को विकारों का दान देकर माया के ग्रहण से मुक्त होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा सच्चे ज्ञान को पाकर कर्मो की गुह्य गति जान गई हूँ... *आपकी श्रीमत पर चलकर जीवन पुण्य कर्मो से सजा रही हूँ... आपके मीठे साथ ने जीवन को फूलो सा महका दिया है... सुकर्मो से दामन सजता जा रहा है...*

❉ *हर कदम में मेरा साथ देकर मेरे भाग्य को श्रेष्ठ बनाते हुए खुदा दोस्त बन मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... श्रीमत ही वह सच्चा आधार है जो जीवन को खुशियो का पर्याय बनाता है... *स्वयं भगवान साथी बन हर कर्म में सलाह और साथ दे रहा है... तो इस महाभाग्य से रोम रोम सजा लो... सच्चे साथी की श्रीमत पर चलकर सुखदायी जीवन का भाग्य अपने नाम करालो...*

➳ _ ➳ *सदा श्रेष्ठ संकल्प और कर्मों से अपने जीवन को सदा के लिए खुशहाल बनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा मनुष्य मत के पीछे लटककर कितनी दुखी हो गई थी... अब आपकी छत्रछाया में कितनी सुखी कितनी बेफिक्र जिंदगी को पा रही हूँ... आपका साथ पाकर मै आत्मा सतयुगी सुखो की मालकिन बनती जा रही हूँ...* मेरे जीवन की बागडोर को थाम आपने मुझे सच्चा सहारा दिया है...

❉ *अपने मीठे वरदानों की बारिश कर मुझे अपने दिल तख़्त पर बिठाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... यह वरदानी संगम सुकर्मो से दामन सजाने वाला खुबसूरत समय है कि मीठा बाबा बच्चों के सम्मुख है... *इसलिए हर कर्म को श्रीमत प्रमाण कर बाबा का दिल सदा का जीत लो... जब बाबा साथ है तो जीवन के पथ पर अकेले न चलो... सच्चे साथ का हाथ पकड़कर अनन्त खुशियो में उड़ जाओ...*

➳ _ ➳ *ईश्वरीय प्रेम के साये में श्रेष्ठ कर्मों से व्यर्थ से मुक्त होकर समर्थ बनकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में कितनी खुशनुमा हो गई हूँ... *हर कदम पर श्रीमत के साथ अपने जीवन में खुशियो के फूल खिला रही हूँ... ईश्वर पिता के सच्चे साथ को पाकर, मै आत्मा हर कर्म को सुकर्म बनाती जा रही हूँ... और बेफिक्र बादशाह बनकर मुस्करा रही हूँ...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  एक बाप की अव्यभिचारी याद में रह देह - भान को खत्म करना है*"
 
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मनमनाभव के महामन्त्र को स्मृति में रखते हुए, देह और देह के सर्व सम्बन्धों से किनारा कर, एक परमात्मा की अव्यभिचारी याद में मैं आत्मा अपने मन बुद्धि को एकाग्र करती हूँ। उस एक *अपने परम प्रिय प्रभु की अव्यभिचारी याद में बैठते ही इस देह रूपी पिंजड़े में कैद मैं आत्मा रूपी पँछी इस देह के पिंजड़े के हर बंधन को तोड़ उड़ चलती हूँ अपने उस परमप्रिय प्रभु, अपने स्वामी, शिव पिता परमात्मा के पास जिनके साथ मेरा जन्म - जन्म का अनादि सम्बन्ध है*। अपने सच्चे शिव प्रीतम की याद मुझे उनसे मिलने के लिए बेचैन कर रही है इसलिए ज्ञान और योग के पंख लगाए मैं आत्मा पँछी और भी तीव्र उड़ान भरते हुए पहुंच जाती हूँ अपने प्रभु के धाम, शांति धाम, निर्वाणधाम में।
 
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अपने शिव प्रभु को अपने सामने पा कर बिना कोई विलम्ब किये मैं पहुंच जाती हूँ उनके पास और उनकी किरणों रूपी बाहों में समा जाती हूँ। *जन्म जन्मान्तर से अपने शिव पिता परमेश्वर से बिछुड़ी मैं आत्मा अपने शिव प्रभु की किरणों रूपी बाहों में अतीन्द्रिय सुख की गहन अनुभूति में मैं इतना खो जाती हूँ कि देह और देह की दुनिया संकल्प मात्र भी याद नही रहती*। केवल मैं और मेरे प्रभु, दूसरा कोई नही। प्रेम के सागर अपने परम प्रिय मीठे बाबा के अति प्यारे, अति सुन्दर, चित को चैन देने वाले अनुपम स्वरूप को निहारते - निहारते मैं डूब जाती हूँ उनके प्रेम की गहराई में और उनके सच्चे निस्वार्थ रूहानी प्रेम से स्वयं को भरपूर करने लगती हूँ।
 
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मेरे शिव प्रीतम का प्यार उनकी सर्वशक्तियों की किरणों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरस रहा है। *उनसे आ रही सर्वशक्तियों रूपी किरणों की मीठी फुहारें मन को रोमांचित कर रही हैं, तृप्त कर रही हैं और साथ ही साथ रावण की जेल में कैद होने के कारण निर्बल हो चुकी मुझ आत्मा को बलशाली बना रही हैं*। अपने शिव प्रभु की सर्व शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके, उनके प्यार को अपनी छत्रछाया बना कर अब मैं वापिस देह और देह की दुनिया की में लौट रही हूं। किन्तु *अब मेरे शिव प्रभु का प्यार मेरे लिए ढाल बन चुका है* जो मुझे इस आसुरी दुनिया मे रहते हुए भी आसुरी सम्बन्धों के लगाव से मुक्त कर रहा है।
 
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देह और देह की दुनिया मे रहते हुए भी अब इस दुनिया से मेरा कोई ममत्व नही रहा। यह तन - मन - धन मेरा नही, मेरे बाबा का है, यह सम्बन्धी भी मेरे नही, बाबा ने मुझे इनकी सेवा अर्थ निमित बनाया हैं। *इस स्मृति में रहने से मैं और मेरे से अटैचमेन्ट समाप्त हो गई है। प्रवृति को ट्रस्टी बन कर सम्भालने से अब मैं स्वयं को हर बन्धन से मुक्त, न्यारा और प्यारा अनुभव कर रही हूं*। परमात्म प्रीत से मेरे सभी लौकिक सम्बन्ध भी अलौकिक बन गए हैं इसलिए देह और दैहिक सम्बन्धो में होने वाला लगाव, झुकाव और टकराव अब समाप्त हो गया है।
 
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साक्षी भाव से हर आत्मा के पार्ट को अब मैं साक्षी हो कर देख रही हूं और हर कर्म साक्षी पन की सीट पर सेट हो कर करने से सदा बाप के साथीपन का अनुभव कर रही हूं। *देह और देह के सम्बन्धो के प्रति साक्षीभाव मुझे इस पुरानी दुनिया से स्वत: ही उपराम बना रहा है*। दैहिक दृष्टि और वृति परिवर्तित हो कर रूहानी बन गई है। इसलिए अब सदैव यही अनुभव होता है कि मैं इस देह में मेहमान हूँ। *मैं रूह हूँ और मुझ रूह का करन करावनहार सुप्रीम रूह है। वह चला रहे हैं, मैं चल रही हूं। सदा मैं रूह और सुप्रीम रूह कम्बाइंड हैं*। निरन्तर इस स्मृति में रहने से किसी भी देहधारी के नाम रूप की अब मुझे याद नही आती। केवल अपने शिव प्रभु की अव्यभिचारी याद में रह, मैं उनके ही प्रेम का रसपान करते हुए सदा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलती रहती हूं।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं मनसा शक्त्ति की अनुभवी आत्मा हूँ।*
✺   *मैं विशाल कार्य में सदा सहयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ *मैं आत्मा निर्भयता और नम्रता का स्वरुप हूँ ।*
✺ *मैं योगी व ज्ञानी आत्मा हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा शिव शक्ति हूँ ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  जब राजयोगी हैं तो राज्य अधिकारी बनना ही है। बापदादा कई बार याद दिलाते हैं कि *बाप आपके लिए सौगात लाये हैं* तो सौगात क्या लाये हैं? *सुनहरी दुनिया, सतोप्रधान दुनिया की सौगात लाये हैं।* तो निश्चय है, *निश्चय कि निशानी है रूहानी नशा। जितना अपने राज्य के समीप आ रहे हो, घर के भी समीप आ रहे हो और अपने राज्य के भी समीप आ रहे हो, तो बार-बार अपने स्वीट होम और अपने स्वीट राज्य की स्मृति स्पष्ट आनी ही चाहिए।* यह समीप आने की निशानी है। *अपना घर, अपना राज्य ऐसा ही स्पष्ट स्मृति में आये, तीसरे नेत्र द्वारा स्पष्ट दिखाई दे।* अनुभव हो आज यह, कल यह। *कितने बार पार्ट पूरा कर अपने घर और राज्य में गये हो,* याद आता है ना! और *अब फिर से जाना है।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अपने स्वीट होम और अपने स्वीट राज्य की स्मृति का स्पष्ट अनुभव"*

 

 _ ➳  मै आत्मा आज बाबा को याद करने बैठीं तो अपने *स्वीट होम और स्वीट राजधानी की कशिश हो रही हैं... मैं आत्मा अभी संगम युग में स्वराज अधिकारी आत्मा हूँ... राजयोगी आत्मा हूँ...* इस संगम युग में स्वंय भगवान ने मुझे राजयोगी बनाया हैं... *अभी मै आत्मा स्वराज अधिकारी हूँ और भविष्य में राज्य अधिकारी बनूँगी...* मै आत्मा राज योगी सो राज्य अधिकारी आत्मा हूँ... स्वयं भगवान मुझ आत्मा को याद करते हैं... *मैं आत्मा कितनी सौभाग्यशाली हूं... कि परमात्मा मेरे लिए स्वर्ग की सौगात लाये हैं... वाह वह सुनहरी दुनियाँ मेरी हैं... जहां सभी आत्माये संपूर्ण पवित्र हैं...* 16 कला संपूर्ण हैं... उस सुख की दुनिया में सुख ही सुख हैं... *बाबा मुझ आत्मा को उस सुख की दुनियाँ में जाने के लिए लायक बना रहे हैं...*

 

 _ ➳  *मुझ आत्मा को यह निश्चय हैं कि इस संगम के बाद वह सुख की दुनियाँ आई कि आई... मै आत्मा इसी रूहानी नशे में हूँ कि मै अपने राजधानी में जाती हूँ... ये रूहानी नशा मुझ आत्मा को निश्चिंत बना रहा हैं...* मै आत्मा एकदम निश्चिंत बन चुकी हूँ... *मै आत्मा अपने स्वीट होम परमधाम की निवासी हूँ...* मै आत्मा इस सृष्टि में पार्ट बजाने के लिए आई हूँ... *मेरा स्वीट होम बहुत ही प्यारा हैं... वहाँ अपार शांति ही शांति है...* वहाँ मै आत्मा अपने पिता परमात्मा के साथ हूँ... *मै आत्मा संपूर्ण पवित्र हूँ... परमधाम में मै आत्मा अपार शांति का अनुभव कर रही हूँ...* वह मेरा स्वीट होम हैं...

 

 _ ➳  *अपने स्वीट होम से मै आत्मा अपने स्वीट राजधानी में आती हूँ...* वह सुख की दुनिया *जहाँ सभी आत्माये अपने पवित्र स्वरुप में हैं...* वहा किसी भी प्रकार के दुःख का नामोनिशान नहीं हैं... वहाँ सुख शांति की बहार हैं... *वहाँ संपूर्ण सुख हैं... परमात्मा ने मुझ आत्मा को स्वर्ग में जाने के लिए चुना हैं...* वाह मेरा भाग्य... जो मुझे सुख की दुनिया में जाना है... *अब मै आत्मा अपने स्वीट राज्य को एकदम समीप से अनुभव कर रही हूँ...* वाह कितना सुंदर समय हैं... *जहाँ प्रकृति भी अपने संपूर्ण स्वरुप में हैं...* वाह जहा सभी मौसम बसंत हैं... कितना सुंदर अनुभव हैं... *वाह कितना सुंदर रूहानी नशा हैं जो इस दुनियाँ के सारे सुखों से भी उपर हैं...*

 

 _ ➳  यह परमानंद और परमात्म्य अनुभति मुझे हो रही हैं... *मुझ आत्मा को अपना स्वीट होम और स्वीट राजधानी एकदम साफ़ समीप दिखाई दे रहा हैं... वहाँ स्वीट साइलेंस हैं... और चारों ओर सुनहरा प्रकाश फैला हुआ हैं...* वैसी ही सुनहरी दुनिया स्वयं भगवान् मुझ आत्मा के लिए बना रहे है... *मुझ आत्मा को स्पष्ट अनुभव हो रहा है कि मै अपने स्वीट राज्य में हूँ...* वहाँ के सुखों का आनंद ले रही हूँ... यह स्पष्ट स्मृति मुझ आत्मा को हैं... कि मुझे वहाँ जाना हैं... *ज्ञान का तीसरा नेत्र जो बाबा ने मुझ आत्मा को दिया हैं... उससे मै आत्मा स्पष्ट अपने राज्य को देख रही हूँ...* वाह मेरा भाग्य...

 

 _ ➳  *जो परमात्म्य प्यार मुझ आत्मा को मिला हैं... उसे मै शब्दों में बयान नहीं कर सकती... मै आत्मा ना जाने कितने बार यह पार्ट पूरा कर चुकी हूँ...* मै आत्मा स्वदर्शन चक्रधारी हूँ... *मेरे पिता परमात्मा प्यार के सागर है... वह सर्व शक्तिमान है...* अब इस कल्प में भी मै आत्मा अपना पार्ट पूरा कर अपने स्वीट होम से अपने स्वीट राजधानी में जा रही  हूँ... *यह सब मुझ आत्मा की स्मृति में इमर्ज हुआ हैं... कि अब फिर से मुझ आत्मा को आदि से अंत तक का पार्ट बजाना हैं...* मुझे सुख की दुनिया में जाना है... मै बहुत बहुत भाग्यशाली आत्मा हूँ... *जो परमात्म प्यार की अधिकारी बनी... और भविष्य राज्य अधिकारी बनूँगी... शुक्रिया बाबा, आपका बहुत बहुत शुक्रिया...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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