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 06 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बाप समान बनने की हिम्मत रखी ?*

 

➢➢ *किसी भी बता में डरे तो नहीं ?*

 

➢➢ *सदा रहम और कलयाण की दृष्टि से विश्व की सेवा की ?*

 

➢➢ *मान, सहना को त्याग कर अपने समय को बेहद सेवा में सफल किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जब बाप समान बनना है तो *एक है - निराकार और दूसरा है - अव्यक्त फरिश्ता। तो जब भी समय मिलता है सेकण्ड में बाप समान निराकारी स्टेज पर स्थित हो जाओ, फिर कार्य करते फरिश्ता बनकर कर्म करो, फरिश्ता अर्थात् डबल लाइट। कार्य का बोझ नहीं हो। तो बीच-बीच में निराकारी और फरिश्ता स्वरूप की मन की एक्सरसाइज करो तो थकावट नहीं होगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कर्मभोग पर विजय पाने वाले विजयी रत्न हूँ"*

 

  कर्मभोग पर विजय पाने वाले विजयी रत्न हो ना! *वे कर्मभोग भोगने वाले होते और आप कर्मयोगी हो। भोगने वाले नहीं हो लेकिन सदा के लिए भस्म करने वाले हो।* ऐसा भस्म करते हो जो 21 जन्म कर्मभोग का नाम निशान न रहे। आयेगा तब तो भस्म करेंगे?

 

  *आयेगा जरूर लेकिन आता है भस्म होने के लिए, न कि भोगना के लिए। विदाई लेने के लिए आता है।*

 

〰✧  *क्योंकि कर्मभोग को भी पता है कि हम अभी ही आ सकते हैं फिर नहीं आ सकते। इसलिए थोड़ा थोड़ा बीच में चाँस लेता है। जब देखते यहाँ तो दाल गलने वाली नहीं है तो वापस चला जाता।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी का लक्ष्य बाप समान बनने का है। तो *सारे दिन में यह ड़ि्ल करो - मन की ड़ि्ला शरीर की ड्रिल तो शरीर की तन्दरूस्ती के लिए करते हो, करते रहो क्योंकि आजकल दवाईयों से भी एक्सरसाइज आवश्यक है।*

 

✧  वह तो करो और खूब करो टाइम पर। *सेवा के टाइम एक्सरसाइज नहीं करते रहना। बाकी टाइम पर एक्सरसाइज करना अच्छा है।* लेकिन साथ-साथ मन की एक्सरसाइज बार-बार करो।

 

✧  *जब बाप समान बनना है तो एक है - निराकार और दूसरा है - अव्यक्त फरिश्ता तो जब भी समय मिलता है सेकण्ड में बाप समान निराकारी स्टेज पर स्थित हो जाओ, बाप समान बनना है तो निराकारी स्थिति बाप समान है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  ऐसे ही अगर आप सभी भी मस्तक के मणि को ही देखते रहो तो फिर यह दृष्टि और वृत्ति शुद्ध सतोप्रधान बन जायेगी। *दृष्टि जो चंचल होती है उसका मूल कारण यह है। मस्तक के मणि को न देख, शारीरिक रूप को देखते हो।* रूप को न देखो लेकिन मस्तक के मणि को देखी। *जब रूप को दूखते हो तो ऐसे ही समझो कि सांप को देख रहे हैं। सांप के मस्तक में मणि होती है ना। तो मणि को देखना है, न कि सांप को।* अगर शरीर-भान में देखते हो तो मानों सांप को देखते हो। *सांप को देखा और सांप ने काटा। सांप तो अपना कार्य करेगा। सांप में विष भी होता है।* बापदादा के सामने तो बहुत प्रतिज्ञाएं की हैं, लेकिन आज अपने आपसे प्रतिज्ञा करो कि - "अब से लेकर सिवाए मणि के और कुछ नहीं देखेंगे और खुद ही माला के मणि बनकर के सारी सृष्टि के बीच चमकेंगे। *जब खुद मणि बनेंगे तब चमकेगे। अगर मणि नहीं बनेंगे तो चमक नहीं सकेगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पवित्र जरुर बनना"*

 

_ ➳  आंख खुलते ही बापदादा को अपने आंखों के सामने देख रही हूँ... *बापदादा के नैनों से असीम प्यार छलक रहा है... मेरा दिल परमात्म प्यार को पाकर... परमात्मा प्राप्तियों का सिमरन करते करते गदगद हो गया है... प्रभु के स्नेह में नैनों से अश्रु धारा बह रही है...* बाबा ने मुझे अपना कर मुझे क्या से क्या बना दिया है... कहाँ दर-दर की ठोकरें खाते भटक रहे थे, कहाँ प्रभु ने अपने दिलतख्त पर बिठा लिया... *मैं आत्मा सजल नैनो से मीठे बाबा को एकटक निहार रही हूँ...*

 

  *स्नेह सागर में मुझ आत्मा को भिगोते हुए स्नेह सागर बाबा कहते हैं:-* "मेरे प्यारे बच्चे... बाबा इस पतित दुनिया में तुम बच्चों के लिए ही आए हैं... तुम्हें पावन बनाने के लिए... *पतित दुनिया में कोई भी जीव आत्मा पवित्र नहीं है... पवित्र न होने के कारण अपने को महात्मा भी कहलवा नहीं सकती... प्यारे बच्चे, तुम्हें अभी पवित्र जीवात्मा बनना है..."*

 

_ ➳  *रत्नागर बाबा से मिले एक एक ज्ञान रत्न को स्वयं में धारण करती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे मीठे बाबा... हमारी जन्म जन्म की पुकार सुनकर आप हमें भक्ति के दलदल से निकालने आ गए हो... *मेरा मन आपके उपकारों का सिमरन करते करते रोमांचित हो उठा है... बाबा मैं आत्मा आपकी बताई गई युक्तियों और श्रीमत पर चलकर संपूर्ण पावन बन रही हूँ... पवित्रता की स्वयं में धारणा कर रही हूँ..."*

 

  *ज्ञान के गुह्य राज समझाते हुए सतगुरु बाबा कहते हैं:-* "मेरे लाडले सपूत बच्चे... पतित दुनिया में सभी जीवात्माओं को पावन बनाने के लिए एक बाप ही आते हैं... *परमपिता परमात्मा एक ही है... उनको जीव नहीं कहा जा सकता... क्योंकि उनका स्थूल सूक्ष्म शरीर नहीं है... वह परमात्मा ही एवर प्योर है... सुप्रीम प्योर है...* वही आकर सबको पावन बनाते हैं... अब तुम्हें परमपिता परमात्मा की मत पर ही चलना है..."

 

_ ➳  *ज्ञान के मीठे बोल सुनकर गदगद होती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्यारे बाबा... ज्ञान के गुह्य राज मेरी बुद्धि में स्पष्ट होते जा रहे हैं... आपके बताए हुए ज्ञान को मैं आत्मा गहराई से समझ रही हूँ... *अब मैं आत्मा पूरी तरह से एक आपकी ही श्रीमत पर चल रही हूँ... आपके बताए हुए मार्ग को, शिक्षाओं को ही फॉलो कर रही हूँ..."*

 

  *मीठी मीठी समझानी देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे नैनों के नूर बच्चे... *सतयुग में पवित्र जीव आत्माएं ही होती हैं... वहां तो पावन बनाने की बात ही नहीं होती... वहां शरीर भी पावन तो आत्माएं भी पावन होती हैं... वहां जब तुम देवी देवता थे, तो संपूर्ण पावन थे...* तुम्हें इतना पावन बनाने वाले एक बाबा ही है... इसलिए उनकी मत पर चलकर संपूर्ण पवित्र जीवात्मा बनो..."

 

_ ➳  *बाबा द्वारा दी गई शिक्षाओं का स्वरूप बनती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणेश्वर मीठे बाबा... आप हमारे लिए संपूर्ण पावन सतयुगी दुनिया की स्थापना कर रहे हो... उस दुनिया में ले जाने के लिए, हमें पावन बनाने के लिए कितनी मेहनत कर रहे हो... *अब मैं आत्मा आपके स्नेह में, आपकी याद में समाई हुई हूँ... आपकी शक्तिशाली पवित्र किरणों से मेरी जन्म जन्म की विकारों की मैल नष्ट होती जा रही है... और मैं आत्मा संपूर्ण पवित्र आत्मा बनती जा रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदा बाप समान बनने की हिम्मत रखनी है*"

 

_ ➳  अपने गिरधर गोपाल शिव बाबा के प्रेम की लगन में मगन मैं आत्मा रूपी गोपी, मन को सुकून देने वाली अपने कान्हा की मीठी मीठी यादों में खोई हुई, स्वयं को इस संसार के शोरगुल से दूर एक छोटे से सुंदर से टापू पर देख रही हूं। *चारों और पहाड़ियों से घिरा यह छोटा सा स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है*। तन और मन दोनों तरफ से बिल्कुल शांत चित्त स्थिति में स्थित होकर मैं प्रकृति की इस अद्भुत छटा का आनंद ले रही हूं। *प्रकृति के इस अद्भुत सौंदर्य का आनन्द लेते लेते मैं अपनी आंखें बंद कर अपने गिरधर गोपाल अपने मीठे शिव बाबा को याद करती हूँ* तभी कानों में बांसुरी की मधुर आवाज सुनाई देने लगती है और मैं मंत्रमुग्ध होकर उस आवाज को सुनने लगती हूं।

 

_ ➳  बांसुरी की मधुर आवाज के साथ साथ एक बहुत ही सुंदर नजारा मुझे दिखाई देता है। मैं देख रही हूँ मेरे शिव बाबा, मेरे नटखट गिरधर गोपाल सामने खड़े बांसुरी बजा रहे हैं और बांसुरी की मधुर आवाज को सुनकर गोपियां दौड़ी दौड़ी चली आ रही है। *नटखट कान्हा गोपियों के संग रास रचा रहे हैं*। एक अद्भुत दृश्य मैं देख रही हूँ कि बांसुरी की मधुर आवाज से बेसुध होकर कोई गोपी मुस्करा रही है, कोई जोर - जोर से हंस रही है और कोई अपने कान्हा के प्रेम में डूबी आंसू बहा रही है। एकाएक गिरधर गोपाल का स्वरूप बापदादा के लाइट माइट स्वरूप में परिवर्तित हो जाता है।

 

_ ➳  अब मैं देख रही हूं कान्हा के प्रेम में डूबी उन सभी गोपियों को लाइट के फ़रिशता स्वरुप में बाप-दादा के सामने बैठे हुए। *बापदादा मधुर महावाक्य उच्चारण कर रहे हैं और सभी फरिश्ते मंत्रमुग्ध होकर बाबा की वाणी को सुन रहे हैं*। कुछ बाबा के प्रेम में मगन होकर आंसू बहा रहे हैं और कोई पूरी तरह से बाबा के प्रेम में डूबे हुए हैं।

 

_ ➳  मन को लुभाने वाले इस दृश्य को देख कर मैं सोचती हूं कि भक्ति में जो गायन है कि कान्हा जब मुरली बजाता था तो गोपियां अपनी सुध-बुध खो कर दौड़ी चली आती थी। वास्तव में यह गायन तो इस समय का है जो मैं मन बुद्धि रूपी दिव्य नेत्रो से इस समय देख रही हूं कि *शिव बाबा जब ब्रह्मा तन में आकर मुरली चलाते हैं तो ब्राह्मण आत्माएं रुपी गोपिकाएं कैसे अपने कान्हा अपने शिव बाबा के प्रेम में मग्न हो कर अपनी सुध बुध खो देती है*।

 

_ ➳  इस खूबसूरत नजारे को देख अपने गिरधर गोपाल से मिलने की तड़प और तीव्र हो जाती है और मैं आत्मा गोपी इस नश्वर देह को छोड़ अपने गिरधर गोपाल से मिलने चल पड़ती हूँ उनके धाम। आवाज की दुनिया से पार, पांचो तत्वों से भी पार, मैं पहुँच जाती हूँ गोल्डन प्रकाश से परिपूर्ण, संपूर्ण शांति से भरपूर अपने निजधाम में । *यहां मैं पूर्ण शांत और आनन्दमय स्थिति का अनुभव कर रही हूँ । मेरे सामने हैं सर्व सुखों के दाता, आनन्द के सागर मेरे गिरधर गोपाल मेरे प्यारे परम पिता परमात्मा*। उनको देखते ही मेरा रोम रोम जैसे खिल उठा है। मेरी ख़ुशी का कोई पारावार नही है। मन में एक ही गीत बज रहा है "पाना था सो पा लिया"।

 

_ ➳  अपने शिव प्रीतम के प्रति अपने असीम प्रेम के उदगार को अपने मन में उठ रहे संकल्पो के माध्यम से मैं उनके सामने प्रकट कर रही हूँ। हे मेरे प्राणेश्वर, मेरे नाथ जन्म -जन्म से मैं आपको याद कर रही थी। आखिर मैं आपके पास पहुँच ही गई। *आपसे मिल कर मेरे जन्म-जन्म के कष्ट मिट गये*। सर्व दुखों से परे आपके पावन प्रेम की शीतल छाया को पाकर मैं धन्य-धन्य हो गई हूँ। आपको पाकर मैंने सब कुछ पा लिया मेरे स्वामी।

 

_ ➳  मेरे प्यार का प्रतिफल मेरे प्राणेश्वर शिव बाबा के प्यार की शक्तिशाली किरणों के रूप में अब मुझ पर बरस रहा है जो मुझे आनन्द विभोर कर रहा है। अपने गिरधर गोपाल से असीम प्रेम पा कर अब मैं धीरे - धीरे परमधाम से नीचे आ रही हूँ और प्रवेश कर रही हूँ अपनी साकारी देह में। *मेरा मन अब परम आनन्द से भरपूर है। मेरा जीवन ईश्वरीय प्रेम से भर गया है। अब मुझे बाप समान फ्राकदिल बन सर्व आत्माओं को इस परमात्म सुख, परमात्म प्रेम का अनुभव करवाना है* और सबको परमात्म वर्से का अधिकारी बनाना है । यही मेरा अब इस साकार सृष्टि पर कर्तव्य रह गया है ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सदा रहम और कल्याण की दृष्टि रखने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व की सेवा करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व परिवर्तक आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा मान, शान का त्याग करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा अपने समय को सदा बेहद सेवा में सफल करती हूँ  ।*

   *मैं परोपकारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  जब राजयोगी हैं तो राज्य अधिकारी बनना ही है। बापदादा कई बार याद दिलाते हैं कि *बाप आपके लिए सौगात लाये हैं* तो सौगात क्या लाये हैं? *सुनहरी दुनिया, सतोप्रधान दुनिया की सौगात लाये हैं।* तो निश्चय है, *निश्चय कि निशानी है रूहानी नशा। जितना अपने राज्य के समीप आ रहे हो, घर के भी समीप आ रहे हो और अपने राज्य के भी समीप आ रहे हो, तो बार-बार अपने स्वीट होम और अपने स्वीट राज्य की स्मृति स्पष्ट आनी ही चाहिए।* यह समीप आने की निशानी है। *अपना घर, अपना राज्य ऐसा ही स्पष्ट स्मृति में आये, तीसरे नेत्र द्वारा स्पष्ट दिखाई दे।* अनुभव हो आज यह, कल यह। *कितने बार पार्ट पूरा कर अपने घर और राज्य में गये हो,* याद आता है ना! और *अब फिर से जाना है।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अपने स्वीट होम और अपने स्वीट राज्य की स्मृति का स्पष्ट अनुभव"*

 

 _ ➳  मै आत्मा आज बाबा को याद करने बैठीं तो अपने *स्वीट होम और स्वीट राजधानी की कशिश हो रही हैं... मैं आत्मा अभी संगम युग में स्वराज अधिकारी आत्मा हूँ... राजयोगी आत्मा हूँ...* इस संगम युग में स्वंय भगवान ने मुझे राजयोगी बनाया हैं... *अभी मै आत्मा स्वराज अधिकारी हूँ और भविष्य में राज्य अधिकारी बनूँगी...* मै आत्मा राज योगी सो राज्य अधिकारी आत्मा हूँ... स्वयं भगवान मुझ आत्मा को याद करते हैं... *मैं आत्मा कितनी सौभाग्यशाली हूं... कि परमात्मा मेरे लिए स्वर्ग की सौगात लाये हैं... वाह वह सुनहरी दुनियाँ मेरी हैं... जहां सभी आत्माये संपूर्ण पवित्र हैं...* 16 कला संपूर्ण हैं... उस सुख की दुनिया में सुख ही सुख हैं... *बाबा मुझ आत्मा को उस सुख की दुनियाँ में जाने के लिए लायक बना रहे हैं...*

 

 _ ➳  *मुझ आत्मा को यह निश्चय हैं कि इस संगम के बाद वह सुख की दुनियाँ आई कि आई... मै आत्मा इसी रूहानी नशे में हूँ कि मै अपने राजधानी में जाती हूँ... ये रूहानी नशा मुझ आत्मा को निश्चिंत बना रहा हैं...* मै आत्मा एकदम निश्चिंत बन चुकी हूँ... *मै आत्मा अपने स्वीट होम परमधाम की निवासी हूँ...* मै आत्मा इस सृष्टि में पार्ट बजाने के लिए आई हूँ... *मेरा स्वीट होम बहुत ही प्यारा हैं... वहाँ अपार शांति ही शांति है...* वहाँ मै आत्मा अपने पिता परमात्मा के साथ हूँ... *मै आत्मा संपूर्ण पवित्र हूँ... परमधाम में मै आत्मा अपार शांति का अनुभव कर रही हूँ...* वह मेरा स्वीट होम हैं...

 

 _ ➳  *अपने स्वीट होम से मै आत्मा अपने स्वीट राजधानी में आती हूँ...* वह सुख की दुनिया *जहाँ सभी आत्माये अपने पवित्र स्वरुप में हैं...* वहा किसी भी प्रकार के दुःख का नामोनिशान नहीं हैं... वहाँ सुख शांति की बहार हैं... *वहाँ संपूर्ण सुख हैं... परमात्मा ने मुझ आत्मा को स्वर्ग में जाने के लिए चुना हैं...* वाह मेरा भाग्य... जो मुझे सुख की दुनिया में जाना है... *अब मै आत्मा अपने स्वीट राज्य को एकदम समीप से अनुभव कर रही हूँ...* वाह कितना सुंदर समय हैं... *जहाँ प्रकृति भी अपने संपूर्ण स्वरुप में हैं...* वाह जहा सभी मौसम बसंत हैं... कितना सुंदर अनुभव हैं... *वाह कितना सुंदर रूहानी नशा हैं जो इस दुनियाँ के सारे सुखों से भी उपर हैं...*

 

 _ ➳  यह परमानंद और परमात्म्य अनुभति मुझे हो रही हैं... *मुझ आत्मा को अपना स्वीट होम और स्वीट राजधानी एकदम साफ़ समीप दिखाई दे रहा हैं... वहाँ स्वीट साइलेंस हैं... और चारों ओर सुनहरा प्रकाश फैला हुआ हैं...* वैसी ही सुनहरी दुनिया स्वयं भगवान् मुझ आत्मा के लिए बना रहे है... *मुझ आत्मा को स्पष्ट अनुभव हो रहा है कि मै अपने स्वीट राज्य में हूँ...* वहाँ के सुखों का आनंद ले रही हूँ... यह स्पष्ट स्मृति मुझ आत्मा को हैं... कि मुझे वहाँ जाना हैं... *ज्ञान का तीसरा नेत्र जो बाबा ने मुझ आत्मा को दिया हैं... उससे मै आत्मा स्पष्ट अपने राज्य को देख रही हूँ...* वाह मेरा भाग्य...

 

 _ ➳  *जो परमात्म्य प्यार मुझ आत्मा को मिला हैं... उसे मै शब्दों में बयान नहीं कर सकती... मै आत्मा ना जाने कितने बार यह पार्ट पूरा कर चुकी हूँ...* मै आत्मा स्वदर्शन चक्रधारी हूँ... *मेरे पिता परमात्मा प्यार के सागर है... वह सर्व शक्तिमान है...* अब इस कल्प में भी मै आत्मा अपना पार्ट पूरा कर अपने स्वीट होम से अपने स्वीट राजधानी में जा रही  हूँ... *यह सब मुझ आत्मा की स्मृति में इमर्ज हुआ हैं... कि अब फिर से मुझ आत्मा को आदि से अंत तक का पार्ट बजाना हैं...* मुझे सुख की दुनिया में जाना है... मै बहुत बहुत भाग्यशाली आत्मा हूँ... *जो परमात्म प्यार की अधिकारी बनी... और भविष्य राज्य अधिकारी बनूँगी... शुक्रिया बाबा, आपका बहुत बहुत शुक्रिया...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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