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 06 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कोई भी अशुद्ध चीज़ तो नहीं खायी ?*

 

➢➢ *स्वर्ग के रचयिता बाप को याद किया ?*

 

➢➢ *अपनी शक्तियों व गुणों द्वारा निर्बल को शक्तिवान बनाया ?*

 

➢➢ *दृढ़ निश्चय से भाग्य को निश्चित किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे स्थूल अग्नि वा प्रकाश अथवा गर्मी दूर से ही दिखाई देती वा अनुभव होती है। वैसे आपकी तपस्या और त्याग की झलक दूर से ही आकर्षण करे।* हर कर्म में त्याग और तपस्या प्रत्यक्ष दिखाई दे तब ही सेवा में सफलता पा सकेंगे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? ब्राह्मणों को सदा ऊंचे ते ऊंची चोटी पर दिखाते हैं। चोटी का अर्थ ही है ऊंचा। *तो संगमयुगी अर्थात् ऊंचे ते ऊंची आत्मायें। जैसे बाप ऊंचे ते ऊंचा गाया हुआ है, ऐसे बच्चे भी ऊंचे और संगमयुग भी ऊंचा है। सारे कल्प में संगमयुग जैसा ऊंचा कोई युग नहीं है क्योंकि इस युग में ही बाप और बच्चों का मिलना होता है।* और कोई युग में आत्मा और परमात्मा का मेला नहीं होता है।

 

  तो जहाँ आत्मा और परमात्मा का मेला है, वही श्रेष्ठ युग हुआ ना। ऐसे श्रेष्ठ युग की श्रेष्ठ आत्मायें हो! आप श्रेष्ठ ब्राह्मणों का कार्य क्या है? *ब्राह्मणों का काम है - पढ़ना और पढ़ाना। नामधारी ब्राह्मण भी शास्त्र पढ़ेंगे और दूसरों को सुनायेंगे। तो आप ब्राह्मणों का काम है ईश्वरीय पढ़ाई पढ़ना और पढ़ाना जिससे ईश्वर के बन जाएं।*

 

  तो ऐसे करते हो? पढ़ते भी हो और पढ़ाते अर्थात् सेवा भी करते हो। *यह ईश्वरीय ज्ञान देना ही ईश्वरीय सेवा है। सेवा का सदा ही मेवा मिलता है। कहावत है ना - 'करो सेवा तो मिले मेवा'। तो ईश्वरीय सेवा करने से अतीन्द्रिय सुख का मेवा मिलता है, शक्तियों का मेवा मिलता है, खुशी का मेवा मिलता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जैसै एक सेकण्ड में स्विच आँन और आँफ किया जाता हे, ऐसे ही एक सेकण्ड में शरीर का आधार लिया और फिर एक सेकण्ड में शरीर से परे अशरीरी स्थिति में स्थित हो सकते हो? *अभी - अभी शरीर में आये फिर अभी - अभी अशरीरी बन गये, यह प्रैक्टीस करनी है।* इसी को ही कर्मातीत अवस्था कहा जाता है। ऐसे अनुभव होगा जब चाहे कोई कैसा वस्त्र धारण करना वा न करना यह अपने हाथ में रहेगा। आवश्यकता हुई धारण किया, आवश्यकता न हुई तो शरीर से अलग हो गये। एसे अनुभव इस शरीर रूपी वस्त्र में हो।

  

✧  कर्म करते हुए भी अनुभव ऐसा ही होना चाहिए जैसे कोई वस्त्र धारण कर और कार्य कर रहे हैं। कार्य पूरा हुआ और वस्त्र से न्यारे हुए। *शरीर और आत्मा दोनों का न्यारापन चलते - फिरते भी अनुभव होना है।* जैसे कोई प्रैक्टिस  हो जाती है ना। लेकिन यह प्रैक्टिस किनको हो सकती है?

     

✧  जो शरीर के साथ वा शरीर के संबन्ध में जो भी बातें है, शरीर की दुनिया, संबन्ध वा अनेक जो भी वस्तुएँ है उनसे बिल्कुल डिटैच होंगे, जरा भी लगाव नहीं होगा तब न्यारे हो सकेंगे। *अगर सूक्ष्म संकल्प में भी हल्का - पन नहीं है, डिटैच नहीं हो सकते तो न्यारापन का अनुभव नहीं कर सकेंगे।* तो अब महारथियों को यह प्रैक्टिस करनी है। बिल्कुल ही न्यारापन का अनुभव हो। इसी स्टेज पर रहने से अन्य आत्माओं को भी आप लोगों से न्यारे - पन का अनुभव होगा, लह भी महसूस करेंगे।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जैसे प्रकृति के पांच रूप विकराल रूप धारण करेंगे, वैसे ही पांच विकार भी अपना शक्तिशाली रूप  धारण कर अन्तिम वार अति सूक्ष्म रूप में ट्रायल करेंगे अर्थात् माया और प्रकृति दोनों ही अपना फुल फोर्स का अन्तिम दाव लगायेंगे।* जैसे किसी भी स्थूल युद्ध में भी अन्तिम दृश्य हास पैदा करने वाला होता है और हिम्मत बढ़ाने वाला भी होता है, ऐसे ही कमजोर आत्माओं के लिए भी हास पैदा करने वाला दृश्य होगा - मास्टर सर्वशक्तिवान आत्माओं के लिए वह हिम्मत और हुल्लास देने वाला दृश्य होगा।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ईश्वर के गोद मिलने के नशे में रहना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा मधुबन में प्रकाश स्तम्भ के सामने बैठ आत्मचिंतन करती हूँ... कितनी भाग्यशाली हूँ मैं जिसको स्वयं परमात्मा ने अपना बनाया... अपनी गोद में बिठाकर पालना दे रहा है... प्रेम का सागर, सागर से भी गहरा प्यार बरसा रहा है... *शिक्षा देकर पत्थर से पारस बना रहा है... श्रीमत पर चलना सिखाकर स्वर्णिम युग का वर्सा दे रहा है... प्रकाश स्तम्भ से निकलते प्रकाश की किरणों में बैठकर मैं आत्मा प्रकाश के वतन में उड़ चलती हूँ मीठे बाबा के पास...* 

 

   *मुझे एडाप्ट कर सत्य ज्ञान देकर देवताओ से भी ऊँच ब्राह्मण जीवन का महत्व समझाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वर पिता की गोद में महके से फूल हो... *स्वयं भगवान की पालना में पलने वाले महान खुशनसीब हो...* बेसमझ मनुष्य से ईश्वर पुत्र हो, सदा के समझदार, तीनो कालो और लोको को जानने वाले त्रिकालदर्शी बन मुस्करा रहे हो... इस मीठे से भाग्य के नशे में आनन्दित हो जाओ..."

 

_ ➳  *इस अमूल्य जीवन के महत्व को जान श्रेष्ठ ईश्वरीय कुल की संतान होने के नशे में मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... *मैं आत्मा ईश्वरीय हाथो में खिलने वाला खुबसूरत रूहानी गुलाब हूँ... मीठे बाबा कभी खुद को भी न जानने वाली, आज त्रिकालदर्शी बन मुस्करा रही हूँ...* आपके प्यार में विकारो के दलदल से निकल पवित्र ब्राह्मण सी खिल उठी हूँ..."

 

   *अपना परम तख़्त छोड़ इस धरा पर आकर अपने दिल तख़्त पर मुझे बिठाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... अपनी ईश्वरीय खुशनसीबी पर बलिहार जाओ... किसने चुना है,और दिल की धड़कन सा दिल में समाया है... *इन मीठी यादो में रोमांचित हो जाओ... ईश्वरीय बुद्धि को पाने वाले और मीठे बाबा की बाँहों में मुस्कराने वाले, ऊँच ते ऊँच आप ही ब्राह्मण बच्चे हो..."*

 

_ ➳  *प्रभु प्यार की किरणों से श्रृंगार कर प्यार के सागर की महिमा गाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा कितने महान भाग्य की मालिक हूँ... संगम पर प्यारे बाबा आपको पाकर देवताई सौंदर्य से सजधज रही हूँ... *मीठे सुखो की सतयुगी धरती पर कदम बढ़ाती जा रही हूँ... ईश्वर पिता को और उसके सारे राजो को जानने वाली भाग्य की धनी हूँ..."*

 

   *अपनी बाँहों में लेकर प्यार से पालना देकर हर सम्बन्ध का अनुभव कराते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... जो भाग्य देवताओ का भी नही वह प्यारा भाग्य आप बच्चों ने पाया है... भगवान को जान कर उसकी यादो में स्वयं को बसाया है... *यह निराला सुख देवताओ को भी नसीब नही जो आप बच्चों ने सहज ही पाया है... ईश्वरीय खजानो, शक्तियो और प्यार को दिल में अपने समाया है..."*

 

_ ➳  *हसीन बाबा के हसीन यादों के आँगन में खुशनुमा फूल बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कितने प्यारे भाग्य को सहज ही पा गई हूँ... मनुष्य बनी सदा मूँझने वाली, आज ईश्वरीय गोद में ब्राह्मण बनकर... बेहद की समझदार हो गयी हूँ... *मीठे बाबा आपकी यादो में ईश्वरीय जादू की मिसाल बन मुस्करा रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस पुरानी छी छी दुनिया से बेहद का वैराग्य रखना है*"

 

_ ➳  देह और देह की यह झूठी दुनिया जिसमे बुद्धि को फंसा कर आज दिन तक सिवाय दुख और अशांति के कुछ प्राप्त नही हुआ ऐसी नश्वर दुनिया से वैराग्य रख उसे बुद्धि से भूल अपने मन बुद्धि को शन्ति, प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, आनन्द और पवित्रता के सागर अपने शिव पिता परमात्मा पर एकाग्र करना ही राजयोग है जो सच्चे सुख और शान्ति को पाने का एकमात्र उपाय है। *इसी चिंतन के साथ इस असार संसार की नश्वरता का विचार मन मे आते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे मेरा मन इस बेहद की दुनिया से वैरागी होने लगा है*। इस असार संसार मे होते हुए भी जैसे मैं इसमें नही हूँ।

 

_ ➳  स्वयं को मैं केवल अपने लाइट स्वरूप में, एक चमकते हुए चैतन्य सितारे के रूप में देख रही हूँ और अनुभव कर रही हूँ कि *मेरा घर यह नश्वर दुनिया नही बल्कि 5 तत्वों से बनी इस दुनिया से परे, तारामंडल से भी परें, फ़रिश्तों की दुनिया के पार अनन्त प्रकाश की अति सुंदर दुनिया परमधाम हैं*। उस प्रकाश की दुनिया में अपने शिव पिता परमात्मा के साथ मैं रहने वाली हूँ। इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर मैं केवल पार्ट बजाने के लिए ही तो आई हूँ। हर आत्मा यहां इस बेहद की दुनिया मे आ कर ड्रामा प्लैन अनुसार अपना पार्ट ही तो बजा रही है। 

 

_ ➳  ड्रामा के इस अति गुह्य राज को स्मृति में रख इन सभी के पार्ट को अब मैं साक्षी हो कर देख रही हूँ। साक्षीदृष्टा की यह अवस्था मुझे इस बेहद की दुनिया से वैराग्य दिला रही है। *बुद्धि से इस दुनिया को भूल, अपनी अति सुंदर निराकारी दुनिया को स्मृति में लाकर अब मैं मन बुद्धि के विमान पर बैठ इस बेहद की दुनिया से किनारा कर प्रकाश की उस अति उज्ज्वल दुनिया की ओर जा रही हूँ*। स्वीट साइलेन्स होम की स्मृति मात्र से ही मेरे अंदर जैसे शक्ति भरने लगी है जो मुझे लाइट और माइट स्वरुप में स्थित कर, ऊपर की ओर ले जा रही है। हर प्रकार के बन्धन से मुक्त हल्के हो कर उड़ते हुए असीम आनन्द का अनुभव करते - करते आकाश मण्डल को मैं पार कर जाती हूँ।

 

_ ➳  आकाश को पार कर, सफेद प्रकाश की दुनिया सूक्ष्म लोक को पार कर मैं पहुँच जाती  हूँ अति दिव्य, अलौकिक लाल प्रकाश से प्रकाशित अपने स्वीट साइलेन्स होम शान्तिधाम में। *शान्ति की इस दुनिया मे पहुंचते ही गहन शांति की अनुभूति में मैं खो जाती हूँ और हर संकल्प, विकल्प से परें एक अति न्यारी और प्यारी निरसंकल्प स्थिति में स्थित हो जाती हूँ*। संकल्पो से रहित इस अति प्यारी अवस्था में मेरा सम्पूर्ण ध्यान केवल अपने सामने विराजमान मेरे शिव पिता की ओर है। मुझे केवल मेरा चमकता हुआ ज्योति बिंदु स्वरूप और अपने शिव पिता परमात्मा का अनन्त प्रकाशमय महाज्योति स्वरूप दिखाई दे रहा है। 

 

_ ➳  इस अतिशय प्यारी निरसंकल्प स्थिति में स्थित मैं आत्मा महाज्योति अपने शिव बाबा से आ रही अनन्त शक्तियों की किरणें को स्वयं में समाहित कर शक्तिसम्पन्न स्वरूप बनती जा रही हूँ। *शिव बाबा से आ रही सातों गुणों की सतरंगी किरणे मुझ आत्मा में समाहित होकर मेरे अंदर निहित सातों गुणों को विकसित कर रही हैं*। देह अभिमान में आ कर, अपने सतोगुणी स्वरूप को भूल चुकी मैं आत्मा अपने एक - एक गुण को पुनः प्राप्त कर फिर से अपने सतोगुणी स्वरूप में स्थित होती जा रही हूँ। 

 

_ ➳  हर गुण, हर शक्ति से मैं स्वयं को सम्पन्न बना कर वापिस देह की दुनिया में कर्म करने के लिए लौट रही हूँ। अपनी देह में पुनः भृकुटि के अकालतख्त पर अब मैं विराजमान हूँ। *बाबा के साथ सदा कम्बाइन्ड रहकर अपने गुणों और सर्वशक्तियों को सदा इमर्ज रखते हुए अब मैं साक्षीदृष्टा बन इस बेहद की दुनिया में अपना पार्ट बजा रही हूँ*। इस दुनिया मे स्वयं को मेहमान समझ इसमें रहते हुए बुद्धि से अब मैं इसे भूलती जा रही हूँ। *इस बेहद की दुनिया से बेहद की वैराग्य वृति रख, अपने शिव पिता पर अपनी बुद्धि को सदा एकाग्र रखते हुए, उनकी याद में रहते केवल निमित बन अब मैं हर कर्तव्य कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपने शक्तियों वा गुणों द्वारा निर्बल को शक्तिवान बनाने वाली श्रेष्ठ दानी आत्मा हूँ।*

   *मैं सहयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा दृढ़ निश्चय से भाग्य को निश्चित कर देती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा निश्चिंत रहती हूँ  ।*

   *मैं निश्चय बुद्धि निश्चिंत आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  सदा सुख की शैय्या पर सोई हुई आत्मा के लिए यह विकार भी छत्रछाया बन जाता हैं -दुश्मन बदल सेवाधारी बन जाते हैं। *अपना चित्र देखा है ना! तो शेष शय्या' नहीं लेकिन सुख-शय्या'। सदा सुखी और शान्त की निशानी है - सदा हर्षित रहना। सुलझी हुई आत्मा का स्वरूप सदा हर्षित रहेगा। उलझी हुई आत्मा कभी हर्षित नहीं देखेंगे। उसका सदा खोया हुआ चेहरा दिखाई देगा* और वह सब कुछ पाया हुआ चेहरा दिखाई देगा। जब कोई चीज खो जाती है तो उलझन की निशानी क्यों, क्या, कैसे ही होता है। तो रूहानी स्थिति में भी जो भी पवित्रता को खोता है, उसके अन्दर क्यों, क्या और कैसे की उलझन होती है। तो समझा कैसे चेक करना है? *सुख-शांति के प्राप्ति स्वरूप के आधार पर मंसा पवित्रता को चेक करो।*

 

✺  *"ड्रिल :- सदा सुख की शैय्या पर सोये हुए अनुभव करना*

 

_ ➳  *"अमृतवेला शुद्ध पवन है, मेरे लाडले जागो..."  मीठे बाबा की मीठी आवाज़ सुन मैं जाग जाती हूँ...* अमृतवेले अमृत पिलाने के लिए मीठे बाबा मुझे जगा रहे हैं... मैं प्यारे बाबा को गुड मॉर्निंग कहकर उनकी गोदी में बैठ जाती हूँ... मेरी लाडली शहजादी कहकर बाबा मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हैं... मैं आत्मा रूहानी खिवैया की गोदी में बैठकर अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ... *रूहानी खिवैया ने विषय सागर में डोलती हुई मेरे जीवन रूपी नैया को मझधार से निकालकर किनारे पर लगा दिया है...*

 

_ ➳  अब बाबा ही मेरे जीवन के दाता हैं... मेरे सांसो के स्वामी हैं... अब मैं आत्मा अपने जीवन रूपी नैया की पतवार बाबा के हाथों सौंपती हूँ... *प्यारे बाबा ने ज्ञान अमृत पिलाकर नया ब्राह्मण जन्म दिया है... सर्व गुण, शक्तियों के खजाने दिए हैं... विकारों रूपी विष को खत्म कर पवित्रता की शक्ति दी है...* सर्व गुण सम्पन्न, 16 कलाओं से सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी बनाकर स्वर्ग सुखों का अविनाशी वरदान दिया है...

 

_ ➳  *प्यारे बाबा मुझे प्यार से अपनी गोदी में उठाकर ले चलते हैं परमधाम...* परमधाम में मैं आत्मा अपने बाबा में समाकर उनसे एक हो जाती हूँ... मैं आत्मा सर्व गुणों, शक्तियों से सम्पन्न बन रही हूँ... अखूट खजानों की मालिक बन रही हूँ... *पवित्रता के सागर में डुबकी लगाकर मैं आत्मा सम्पूर्ण पवित्र बन रही हूँ...* पवित्रता की शक्ति से मुझ आत्मा के जन्म-जन्मान्तर के विकर्म दग्ध हो रहे हैं...

 

_ ➳  *पवित्रता की शक्ति को धारण करने से मुझ आत्मा के अन्दर क्यों, क्या और कैसे की उलझन समाप्त हो रही है...* मैं आत्मा सदा सुख-शांति की अनुभूति कर रही हूँ... सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न अवस्था का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा सबकुछ पाकर सदा हर्षित रहती हूँ... *अब मैं आत्मा उलझन की शय्या से निकल सदा सुख की शय्या पर रहती हूँ...*

 

_ ➳  *सदा सुख की शय्या पर रहने से मुझ आत्मा के विकार भी छत्रछाया बन गए हैं...* दुश्मन भी बदलकर सेवाधारी बन गए हैं... जिस परमात्मा को जन्म-जन्म से ढूंढ रही थी उसने मुझे ढूंढकर अपना बना लिया... सर्व अधिकार देकर सर्व खजानों से सम्पन्न बना दिया... मेरे प्यारे बाबा मुझे उलझन और काँटों की शय्या से निकाल अपनी गोदी की सुख की शय्या पर सुलाते हैं... *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को 21 जन्मों का वर्सा देकर 21 जन्म तक सदा सुख की शय्या का वरदान देते हैं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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