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 06 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *उठते बैठते चलते अपने को एक्टर समझा ?*

 

➢➢ *जितना हो सके, अपने घर को याद किया ?*

 

➢➢ *अपने हल्केपन की स्थिति द्वारा हर कार्य को लाइट बनाया ?*

 

➢➢ *"वाह रे मैं" - सदा इसी अलोकिक नशे में रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *शक्तिशाली ज्वाला स्वरूप की याद तब रहेगी जब याद का लिंक सदा जुटा रहेगा।* अगर बार-बार लिंक टूटता है, तो उसे जोड़ने में समय भी लगता, मेहनत भी लगती और शक्तिशाली के बजाए कमजोर हो जाते हो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा हूँ"*

 

  पदमापदम भाग्यवान आत्मायें अनुभव करते हो! इतना श्रेष्ठ भाग्य सारे कल्प में किसी भी आत्मा का नहीं है। चाहे कितने भी नामीग्रामी आत्मायें हों, लेकिन आपके भाग्य के आगे उन्हों का भाग्य क्या है? *वह है अल्पकाल का भाग्य और ब्राह्मण आत्माओंका है - अविनाशी भाग्य। सिर्फ इस एक जन्म का नहीं है, जन्म-जन्म का है। बाप का बनना अर्थात् भाग्य का वर्सा अधिकार में मिलना। तो अधिकार तो मिल गया ना। बच्चा अर्थात् अधिकार, वर्सा।* अधिकार का नशा है कि उतरता चढ़ता है? आधाकल्प तो नीचे ही उतरे, अभी क्या करना है? चलना है, चढ़ना है या उड़ना है? उड़ने वाली चीज बीच में कभी रुकती नहीं। रुकेंगे तो नीचे आयेंगे। थोड़े से समय में भी रुकेंगे फिर उड़ेंगे तो मंजिल पर कैसे पहुँचेंगे? इसलिए उड़ते रहो। लेकिन सदा उड़ेगा कौन? जो हल्का होगा। तो हल्के हो ना? या तन का, मन का, सम्बन्ध का बोझ है? अगर बोझ नहीं है तो रुकते क्यों हैं? जो बोझ वाली चीज है वो नीचे आती है और जो हल्की होती है वह सदा ऊपर रहती है।

 

  आप सब तो डबल लाइट हो ना? तो सदा अपने भाग्य को स्मृति में रखने से भाग्य विधाता बाप स्वत: ही याद आयेगा। भाग्य विधाता को याद करना अर्थात् भाग्य को याद करना और भाग्य को याद करना अर्थात् भाग्य विधाता को याद करना। दोनों का सम्बन्ध है। कोई भी एक को याद करो तो दोनों याद आ जाते हैं। *तो चलते-फिरते वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! जो संकल्प में भी न था लेकिन साकार स्वरूप में प्राप्त कर रहे हैं। इतना सहज भाग्य और प्राप्त कितना सहज हो गया!* किसी भी महान आत्मा के पास जाते हैं तो हद की प्राप्ति के लिए - चाहे बच्चा चाहिए, चाहे धन चाहिए, चाहे तन की तन्दरुस्ती चाहिए, तो एक प्राप्ति के लिए भी कितनी मेहनत कराते हैं और आपको क्या करना पड़ा? मेहनत करनी पड़ी? या आंख खुली, तीसरा नेत्र खुला और देखा भाग्य का नजारा।

 

  घर बैठे परिचय मिल गया। आप लोगों को ढूंढना नहीं पड़ा। कोई हद के खान से भी हद का खजाना लेना हो तो कितनी भागदौड़ करनी पड़ती है। ये तो सहज ही आपको घर बैठे हाथ में मिल गया। एक बाप एक परिवार। अनेकता खत्म हो गई और सभी एक हो गये। *अपना बाप, अपना परिवार। अपना लगता है ना। चाहे कितना भी दूर हो लेकिन स्नेह समीप ले आता है। स्नेह नहीं तो साथ रहते भी दूर लगता है। तो ईश्वरीय स्नेह वाले परिवार में आ गये। इसलिए सदा याद रखो - ओहो मेरा श्रेष्ठ भाग्य! भाग्य विधाता द्वारा श्रेष्ठ भाग्य पा लिया।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧    'साइलेन्स इज गोल्ड', यही गोल्डन ऐज्ड स्टेज कही जाती है।*इस स्टेज पर स्थित रहने से 'कम खर्च बाला नशीन' बनेंगे।* समय रूपी खजाना, एनर्जी का खजाना और स्थूल खजाना में 'कम खर्च बाला नशीन' हो जायेंगे। *इसके लिए एक शब्द याद रखो। वह कौन सा हे? 'बैलेन्स'।*

 

✧  *हर कर्म में, हर संकल्प और बोल, सम्बन्ध वा सम्पर्क में बैलेन्स हो।* तो बोल, कर्म, संकल्प, सम्बन्ध वा सम्पर्क साधारण के बजाए अलौकिक दिखाई देगा अर्थात चमत्कारी दिखाई देगा।

     

✧  हर एक के मुख से, मन से यही आवाज निकलेगा कि यह तो चमत्कार है। *समय के प्रमाण स्वयं के पुरुषार्थ की स्पीड और विश्व सेवा की स्पीड तीव्र गति की चाहिए तब विश्व कल्याणकारी बन सकेंगे।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सूर्यवंशी सदा मास्टर ज्ञान-सूर्य अर्थात् पावरफुल स्टेज बीजरूप में रहते अथवा सेकण्ड स्टेज अव्यक्त फरिश्ते में ज़्यादा समय स्थित रहते। *चन्द्रवंशी ज्ञान-सूर्य समान बीज़रूप स्टेज में कम ठहर सकते लेकिन फरिश्ते स्वरूप में और अनेक प्रकार के माया के विघ्नों से युद्ध कर विजयी बनने की स्टेज में ज़्यादा रहते हैं।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  निश्चयबुद्धि बन पुरुषार्थ करना"*

 

_ ➳  मीठे बाबा की यादो में खोयी हुई मै आत्मा इस देह को छोड़ प्रकाश की काया में वतन की सैर को निकलती हूँ... मुझे देखते ही बाबा ख़ुशी से पुलकित हो उठे और बोले :- "मीठे बच्चे *निश्चय ही सच्चे प्रेम की आधारशिला है... और इसी में मंजिल का पता छुपा है.*. निश्चय और गहरा विश्वास ईश्वर पिता और बच्चों के बीच एक पुल की तरहा है... जिस पर चलकर सहज ही मंजिल बाँहों में दौड़ी आयेगी... मै आत्मा मीठे बाबा के प्यार में खोयी हुई सी, बाबा के इन कथनो पर सहर्ष स्वीकृति दे रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मेरे प्रेम से भरे भावो पर मुस्कराये और बोले :-* "मेरे प्यारे से रूहानी गुल... जिन इंसानी रिश्तो को गहराई से बुनते आये... वहाँ भी तो निश्चय ही आधार रहा... ईश्वरीय राहो की भी वही बुनियाद है... *जितनी गहराई से, इस सच्चे प्रेम समन्दर में डूबोगे, उतने अथाह खजाने बाँहों में भर पाओगे.*..और देवताई मंजिल  कदमो में स्वतः ही खिंची चली आएगी..."

 

_ ➳  *प्यारे बाबा को अपने सर पर वरदानी हाथ फेरते... प्यार से समझाते सुनकर, मै आत्मा अपने भाग्य पर झूम उठी और बोली :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपके बिना जीवन कितना सूना और वीरान था... जीवन का न कोई लक्ष्य न ठिकाना था... आज आपने मुझे खुबसूरत देवताई लक्ष्य देकर क्या से क्या बना दिया है... *इतना प्यारा भाग्य मेरे हाथो में सजा दिया है.*.."

 

   *प्यारे बाबा मेरे दिल के अरमान सुनकर... मीठी नजरो से निहारने लगे और बोले :-* "सिकीलधे लाडले बच्चे... जनमो से सच्चे सुख और प्रेम के लिए तड़फते रहे हो... ईश्वरीय प्रेम को सदा तरसते रहे हो... *आज ईश्वर पिता बनकर सारे जज्बात, सतगुरु बनकर सारी मुरादे पूरी करने के लिए, दिल के द्वार पर खड़ा दस्तक दे रहा है.*.. तो निश्चय और गहरे विश्वास संग अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाओ..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा के वरदानी बोल और स्नेह दृष्टि में भीगती हुई मै आत्मा बाबा को कह रही :-* "सबसे प्यारे मेरे बाबा... *आप ईश्वर पिता यूँ मेरे दिल पर प्रेम की थाप दे.*.. और मै आत्मा न झूमूँ  यह भला कैसे हो सकता है बाबा... आप ही तो सदा की मेरी पुकार रहे है... आपको पाने की चाहत में तो मै आत्मा कितना भटकी हूँ... अब जो मिले हो बाबा तो रोम रोम से कुर्बान हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मेरी प्रेम भावनाओ में खो गये... और प्रेम की तरंगे जेसे पूरे वतन में तरंगित हो गई... और कहने लगे :-* "ईश्वरीय राहो पर सम्पूर्ण निश्चय के साथ, अपनी मंजिल को सहज ही पाने वाले बनकर, सदा की मुस्कराहट से सज जाओ... *देवताओ सी शानो शौकत और सुख, ईश्वरीय पुत्रो की बपौती है.*.. उसे तकदीर में भरकर, अनन्त खुशियो को चिर स्थायी बनाओ..."

 

_ ➳  *अपने प्यारे बाबा का इस कदर प्यार पाकर... ऐसी मीठी रुहरिहानं करते हुए, मै आत्मा बोली :-* "मेरे सच्चे साथी बाबा मेने तो अपनी चाहतो में आपको ही बसाया था... बस आपको ही चाहा और दुआओ में सदा माँगा था... *कब सोचा था कि आपके पीछे स्वर्ग के मीठे सुख कतारो में खड़े, मेरा इंतजार कर रहे है.*.. ऐसा जादू भरा जीवन तो मेरी कल्पनाओ में भी न था... मीठे बाबा और मै आत्मा मुस्करायी और अपने स्थूल जगत मै लौट आई..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- निश्चयबुद्धि हो कांटो से फूल बनने का पुरुषार्थ करना है*"

 

_ ➳  कांटों को फूल बनाने वाले बबूलनाथ अपने प्यारे, मीठे शिव बाबा को मन ही मन मैं शुक्रिया अदा करती हूं जिन्होंने मुझे माया रावण की कांटों की नगरी से निकाल परमात्म छत्रछाया रूपी फूलों की सेज पर बिठा दिया। *बाबा का शुक्रिया अदा करते करते साथ ही साथ मन मे विचार आता है कि रावण के मायावी जाल में फंसकर कैसे आज सभी कांटे बन एक दूसरे को दुख दे रहे हैं*। इस मायाजाल में इतने फंसे हुए हैं कि दुखी होते हुए भी इस मायाजाल को तोड़ इससे बाहर निकलने में असमर्थ हैं। लेकिन मेरे सर्वसमर्थ बाबा ने आकर इस मायाजाल को तोड़ने की युक्ति बताकर मेरे काँटे समान जीवन को फूल समान सुगंधित बना दिया।

 

_ ➳  दुःखो से भरी रावण की इस नगरी के बारे में विचार करते करते एक दृश्य मेरी आँखों के सामने आ जाता है। इस दृश्य में मैं स्वयं को एक ऐसे स्थान पर खड़ा हुआ देख रही हूं जहां से मुझे दो रास्ते दिखाई दे रहे हैं और दोनों रास्ते एक ही मंजिल तक ले जाने वाले हैं। *दूर से देखने पर एक रास्ता बहुत ही आकर्षक तरीके से सजा हुआ दिखाई दे रहा है जो सब को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है जबकि दूसरा रास्ता बिल्कुल साधारण दिखाई दे रहा है उस पर किसी तरह की कोई सजावट नहीं*। इन दोनो रास्तो पर बहुत से लोग जा रहे हैं।

 

_ ➳  किंतु एक बहुत ही हैरान करने वाली बात मैं यह देखती हूं कि आकर्षक तरीके से सजे रास्ते से आकर्षित होकर जो भी व्यक्ति उस रास्ते पर जा रहा है वह उस रास्ते को पार कर जब अपनी मंजिल पर पहुंचता है तो उसकी अवस्था बहुत ही जर्जर हो चुकी होती है दुख से वह बेहाल होता है। लेकिन *दूसरे साधारण रास्ते को पार कर अपनी मंजिल तक पहुंचने वाले लोगों के चेहरे एकदम फूल की तरह खिले हुए दिखाई देते हैं*। उनके चेहरे पर एक अनोखी चमक स्पष्ट दिखाई देती है।

 

_ ➳  इस दृश्य को देखकर असमंजस की स्थिति में मैं इस में छुपे रहस्य को जानने का प्रयास करती हूं तभी मेरे सामने अपने लाइट माइट स्वरुप में बाप दादा उपस्थित हो जाते हैं। *मेरे चेहरे के हर भाव को पढ़कर बाबा बड़ी गुह्य मुस्कुराहट के साथ मेरी ओर देखते हैं और मुझसे कहते हैं आओ मेरे मीठे बच्चे इस दृश्य का रहस्य मैं तुम्हें समझाता हूं*।

 

_ ➳  बाबा कहते बच्चे जो रास्ता दूर से सबको अपनी ओर आकर्षित कर रहा है ना, वह काँटो का जंगल है। *अब बाबा दिव्य दृष्टि से मुझे उस रास्ते के अन्दर का सीन दिखा रहें हैं मैं देख रही हूं पूरा रास्ता जैसे काँटो की शैया है*। जहाँ पैर रखो वहां काँटे ही काँटे। लोग काँटो की चुभन से तड़प रहें हैं, रो रहे हैं, चिल्ला रहे हैं किंतु वापिस आने की समर्थता किसी मे नही। अब बाबा दूसरा बिल्कुल साधारण रास्ता दिखाते हुए कहते हैं बच्चे यह फूलों का बगीचा है। *मैं देख रही हूं पूरा रास्ता फूलों की सेज बना हुआ है*। लोग बड़े आराम से आनन्दित होते हुए इस रास्ते से जा रहें हैं और एक दिव्य आभा के साथ अपनी मंजिल पर पहुंच रहें हैं।

 

_ ➳  दोनों रास्तों का रहस्य बताकर मेरे मन की उलझन को दूर कर अब बाबा मुझे समझाते हुए कहते हैं मेरे रूहे गुलाब बच्चे आज पूरी दुनिया ही काँटो का जंगल बन गई है इसलिए कदम कदम पर खबरदारी रखना। *माया के आकर्षण में आ कर कभी काँटो वाले रास्ते पर नही जाना*। माया संशय बुद्धि बनाने की कोशिश करेगी किन्तु सदैव निश्चयबुद्धि बन बाबा के फरमान पर चलते हुए काँटो से फूल बनने का पुरुषार्थ करते रहना। *सदैव फूलों वाले रास्ते पर चलते हुए खुशबूदार फूल बन औरों को भी काँटो से फूल बनाते रहना*।

 

_ ➳  अब बाबा अपने रूहानी नयनों से रूहानी दृष्टि दे अपनी सर्वशक्तियाँ मुझ में समाते जा रहें हैं और *मैं रूहे गुलाब बन बापदादा को निहारते हुए स्वयं को रूहानी खुशबू से भरपूर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपने हल्केपन की स्थिति द्वारा हर कार्य को लाइट बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं बाप समान न्यारी प्यारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव अलौकिक नशे में रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा "वाह रे मैं" के अलौकिक नशे में रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मन और तन से नेचुरल डांस होते अनुभव करती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ बापदादा दास आत्माओं की कर्मलीला देख रहम के साथ-साथ मुस्कराते हैं। साकार में भी एक हँसी की कहानी सुनाते थे। दास आत्मायें क्या करत भई! कहानी याद है? सुनाया था कि *चूहा आता, चूहे को निकालते तो बिल्ली आ जाती, बिल्ली को निकालते तो कुत्ता आ जाता। एक निकालते दूसरा आता, दूसरे को निकालते तो तीसरा आ जाता। इसी कर्म-लीला में बिजी रहते हैं। क्योंकि दास आत्मा है ना।* तो कभी आँख रूपी चूहा धोखा दे देता, कभी कान रूपी बिल्ली धोखा दे देती। कभी बुरे संस्कार रूपी शेर वार कर लेता, और बिचारी दास आत्मा उन्हों को निकालते-निकालते उदास रह जाती है। *इसलिए बापदादा को रहम भी आता और मुस्कराहट भी आती। तख्त छोड़ते ही क्यों हो,आटोमेटिक खिसक जाते हो क्या? याद के चुम्बक से अपने को सेट कर दो तो खिसकेंगे नहीं। फिर क्या करते हैं?*

➳ _ ➳ बापदादा के आगे आर्जियों के लम्बे-चौड़े फाइल रख देते हैं। कोई अर्जी डालते कि एक मास से परेशान हूँ, कोई कहते 3 मास से नीचे ऊपर हो रहा हूँ। कोई कहते 6 मास से सोच रहा था लेकिन ऐसे ही था। इतनी आर्जियाँ मिलकर फाईल हो जाती - लेकिन यह भी सोच लो जितनी बड़ी फाइल है उतना फाइन देना पड़ेगा। *इसलिए अर्जी को खत्म करने का सहज साधन है - सदा बाप की मर्ज़ी पर चलो। मेरी मर्ज़ी यह है'' तो वह मनमर्ज़ी अर्जी की फाइल बना देती है। जो बाप की मर्ज़ी वह मेरी मर्ज़ी।* बाप की मर्ज़ी क्या है?

➳ _ ➳ *हरेक आत्मा सदा शुभचिंतन करने वाली,सर्व के प्रति सदा शुभचिंतक रहने वाली, स्व कल्याणी और विश्व-कल्याणी बनें। इसी मर्ज़ी को सदा स्मृति में रखते हुए बिना मेहनत के चलते चलो।* जैसे कहा जाता है - आँख बन्द करके चलते चलो। ऐसा तो नहीं, वैसा तो नहीं होगा? यह आँख नहीं खोलो। यह व्यर्थ चिंतन की आँख बन्द कर बाप की मर्ज़ी अर्थात् बाप के कदम पीछे कदम रखते चलो। पाँव के ऊपर पाँव रखकर चलना मुश्किल होता है वा सहज होता है? तो ऐसे सदा फालो फादर करो। फालो सिस्टर, फालो ब्रदर यह नया स्टेप नहीं उठाओ। इससे मंजल से वंचित हो जायेंगे। रिगार्ड दो,लेकिन फालो नहीं करो। विशेषता और गुण को स्वीकार करो लेकिन फुटस्टेप बाप के फुटस्टेप पर हो। समय पर मतलब की बातें नहीं उठाओ। मतलब की बातें भी बड़ी मनोरंजन की करते हैं। वह डायलॉग फिर सुनायेंगे,क्योंकि बापदादा के पास तो सब सेवा स्टेशन्स की न्यूज आती है। आल वर्ल्ड की न्यूज आती है। तो दास आत्मा मत बनो।

✺ *"ड्रिल :- बाप की मर्ज़ी पर चल भिन्न भिन्न प्रकार की अर्जी को समाप्त करना*

➳ _ ➳ *मैं आत्मा सभी लौकिक व्यक्त बातों से मन बुद्धि को समेट कर अलौकिकता को धारण कर अव्यक्त फरिश्ता बन अव्यक्त वतन पहुंच जाती हूं अव्यक्त बापदादा के सम्मुख बैठ जाती हूं...* वहां मैं देखती हूं बापदादा बहुत सारे फाइलें चेक कर रहे थे... मैं बाबा को पूछती हूं- बाबा ये सब फाइलें क्या हैं? बाबा बोले बच्ची ये सबकी अर्जियों की लंबी चौड़ी फाइलें हैं... जब बाप की मर्ज़ी को छोड़ मनमर्ज़ी करते हैं तो वह मनमर्ज़ी अर्जी की फाइल बना देती है...

➳ _ ➳ मैं आत्मा बाबा को कहती हूँ:- जी बाबा क्या करें, *एक के बाद एक माया रूप बदल कर आती है, कभी चूहा, कभी बिल्ली, कभी शेर बनकर आती है, तो हम आत्मायें उसका सामना नहीं कर पाते फिर परेशान होकर नीचे ऊपर होते रहते हैं...* एक निकालते तो दूसरा आ जाता, दूसरे को निकालते तो तीसरा आ जाता... इसी कर्म-लीला में बिजी रहकर उदास रहते हैं... दुखी हो जाते हैं...

➳ _ ➳ बापदादा मुस्कुराते हुए बोले:- बच्ची- तख्त छोड़ते ही माया तुम पर वार करती है... *जब तख्त पर विराजमान रहते हो तो सदा सेफ रहते हो... याद के चुम्बक से अपने को सदा के लिए सेट कर दो तो तख्त से कभी भी खिसकेंगे नहीं...* बाप की मर्ज़ी को अपनी मर्जी बना लो... सदा बाप की मर्ज़ी पर चलोगे तो सारी अर्जियां सहज ही खत्म हो जायेंगी... बाबा अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रखकर वरदान देते हैं- सदा शुभचिंतन कर, सर्व के प्रति सदा शुभचिंतक बन स्व कल्याणी और विश्व-कल्याणी बनो...

➳ _ ➳ बाबा के वरदानों, खजानों से भरपूर होकर मैं आत्मा अपने को सम्पन्न महसूस कर रही हूँ... *अब मैं आत्मा बाबा की मर्जी को अपनी मर्ज़ी बनाकर चल रही हूँ... बिना मेहनत के, व्यर्थ चिंतन की आँख बन्द करके चल रही हूँ...* बाबा के हर कदम में कदम रख चल रही हूँ... फालो फादर करती हुई हर कर्म में सफलता प्राप्त कर रही हूँ... अब मैं आत्मा किसी भी देहधारी को फालो नहीं करती हूँ... बाप के फुटस्टेप पर फुटस्टेप रख मंजिल की तरफ बढती जा रही हूँ...

➳ _ ➳ मैं आत्मा सबको रिगार्ड देकर सबकी विशेषताओं और गुणों को स्वीकार करती हूँ... व्यर्थ बातें, व्यर्थ चिंतन छोड़ स्मृति स्वरुप, समर्थी स्वरुप बन रही हूँ... बाबा की याद के चुम्बक से अपने को तख्त पर सेट कर अब मैं आत्मा सदा तख्तनशीन बनकर रहती हूँ... शुभ भावनाओं और शुभ कामनाओं से सर्व का कल्याण कर रही हूँ... अब मैं आत्मा कभी भी मनमत वा परमत पर नहीं चलती हूँ... सदा ही बाबा की श्रीमत का पालन करती हूँ... *बाबा की मर्जी ही अब मेरी मर्जी है... बाबा के बताए एक-एक शब्द को स्वयं में ग्रहण कर रही हूँ... अब मैं आत्मा बाप की मर्ज़ी पर चलकर भिन्न भिन्न प्रकार की अर्जी को समाप्त कर रही हूँ...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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