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 06 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"पहले हम अपने घर शांतिधाम में जायेंगे फिर अपनी राजधानी में आयेंगे" - इसी डबल ख़ुशी में रहे ?*

 

➢➢ *देह अभिमान में आकर कोई विकर्म तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *मन की स्वंत्रता द्वारा सर्व आत्माओं को शांति का दान दिया ?*

 

➢➢ *स्नेह रूप और शक्ति रूप दोनों का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे बाप अव्यक्त वतन, एक स्थान पर बैठे चारों ओर के विश्व के बच्चों की पालना कर रहे हैं *ऐसे आप बच्चे भी एक स्थान पर बैठकर बाप समान बेहद की सेवा करो। फालो फादर करो। बेहद में सकाश दो। बेहद की सेवा में अपने को बिजी रखो तो बेहद का वैराग्य स्वत: ही आयेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं भाग्यविधाता का बच्चा हूँ"*

 

〰✧  सदा अपने भाग्य के चमकते हुए सितारे को देखते रहते हो? भाग्य का सितारा कितना श्रेष्ठ चमक रहा है! सदा अपने भाग्य के गीत गाते रहते हो? क्या गीत है? *वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! यह गीत सदा बजता रहता है? आटोमेटिक है या मेहनत करनी पड़ती है? आटोमेटिक है ना। क्योंकि भाग्यविधाता बाप अपना बन गया। तो जब भाग्यविधाता के बच्चे बन गये, तो इससे बड़ा भाग्य और क्या होगा! बस, यही स्मृति सदा रहे कि भाग्यविधाता के बच्चे हैं।*

 

  दुनिया वाले तो अपने भाग्य का वरदान लेने के लिए यहाँ-वहाँ भटकते रहते हैं और आप सभी को घर बैठे भाग्य का खजाना मिल गया। मेहनत करने से छूट गये ना। तो मेहनत भी नहीं और प्राप्ति भी ज्यादा। इसको ही भाग्य कहा जाता है, जो बिना मेहनत के प्राप्त हो जाये। *एक जन्म में 21 जन्म की प्राप्ति करना-यह कितना श्रेष्ठ हुआ! और प्राप्ति भी अविनाशी और अखण्ड है, कोई खण्डित नहीं कर सकता। माया भी सरेन्डर हो जाती है, इसलिए अखण्ड रहता है।* कोई लड़ाई करके विजय प्राप्त करना चाहे तो कर सकेगा? किसकी ताकत नहीं है। ऐसा अटल-अखण्ड भाग्य पा लिया! स्थिति भी अभी ऐसी अटल बनाओ।

 

  कैसी भी परिस्थिति आये लेकिन अपनी स्थिति को नीचे-ऊपर नहीं करो। अविनाशी बाप है, अविनाशी प्राप्तिया हैं। तो स्थिति भी क्या रहनी चाहिए? अविनाशी चाहिए ना। सभी निर्विग्न हो? या थोड़ा-थोड़ा विघ्न आता है? विघ्न-विनाशक गाये हुए हो ना। *कैसा भी विघ्न आये, याद रखो-मैं विघ्न-विनाशक आत्मा हूँ। अपना यह टाइटल सदा याद है? जब मास्टर सर्वशक्तिवान हैं, तो मास्टर सर्वशक्तिवान के आगे कितना भी बड़ा विघ्न कुछ भी नहीं है। जब कुछ है ही नहीं तो उसका प्रभाव क्या पड़ेगा?*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी स्वतन्त्र हो? बिगुल बजे और भाग आयें। ऐसे नष्टोमोहा हो? *जरा भी 5 परसेन्ट भी अगर मोह की रग होगी तो 5 मिनट देरी लगायेंगे और खत्म हो जायेगा।* क्योंकि सोचेंगे, निकलें या न निकलें।

 

✧  तो सोच में ही समय निकल जायेगा। *इसलिए सदा अपने को चेक करो कि किसी भी प्रकार का देह का, सम्बन्ध का, वैभवों का बन्धन तो नहीं है।*

 

✧  जहाँ बन्धन होगा वहाँ आकर्षण होगी। इसलिए *बिल्कुल स्वतन्त्र। इसको ही कहा जाता है- बाप समान कर्मातीत स्थिति।* सभी ऐसे हो ना?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सार स्वरूप में स्थित हो फिर विस्तार में आना यह बात भूल तो नहीं जाते हो? *सार स्वरूप में स्थित हो विस्तार में आने से कोई भी प्रकार के विस्तार की आकर्षण नहीं होगी। विस्तार को देखते, सुनते, वर्णन करते ऐसे अनुभव करेंगे जैसे एक खेल कर रहे हैं।* ऐसा अभ्यास सदा कायम रहे। इसको ही सहज याद' कहा जाता है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  सदैव ख़ुशी में रहना"*

 

_ ➳  अपने मीठे भाग्य के नशे में झूमती हुई मै आत्मा... सोच रही हूँ कि कब सोचा था... *यह जीवन ईश्वरीय हाथो में देवत्व की प्रतिमा सा सज जायेगा.*.. भगवान की सबसे सुन्दरतम रचना देवता बनकर मै आत्मा... सुखो की नगरी में राज्य करूंगी... *यह तो सपने भी नही थे,जो आज जीवन का... खुबसूरत सत्य बनकर, मुझे असीम ख़ुशी से सराबोर कर रहा है*.. जो भगवान की बपौती है.. वह सारी जागीरे मेरे द्वार पर सजी है... और *मै मालिक बनकर, उनका भरपूर लुत्फ़ उठाने वाली भाग्यवान हूँ.*.. स्वयं ईश्वर मेरे समक्ष उपस्थित है... और मै जो कहती हूँ करता जा रहा है... *मेरे हाथो में ईश्वरीय हाथ आ गया है, और कदमो तले सुख के फूल बिखरे है... वाह रे प्यारे भाग्य मेरे*...

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी प्रेम तरंगो में रूहानी बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... भगवान को पाने वाले खुबसूरत भाग्य के धनी हो... कितना मीठा भाग्य है की ईश्वर *पिता सम्मुख हाजिर नाजिर है... और स्वर्ग की सौगात हथेली पर सजाकर ले आये है.*. सदा इन मीठी यादो में रहकर, अपने मीठे भाग्य के नशे में झूम जाओ... सदा अपार खुशियो में मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से ईश्वरीय जागीर को अपनी बाँहों में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपको पाकर, जमी आसमाँ को बाँहों में समाकर मुस्करा रही हूँ... *मुझे दिव्यता से संवारने, अपना सब कुछ मुझे देने, भगवान धरती पर आ गया है.*.. यह मेरे भाग्य की कितनी निराली शान है..और भला मुझे क्या चाहिए..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान योग से श्रंगारित कर देवात्मा बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे,... सदा मीठी खुशियो में नाचते रहो... कि *ईश्वर की गोद में पलने वाली, उनकी बाँहों में झूलने वाली, शानदार किस्मत की धनी, मै आत्मा हूँ..*.मीठा बाबा असीम सुखो का उपहार बहिश्त... आपके लिए ही तो लाया है... इससे बड़ी ख़ुशी भला और क्या होगी... सदा इन मीठी स्मर्तियो में डूबे रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा से सर्व शक्तियो की मालिक बनकर कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा... मै आत्मा भगवान को पाकर भी खुश नही रहूंगी, तो भला कब रहूंगी... यही तो मेरी जनमो की चाहत थी... कि मात्र एक झलक मै आत्मा भगवान की पाऊं... *आज साक्षात् भगवान के सम्मुख बेठ, अथाह ज्ञान रत्नों से मालामाल हो रही हूँ... यह कितना अनोखा मेरा भाग्य है.*.."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को खुशनसीब आत्मा के नशे से भरते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता परमधाम से उतरकर, सारे खजाने और खानों को लेकर, सुखो और खुशियो से लबालब करने आये है... तो इन मीठी प्राप्तियों की यादो में रहकर... सदा खुशियो के शिखर पर सजे रहो... *भगवान गुणो और शक्तियो के सौंदर्य से, खुबसूरत बना रहा है... इन सच्ची खुशियो में सदा पुलकित रहो.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के  प्यार में खुशनुमा फूल बनकर, खिलते हुए कहती हूँ:-* मीठे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा सच्ची खुशियो को सदा ही तरसती रही... देह की मिटटी में लथपथ होकर, आपसे पायी सुखो की जागीर को खो चुकी थी... *अब भाग्य ने मुझे वरदानी संगम युग में पुनः आपसे मिलवाकर.. असीम खुशियो से जीवन सजाया है.*..आपको पाकर मैंने तो सब कुछ पा लिया है..." मीठे बाबा से खुशियो की सम्पत्ति लेकर मै आत्मा... अपने कर्मक्षेत्र में आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  देह अभिमान में आकर कोई भी विकर्म नही करना है*

 

_ ➳  स्वराज्यअधिकारी की सीट पर सेट होकर, अपनी कर्मेन्द्रियों की राजदरबार लगाकर मैं चेक कर रही हूँ कि सभी कर्मेन्द्रियाँ सुचारू रूप से कार्य कर रही हैं! *यह चेकिंग करते - करते मैं मन ही मन विचार करती हूँ कि पूरे 63 जन्म इन कर्मेन्द्रियों ने मुझ आत्मा राजा को अपना गुलाम बना कर ना जाने मुझ से क्या - क्या विकर्म करवाये*। इन विकर्मो का बोझ मुझ आत्मा के ऊपर इतना अधिक हो गया कि मैं अपने सत्य स्वरुप को ही भूल गई। मैं आत्मा अपना ही स्वधर्म, जो कि सदा शान्त और सुखमय है, उसे भूल कितनी दुखी और अशांत हो गई। किन्तु अब जबकि मेरे प्यारे पिता ने आकर मुझे फिर से मेरे सत्य स्वरूप की पहचान दे दी है कि मैं आत्मा कर्मेन्द्रियों की गुलाम नही हूँ, मैं तो राजा हूँ।

 

_ ➳  इसलिए इस सत्य पहचान के साथ अब मुझे स्व स्वरूप में सदा स्थित रहकर, इन कर्मेन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रखना है। *पुराने स्वभाव संस्कारो के कारण अगर कभी मन मे कोई विकल्प उतपन्न होता भी है तो भी मुझे कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नही होने देना है और यह तभी होगा जब मैं सदैव स्व स्वरूप की स्थिति में स्थित रहूँगी*। मन ही मन यह चिन्तन करते हुए अपने स्व स्वरूप में स्थित होकर अब मैं अपने ही स्वरूप को देखने मे मगन हो जाती हूँ। सातों गुणों और अष्ट शक्तियों से सम्पन्न अपने अति सुन्दर निराकारी स्वरूप को मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्र से देख रही हूँ। *दोनों आईब्रोज के बीच मस्तक पर चमकता हुए एक चैतन्य सितारे के रूप में मुझे मेरा यह स्वरूप बहुत ही लुभायमान लग रहा है*। देख रही हूँ 7 रंगों की रंगबिरंगी किरणों को मैं अपने मस्तक से निकलते हुए जिसका भीना - भीना प्रकाश मन को आनन्दित कर रहा है।

 

_ ➳  इस प्रकाश में विद्यमान वायब्रेशन्स धीरे - धीरे मस्तक से बाहर निकल कर मेरे चारो और फैल कर मेरे आस पास के वायुमण्डल को शुद्ध और पावन बना रहे हैं।  वातावरण में एक दिव्य रूहानी खुशबू फैलती जा रही है, जो मुझे देह से डिटैच कर रही है। *देह, देह की दुनिया, देह के वैभवों, पदार्थो को भूल अब मैं पूरी तरह से अपने स्वरूप में स्थित हो गई हूँ और बड़ी आसानी से अपने अकाल तख्त को छोड़, देह से बाहर आ गई हूँ*। देह से बाहर आकर देख रही हूँ अब मैं स्वयं को देह से बिल्कुल न्यारे स्वरूप में। हर बन्धन से मुक्त इस डबल लाइट स्वरूप में स्थित होकर अब मैं धीरे - धीरे ऊपर की और जा रही हूँ।

 

_ ➳  मन बुद्धि की एक खूबसूरत रूहानी यात्रा पर चलते - चलते मैं पांचो तत्वों की साकारी दुनिया को पार कर पहुँच गई हूँ आकाश से ऊपर और इससे भी ऊपर सौरमण्डल, तारामण्डल को पार करके, सूक्ष्म लोक से होकर अब मैं अपनी निराकारी दुनिया मे आ गई हूँ। *इस अनन्त प्रकाशमय अंतहीन निर्वाणधाम घर में अब मैं विचरण कर रही हूँ और यहाँ फैले शान्ति के वायब्रेशन्स को स्वयं में समाकर डीप साइलेन्स का अनुभव कर रही हूँ*। यह डीप साइलेन्स की अनुभूति मुझे ऐसा अनुभव करवा रही है जैसे मैं शांति की किसी गहरी गुफा में बैठी हूँ जहाँ संकल्पो की भी कोई हलचल नही। शांति की गहन अनुभूति करके अब मैं सर्वगुणों, सर्वशक्तियों के सागर अपने प्यारे पिता के पास पहुँचती हूँ । *एक अति प्रकाशमय ज्योतिपुंज के रूप में अपने शिव पिता को मैं अपने सामने देख रही हूँ*।

 

_ ➳  उनके सानिध्य में गहन सुख और शांति की अनुभूति करते हुए मैं उनके बिल्कुल समीप पहुँच कर उन्हें टच करती हूँ। सर्वशक्तियों की तेज धारायें मुझ आत्मा में प्रवाहित होने लगती है और मुझ आत्मा पर चढ़े विकर्मो की कट उतरने लगती है। *पुराने सभी स्वभाव संस्कार सर्वशक्तियों की तेज आंच से जलने लगते हैं और मैं आत्मा स्वयं को एकदम हल्का अनुभव करने लगती हूँ*। मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकर्मो की कट को उतारने के साथ - साथ, कर्मेन्द्रियों पर जीत पाने के लिए बाबा अपनी सर्वशक्तियों का बल मेरे अंदर भरकर मुझे शक्तिशाली बना रहे हैं। सर्व शक्तियों से भरपूर होकर मैं आत्मा अब वापिस साकारी दुनिया की ओर लौट रही हूँ।

 

_ ➳  अपने साकार तन में भृकुटि के भव्यभाल पर मैं आत्मा फिर से विराजमान हूँ और इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अपना पार्ट बजा रही हूँ। हर कर्म अब मैं बाबा को अपने साथ रखकर, कम्बाइंड होकर करती हूँ। *बाबा की याद मेरे चारों और शक्तियों का एक ऐसा सुरक्षा कवच बना कर रखती है जिससे मैं आत्मा माया के धोखे से सदा बची रहती हूँ*। अपनी शक्तिशाली स्व स्थिति में अब मैं सदा स्थित रहती हूँ। मनसा में कोई विकल्प कभी आ भी जाये तो भी परमात्म बल के प्रयोग द्वारा, कर्मेन्द्रियों पर जीत पाकर, उनसे कोई भी विकर्म अब मैं कभी भी नही होने देती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मन की स्वतन्त्रता द्वारा सर्व आत्माओं को शान्ति का दान देने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मन्सा महादानी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा स्नेह रूप का अनुभव सुनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा शक्ति रूप का अनुभव सुनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा स्नेह स्वरूप और शक्ति स्वरूप हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

 

➳ _ ➳  आज बापदादा अपने राज्य दरबार वासी साथियों को देख रहे थे। सभी यहाँ पहुँच गये हैं। आज की सभा में विशेष स्नेही आत्मायें ज्यादा हैं तो स्नेही आत्माओं को बापदादा भी स्नेह के रिटर्न में स्नेह देने के लिए स्नेह ही दरबार में पहुँच गये हैं। मिलन मेला मनाने के उमंग उत्साह वाली आत्मायें हैं। *बापदादा भी मिलन मनाने के लिए बच्चों के उत्साह भरे उत्सव में पहुँच गये हैं। यह भी स्नेह के सागर और नदियों का मेला है*। तो मेला मनाना अर्थात् उत्सव मनाना। आज बापदादा भी मेले के उत्सव में आये हैं।

 

➳ _ ➳  बापदादा मेला मनाने वालेस्नेह पाने के भाग्यशाली आत्माओं को देख हर्षित हो रहे हैं कि सारे इतने विशाल विश्व में अथाह संख्या के बीच कैसी-कैसी आत्माओं ने मिलन का भाग्य ले लिया! *विश्व के आगे ना उम्मीदवार आत्माओं ने अपनी सर्व उम्मीदें पूर्ण करने का भाग्य ले लिया*। और जो विश्व के आगे नामीग्रामी उम्मीदवार आत्मायें हैं वह सोचती और खोजती रह गई। *खोजना करते-करते खोज में ही खो गये*। और *आप स्नेही आत्माओं ने स्नेह के आधार पर पा लिया*। तो श्रेष्ठ कौन हुआ?

 

 ✺   *"ड्रिल :- अपने श्रेष्ठ भाग्य के नशे में रहना*"

 

➳ _ ➳  *आकाश में पल-पल रूप बदलते बादलों के घूँघट से झाँकता पूनम का चाँद... और बिखरी हुई चाँदनी से पूरी तरह पारदर्शी हो चुके बादल... ठीक ऐसे ही इस नश्वर देह के भीतर अपनी आभा बिखेरती चन्द्रमा  रूपी मणि के समान मैं आत्मा... शीतलता पावनता और प्रेम की किरणे फैलाती हुई देह को इन्द्रधनुषी आभा से भरपूर कर रही हूँ...* मेरा प्रकाश और दिव्यता बढती जा रही है... और बढते-बढते पहुँच गयी है उस स्तर पर जहाँ से देह रूपी बदली अपना घूँघट हटा लेने को मजबूर हो गयी है... देहभान से मुक्त मैं आत्मा मन बुद्धि के पंखों से उडती जा रही हूँ परम धाम की ओर... सब कुछ पीछे छोडती हुई... स्थूल और सूक्ष्म की टाल टालियाँ, तेरा मेरा, ऊँचा, नीचा की अट्टालिकाए और क्या, कब, क्यूँ, कहाँ जैसे शिखरों की घेरावलियाँ... *मैं आत्मा आज स्नेह निमन्त्रण देने जा रही हूँ अपने शिव प्रियतम को... बस एक ही संकल्प लिए, भेज रहे है स्नेह निमन्त्रण प्रियतम तुम्हें बुलाने  को... हे मानस के राजहंस! तुम भूल न जाना आने को*...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा पहुँच गयी हूँ परमधाम में असंख्य फुलझडियों के बीच... शान्ति की रश्मियाँ प्रवाहित करती, ये फुलझडियाँ शिव बिन्दु के असीम स्नेह सागर में समाई हुई है... दो पल के लिए उस स्नेह को स्वयं में समाती हुई... और *संकल्पों से ही साकार मिलन का निमन्त्रण देती हुई, मैं उन्हें छूकर वापस लौट आयी हूँ डायमंड हाँल में*...

 

➳ _ ➳   डायंमड हाॅल, जिसमें बापदादा के इन्तजार में असंख्य फरिश्तें पलके बिछाए हुए है इस महामिलन के लिए... *संगम पर सागर और नदियों का मेला और मेले में भविष्य राज्यधिकारी स्नेही आत्माएं फरिश्ता रूप में*... हर किसी का स्नेह में डूबा संकल्प... *सखि! जब उतरें आज धरा पर वो तो, मैं अखियों में उतार लूँगी, गिराकर परदे पलकों के उनको न जाने दूँगी*...

 

➳ _ ➳  और तभी साकारी रथ में बापदादा की पधरामणि... अद्भुत नज़ारा है ये सदी का, गहन नीरवता... मगर... *मीठी-सी सरगम है, मौन भी गुनगुना रहा है*... *मेरा बाबा का गीत धडकनों को भा रहा है... दर-दर भटके है जिसकी एक झलक पाने को... सदियों की तलाश, सदियों की भटकन को एक नया आयाम मिल गया है, सौभाग्य बरसा है इस कदर मेहरबाँ होकर अब रहमतों का सिलसिला सा चल गया है*...

 

➳ _ ➳  *मैं अति श्रेष्ठ भाग्यशाली आत्मा अपने भाग्य का गीत गाती हुई मगन अवस्था में*... स्टेज से बाप दादा  एक-एक आत्मा को दृष्टि देते हुए... और मुझ पर आते ही उनकी नजरों का ठहर जाना... जमाने भर का स्नेह, वात्सल्य, प्रेम सभी कुछ तो उडेल कर रख दिया है आज उन्होनें... दो नैनों से स्नेह की ऐसी धारा फूटी है कि सम्पूर्ण डायमंड हाॅल स्नेह सागर से भरपूर हो रहा है स्नेह का दरिया मानो उफन रहा है... सारे जग के पालन हार को स्टेज पर भोग स्वीकार कराया जा रहा है... अभोक्ता बाबा आज बच्चों के हाथों भोग स्वीकार रहा है...

 

➳ _ ➳  एक दृश्य मंच पर है और दूसरा मेरी आँखों के सामने... *मेरे बाबा चलकर आ गए है मेरे करीब और मुझे खिलाकर, मेरे हाथों से भोग स्वीकार कर रहे है मेले में भी हम दोनो अकेले है... मेरे बाबा सिर्फ मेरे साथ है*... मुझे स्वराज्य अधिकारी का तिलक दे रहे है... (मंच पर से बाबा के जाने की सूचना)... *मगर मैने तो पलके बन्द कर कैद कर लिया है उनको सदा सदा के लिए*... *मै जाने न दूँगी अब कैद हुए हो पलको में ठाकुर*... जाकर तो दिखाओं इस दिल और धडकन से दूर... और मैं मगन हूँ, अपने श्रेष्ठ भाग्य के नशे में... ये नशा शाश्वत नशा है... दिल यही अनहद धुन गुनगुना रहा है... *जो चढती उतरती है मस्ती, वो हकीकत में मस्ती नही है, जिन नजरों में तुम हो बसते, वो नजर फिर तरसती नही है*... और मैं संगम पर सदा परमात्म मिलन मनाती हुई *अपने श्रेष्ठ भाग्य के नशे में चूर आत्मा अपनी देह में वापस लौट आयी हूँ*... ओम शान्ति...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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