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 06 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बाप समान मास्टर ज्ञान सागर बनकर रहे ?*

 

➢➢ *हीरे जैसा अबने और बनाया ?*

 

➢➢ *श्रेत्श और शुभ वृत्ति द्वारा वाणी और कर्म को श्रेष्ठ बनाया ?*

 

➢➢ *विदेही व अशरीरी बनने का अभ्यास किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  पहले अपनी देह के लगाव को खत्म करो तो संबंध और पदार्थ से लगाव आपे ही खत्म हो जायेगा। *फरिश्ता बनने के लिए पहले यह अभ्यास करो कि यह देह सेवा अर्थ है, अमानत है, मैं ट्रस्टी हूँ। फिर देखो, फरिश्ता बनना कितना सहज लगता है!*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाबा की आँखों का तारा हूँ"*

 

  सदा अपने को कौनसे सितारे समझते हो? (सफलता के सितारे, लक्की सितारे, चमकते हुए सितारे, उम्मीदों के सितारे) बाप की आंखों के तारे। तो नयनों में कौन समा सकता है? जो बिन्दु है। *आंखों में देखने की विशेषता है ही बिन्दु में। जितना यह स्मृति रखेंगे कि हम बाप के नयनों के सितारे हैं, तो स्वत: ही बिन्दु रूप होंगे।* कोई बड़ी चीज आंखों में नहीं समायेगी। स्वयं आंख ही सूक्ष्म है, तो सूक्ष्म आंख में समाने का स्वरूप ही सूक्ष्म है। बिन्दु-रूप में रहते हो? यह बड़ा लम्बा- चौड़ा शरीर याद आ जाता है?

 

  बापदादा ने पहले भी सुनाया था कि हर कर्म में सफलता वा प्रत्यक्षफल प्राप्त करने का साधन है-रोज अमृतवेले तीन बिन्दु का तिलक लगाओ। तो तीन बिन्दु याद हैं ना। लगाना भी याद रहता है? *क्योंकि अगर तीनों ही बिन्दी का तिलक सदा लगा हुआ है तो सदैव उड़ती कला का अनुभव होता रहेगा। कौनसी कला में चल रहे हो? उड़ती कला है? या कभी उड़ती, कभी चलती, कभी चढ़ती? सदा उड़ती कला। उड़ने में मजा है ना। या चढ़ने में मजा है?* चारों ओर के वायुमण्डल में देखो कि समय उड़ता रहता है। समय चलता नहीं है, उड़ रहा है। और आप कभी चढ़ती कला, कभी चलती कला में होंगे तो क्या रिजल्ट होगी? समय पर पहुँचेंगे? तो पहुँचने वाले हो या पहुँचने वालों को देखने वाले हो? सभी पहुँचने वाले हो, देखने वाले नहीं। तो सदा उड़ती कला चाहिए ना।

 

  उड़ती कला का क्या साधन है? बिन्दु रूप में रहना। डबल लाइट। बिन्दु तो है लेकिन कर्म में भी लाइट। डबल लाइट हो तो जरूर उड़ेंगे। आधा कल्प बोझ उठाने की आदत होने कारण बाप को बोझ देते हुए भी कभी-कभी उठा लेते हैं। तंग भी होते हो लेकिन आदत से मजबूर हो जाते हो। कहते हो 'तेरा' लेकिन बना देते हो 'मेरा'। *स्वउन्नति के लिए वा विश्व-सेवा के लिए कितना भी कार्य हो वह बोझ नहीं लगेगा। लेकिन मेरा मानना अर्थात् बोझ होना। तो सदैव क्या याद रखेंगे? मेरा नहीं, तेरा। मन से, मुख से नहीं। मुख से तेरा-तेरा भी कहते रहते हैं और मन से मेरा भी मानते रहते हैं। ऐसी गलती नहीं करना।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *संसार में एक सम्बन्ध, दूसरी है सम्पति। दोनों विशेषतायें बिन्दू बाप में समाई हुई हैं।* सर्व सम्बन्ध एक द्वारा अनुभव किया है? सर्व सम्पत्ति की प्राप्ति सुख-शान्ति, खुशी यह भी अनुभव किया है या अभी करना है? तो क्या हुआ? विस्तार सार में समा गया ना!

 

✧  *अपने आप से पूछो अनेक तरफ विस्तार में भटकने वाली बुद्धि समेटने के शक्ति के आधार पर एक में एकाग्र हो गई है?* वा अभी भी कहाँ विस्तार में भटकती है! समेटने की शक्ति और समाने की शक्ति का प्रयोग किया है? या सिर्फ नॉलेज है। अगर इन दोनों शक्तियों को प्रयोग करना आता है तो उसकी निशानी सेकण्ड में जहाँ चाहो जब चाहो बुद्धि उसी स्थिति में स्थित हो जायेगी।

 

✧  जैसे स्थूल सवारी में पॉवरफुल ब्रेक होती है तो उसी सेकण्ड में जहाँ चाहें वहाँ रोक सकते हैं। जहाँ चाहें वहाँ गाडी को या सवारी को उसी दिशा में ले जा सकते हैं। ऐसे स्वयं यह शक्ति अनुभव करते हो वा एकाग्र होने में समय लगता है? वा व्यर्थ से समर्थ की ओर बुद्धि को स्थित करने में मेहनत लगती है? *अगर समय और मेहनत लगती है तो समझो इन दोनों शक्तियों की कमी है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ विदेही बापदादा को देह का आधार लेना पड़ता है। किसलिए? बच्चों को भी विदेही बनाने के लिए। जैसे बाप विदेही, देह में आते हुए भी विदेही स्वरूप में, विदेहीपन का अनुभव कराते है। ऐसे आप सभी जीवन में रहते, *देह में रहते विदेही आत्म-स्थिति में स्थित हो इस देह द्वारा करावनहार बन करके कर्म कराओ। यह देह करनहार है। आप देही करावनहार हो। इसी स्थिति को 'विदेही स्थिति' कहते हैं। इसी को ही फालो फादर कहा जाता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  यह संगम हीरे समान है, यहाँ कौड़ी से हीरे जैसा बनना"*

 

_ ➳  आँगन में कौड़ी खेलते बच्चों को देख मै आत्मा... मुस्कराती हूँ... और मुझे भी कौड़ी से हीरे जैसा बनाने वाले... मीठे बाबा की यादो में डूब जाती हूँ... अपने प्यारे बाबा से मीठी मीठी बाते करने... मीठे वतन में पहुंचती हूँ... प्यारे बाबा रत्नागर को देख ख़ुशी से खिल जाती हूँ... और मीठे बाबा के प्यार में डूबकर... अपनी ओज भरी चमक, मीठे बाबा को दिखा दिखाकर लुभाती हूँ... *देखो मीठे बाबा... मै आत्मा आपके साये में कितनी प्यारी, चमकदार और हीरे जेसी अमूल्य हो गयी हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने महान भाग्य का नशा दिलाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता धरती पर अपने फूल बच्चों के लिए अमूल्य खजानो और शक्तियो को हथेली पर सजा कर आये है.*.. इस वरदानी समय पर कौड़ी से हीरो जैसा सज जाते हो... और यादो की अमीरी से, देवताई सुखो की बहारो भरा जीवन सहज ही पाते हो...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के ज्ञान खजाने से स्वयं को लबालब करते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... आपको पाकर तो मुझ आत्मा ने जहान पा लिया है... देह और दुखो की दुनिया में कितनी निस्तेज और मायूस थी... *आपने आत्मा सितारा बताकर मुझे नूरानी बना दिया है... फर्श उठाकर अर्श पर सजा दिया है*.."

 

  *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अपने नेह की धारा में भिगोते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले प्यारे बच्चे... अपने प्यारे से भाग्य को सदा स्मर्तियो में रख खुशियो में मुस्कराओ... ईश्वर पिता का साथ मिल गया... भगवान स्वयं गोद में बिठाकर पढ़ा रहा... सतगुरु बनकर सदगति दे रहा... *एक पिता को पाकर सब कुछ पा किया है... निकृष्ट जीवन से श्रेष्ठतम देवताई भाग्य पा रहे हो*..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की अमीरी को अपनी बाँहों में भरकर मुस्कराते हुए कहती हूँ :-* "मेरे सच्चे साथी बाबा... आपने आकर मेरा सच्चा साथ निभाया है... दुखो के दलदल से मुझे हाथ देकर सुखो के फूलो पर बिठाया है... *सच्चे स्नेह की धारा में मेरे कालेपन को धोकर... मुझे निर्मल, धवल बनाया है.*.. मुझे गुणवान बनाकर हीरे जैसा चमकाया है..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को काँटों से फूल बनाते हुए कहा :-* " मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... भगवान के धरती पर उतर आने का पूरा फायदा उठाओ... ईश्वरीय सम्पत्ति को अपना अधिकार बनाकर, सदा की अमीरी से भर जाओ... *ईश्वर पिता के साये में गुणवान, शक्तिवान बनकर, हीरे जैसा भाग्य सजा लो..*. और सतयुगी दुनिया में अथाह सुख लुटने की सुंदर तकदीर को पाओ...

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने दुलारे बाबा को दिल से शुक्रिया करते हुए कहती हूँ :-* "मनमीत बाबा मेरे... विकारो के संग में, मै आत्मा जो कौड़ी तुल्य हो गयी थी... *आपने उस कौड़ी को अपने गले से लगाकर, हीरे में बदल दिया है.*.. मै आत्मा आपके प्यार की रौशनी में, कितनी प्यारी चमकदार बन गयी हूँ... अपनी खोयी चमक को पुनः पाकर निखर गयी हूँ..."मुझे हीरे सा सजाने वाले खुबसूरत बनाने वाले रत्नागर बाबा... को दिल से धन्यवाद देकर मै आत्मा.. स्थूल वतन में आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप समान मास्टर ज्ञान सागर बनना है*"

 

_ ➳  ज्ञान सागर में डुबकी लगाकर, ज्ञान गंगा बन ज्ञान के शीतल जल से पतितों को पावन बनाने की सेवा करने के लिए मैं ज्ञान के सागर, *पतित पावन अपने शिव पिता परमात्मा की याद में अपने मन बुद्धि को एकाग्र करती हूँ और अंतर्मुखता की एक ऐसी यात्रा पर चल पड़ती हूँ जो मुझे सीधी ज्ञान सागर मेरे प्यारे पिता के पास ले जायेगी*। अंतर्मुखता की इस अति सुन्दर लुभावनी यात्रा पर अनेक सुन्दर अनुभवों की खान अपने साथ लेकर मैं इस यात्रा का आनन्द लेते हुए देह के आकर्षण से स्वयं को मुक्त कर विदेही बन अब नश्वर देह से बाहर निकलती हूँ और ऊपर की ओर चल पड़ती हूँ। 

 

_ ➳  अपने अति सुंदर, उज्ज्वल स्वरूप में, दिव्य गुणों की महक चारों और फैलाते हुए, ज्ञान सागर अपने शिव पिता से मिलने की लगन में मगन मैं आत्मा ज्ञान और योग के सुंदर पंख लगा कर, उस रास्ते पर उड़ती जा रही हूँ जो मेरे स्वीट साइलेन्स होम को जाता है। *आनन्द से भरपूर, ज्ञान की रूहानी अलौकिक मस्ती में डूबी मैं आत्मा पंछी समस्त पृथ्वी लोक का चक्कर लगा कर, नीले गगन को पार करते हुए, फ़रिशतो की दुनिया से भी परें, अपने स्वीट साइलेन्स होम में प्रवेश करती हूँ*। 

 

_ ➳  गहन शांति की यह दुनिया जहाँ अशांत करने वाली कोई बात नही, ऐसे अपने शांतिधाम घर मे पहुंच कर, गहन शांति का अनुभव करते - करते मैं आत्मा अपने बुद्धि रूपी बर्तन को ज्ञान से भरपूर करने के लिए अब अपने ज्ञान सागर बाबा की सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे जाकर बैठ जाती हूँ। *अनन्त रंग बिरंगी किरणों के रूप में ज्ञान सागर मेरे शिव पिता के ज्ञान की वर्षा मुझ पर हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा ज्ञान की शक्तिशाली किरणे मुझ आत्मा में प्रवाहित कर मुझे आप समान मास्टर ज्ञान का सागर बना रहे हैं*। ज्ञान रत्नों से मैं भरपूर होती जा रही हूँ।

 

_ ➳  अपनी बुद्धि रूपी झोली में ज्ञान का अखुट भण्डार जमा कर, ज्ञान गंगा बन पतितों को पावन बनाने की सेवा करने के लिए अब मैं परमधाम से नीचे आती हूँ और अपने फ़रिश्ता स्वरूप को धारण कर विश्व ग्लोब पर बैठ बापदादा का आह्वान करती हूँ। *बापदादा की छत्रछाया को अपने ऊपर अनुभव करते हुए, बापदादा के साथ कम्बाइन्ड होकर अब ज्ञान सागर अपने शिव पिता से ज्ञान की अनन्त किरणों को स्वयं में भरकर, फिर उन्हें चारों और फैला रही हूँ*। मुझ ज्ञान गंगा से निकल रही ज्ञानअमृत की शीतल धारायें मुझ से निकल कर विश्व की सर्व आत्माओं के ऊपर पड़ रही है और उन्हें विकारों की तपन से मुक्त कर, गहन शीतलता का अनुभव करवा रही है।

 

_ ➳  विश्व की सर्व आत्माओं पर ज्ञान वर्षा करके, मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होती हूँ और ज्ञान गंगा बन सबको यह सच्चा ज्ञान देकर उन्हें पावन बनाने की सेवा के लिए चल पड़ती हूँ। *मुरली के माध्यम से बाबा जो अविनाशी ज्ञान रत्न हर रोज मुझे देते हैं उन अविनाशी ज्ञान रत्नों से अपनी बुद्धि रूपी झोली को भरकर, उन्हें कण्ठ कर, सबको उन ज्ञान रत्नों का मैं दान करती रहती हूँ*। अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को इस सत्य ज्ञान रूपी गंगा जल से पावन बनाने की सेवा करते हुए, सबको ज्ञान सागर उनके शिव पिता से मिलाने की प्रतिज्ञा को पूरा करने के पुरुषार्थ में अब मैं निरन्तर लगी रहती हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं श्रेष्ठ और शुभ वृत्ति द्वारा वाणी और कर्म को श्रेष्ठ बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व परिवर्तक आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव विदेही वा अशरीरी बनने का अभ्यास करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा किसी के भी मन के भाव को जान लेती हूँ  ।*

   *मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  हर एक बच्चा निश्चय और फलक से कहते हैं कि *मेरा बाबा मेरे साथ है।*

➳ _ ➳  कोई भी पूछे परमात्मा कहाँ हैतो क्या कहेंगेमेरे साथ है। *फलक से कहेंगे कि अब तो बाप भी मेरे बिना रह नहीं सकता। तो इतने समीपसाथी बन गये हो।* आप भी एक सेकण्ड भी बाप के बिना नहीं रह सकते हो।

➳ _ ➳  बापदादा बच्चों का यह खेल भी देखते रहते हैं कि *बच्चे एक तरफ कह रहे हैं मेरा बाबामेरा बाबा और दूसरे तरफ किनारा भी कर लेते हैं।*

➳ _ ➳  बाप को देखने की दृष्टि बन्द हो जाती है और माया को देखने की दृष्टि खुल जाती है। तो *आंख मिचौनी खेल कभी-कभी खेलते होबाप फिर भी बच्चों के ऊपर रहमदिल बन माया से किसी भी ढंग से किनारा करा लेता है। वो बेहोश करती और बाप होश में लाता है कि तुम मेरे हो। बन्द आंख याद के जादू से खोल देते हैं।*

✺   *ड्रिल :-  "बाबा की मदद से माया से किनारे का अनुभव"*

➳ _ ➳  *नीले आसमान सी चुनरिया और सिंदूरी श्याम सी बिंदिया, पेड़ पत्तों की खनखनाहट है हाथों में और मुख पर सुर्ख हवाओं का पर्दा गिरा कर देखो यह प्रकृति कितनी मुस्कुरा रही है... दूर एक छोटे से टापू पर बैठ कर मैं आत्मा यह नजारा देख रही हूं...  और मुझे यह प्रकृति इस श्रृंगार में अति मनमोहक लग रही है...* यह दृश्य मुझे अति आनंदित अनुभव करा रहा है... और इसी आनंद की स्थिति में मैं और गहराई में चली जाती हूं... और पहुंच जाती हूं आबू पर्वत... जहां पर बाबा के बच्चे फरिश्ते की तरह निमित्त भाव से सेवा करते नजर आ रहे हैं... मैं उनको और उनके सेवाभाव को तथा उनकी बाबा से लगन को जानने के लिए उनके पास जाकर गहराई से उनके मनोभाव को जानने का प्रयास करती हूं...

➳ _ ➳  और जैसे ही मैं आत्मा उन फरिश्तों रूपी बाबा के बच्चों के पास जाती हूँ... तो मुझे यह ज्ञात होता है कि... उन सभी ब्राहमण आत्माओं के पास एक चाबी है... जिसका नाम है *मेरा बाबा और जिसके कारण वह आत्माएं हर बंद ताले को खोल सकती है... और अपने हर कार्य में सफल हो जाती है...* मैं उन आत्माओं से पूछती हूं... कि क्या यह चाबी आपके पुरुषार्थ में तुम्हारी मदद करती है... तो वह आत्माएं हमें कहती है... हमारे सामने चाहे कोई भी परिस्थिति आए... चाहे कितनी भी खुशी रहे इस मेरे बाबा रूपी चाबी को कभी नहीं भूलती... जिसके कारण हम आत्माएं फरिश्ते रूप में अपने आप को सहज ही अनुभव कर निमित्त सेवाधारी का पार्ट बजा पा रही हैं...

➳ _ ➳  फिर मैं उन फरिश्तों रूपी आत्माओं को इस स्थिति में देखकर मैं आत्मा पहुंच जाती हूं मन बुद्धि से उसी स्थान पर... जहां से मुझे यह प्रकृति अति मनमोहक लग रही है... और उसी टापू पर बैठकर मैं सोचने लगती हूँ... की बाबा मुझे रोज सच्चा ज्ञान दे रहे हैं, मुझे माया से जीतना सिखा रहे हैं... अपना घर शांति धाम छोड़ कर... *यहां कलियुगी दुनिया में आकर मुझे इस कलियुग की दुनिया से निकालकर सुखधाम ले जाने के लिए आए हैं... तो मेरा भी यह पूरा-पूरा कर्तव्य होना चाहिए... कि मेरे दिल में सिर्फ और सिर्फ मेरा प्यारा बाबा ही हो ना कि कोई और... अगर मैं हमेशा इन फरिश्तों की भांति अपने आप को देखना चाहती हूं... और सभी दुख दर्द से छुटकारा पाना चाहती हूं... तो मुझे भी इस मेरे बाबा रूपी चाबी का शत प्रतिशत उपयोग करना होगा...* मैं अपने आप से यह दृढ़ संकल्प करती हूं कि... आज से मेरे दिल में मेरे हर संकल्प में सिर्फ और सिर्फ मेरा प्यारा बाबा ही होगा...

➳ _ ➳  और जैसे ही मैं अपने आपसे यह वादा करती हूं... तो मैं अनुभव करती हूं... कि मैं इस सृष्टि की सबसे सौभाग्यशाली आत्मा हूं... क्योंकि मुझे स्वयं परमपिता सच्चा ज्ञान दे रहे हैं... और अपनी गोद में बिठाकर  मायावी दुनिया से मुझे बचा रहे हैं... और जैसे ही मुझे इस स्थिति का अपने अंदर पूर्ण आभास होता है... तो मैं देखती हूं की मेरे सामने स्वयं बापदादा खड़े होकर मुस्कुरा रहे हैं... बाबा का मुस्कुराता हुआ चेहरा देख मैं अपनी मुस्कान कभी रोक नहीं पाती और मैं बाबा से कहती हूं... मेरे मीठे बाबा मैं बार-बार आपका हाथ छोड़ कर माया के पास चली जाती हूं... और माया मुझे बेहोश कर देती है... परंतु मेरे मीठे बाबा इस मायावी बेहोशी से हर बार मेरे खिवैया बनकर... आप मुझे इस विषय सागर से निकाल ही लेते हो... और मैं कहती हूं... *बाबा आप हार नहीं मानते तो मैं भी आपकी बच्ची हूं... मैं भी हार नही मानूंगी... और हमेशा आपका नाम लेकर आपके नाम के सहारे से मैं इस विषय सागर से निकलकर किनारे पर आ जाऊंगी...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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