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 06 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कर्मेन्द्रियजीत बनकर रहे ?*

 

➢➢ *मन को जहां और जितना समय स्थित करने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *किसी भी व्यक्ति व वैभव ने अपनी तरफ आकर्षित तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *अमृतवेला श्रेष्ठ प्राप्तियों का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बीजरूप को सदा साथ रखो तो माया का बीज ऐसा भस्म हो जायेगा जो फिर कभी भी उस बीज से अंश भी नहीं निकल सकेगा।* वैसे भी आग में जले हुए बीज से कभी फल नहीं निकलता इसलिए बीज को छोड़ *सिर्फ शाखाओं को काटने की मेहनत नहीं करो। बीजरूप द्वारा विकारों के बीज को खत्म कर दो तो बार-बार मेहनत करने से स्वत: ही छूट जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को सदा स्वदर्शन चक्रधारी आत्मा अनुभव करते हो? स्व का दर्शन अर्थात् स्व की पहचान। अच्छी तरह से स्व को पहचान लिया कि मैं कौन हूँ? अपने को अच्छी तरह से पहचाना है? सिर्फ मैं आत्मा हूँ-यह जानना ही जानना नहीं है लेकिन मैं कौन-सी आत्मा हूँ? ये स्मृति रहती है? आपके कितने टाइटल हैं? (बहुत हैं) तो टाइटल याद रहते हैं या भूल जाते हैं? कभी याद रहते हैं, कभी भूल जाते हैं? माया हार भी खिलाती रहे और कहते रहो कि मैं महावीर हूँ, ऐसे तो नहीं? *क्योंकि जो टाइटल बाप द्वारा मिले हैं वह हैं ही स्थिति में स्थित होने के लिये। तो जैसे टाइटल याद आये वैसी स्थिति बन जाये। वैसी स्थिति बनती है या हिलती रहती है? जैसे लौकिक दुनिया में अगर कोई टाइटल मिलता है तो टाइटल के साथ-साथ वह सीट भी मिलती है ना।*

 

✧  समझो जज का टाइटल मिला, तो वह जज की सीट भी मिलेगी ना। अगर जज की सीट पर नहीं बैठे तो कौन मानेगा कि ये जज है। *अगर स्थिति नहीं है और सिर्फ बुद्धि में वर्णन करते रहते हो कि मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ, मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ और परदर्शन भी हो रहा है तो सीट पर सेट नहीं हुए ना। तो जो टाइटल स्मृति में लाते हो वैसी समर्थ स्थिति अवश्य चाहिये-तब कहेंगे कि हाँ यह स्वदर्शन चक्रधारी है, यह हीरो एक्टर है। एक्ट साधारण हो और कहे कि यह हीरो एक्टर है तो कौन मानेगा?* और सदा ये याद रखो कि ये टाइटल देने वाला कौन? दुनिया में कितना भी बड़ा टाइटल हो लेकिन आत्मा, आत्मा को देगी। चाहे प्रेजीडेन्ट है या प्राइम मिनिस्टर है, लेकिन है कौन? आत्मा है ना।

 

✧  संगम पर स्वयं बाप बच्चों को टाइटल देते हैं। कितना नशा चाहिये! यह रूहानी नशा रहता है? देहभान का नशा नहीं। क्रोध कर रहे हैं और कहे कि मैं तो हूँ ही नूरे रत्न, ऐसा नशा नहीं। ऐसे तो नहीं करते हो? मातायें क्या करती हैं? घर में खिटखिट कर रहे हो और कहो कि हम तो हैं ही बाबा की अचल-अडोल आत्मायें! ऐसे तो नहीं करते? *तो सदा अपने भिन्न-भिन्न टाइटल्स को स्मृति में रखो और उस स्थिति में स्थित होकर चलो फिर देखो कितना मजा आता है। स्वदर्शन चक्रधारी अर्थात् सदा मायाजीत। स्वदर्शन चक्रधारी के आगे माया हिम्मत नहीं रख सकती।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जैसे अभी भी कोई वाद-विवाद वाला आता है तो वाणी से और ज्यादा वाद-विवाद में आ जाता है। *उसको याद में बिठाए साइलेन्स की शक्ति का अनुभव कराते हो ना।*

 

✧  एक सेकण्ड भी अगर याद द्वारा शान्ति का अनुभव कर लेते हैं तो स्वयं ही अपनी वाद-विवाद की बुद्धि को साइलेन्स की अनुभूति के आगे सरेन्डर कर देते हैं तो इस *साइलेन्स की शक्ति का अनुभव बढ़ाते जाओ।* अभी यह साइलेन्स की शक्ति की अनुभूति बहुत कम है। साइलेन्स की शक्ति का रस अब तक मैजारिटी ने सिर्फ अंचली मात्र अनुभव किया है।

 

✧  हे शान्ति देवा! आपके भक्त आपके जड चित्रों से शान्ति का अल्पकाल का अनुभव करते हैं, ज्यादा करके मांगते भी शान्ति है क्योंकि शान्ति में सुख समाया हुआ है तो *बापदादा देख रहे थे कि शान्ति की शक्ति के अनुभवी आत्मायें कितनी हैं,* वर्णन करने वाली कितनी हैं और *प्रयोग करने वाली कितनी हैं।* इसके लिए - *'अन्तर्मुखता और एकान्तवासी' बनने की आवश्यकता है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ स्व-स्थिति की शक्ति से किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकते हो ना! *स्वस्थिति अर्थात् आत्मिकस्थिति। पर-स्थिति व्यक्ति व प्रकृति द्वारा आती है। अगर स्व-स्थिति शक्तिशाली है तो उसके आगे पर-स्थिति कुछ भी नहीं है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- रूहानी ड्रिल करना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा घर की छत पर खड़े होकर सामने स्कूल के मैदान में बच्चों को देख रही हूँ... सभी बच्चे सफ़ेद पोशाक में खड़े होकर ड्रिल कर रहे हैं... जैसे-जैसे ड्रिल मास्टर आदेश कर रहे, वैसे-वैसे ही बच्चे ड्रिल कर रहे हैं... *मैं आत्मा मीठे बाबा का आह्वान करती हूँ... मीठे बाबा मुझे अपने गोद में उठाकर ले चलते हैं सूक्ष्म वतन में... प्यारे बाबा ड्रिल मास्टर बनकर मुझे रूहानी ड्रिल सिखाते हैं... मैं आत्मा इस शरीर से डिटैच होकर अशरीरी बन बाबा की यादों में खो जाती हूँ...* 

 

  *मनमनाभव का मन्त्र देकर मुझे अशरीरी बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... अपने सत्य स्वरूप के नशे में गहरे डूब जाओ... *इस विकारी देह और देह के भान से स्वयं को मुक्त कर अशरीरी सच्चे वजूद की याद में खो जाओ... इस पराये शरीर के ममत्व से बाहर निकल अपने अविनाशी अस्तित्व की मस्ती में झूम जाओ...*

 

_ ➳  *रावण की प्रॉपर्टी इस तन से न्यारी होकर अपने अविनाशी स्वरुप में टिकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपने असली स्वरूप को पाकर धन्य हो गयी हूँ... *दुःख को ही जीवन का अटल सत्य समझने वाली शरीरधारी से... इस कदर खुबसूरत मणि बन मुस्करा रही हूँ...*

 

  *देह की दुनिया के दलदल से निकाल रूहानियत का इत्र लगाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... जिस लाल घर के लाल हो वहाँ यह पराया तन तो जा ही न सके... तो इससे फिर दिल लगाना ही क्यों... *इन झूठे नातो और विकारी सम्बन्धो के भँवर से ईश्वरीय यादो के सहारे बाहर निकल जाओ... और अपने खुबसूरत स्वरूप और सच्चे सौंदर्य को प्रतिपल याद करो...*

 

_ ➳  *सुख के सागर में सत्यता की नाव में बैठकर अपने घर की ओर रुख करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... आपने धरा पर आकर मुझ भूली भटकी आत्मा को आवाज देकर सुखो से संवार दिया है... *मै आत्मा तो दुखो के लिए हूँ ही नही और सदा सुख की अधिकारी हूँ... यह मीठा सत्य सुनकर मै आत्मा आपकी रोम रोम से ऋणी हो गयी हूँ...*

 

  *निराकारी बाबा मुझ आत्मा को आप समान निराकारी बनाते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... यह विकारी तन तो रावण का है यह कभी साथ जाना नही इसके मायाजाल से स्वयं को निकालो... *अपने अशरीरी के भान में खो जाओ और ईश्वर पिता की यादो में अपनी धुंधली सी हो गई रंगत को उसी ओज से भर लो...*

 

_ ➳  *बाबा की यादों से अपने जीवन के हर एक पल को मीठा बनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी प्यारी यादो में अपनी खोयी चमक को पाती जा रही हूँ... *शरीर के भान से मुक्त होकर सच्चे स्वरूप को प्रतिपल यादो में समाकर ईश्वरीय यादो में मालामाल होती जा रही हूँ... मै अजर अमर अविनाशी आत्मा हूँ इस सच्ची ख़ुशी से मुस्कराती जा रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  अमृतवेला श्रेष्ठ प्राप्तियो का अनुभव करना*"

 

_ ➳  *अपने आप को महान योगी, महान तपस्वी कहलाने वाले महा मंडलेश्वर, साधू सन्यासी और उन्हें महान योगी, महान तपस्वी का टाइटल देने वाले उनके फॉलोअर्स के बारे में एकान्त में बैठी मैं विचार कर रही हूँ और सोच रही हूँ* कि अपने शरीर को तकलीफ देकर, जिस कठिन साधना और तपस्या द्वारा ये परमात्मा को पाने का प्रयास कर रहें हैं उस कठोर साधना और तपस्या के द्वारा उन्हें आखिर क्या प्राप्त होगा! 

 

_ ➳  खुदा को पाने का सत्य मार्ग अगर कोई बता सकता है तो वो स्वयं खुदा ही बता सकता है और वो खुदा इस समय स्वयं आकर कह रहा है कि जप - तप, और भक्ति मार्ग के कर्मकांडो से मेरी प्राप्ति नही हो सकती। *मुझे पाने का सहज उपाय तो ये सहज राजयोग है और जो परमात्मा की श्रीमत को मान कर, राजयोग के मार्ग पर चल रहे हैं वही सही मायने में महान योगी और महान तपस्वी है*। मन ही मन अपने आप से बातें करते हुए मैं अपने योगी जीवन के बारे में विचार करती हूँ और अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सराहना करती हूँ कि कितनी महान पदमापदम सौभाग्य शाली हूँ मैं आत्मा, जो अमृतवेले से रात्रि तक श्रेष्ठ योगी जीवन का अनुभव करती हूँ।

 

_ ➳  स्नेह के सागर में समाकर, याद की मेहनत से मुक्त, अपने सहजयोगी, स्वत:योगी और निरन्तर योगी जीवन के बारे में चिंतन करते ही अब एक - एक करके अनेक स्मृतियाँ अनेक दृश्यों के रूप में मेरे मानसपटल पर उभर आती है। *सुबह अमृतवेले भगवान का स्वयं मेरे पास आकर मुझे मीठे लाडले बच्चे कह कर जगाना और अपने वरदानीमूर्त हस्तों को मेरे ऊपर फैलाकर, वरदानो से मेरी झोली भरना, परम शिक्षक बन अविनाशी ज्ञान रत्नों के अखुट खजाने मुझ पर लुटाना, सतगुरु बन अपनी श्रेष्ठ मत देकर मुझे श्रेष्ठ कर्म सिखलाना और सर्व सम्बन्धो का मुझे सुख देना*। मन बुद्धि रूपी नेत्रों से इन सभी दृश्यों को देखते - देखते एक अलौकिक रूहानी नशा मुझ पर छाने लगता है।

 

_ ➳  रूहानी मस्ती में डूबी मैं आत्मा अपने प्यारे प्रभु का दिल से कोटि - कोटि धन्यवाद करती हुई, उनसे मिलने के लिए आतुर, अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होकर, एक अति सूक्ष्म चमकते हुए चैतन्य सितारे के रूप में भृकुटि की कुटिया से बाहर निकलती हूँ और सीधे ऊपर आकाश की दिशा में चल पड़ती हूँ। *अमृतवेले से लेकर रात्रि तक के अपने श्रेष्ठ योगी जीवन के अनुभवों की मधुर स्मृतियाँ मेरी इस आंतरिक यात्रा को आनन्दमयी बनाकर मुझे सेकण्ड में मेरी मंजिल तक पहुंचा देती हैं*। 

 

_ ➳  देख रही हूँ मैं स्वयं को अपने परमधाम घर में, महाज्योति अपने प्यारे प्रभु की सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे। *सर्वशक्तियों की किरणों की मीठी फ़ुहारों के रूप में मुझ पर निरन्तर बरस रहे उनके असीम स्नेह को पाकर मैं परम आनन्द का अनुभव कर रही हूँ*। प्यार के सागर मेरे पिता अपने प्यार की शीतल फुहारें मुझ पर बरसाते हुए अपना सारा प्यार मुझ पर लुटा रहें हैं। उनका ये अनकंडीशनल, निस्वार्थ प्यार मुझमें अथाह ऊर्जा का संचार कर रहा है। 

 

_ ➳  अपने शिव पिता के प्यार के अति सुखद खूबसूरत एहसास को अपने अंदर समाकर, अब मैं वापिस साकार लोक में आ जाती हूँ। इस प्यार के मधुर अहसास को अपने ब्राह्मण जीवन का आधार बनाकर, अपने इस अलौकिक जीवन का मैं भरपूर आनन्द ले रही हूँ। *सुबह आंख खोलते बाबा, दिन की शुरुवात करते बाबा, कर्मयोगी बन हर कर्म करते एक साथी बाबा, दिन समाप्त करते भी एक बाबा के लव में लीन रहने वाली लवलीन आत्मा बन कर, अमृतवेले से लेकर रात्रि तक श्रेष्ठ योगी जीवन का अनुभव मैं हर पल कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं देह भान का त्याग करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निक्रोधी बननें वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निर्मानचित आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा माया की अधीनता को छोड़ स्वतंत्र बनती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मौज का अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मायाजीत हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *अपने भाई बहिनों के ऊपर रहमदिल बनोऔर रहमदिल बन सेवा करेंगे तो उसमें निमित्त भाव स्वतः ही होगा।* किसी पर भी चाहे कितना भी बुरा हो लेकिन अगर आपको उस आत्मा के प्रति रहम हैतो आपको उसके प्रति कभी भी घृणा या ईर्ष्या या क्रोध की भावना नहीं आयेगी। *रहम की भावना सहज निमित्त भाव इमर्ज कर देती है।* मतलब का रहम नहींसच्चा रहम। मतलब का रहम भी होता हैकिसी आत्मा के प्रति अन्दर लगाव होता है और समझते हैं रहम पड़ रहा है। तो वह हुआ मतलब का रहम। सच्चा रहम नहीं, *सच्चे रहम में कोई लगाव नहींकोई देह भान नहींआत्मा-आत्मा पर रहम कर रही है। देह अभिमान वा देह के किसी भी आकर्षण का नाम-निशान नहीं।* कोई का लगाव बाडी से होता है और कोई का लगाव गुणों सेविशेषता से भी होता है।

 

 _ ➳  लेकिन विशेषता वा गुण देने वाला कौन? *आत्मा तो फिर भी कितनी भी बड़ी हो लेकिन बाप से लेवता (लेने वाली) है। अपना नहीं हैबाप ने दिया है। तो क्यों नहीं डायरेक्ट दाता से लो।* इसीलिए कहा कि स्वार्थ का रहम नहीं। कई बच्चे ऐसे नाज-नखरे दिखाते हैं, होगा स्वार्थ और कहेंगे मुझे रहम पड़ता है। और कुछ भी नहीं है सिर्फ रहम है।

 

 _ ➳  *लेकिन चेक करो - निःस्वार्थ रहम हैलगावमुक्त रहम है? कोई अल्पकाल की प्राप्ति के कारण तो रहम नहीं है?* फिर कहेंगे बहुत अच्छी है नाबहुत अच्छा है ना, इसीलिए थोड़ा.... थोड़े की छुट्टी नहीं है। अगर कर्मातीत बनना है तो यह सभी रूकावटें हैं जो बाडी कानसेस में ले आती हैं। अच्छा हैलेकिन बनाने वाला कौन? *अच्छाई भले धारण करो लेकिन अच्छाई में प्रभावित नहीं हो। न्यारे और बाप के प्यारे। जो बाप के प्यारे हैं वह सदा सेफ हैं।* समझा! 

 

✺   *ड्रिल :-  "सच्चा और निःस्वार्थ रहम की भावना रख न्यारे और बाप के प्यारे बनने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने इस स्थूल शरीर से निकलकर फरिश्ता बनकर ऊपर उड़ती हूँ... *इस साकारी दुनिया से ऊपर चाँद सितारों को पीछे छोड़ते हुए सूक्ष्म वतन में आकर ठहरती हूँ...* चारों ओर चाँदनी सा प्रकाश बिखरा हुआ है... मेरे अंदर भी ये प्रकाश समाने लगता है... थोड़ा आगे चलकर अपने सामने ब्रह्मा बाबा को देखती हूँ और उनके सम्मुख जाकर बैठ जाती हूँ...

 

 _ ➳  बाबा की शक्तिशाली किरणें मुझ आत्मा में प्रवाहित होने लगी हैं... *मेरे पुराने सब आसुरी संस्कार भस्म हो रहे हैं और दैवी संस्कार इमर्ज हो रहे हैं*... बाबा की शक्तिशाली किरणें मेरी सब कमी कमज़ोरियों को समाप्त कर रही हैं और अब मैं आत्मा बाबा का प्रकाश स्वयं में महसूस कर रही हूं... एक दम हल्की हो गयी हूँ...

 

 _ ➳  बाबा के प्यार की किरणें मेरे क्रोध के संस्कार को समाप्त कर रही हैं और मैं आत्मा अपने मूल स्वरूप शान्त स्वरूप में स्थित हो गयी हूँ... *किसी भी आत्मा के प्रति ईर्ष्या या घृणा के भाव समाप्त हो रहे हैं और रहम के संस्कार मुझ आत्मा में भर रहे हैं*... मेरे संपर्क में आने वाली हर आत्मा को मैं स्नेह देती हूँ... कैसी भी आसुरी संस्कार वाली आत्मा हो मैं उससे घृणा नहीं करती उसे रहम के वाइब्रेशन दे उसके संस्कार परिवर्तन में सहयोग देती हूं...

 

 _ ➳  मैं आत्मा देह के भान से न्यारी हूँ... देह अभिमान और देह के आकर्षण से मुक्त हूँ... *सर्व आत्माएं मेरे भाई बहन हैं और मैं अपने सभी भाई बहनों के प्रति रहम की भावना रखती हूँ...* बाबा का प्यार मुझमें वो अलौकिक ख़ुशी भर रहा है जिससे मैं किसी भी आत्मा से ईर्ष्या नहीं करती... सबको सहयोग दे आगे बढ़ाती हूँ...

 

 _ ➳  मैं आत्मा बाबा के प्यार में समाती जा रही हूँ... *बाबा के साथ सर्व संबंध जोड़ कर मैं आत्मा इस संसार के लगाव से मुक्त होती जा रही हूँ*... संसार के वैभव, देह के संबंध सब कुछ पीछे छोड़ रही हूँ... *और मैं आत्मा बाबा की प्यारी बनती जा रही हूँ*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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