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 06 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *ज्ञान दान कर ख़ुशी का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *आपस में बिगड़कर लून पानी तो नहीं हुए ?*

 

➢➢ *सदा पुण्य का खाता जमा किया ?*

 

➢➢ *संगठन में सेफ्टी का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बीजरूप को सदा साथ रखो तो माया का बीज ऐसा भस्म हो जायेगा जो फिर कभी भी उस बीज से अंश भी नहीं निकल सकेगा।* वैसे भी आग में जले हुए बीज से कभी फल नहीं निकलता इसलिए बीज को छोड़ *सिर्फ शाखाओं को काटने की मेहनत नहीं करो। बीजरूप द्वारा विकारों के बीज को खत्म कर दो तो बार-बार मेहनत करने से स्वत: ही छूट जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को सदा स्वदर्शन चक्रधारी आत्मा अनुभव करते हो? स्व का दर्शन अर्थात् स्व की पहचान। अच्छी तरह से स्व को पहचान लिया कि मैं कौन हूँ? अपने को अच्छी तरह से पहचाना है? सिर्फ मैं आत्मा हूँ-यह जानना ही जानना नहीं है लेकिन मैं कौन-सी आत्मा हूँ? ये स्मृति रहती है? आपके कितने टाइटल हैं? (बहुत हैं) तो टाइटल याद रहते हैं या भूल जाते हैं? कभी याद रहते हैं, कभी भूल जाते हैं? माया हार भी खिलाती रहे और कहते रहो कि मैं महावीर हूँ, ऐसे तो नहीं? *क्योंकि जो टाइटल बाप द्वारा मिले हैं वह हैं ही स्थिति में स्थित होने के लिये। तो जैसे टाइटल याद आये वैसी स्थिति बन जाये। वैसी स्थिति बनती है या हिलती रहती है? जैसे लौकिक दुनिया में अगर कोई टाइटल मिलता है तो टाइटल के साथ-साथ वह सीट भी मिलती है ना।*

 

✧  समझो जज का टाइटल मिला, तो वह जज की सीट भी मिलेगी ना। अगर जज की सीट पर नहीं बैठे तो कौन मानेगा कि ये जज है। *अगर स्थिति नहीं है और सिर्फ बुद्धि में वर्णन करते रहते हो कि मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ, मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ और परदर्शन भी हो रहा है तो सीट पर सेट नहीं हुए ना। तो जो टाइटल स्मृति में लाते हो वैसी समर्थ स्थिति अवश्य चाहिये-तब कहेंगे कि हाँ यह स्वदर्शन चक्रधारी है, यह हीरो एक्टर है। एक्ट साधारण हो और कहे कि यह हीरो एक्टर है तो कौन मानेगा?* और सदा ये याद रखो कि ये टाइटल देने वाला कौन? दुनिया में कितना भी बड़ा टाइटल हो लेकिन आत्मा, आत्मा को देगी। चाहे प्रेजीडेन्ट है या प्राइम मिनिस्टर है, लेकिन है कौन? आत्मा है ना।

 

✧  संगम पर स्वयं बाप बच्चों को टाइटल देते हैं। कितना नशा चाहिये! यह रूहानी नशा रहता है? देहभान का नशा नहीं। क्रोध कर रहे हैं और कहे कि मैं तो हूँ ही नूरे रत्न, ऐसा नशा नहीं। ऐसे तो नहीं करते हो? मातायें क्या करती हैं? घर में खिटखिट कर रहे हो और कहो कि हम तो हैं ही बाबा की अचल-अडोल आत्मायें! ऐसे तो नहीं करते? *तो सदा अपने भिन्न-भिन्न टाइटल्स को स्मृति में रखो और उस स्थिति में स्थित होकर चलो फिर देखो कितना मजा आता है। स्वदर्शन चक्रधारी अर्थात् सदा मायाजीत। स्वदर्शन चक्रधारी के आगे माया हिम्मत नहीं रख सकती।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जैसे अभी भी कोई वाद-विवाद वाला आता है तो वाणी से और ज्यादा वाद-विवाद में आ जाता है। *उसको याद में बिठाए साइलेन्स की शक्ति का अनुभव कराते हो ना।*

 

✧  एक सेकण्ड भी अगर याद द्वारा शान्ति का अनुभव कर लेते हैं तो स्वयं ही अपनी वाद-विवाद की बुद्धि को साइलेन्स की अनुभूति के आगे सरेन्डर कर देते हैं तो इस *साइलेन्स की शक्ति का अनुभव बढ़ाते जाओ।* अभी यह साइलेन्स की शक्ति की अनुभूति बहुत कम है। साइलेन्स की शक्ति का रस अब तक मैजारिटी ने सिर्फ अंचली मात्र अनुभव किया है।

 

✧  हे शान्ति देवा! आपके भक्त आपके जड चित्रों से शान्ति का अल्पकाल का अनुभव करते हैं, ज्यादा करके मांगते भी शान्ति है क्योंकि शान्ति में सुख समाया हुआ है तो *बापदादा देख रहे थे कि शान्ति की शक्ति के अनुभवी आत्मायें कितनी हैं,* वर्णन करने वाली कितनी हैं और *प्रयोग करने वाली कितनी हैं।* इसके लिए - *'अन्तर्मुखता और एकान्तवासी' बनने की आवश्यकता है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ स्व-स्थिति की शक्ति से किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकते हो ना! *स्वस्थिति अर्थात् आत्मिकस्थिति। पर-स्थिति व्यक्ति व प्रकृति द्वारा आती है। अगर स्व-स्थिति शक्तिशाली है तो उसके आगे पर-स्थिति कुछ भी नहीं है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पतित पावन बाप की श्रीमत पर पावन बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बगीचे में बागवानी करते हुए पौधों के आसपास के खरपतवार को निकाल रही हूँ... जो पौधों के पोषक तत्वों को शोषित कर उनके विकास की गति को धीमी कर रहे हैं...* खरपतवार को निकालने के बाद फूल-पौधे बहुत ही सुन्दर दिख रहे हैं... मुस्कुरा रहे हैं... *ऐसे ही परम बागबान ने मुझ आत्मा के अन्दर के विकारों रूपी खरपतवार को निकालकर मुझे रूहानी फूल बना दिया है... मेरे जीवन के आंगन को खुशियों से खिला दिया है...* मैं आत्मा उड़ चलती हूँ मेरे जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाले प्यारे बागबान बाबा के पास...

 

  *पावन दुनिया की राजाई के लिए श्रेष्ठ श्रीमत देते हुए पतित पावन प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... *मीठे बाबा की श्रीमत पर चलकर पावन बनते हो इसलिए पावन दुनिया के सारे सुखो के अधिकारी बनते हो...* मनुष्य की मत सम्पूर्ण पावन न बन सकते हो न ही सतयुगी दुनिया के मालिक बन सकते हो... यह कार्य ईश्वर पिता के सिवाय कोई कर ही न सके...

 

_ ➳  *श्रीमत की बाँहों में झूलते हुए सतयुगी सुखों के आसमान को छूते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपनी मत और दूसरो की मत से अपनी गिरती अवस्था की बेहतर अनुभवी हूँ... *अब श्रीमत का हाथ थाम खुशियो के संसार में बसेरा हुआ है... प्यारा बाबा मुझे पावन बनाने आ गया है...*

 

  *प्यार भरी नज़रों से मुझे निहाल कर लक्ष्मी नारायण समान श्रेष्ठ बनाते हुए मीठे-मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... पतित पावन सिर्फ बाबा है जो स्वयं पावन है वही पावन बना भी सकता है... मनुष्य खुद इस चक्र में आता है वह दूसरो को पावनता से कैसे सजाएगा भला... *ईश्वर की मत ही सर्व प्राप्तियों का आधार है... श्रीमत ही मनुष्य को देवता श्रृंगार देकर सजाती है...*

 

_ ➳  *अपने जीवन की गाड़ी को श्रीमत रूपी पटरी पर चलाते हुए मंजिल के करीब पहुँचते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा इतनी भाग्यशाली हूँ कि श्रीमत मेरे भाग्य में है... श्रीमत की ऊँगली पकड़ मै आत्मा पावनता की सुंदरता से दमक रही हूँ...* और श्रीमत पर सम्पूर्ण पावन बन सतयुग की राजाई की अधिकारी बन रही हूँ...

 

  *पवित्रता की खुशबू से महकाकर खुशियों के झूले में झुलाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता धरती पर उतरा है प्रेम की सुगन्ध को बाँहों में समाये हुए... तो फूल बच्चे इस खुशबु को अपने रोम रोम में सुवासित कर लो... *यादो को सांसो सा जीवन में भर लो... और यही प्रेम नाद सबको सुनाकर आह्लादित रहो... हर साँस पर नाम खुदाया हो... ऐसा जुनूनी बन जाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा ज्ञान कलश को सिर पर धारण कर हीरे समान चमकते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपनी मत पर चलकर और परमत का अनुसरण कर निराश मायूस हो गई थी... दुखो को ही अपनी नियति मान बैठी थी... *प्यारे बाबा आपकी श्रीमत ने दुखो से निकाल... मीठे सुखो से दामन सजा दिया है... प्यारी सी श्रीमत ने मुझे पावन बनाकर महका दिया है...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बुद्धि रूपी झोली में अविनाशी ज्ञान रत्न भरपूर कर फिर दान करना है*"

 

_ ➳  ज्ञान के सागर अपने शिव पिता परमात्मा द्वारा मुरली के माध्यम से हर रोज प्राप्त होने वाले मधुर महावाक्यों को एकांत में बैठ मैं पढ़ रही हूँ और *पढ़ते - पढ़ते अनुभव कर रही हूँ कि ब्रह्मा मुख द्वारा अविनाशी ज्ञान के अखुट खजाने लुटाते मेरे शिव पिता परमात्मा परमधाम से नीचे साकार सृष्टि पर आकर मेरे सम्मुख विराजमान हो गए हैं*। अपने मुख कमल से मेरी रचना कर मुझे ब्राह्मण बनाने वाले मेरे परम शिक्षक शिव बाबा, ब्रह्मा बाबा की भृकुटि पर बैठ ज्ञान की गुह्य बातें मुझे सुना रहें हैं और *मैं ब्राह्मण आत्मा ज्ञान के सागर अपने शिव पिता के सम्मुख बैठ, ब्रह्मा मुख से उच्चारित मधुर महावाक्यों को बड़े प्यार से सुन रही हूँ और ज्ञान रत्नों से अपनी बुद्धि रूपी झोली को भरपूर कर रही हूँ*।

 

_ ➳  मुरली का एक - एक महावाक्य अमृत की धारा बन मेरे जीवन को परिवर्तित कर रहा है। *आज दिन तक अज्ञान अंधकार में मैं भटक रही थी और व्यर्थ के कर्मकांडो में उलझ कर अपने जीवन के अमूल्य पलों को व्यर्थ गंवा रही थी*। धन्यवाद मेरे शिव पिता परमात्मा का जिन्होंने ज्ञान का तीसरा नेत्र देकर मुझे अज्ञान अंधकार से निकाल मेरे जीवन मे सोझरा कर दिया। अपने शिव पिता परमात्मा के समान महादानी बन अब मुझे उनसे मिलने वाले अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान सबको कर, सबको अज्ञान अंधकार से निकाल सोझरे में लाना है।

 

_ ➳  अपने शिव पिता के स्नेह का रिटर्न अब मुझे उनके फरमान पर चल, औरो को आप समान बनाने की सेवा करके अवश्य देना है। *अपने आप से यह प्रतिज्ञा करते हुए मैं देखती हूँ मेरे सामने बैठे बापदादा मुस्कराते हुए बड़े प्यार से मुझे निहार रहें हैं। उनकी मीठी मधुर मुस्कान मेरे दिल मे गहराई तक समाती जा रही है*। उनके नयनों से और भृकुटि से बहुत तेज दिव्य प्रकाश निकल रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे प्रकाश की सहस्त्रो धारायें मेरे ऊपर पड़ रही है और उस दिव्य प्रकाश में नहाकर मेरा स्वरूप बहुत ही दिव्य और लाइट का बनता जा रहा है। *मैं देख रही हूँ बापदादा के समान मेरे लाइट के शरीर में से भी प्रकाश की अनन्त धारायें निकल रही हैं और चारों और फैलती जा रही हैं*।

 

_ ➳  अब बापदादा मेरे पास आ कर मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर अपने सभी अविनाशी खजाने, गुण और शक्तियां मुझे विल कर रहें हैं। *बाबा के हस्तों से निकल रहे सर्व ख़ज़ानों, सर्वशक्तियों को मैं स्वयं में समाता हुआ स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*। बापदादा मेरे सिर पर अपना वरदानी हाथ रख मुझे "अविनाशी ज्ञान रत्नों के महादानी भव" का वरदान दे रहें हैं। वरदान दे कर, उस वरदान को फलीभूत कर, उसमे सफलता पाने के लिए बाबा अब मेरे मस्तक पर विजय का तिलक दे रहें हैं। *मैं अनुभव कर रही हूँ मेरे लाइट माइट स्वरूप में मेरे मस्तक पर जैसे ज्ञान का दिव्य चक्षु खुला गया है जिसमे से एक दिव्य प्रकाश निकल रहा है और उस प्रकाश में ज्ञान का अखुट भण्डार समाया है*।

 

_ ➳  महादानी बन, अपने लाइट माइट स्वरूप में सारे विश्व की सर्व आत्माओ को अविनाशी ज्ञान रत्न देने के लिए अब मैं सारे विश्व मे चक्कर लगा रही हूँ। मेरे मस्तक पर खुले ज्ञान के दिव्य चक्षु से निकल रही लाइट से ज्ञान का प्रकाश चारों और फैल रहा है और सारे विश्व में फैल कर विश्व की सर्व आत्माओं को परमात्म परिचय दे रहा हैं। *सर्व आत्माओं को परमात्म अवतरण का अनुभव हो रहा है। सभी आत्मायें अविनाशी ज्ञान रत्नों से स्वयं को भरपूर कर रही हैं*। सभी का बुद्धि रूपी बर्तन शुद्ध और पवित्र हो रहा है। ज्ञान रत्नों को बुद्धि में धारण कर सभी परमात्म पालना का आनन्द ले रहे हैं।

 

_ ➳  लाइट माइट स्वरूप में विश्व की सर्व आत्माओं को अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान दे कर, अब मैं साकार रूप में अपने साकार ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर महादानी बन मुख द्वारा अपने सम्बन्ध संपर्क में आने वाली सभी आत्माओं को आविनाशी ज्ञान रत्नों का दान दे कर, सभी को अपने पिता परमात्मा से मिलाने की सेवा निरन्तर कर रही हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में, डबल लाइट स्थिति का अनुभव करते अपनी स्थिति से मैं अनेको आत्माओं को परमात्म प्यार का अनुभव करवा रही हूँ। परमात्म प्यार का अनुभव करके वो सभी आत्मायें अब परमात्मा द्वारा मिलने वाले अविनाशी ज्ञान रत्नों को धारण कर अपने जीवन को खुशहाल बना रही हैं*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सदा पुण्य का खाता जमा करने और जमा कराने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मास्टर शिक्षक आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा संगठन के महत्व को जानती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा संगठन में ही स्वयं की सेफ्टी का अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं स्नेही व सहयोगी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *अपने भाई बहिनों के ऊपर रहमदिल बनोऔर रहमदिल बन सेवा करेंगे तो उसमें निमित्त भाव स्वतः ही होगा।* किसी पर भी चाहे कितना भी बुरा हो लेकिन अगर आपको उस आत्मा के प्रति रहम हैतो आपको उसके प्रति कभी भी घृणा या ईर्ष्या या क्रोध की भावना नहीं आयेगी। *रहम की भावना सहज निमित्त भाव इमर्ज कर देती है।* मतलब का रहम नहींसच्चा रहम। मतलब का रहम भी होता हैकिसी आत्मा के प्रति अन्दर लगाव होता है और समझते हैं रहम पड़ रहा है। तो वह हुआ मतलब का रहम। सच्चा रहम नहीं, *सच्चे रहम में कोई लगाव नहींकोई देह भान नहींआत्मा-आत्मा पर रहम कर रही है। देह अभिमान वा देह के किसी भी आकर्षण का नाम-निशान नहीं।* कोई का लगाव बाडी से होता है और कोई का लगाव गुणों सेविशेषता से भी होता है।

 

 _ ➳  लेकिन विशेषता वा गुण देने वाला कौन? *आत्मा तो फिर भी कितनी भी बड़ी हो लेकिन बाप से लेवता (लेने वाली) है। अपना नहीं हैबाप ने दिया है। तो क्यों नहीं डायरेक्ट दाता से लो।* इसीलिए कहा कि स्वार्थ का रहम नहीं। कई बच्चे ऐसे नाज-नखरे दिखाते हैं, होगा स्वार्थ और कहेंगे मुझे रहम पड़ता है। और कुछ भी नहीं है सिर्फ रहम है।

 

 _ ➳  *लेकिन चेक करो - निःस्वार्थ रहम हैलगावमुक्त रहम है? कोई अल्पकाल की प्राप्ति के कारण तो रहम नहीं है?* फिर कहेंगे बहुत अच्छी है नाबहुत अच्छा है ना, इसीलिए थोड़ा.... थोड़े की छुट्टी नहीं है। अगर कर्मातीत बनना है तो यह सभी रूकावटें हैं जो बाडी कानसेस में ले आती हैं। अच्छा हैलेकिन बनाने वाला कौन? *अच्छाई भले धारण करो लेकिन अच्छाई में प्रभावित नहीं हो। न्यारे और बाप के प्यारे। जो बाप के प्यारे हैं वह सदा सेफ हैं।* समझा! 

 

✺   *ड्रिल :-  "सच्चा और निःस्वार्थ रहम की भावना रख न्यारे और बाप के प्यारे बनने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने इस स्थूल शरीर से निकलकर फरिश्ता बनकर ऊपर उड़ती हूँ... *इस साकारी दुनिया से ऊपर चाँद सितारों को पीछे छोड़ते हुए सूक्ष्म वतन में आकर ठहरती हूँ...* चारों ओर चाँदनी सा प्रकाश बिखरा हुआ है... मेरे अंदर भी ये प्रकाश समाने लगता है... थोड़ा आगे चलकर अपने सामने ब्रह्मा बाबा को देखती हूँ और उनके सम्मुख जाकर बैठ जाती हूँ...

 

 _ ➳  बाबा की शक्तिशाली किरणें मुझ आत्मा में प्रवाहित होने लगी हैं... *मेरे पुराने सब आसुरी संस्कार भस्म हो रहे हैं और दैवी संस्कार इमर्ज हो रहे हैं*... बाबा की शक्तिशाली किरणें मेरी सब कमी कमज़ोरियों को समाप्त कर रही हैं और अब मैं आत्मा बाबा का प्रकाश स्वयं में महसूस कर रही हूं... एक दम हल्की हो गयी हूँ...

 

 _ ➳  बाबा के प्यार की किरणें मेरे क्रोध के संस्कार को समाप्त कर रही हैं और मैं आत्मा अपने मूल स्वरूप शान्त स्वरूप में स्थित हो गयी हूँ... *किसी भी आत्मा के प्रति ईर्ष्या या घृणा के भाव समाप्त हो रहे हैं और रहम के संस्कार मुझ आत्मा में भर रहे हैं*... मेरे संपर्क में आने वाली हर आत्मा को मैं स्नेह देती हूँ... कैसी भी आसुरी संस्कार वाली आत्मा हो मैं उससे घृणा नहीं करती उसे रहम के वाइब्रेशन दे उसके संस्कार परिवर्तन में सहयोग देती हूं...

 

 _ ➳  मैं आत्मा देह के भान से न्यारी हूँ... देह अभिमान और देह के आकर्षण से मुक्त हूँ... *सर्व आत्माएं मेरे भाई बहन हैं और मैं अपने सभी भाई बहनों के प्रति रहम की भावना रखती हूँ...* बाबा का प्यार मुझमें वो अलौकिक ख़ुशी भर रहा है जिससे मैं किसी भी आत्मा से ईर्ष्या नहीं करती... सबको सहयोग दे आगे बढ़ाती हूँ...

 

 _ ➳  मैं आत्मा बाबा के प्यार में समाती जा रही हूँ... *बाबा के साथ सर्व संबंध जोड़ कर मैं आत्मा इस संसार के लगाव से मुक्त होती जा रही हूँ*... संसार के वैभव, देह के संबंध सब कुछ पीछे छोड़ रही हूँ... *और मैं आत्मा बाबा की प्यारी बनती जा रही हूँ*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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