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 06 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *ऐसा कोई कर्म तो नहीं किया जिससे पश्चाताप करना पड़े ?*

 

➢➢ *संग की बहुत बहुत संभाल की ?*

 

➢➢ *मनसा संकल्प व वृत्ति द्वारा श्रेष्ठ वाइब्रेशनस की खुशबू फैलाई ?*

 

➢➢ *सुखदाता द्वारा सुख का भण्डार प्राप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  सेवा का विस्तार भल कितना भी बढ़ाओ लेकिन विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो, *विस्तार में सार भूल न जाये। खाओ-पियो, सेवा करो लेकिन न्यारेपन को नहीं भूलो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं कर्मयोगी आत्मा हूँ"*

 

  हर कर्म करते 'कर्मयोगी आत्मा' अनुभव करते हो? कर्म और योग सदा साथ-साथ रहता है? कर्मयोगी हर कर्म में स्वत: ही सफलता को प्राप्त करता है। *कर्मयोगी आत्मा कर्म का प्रत्यक्षफल उसी समय भी अनुभव करता और भविष्य भी जमा करता, तो डबल फायदा हो गया ना। ऐसे डबल फल लेने वाली आत्मायें हो। कर्मयोगी आत्मा कभी कर्म के बन्धन में नहीं फंसेगी। सदा न्यारे और सदा बाप के प्यारे।कर्म के बन्धन से मुक्त-इसको ही 'कर्मातीत' कहते हैं।*

 

  *कर्मातीत का अर्थ यह नहीं है कि कर्म से अतीत हो जाओ। कर्म से न्यारे नहीं, कर्म के बन्धन में फँसने से न्यारे,इसको कहते हैं -कर्मातीत। कर्मयोगी स्थिति कर्मातीत स्थिति का अनुभव कराती है।* तो किसी बंधन में बंधने वाले तो नहीं हो ना? औरों को भी बंधन से छुड़ाने वाले। जैसे बाप ने छुड़ाया, ऐसे बच्चों का भी काम है छुड़ाना, स्वयं कैसे बंधन में बंधेंगे?

 

  *कर्मयोगी स्थिति अति प्यारी और न्यारी है। इससे कोई कितना भी बड़ा कार्य हो लेकिन ऐसे लगेगा जैसे काम नहीं कर रहे हैं लेकिन खेल कर रहे हैं। चाहे कितना भी मेहनत का, सख्त खेल हो, फिर भी खेल में मजा आयेगा ना। जब मल्लयुद्ध करते हैं तो कितनी मेहनत करते हैं। लेकिन जब खेल समझकर करते हैं तो हंसते-हंसतक करते हैं।* मेहनत नहीं लगती, मनोरंजन लगता है। तो कर्मयोगी के लिए कैसा भी कार्य हो लेकिन मनोरंजन है, संकल्प में भी मुश्किल का अनुभव नहीं होगा। तो कर्मयोगी ग्रुप अपने कर्म से अनेकों का कर्म श्रेष्ठ बनाने वाले, इसी में बिजी रहो। कर्म और याद कम्बाइण्ड, अलग हो नहीं सकते।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  वास्तव में इसको ही ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन कहा जाता है। जिसका जितना स्व पर राज्य है अर्थात स्व को चलने और सर्व को चलाने की विधि आती है, वही नम्बर आगे लेता है। *इस फाउण्डेशन में अगर यथाशक्ति है तो ऑटोमैटिकली नम्बर पीछे हो जाता है।*

 

✧  जिसको स्वयं को चलाने और चलने आता है वह दूसरों को भी सहज चला सकता है अर्थात हैंडलिंग पॉवर आ जाती है। सिर्फ दूसरे को हैंडलिंग करने के लिए हैंडलिंग पॉवर नहीं चाहिए *जो अपनी सूक्ष्म शक्तियों को हैंडिल कर सकता है। वह दूसरों को भी हैंडिल कर सकता है।*

 

✧  तो *स्व के ऊपर कन्ट्रोलिंग पॉवर, रूलिंग पॉवर सर्व के लिए यथार्थ हैंडलिंग पॉवर बन जाती है।* चाहे अज्ञानी आत्माओं को सेवा द्वारा हैडल करो, चाहे ब्राह्मण परिवार में स्नेह सम्पन्न, संतुष्टता सम्पन्न व्यवहार करो - दोनों में सफल हो जायेंगे।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ कैसी भी परिस्थिति हो, हलचल हो लेकिन हलचल में अचल हो जाओ। ऐसे कन्ट्रोलिंग पावर है? या सोचते - सोचते अशरीरी हो जाऊँ, अशरीरी हो जाऊँ, उसमें ही टाइम चला जायेगा? *कई बच्चे बहुत भिन्न-भिन्न पोज़ बदलते रहते, बाप देखते रहते। सोचते हैं अशरीरी बनें फिर सोचते हैं अशरीरी माना आत्मा रूप में स्थित होना, हाँ मैं हूँ तो आत्मा, शरीर तो हूँ ही नहीं, आत्मा ही हूँ। मैं आई ही आत्मा थी, बनना भी आत्मा है अभी इस सोच में अशरीरी हुए या अशरीरी बनने की युद्ध की? आपने मन को आर्डर किया सेकण्ड में अशरीरी हो जाओ, यह तो नहीं कहा सोचो - अशरीरी क्या है?कब बनेंगे, कैसे बनेंगे? आर्डर तो नहीं माना ना! कण्ट्रोलिंग पावर तो नहीं हुई ना! अभी समय प्रमाण इसी प्रैक्टिस की आवश्यकता है। अगर कण्ट्रोलिंग पावर नहीं है तो कई परिस्थितियाँ हलचल में ले आ सकती हैं।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप का मददगार बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अमृतवेले उठ मीठे बाबा से मिलने की तमन्ना में फ़रिश्ता बन उड़ चलती हूँ मधुबन बाबा की कुटिया में... मीठे बाबा अपनी मीठी मुस्कान से मेरा स्वागत करते हैं और अपनी मीठी दृष्टि से मुझे निहाल करते हैं...* बाबा की दृष्टि से मुझ आत्मा के सूक्ष्म विकार, पुराने स्वभाव-संस्कार दैवीय गुणों में परिवर्तित होने लगे हैं... मुझ आत्मा की काया दिव्यता से चमकने लगी है... *फिर प्यारे बाबा मुझे अपने साथ रूहानी सैर पर ले जाते हैं और तीनों कालों के दर्शन कराते हैं... फिर ज्ञान सागर बाबा मुझ पर ज्ञान की बरसात करते हैं...*

 

  *भारत को दैवी स्वराज्य बनाने में मददगार बन श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे...  ईश्वर पिता आप बच्चों के सुखो के लिए हथेली पर स्वर्ग धरोहर लाया है... *स्वर्ग के फाउंडेशन में मददगार बन सदा का सुनहरा भाग्य बनाओ... ईश्वरीय राहो पर चलकर असीम खुशियो में मुस्कराओ...* श्रीमत के हाथो में हाथ देकर, सदा के सुखो में झूम जाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा बेहद के सर्विस में जुटकर बाबा की राईट हैण्ड बन विश्व का कल्याण करते हुए कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपकी यादो में उज्ज्वल भविष्य को पाती जा रही हूँ... *ईश्वर पिता की मदद कर, मीठा प्यारा भाग्य सजा रही हूँ... श्रीमत के साये में विकारो की कालिमा से महफूज होकर,सदा की निश्चिन्त हो गयी हूँ..."*

 

  *मेरे भाग्य के सितारे को आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे...  ईश्वर पिता को खोज खोज कर थक से निकले थे कभी, आज उसकी मदद करने वाले खुबसूरत भाग्य के मालिक हो गए हो... *श्रेष्ठ भाग्य को लिखने की कलम पा गए हो... और अनन्त खुशियो को बाँहों में भरकर मुस्करा रहे हो... भगवान की मदद करने वाले महान हो गए हो..."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा के प्यार के फव्वारे में खुशियों की चरमसीमा पर पहुंचकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा अपनी ही मदद को बेजार थी कभी... आपकी मदद को हर पल तरस रही थी... *आज आपका सारा प्यार आँचल में भरकर मुस्करा रही हूँ... मीठे बाबा भाग्य से युँ सम्मुख पाकर आपके प्यार में बावरी हो गयी हूँ... और असीम खुशियो में नाच रही हूँ..."*

 

  *काँटों के जंगल को फूलों का बगीचा बनाकर रूहानी फूलों का गुलदस्ता तैयार करते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता की श्रीमत पर चलकर जीवन को नये आयामो पर पहुँचाओ... मनुष्य मत ने कितना निस्तेज और बेहाल किया है... *अब श्रीमत के हाथो में पलकर फूलो सा खिलखिलाओ... दिव्य गुणो से सज संवर कर देवताई सौभाग्य को पाओ... सदा खुशियो में गुनगुनाओ..."*

 

_ ➳  *करावनहार के हाथों को थाम श्रीमत के मार्ग पर चलते हुए मंजिल के समीप पहुंचती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अदनी सी, भगवान की कभी मददगार बनूंगी, ऐसा तो मीठे बाबा ख्वाबो में भी न सोचा था... *आज आपकी मदद का भाग्य पाकर, सतयुगी सुखो का हक पा रही हूँ... श्रीमत का हाथ और ईश्वरीय प्यार पाकर, अपना भाग्य शानदार बना रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- माया के वश होकर कोई भी आसुरी चलन नही चलनी है*"

 

_ ➳  अपनी पलकों को मूंदे, परमात्म प्यार की मस्ती में डूबी, अपने प्यारे प्रभु की याद में मैं मग्न होकर बैठी हूँ और मन की आँखों से अनेक खूबसूरत दृश्य देख रही हूँ। *कभी अपने प्यारे प्रभु को नटखट कान्हा के रूप में अपने सँग रास करते हुए, कभी सखा के रूप में उनसे मीठी - मीठी रूह रिहान करते हुए, कभी उन्हें भोग स्वीकार कराते हुए और कभी उनके साथ सारे विश्व का भ्रमण करते हुए मै स्वयं को उनके साथ देख रही हूँ* और इन सभी दृश्यों का भरपूर आनन्द ले रही हूँ। ऐसे अपने प्यारे प्रभु के साथ अनेक खूबसूरत नजारों को देखती मैं मन ही मन अपनी श्रेष्ठ तकदीर के बारे में विचार कर हर्षित हो रही हूँ।

 

_ ➳  अपनी श्रेष्ठ तकदीर की श्रेष्ठ तस्वीर बनाने वाले अपने भाग्यविधाता भगवान बाप का मैं कोटि - कोटि शुक्रिया अदा करके, *अपने निराकार भगवान बाप से मंगल मिलन मनाने के लिए अब उनके समान स्वयं को अपने वास्तविक निराकारी स्वरूप में स्थित करती हूँ और चमकता हुआ सितारा बन देह की कुटिया से बाहर निकल खुले आसमान की ओर चल पड़ती हूँ*। मन बुद्धि के दिव्य चक्षु से मैं देख रही हूँ मस्तक से निकलती एक जगमग करती ज्योति को जो अपने प्रकाश की किरणें चारों ओर फैलाती हुई, अपने प्यारे प्रभु की प्रेम की लगन में मग्न उनसे मिलन मनाने के लिये, हर विघ्न को पार कर, ऊपर की ओर बस उड़ती ही जा रही है।

 

_ ➳  रॉकेट से भी तेज उड़ान भरकर मैं आत्मा सेकेण्ड में आकाश को पार कर, उससे भी उपर उड़ते हुए सूक्ष्म वतन से होती हुई अपनी निराकारी दुनिया मे प्रवेश करती हूँ। *चमकते सितारों की यह निराकारी दुनिया जो मेरे पिता का घर है, अपने इस घर में आकर मैं डीप साइलेन्स की गहन अनुभूति में खो जाती हूँ*। गहन शांति का अनुभव करते हुए अब मैं पहुँच जाती हूँ सर्वगुणों, सर्वशक्तियों के सागर अपने शिव पिता के पास जिनसे आ रही सर्वगुणों और सर्वशक्तियों की शीतल फुहारें मन को शीतलता का अनुभव करवा कर अपनी और खींच रही हैं। *उन शीतल फ़ुहारों के नीचे बैठ गहन शीतलता का अनुभव करके, सर्वगुणों, सर्वशक्तियों से भरपूर होकर मैं आत्मा अब परमधाम से नीचे सूक्ष्म लोक में आ जाती हूँ*।

 

_ ➳  सूक्ष्म आकारी फरिश्तो की इस दुनिया मे आकर अपने लाइट के फ़रिश्ता स्वरूप को धारण कर अब मैं फरिश्ता अपने भाग्यविधाता भगवान बाप के पास पहुँचता है जो *अपने आकारी रथ पर विराजमान होकर मेरे सामने खड़े हैं और मेरे हाथ मे सर्वश्रेष्ठ भाग्य लिखने की कलम मुझे दे कर कह रहे है :- "लो बच्चे, इस कलम से जितना श्रेष्ठ भाग्य लिखना चाहो लिख लो"*। अपनी तकदीर की तस्वीर जैसी बनाना चाहो बना लो। भाग्य लिखने की कलम मेरे हाथ मे देकर  बाबा अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रख कर "श्रेष्ठ भाग्यवान भव" का वरदान देते हुए मेरे मस्तक पर विजय का तिलक लगा रहे हैं और अपनी शक्तियों से मुझे शक्तिशाली भी बना रहे हैं। *अपनी लाइट माइट मुझे देते हुए बाबा अपनी शक्तियों का बल मेरे अंदर भरते जा रहें हैं*।

 

_ ➳  अपने भाग्यविधाता बाप से वरदान, सर्वशक्तियाँ और सर्वश्रेष्ठ भाग्य लिखने की कलम अपने साथ लेकर, अब मैं अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होकर सूक्ष्म लोक से नीचे आ जाती हूँ और साकार सृष्टि पर लौट कर, अपने साकार शरीर मे प्रवेश कर, भृकुटि पर आ कर विराजमान हो जाती हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर अपने हर संकल्प, बोल और कर्म पर पूरा अटेंशन देते हुए अब मैं इस बात का विशेष ध्यान रखती हूँ कि ऐसा कोई भी विकर्म मुझ से न हो या ऐसी कोई भी उल्टी चलन मुझ से ना चली जाए* जिससे मेरी तकदीर को लकीर लग जाये। 

 

_ ➳  *इसलिए हर कदम श्रीमत प्रमाण चलते हुए, अपने भाग्यविधाता भगवान बाप द्वारा मिली भाग्य की कलम से अपने भाग्य का निर्माण करने के लिए श्रेष्ठ पुरुषार्थ कर, अपनी तकदीर की श्रेष्ठ तस्वीर बना रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं मनसा संकल्प वा वृत्ति द्वारा श्रेष्ठ वाइब्रेशन्स की खुशबू फैलाने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं शिव शक्त्ति कम्बाइन्ड आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा सुखदाता द्वारा सुख का भंडार प्राप्त करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सुखदाता के प्यार की निशानी को प्राप्त करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सुखों का भंडार हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *जैसे बाप अशरीरी हैअव्यक्त है वैसे अशरीरी पन का अनुभव करना वा अव्यक्त फरिश्ते पन का अनुभव करना - यह है रंग में रंग जाना*। कर्म करो लेकिन अव्यक्त फरिश्ता बनके काम करो। अशरीरीपन की स्थिति का जब चाहो तब अनुभव करो। ऐसे मन और बुद्धि आपके कन्ट्रोल में हो। आर्डर करो - अशरीरी बन जाओ। आर्डर किया और हुआ। फरिश्ते बन जायें। जैसे *मन को जहाँ जिस स्थिति में स्थित करने चाहो वहाँ सेकण्ड में स्थित हो जाओ*। ऐसे नहीं ज्यादा टाइम नहीं लगा, 5 सेकण्ड लग गये, 2 सेकण्ड लग गये। आर्डर में तो नहीं हुआकन्ट्रोल में तो नहीं रहा। *कैसी भी परिस्थिति होहलचल हो लेकिन हलचल में अचल हो जाओ। ऐसे कन्ट्रोलिंग पावर है?* या सोचते - सोचते अशरीरी हो जाऊंअशरीरी हो जाऊंउसमें ही टाइम चला जायेगा

 

 _ ➳  कई बच्चे बहुत भिन्न-भिन्न पोज बदलते रहतेबाप देखते रहते। सोचते हैं अशरीरी बनें फिर सोचते हैं अशरीरी माना आत्मा रूप में स्थित होनाहाँ मैं हूँ तो आत्माशरीर तो हूँ ही नहीं,आत्मा ही हूँ। मैं आई ही आत्मा थीबनना भी आत्मा है... अभी इस सोच में अशरीरी हुए या अशरीरी बनने की युद्ध की? *आपने मन को आर्डर किया सेकण्ड में अशरीरी हो जाओयह तो नहीं कहा सोचो - अशरीरी क्या हैकब बनेंगेकैसे बनेंगेआर्डर तो नहीं माना ना! कन्ट्रोलिंग पावर तो नहीं हुई ना! अभी समय प्रमाण इसी प्रैक्टिस की आवश्यकता है।* अगर कन्ट्रोलिंग पावर नहीं है तो कई परिस्थितियां हलचल में ले आ सकती हैं। 

 

✺   *ड्रिल :-  "परमात्म रंग में रंग जाना अर्थात् सेकण्ड में अशरीरी बनने का अनुभव करना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा, मन बुद्धि से बापदादा के कमरे में... बापदादा के चित्र के सामने... *मधुशाला के प्यालों के समान बाबा की दोनों आँखें... एक पावनता और दूसरा रूहानियत से भरपूर...* भर-भर कर छलक रहे है दोनों आँखों के प्याले... और उन पावन रूहानी एहसासों को मैं आत्मा, आँखों से ही घूँट- घूँट कर पिये जा रही हूँ... *रूहानी नशे में चूर मैं, अशरीरी अवस्था का अनुभव करती हुई...* मन बुद्धि रूपी पंखों को फैलाये नन्हीं तितली के रूप में... *नन्हें पंखों को हिलाती हुई मैं बापदादा की हथेली पर जाकर बैठ गयी हूँ... एक खूबसूरत सा एहसास... उनके इतने करीब होने का...* अपनी नन्हीं नन्हीं आँखों से बाबा को टुकुर टुकुर देखती हुई... बेहद प्यार से दृष्टि दे रहे है बापदादा मुझे... और देखते ही देखते मैं चमचमाते हीरे के रूप में बदलती हुई... *उनकी हथेली पर मैं आत्मा चमचमाते कोहिनूर हीरे के समान...* मेरी आभा से भरपूर हो गया है आस पास का पूरा ही वातावरण... जैसे एक साथ असंख्य चाँद जमीन पर उतर आये हो...

 

 _ ➳  मैं आत्मा फरिश्ता रूप में सूक्ष्म वतन में... बापदादा एक नये रूप में मेरे सम्मुख... *विशाल और भव्य से टबनुमा बर्तन में भरा है अशरीरी पन का रंग, रूहानियत का रंग... और हाथों में पावनता की पिचकारी लिए एक एक आत्मा को उस रंग में भिगोतें हुए... पूरा रंगने में समय लग रहा है किसी- किसी आत्मा को... अलग अलग पोज़ बदलती हुई आत्माए... मगर मैं याद कर रहा हूँ बापदादा के महावाक्य... बच्चे सेकेंड में अशरीरी होना ही बाप के रंग में रंगना है...* और ये निश्चय कर मैं उतर गया हूं पूरी तरह से उस विशाल से टब में एक ही सेकेंड में... *बेहद खूबसूरत एहसास... अशरीरीपन का...* हम दोनों एक ही रंग में रंगे... *अब पहचान मुश्किल सी है, कौन दर्पण है और कौन है चेहरा... मेरी रंगत से मेल खा रहा है रंग रूप तेरा...*

 

 _ ➳  बापदादा हाथ बढाकर मुझे निकाल रहें है उस टब से... *मगर वो रंग अब पूरी तरह मुझे रंग चुका है...* गले लगा रहे है बापदादा मुझे... और *सेकेंड में कन्ट्रोलिंग पावर का वरदान दे रहे है मेरे सर पर हाथ रखकर...* गहराई से महसूस कर रहा हूँ उन वरदानी हाथों की ऊष्मा को अपने सर पर... और बापदादा के सेकेंड के इशारें पर मैं बापदादा के साथ बिन्दु रूप धारण कर परम धाम की यात्रा पर... मैं और बापदादा परमधाम में बीज रूप अवस्था में... शिव बिन्दु के एकदम करीब... देर तक खुद को सेकेन्ड की कन्ट्रोलिंग पावर से सम्पन्न कर मैं लौट आया हूँ अपनी उसी देह में... मगर देह में भी विदेही और शरीर में अशरीरीपन का गहराई से एहसास समायें हुए... ओम शान्ति...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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