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 06 / 10 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *मुख से सदैव ज्ञान अम्रिओत निकाले ?*

 

➢➢ *चलते फिरते बाप को ताड़ करने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *एक ही रास्ता और एक से रिश्ता रखा ?*

 

➢➢ *सदा सेवा के उमंग उत्साह में रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  सेवा का विस्तार भल कितना भी बढ़ाओ लेकिन विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो, *विस्तार में सार भूल न जाये। खाओ-पियो, सेवा करो लेकिन न्यारेपन को नहीं भूलो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं कर्मयोगी आत्मा हूँ"*

 

  हर कर्म करते 'कर्मयोगी आत्मा' अनुभव करते हो? कर्म और योग सदा साथ-साथ रहता है? कर्मयोगी हर कर्म में स्वत: ही सफलता को प्राप्त करता है। *कर्मयोगी आत्मा कर्म का प्रत्यक्षफल उसी समय भी अनुभव करता और भविष्य भी जमा करता, तो डबल फायदा हो गया ना। ऐसे डबल फल लेने वाली आत्मायें हो। कर्मयोगी आत्मा कभी कर्म के बन्धन में नहीं फंसेगी। सदा न्यारे और सदा बाप के प्यारे।कर्म के बन्धन से मुक्त-इसको ही 'कर्मातीत' कहते हैं।*

 

  *कर्मातीत का अर्थ यह नहीं है कि कर्म से अतीत हो जाओ। कर्म से न्यारे नहीं, कर्म के बन्धन में फँसने से न्यारे,इसको कहते हैं -कर्मातीत। कर्मयोगी स्थिति कर्मातीत स्थिति का अनुभव कराती है।* तो किसी बंधन में बंधने वाले तो नहीं हो ना? औरों को भी बंधन से छुड़ाने वाले। जैसे बाप ने छुड़ाया, ऐसे बच्चों का भी काम है छुड़ाना, स्वयं कैसे बंधन में बंधेंगे?

 

  *कर्मयोगी स्थिति अति प्यारी और न्यारी है। इससे कोई कितना भी बड़ा कार्य हो लेकिन ऐसे लगेगा जैसे काम नहीं कर रहे हैं लेकिन खेल कर रहे हैं। चाहे कितना भी मेहनत का, सख्त खेल हो, फिर भी खेल में मजा आयेगा ना। जब मल्लयुद्ध करते हैं तो कितनी मेहनत करते हैं। लेकिन जब खेल समझकर करते हैं तो हंसते-हंसतक करते हैं।* मेहनत नहीं लगती, मनोरंजन लगता है। तो कर्मयोगी के लिए कैसा भी कार्य हो लेकिन मनोरंजन है, संकल्प में भी मुश्किल का अनुभव नहीं होगा। तो कर्मयोगी ग्रुप अपने कर्म से अनेकों का कर्म श्रेष्ठ बनाने वाले, इसी में बिजी रहो। कर्म और याद कम्बाइण्ड, अलग हो नहीं सकते।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  वास्तव में इसको ही ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन कहा जाता है। जिसका जितना स्व पर राज्य है अर्थात स्व को चलने और सर्व को चलाने की विधि आती है, वही नम्बर आगे लेता है। *इस फाउण्डेशन में अगर यथाशक्ति है तो ऑटोमैटिकली नम्बर पीछे हो जाता है।*

 

✧  जिसको स्वयं को चलाने और चलने आता है वह दूसरों को भी सहज चला सकता है अर्थात हैंडलिंग पॉवर आ जाती है। सिर्फ दूसरे को हैंडलिंग करने के लिए हैंडलिंग पॉवर नहीं चाहिए *जो अपनी सूक्ष्म शक्तियों को हैंडिल कर सकता है। वह दूसरों को भी हैंडिल कर सकता है।*

 

✧  तो *स्व के ऊपर कन्ट्रोलिंग पॉवर, रूलिंग पॉवर सर्व के लिए यथार्थ हैंडलिंग पॉवर बन जाती है।* चाहे अज्ञानी आत्माओं को सेवा द्वारा हैडल करो, चाहे ब्राह्मण परिवार में स्नेह सम्पन्न, संतुष्टता सम्पन्न व्यवहार करो - दोनों में सफल हो जायेंगे।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ कैसी भी परिस्थिति हो, हलचल हो लेकिन हलचल में अचल हो जाओ। ऐसे कन्ट्रोलिंग पावर है? या सोचते - सोचते अशरीरी हो जाऊँ, अशरीरी हो जाऊँ, उसमें ही टाइम चला जायेगा? *कई बच्चे बहुत भिन्न-भिन्न पोज़ बदलते रहते, बाप देखते रहते। सोचते हैं अशरीरी बनें फिर सोचते हैं अशरीरी माना आत्मा रूप में स्थित होना, हाँ मैं हूँ तो आत्मा, शरीर तो हूँ ही नहीं, आत्मा ही हूँ। मैं आई ही आत्मा थी, बनना भी आत्मा है अभी इस सोच में अशरीरी हुए या अशरीरी बनने की युद्ध की? आपने मन को आर्डर किया सेकण्ड में अशरीरी हो जाओ, यह तो नहीं कहा सोचो - अशरीरी क्या है?कब बनेंगे, कैसे बनेंगे? आर्डर तो नहीं माना ना! कण्ट्रोलिंग पावर तो नहीं हुई ना! अभी समय प्रमाण इसी प्रैक्टिस की आवश्यकता है। अगर कण्ट्रोलिंग पावर नहीं है तो कई परिस्थितियाँ हलचल में ले आ सकती हैं।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पुरानी दुनिया से बेहद के वैरागी बनना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा बगीचे में बैठ झुला झूलते हुए प्रकृति का आनंद ले रही हूँ... *मेरी नज़र पेड़ पर बैठी बया चिड़िया पर पड़ती है... वो छोटी सी प्यारी सी चिड़िया एक एक तिनके को जोड़कर घोंसला बना रही है... उस घोंसले को देख मुझे भी अपने नए घर की याद आती है जिसे मेरा प्यारा बाबा बना रहा है...* इस दुःख की दुनिया से निकाल सुख, शांति की नगरी बना रहा है... मैं आत्मा उस स्वर्ग के सपने को यादों में लिए उड़ चलती हूँ मीठे वतन, मीठे बाबा के पास...

 

  *प्यारे बाबा मुझे दिव्य देवताई गुणों से सजाकर हथेली पर स्वर्ग की सौगात देकर कहते हैं:-* मेरे लाडले बच्चे... *आप फूल से बच्चों के लिए पिता खूबसूरत परिस्तान बना रहा... सारे सुखो की जन्नत बच्चों के लिए बसा रहा... यह पुरानी दुनिया का अंत करीब है...* सुखो में मुस्कराने का मीठा समय नजदीक है... इसलिए हर साँस हर संकल्प हर कर्म में पवित्रता को अपनाओ...

 

_ ➳  *नए घर स्वर्ग में जाने स्वयं को निज गुण, शक्तियों के श्रृंगार से सुन्दर बनाती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा नई सी दुनिया में चलने को आतुर हूँ... सम्पूर्ण पवित्रता को अपनाकर सज रही हूँ... *नए सुख बाँहो में भरने को नई दुनिया में जाने के महा पुरुषार्थ में जुट गयी हूँ...*

 

  *पवित्र किरणों से मुझे परी समान सजाकर खुशियों के गगन में उड़ाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... *आप सुंदर देवता बन सुंदर दुनिया में चलोगे असीम खुशियां और आनन्द से खिलोगे... इस दुनिया का बदलाव समीप है...* पर नई दुनिया की पवित्रता पहली शर्त है... इसलिए पवित्रता को अपनाकर अनोखी दिव्यता से नई दुनिया के हकदार बनो...

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्वर्ग की यादों में झूमती, नाचती, पवित्र किरणों में खिलखिलाती हुई कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा पवित्र बन कितनी खूबसूरत होती जा रही हूँ... *मीठा बाबा मेरे लिए प्यारी सी दुनिया बनाने धरा पर उतर आया है... मै इस विनाशी दुनिया के विकारी जीवन को छोड़ चमकीली पवित्र होती जा रही हूँ...*

 

  *खुशियों के बगीचे की रूहानी फूल बनाकर पवित्रता की खुशबू से महकाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *इस विनाशी दुनिया से ममत्व निकाल नई दुनिया सुखो के संसार को याद करो...* पवित्र बन कर अनन्त खुशियो में मुस्कराओ... और शानदार सुखो की दुनिया के मालिक बन सदा के आनन्दित हो जाओ...

 

_ ➳  *इस पुरानी दुनिया से प्रीत निकाल सुखधाम को यादों में बसाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा इस विनाशी देह और दुनिया से मुक्त होती जा रही हूँ... *पवित्रता को दामन में सजाये स्वर्ग के लिए दिव्य प्रकाश से भरती जा रही हूँ... प्यारा बाबा मुझे सुखधाम में ले जाने आ गया है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मुख से सदैव ज्ञान अमृत निकालना है*"

 

_ ➳  अंतर्मुखता की गुफा में बैठ, एकांतवासी बन अपने प्यारे पिता  की याद में अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे *मेरी ब्रह्मा माँ अविनाशी ज्ञान रत्नों से मेरा श्रृंगार कर, मुझे आप समान रूप बसन्त बनाने के लिए अपने अव्यक्त वतन में बुला रही हैं*। सम्पूर्ण फ़रिश्ता स्वरूप में अपनी ब्रह्मा माँ और उनकी भृकुटि में चमक रहे अपने शिव पिता को मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्र से देख रही हूँ और उनकी अव्यक्त आवाज जो मुझे पुकार रही है वो भी मैं स्पष्ट सुन रही हूँ। *बाहें पसारे अपने इंतजार में खड़ी अपनी ब्रह्मा माँ की यह अव्यक्त आवाज मुझे जल्दी से जल्दी उनके पास पहुंचने के लिए व्याकुल कर रही है*। 

 

_ ➳  जैसे एक माँ अपने बच्चे के इंतजार में टकटकी लगा कर दरवाजे को देखती रहती है ऐसा ही स्वरूप अपने इंतजार में खड़ी अपनी ब्रह्मा माँ का मैं देख रही हूँ। *बिना एक पल की भी देरी किये अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर को मैं धारण करती हूँ और साकारी देह से बाहर निकल कर अपने अव्यक्त वतन की ओर चल पड़ती हूँ*। अपने लाइट के फ़रिश्ता स्वरूप में स्थित, जल्दी से जल्दी अपनी ब्रह्मा माँ और अपने शिव पिता के पास पहुँचने का संकल्प जैसे ज्ञान और योग के पंख लगाकर मुझे तीव्र गति से उड़ने का बल दे रहा है। *ज्ञान और योग के इन पँखो की सहायता से बहुत तीव्र उड़ान भर कर मैं फरिश्ता सेकेण्ड से भी कम समय में साकारी दुनिया को पार कर जाता हूँ और उससे ऊपर उड़कर अति शीघ्र पहुँच जाता हूँ अपनी ब्रह्मा माँ के पास*।

 

_ ➳  जैसे अपने बच्चे को देखते ही माँ दौड़ कर दरवाजे पर आती है और उसे अपने गले लगा लेती है ऐसे ही मुझे देखते ही मेरी ब्रह्मा माँ दौड़ कर मेरे पास आती है और अपनी बाहों में भरकर अपना असीम प्यार मुझ पर लुटाने लगती है। अपनी ब्रह्मा माँ के नयनों में अपने लिए समाये अथाह स्नेह को मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ। *अपना असीम स्नेह मुझ पर लुटाकर, मेरा हाथ पकड़ कर वो मुझे अपने पास बिठा कर, बड़े प्यार से मुझे निहार रही है और अपने हाथों से अब मेरा श्रृंगार कर रही है, ज्ञान के एक - एक अमूल्य रत्न से मुझे सजाते हुए मेरी ब्रह्मा माँ मुझ पर बलिहार जा रही है*।मुझे आप समान रूप बसन्त बनाने के लिए दिव्य गुणों से मुझे सजाकर, मर्यादाओं के कंगन पहना रही है। 

 

_ ➳  एक दुल्हन की तरह अविनाशी ज्ञान रत्नों के श्रृंगार से सज - धज कर अब मैं ज्ञान सागर अपने अविनाशी साजन के पास, स्वयं को ज्ञान के अखुट ख़ज़ानों से भरपूर करने उनके धाम जा रही हूँ। *ज्ञान रत्नों के श्रृंगार से सजे अपने निराकारी सुन्दर सलौने स्वरूप में स्थित होकर, अब मैं अव्यक्त वतन से ऊपर निराकार वतन की ओर बढ़ रही हूँ*। देख रही हूँ अपने अविनाशी शिव साजन को अपने सामने विराजमान अपने अनन्त प्रकाशमय स्वरूप में अपनी किरणो रूपी बाहों को फैलाये हुए। बिना विलम्ब किये सम्पूर्ण समर्पण भाव से मैं उनकी किरणो रूपी बाहों में समा जाती हूँ। *मेरे ज्ञान सागर शिव साजन  के ज्ञान की रिमझिम फुहारें मुझ आत्मा सजनी के ऊपर बरसने लगती हैं*। 

 

_ ➳  ज्ञान योग की रिमझिम फ़ुहारों के स्पर्श से रूप बसन्त बन मैं आत्मा परमधाम से नीचे आ जाती हूँ। विश्व ग्लोब पर स्थित होकर, विश्व की सर्व आत्माओं के ऊपर ज्ञान वर्षा करते हुए मैं साकार लोक में प्रवेश करती हूँ और अपने साकार तन में भृकुटि के अकालतख्त पर आकर मैं विराजमान हो जाती हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर ज्ञान योग को अपने जीवन मे धारण कर, अपने मुख से सदा ज्ञान रत्न निकालते हुए, अब मैं सबको अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान दे रही हूँ। ज्ञान सागर अपने शिव पिता की याद में रहकर, स्वयं को उनके ज्ञान की किरणो की छत्रछाया के नीचे अनुभव करते, अपनी बुद्धि रूपी झोली सदा ज्ञान रत्नों से भरपूर करके, रूप बसन्त बन मैं सबको अविनाशी ज्ञान रत्नों से सम्पन्न बना रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं एक ही रास्ता और एक से ही रिश्ता रखने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सम्पूर्ण फरिश्ता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा सेवा के उमंग उत्साह में रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा माया से सेफ्टी का साधन धारण करती हूँ  ।*

   *मैं निष्काम सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *जैसे बाप अशरीरी हैअव्यक्त है वैसे अशरीरी पन का अनुभव करना वा अव्यक्त फरिश्ते पन का अनुभव करना - यह है रंग में रंग जाना*। कर्म करो लेकिन अव्यक्त फरिश्ता बनके काम करो। अशरीरीपन की स्थिति का जब चाहो तब अनुभव करो। ऐसे मन और बुद्धि आपके कन्ट्रोल में हो। आर्डर करो - अशरीरी बन जाओ। आर्डर किया और हुआ। फरिश्ते बन जायें। जैसे *मन को जहाँ जिस स्थिति में स्थित करने चाहो वहाँ सेकण्ड में स्थित हो जाओ*। ऐसे नहीं ज्यादा टाइम नहीं लगा, 5 सेकण्ड लग गये, 2 सेकण्ड लग गये। आर्डर में तो नहीं हुआकन्ट्रोल में तो नहीं रहा। *कैसी भी परिस्थिति होहलचल हो लेकिन हलचल में अचल हो जाओ। ऐसे कन्ट्रोलिंग पावर है?* या सोचते - सोचते अशरीरी हो जाऊंअशरीरी हो जाऊंउसमें ही टाइम चला जायेगा

 

 _ ➳  कई बच्चे बहुत भिन्न-भिन्न पोज बदलते रहतेबाप देखते रहते। सोचते हैं अशरीरी बनें फिर सोचते हैं अशरीरी माना आत्मा रूप में स्थित होनाहाँ मैं हूँ तो आत्माशरीर तो हूँ ही नहीं,आत्मा ही हूँ। मैं आई ही आत्मा थीबनना भी आत्मा है... अभी इस सोच में अशरीरी हुए या अशरीरी बनने की युद्ध की? *आपने मन को आर्डर किया सेकण्ड में अशरीरी हो जाओयह तो नहीं कहा सोचो - अशरीरी क्या हैकब बनेंगेकैसे बनेंगेआर्डर तो नहीं माना ना! कन्ट्रोलिंग पावर तो नहीं हुई ना! अभी समय प्रमाण इसी प्रैक्टिस की आवश्यकता है।* अगर कन्ट्रोलिंग पावर नहीं है तो कई परिस्थितियां हलचल में ले आ सकती हैं। 

 

✺   *ड्रिल :-  "परमात्म रंग में रंग जाना अर्थात् सेकण्ड में अशरीरी बनने का अनुभव करना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा, मन बुद्धि से बापदादा के कमरे में... बापदादा के चित्र के सामने... *मधुशाला के प्यालों के समान बाबा की दोनों आँखें... एक पावनता और दूसरा रूहानियत से भरपूर...* भर-भर कर छलक रहे है दोनों आँखों के प्याले... और उन पावन रूहानी एहसासों को मैं आत्मा, आँखों से ही घूँट- घूँट कर पिये जा रही हूँ... *रूहानी नशे में चूर मैं, अशरीरी अवस्था का अनुभव करती हुई...* मन बुद्धि रूपी पंखों को फैलाये नन्हीं तितली के रूप में... *नन्हें पंखों को हिलाती हुई मैं बापदादा की हथेली पर जाकर बैठ गयी हूँ... एक खूबसूरत सा एहसास... उनके इतने करीब होने का...* अपनी नन्हीं नन्हीं आँखों से बाबा को टुकुर टुकुर देखती हुई... बेहद प्यार से दृष्टि दे रहे है बापदादा मुझे... और देखते ही देखते मैं चमचमाते हीरे के रूप में बदलती हुई... *उनकी हथेली पर मैं आत्मा चमचमाते कोहिनूर हीरे के समान...* मेरी आभा से भरपूर हो गया है आस पास का पूरा ही वातावरण... जैसे एक साथ असंख्य चाँद जमीन पर उतर आये हो...

 

 _ ➳  मैं आत्मा फरिश्ता रूप में सूक्ष्म वतन में... बापदादा एक नये रूप में मेरे सम्मुख... *विशाल और भव्य से टबनुमा बर्तन में भरा है अशरीरी पन का रंग, रूहानियत का रंग... और हाथों में पावनता की पिचकारी लिए एक एक आत्मा को उस रंग में भिगोतें हुए... पूरा रंगने में समय लग रहा है किसी- किसी आत्मा को... अलग अलग पोज़ बदलती हुई आत्माए... मगर मैं याद कर रहा हूँ बापदादा के महावाक्य... बच्चे सेकेंड में अशरीरी होना ही बाप के रंग में रंगना है...* और ये निश्चय कर मैं उतर गया हूं पूरी तरह से उस विशाल से टब में एक ही सेकेंड में... *बेहद खूबसूरत एहसास... अशरीरीपन का...* हम दोनों एक ही रंग में रंगे... *अब पहचान मुश्किल सी है, कौन दर्पण है और कौन है चेहरा... मेरी रंगत से मेल खा रहा है रंग रूप तेरा...*

 

 _ ➳  बापदादा हाथ बढाकर मुझे निकाल रहें है उस टब से... *मगर वो रंग अब पूरी तरह मुझे रंग चुका है...* गले लगा रहे है बापदादा मुझे... और *सेकेंड में कन्ट्रोलिंग पावर का वरदान दे रहे है मेरे सर पर हाथ रखकर...* गहराई से महसूस कर रहा हूँ उन वरदानी हाथों की ऊष्मा को अपने सर पर... और बापदादा के सेकेंड के इशारें पर मैं बापदादा के साथ बिन्दु रूप धारण कर परम धाम की यात्रा पर... मैं और बापदादा परमधाम में बीज रूप अवस्था में... शिव बिन्दु के एकदम करीब... देर तक खुद को सेकेन्ड की कन्ट्रोलिंग पावर से सम्पन्न कर मैं लौट आया हूँ अपनी उसी देह में... मगर देह में भी विदेही और शरीर में अशरीरीपन का गहराई से एहसास समायें हुए... ओम शान्ति...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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