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 06 / 12 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *गुप्त पुरुषार्थ करते रहे ?*

 

➢➢ *इस रंग बिरंगी दुनिया में गँसे तो नहीं ?*

 

➢➢ *सदा ख़ुशी की खुराक खाई और खिलाई ?*

 

➢➢ *एक भी संकल्प व बोल व्यर्थ न चला नॉलेजफुल स्थिति का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  आत्मा शब्द स्मृति में आने से ही रुहानियत के साथ शुभ-भावना भी आ जाती है। पवित्र दृष्टि हो जाती है। *चाहे भल कोई गाली भी दे रहा हो लेकिन यह स्मृति रहे कि यह आत्मा तमोगुणी पार्ट बजा रही है तो उससे नफरत नहीं करेंगे, उसके प्रति भी शुभ भावना बनी रहेगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं लाइट हाउस, माइट हाउस हूँ"*

 

✧  अपने को लाइट हाउस और माइट हाउस समझते हो? जहाँ लाइट होती है वहाँ कोई भी पाप का कर्म नहीं होता है। *तो सदा लाइट हाउस रहने से माया कोई पाप कर्म नहीं करा सकती।* सदा पुण्य आत्मा बन जायेंगे। 

 

✧  ऐसे अपने को पुण्य आत्मा समझते हो? पुण्य आत्मा संकल्प में भी कोई पाप कर्म नहीं कर सकती। *और पाप वहाँ होता है जहाँ बाप की याद नहीं होती। बाप है तो पाप नहीं, पाप है तो बाप नहीं।* तो सदा कौन रहता है? पाप खत्म हो गया ना? जब पुण्य आत्मा के बच्चे हो तो पाप खत्म।

 

✧  तो आज से 'मैं पुण्य आत्मा हूँ पाप मेरे सामने आ नहीं सकता' यह दृढ़ संकल्प करो। जो समझते हैं आज से पाप को स्वपन में भी, संकल्प में भी नहीं आने देंगे वह हाथ उठाओ। *दृढ़ संकल्प की तीली से 21 जन्मों के लिए पाप कर्म खत्म।* बापदादा भी ऐसे हिम्मत रखने वाले बच्चों को मुबारक देते हैं। यह भी कितना भाग्य है जो स्वयं बाप बच्चों को मुबारक देते हैं। इसी स्मृति में सदा खुश रहो और सबको खुश बनाओ।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सेवा में बहुत अच्छा लगे हुए हो लेकिन लक्ष्य क्या है? सेवाधारी बनने का वा कर्मातीत बनने का? कि दोनों साथ-साथ बनेंगे? ये अभ्यास पक्का है? *अभी-अभी थोडे समय के लिए यह अभ्यास कर सकते हो?* 

 

✧  अलग हो सकते हो? या ऐसे अटैच हो गये हो जो डिटैच होने में टाइम चाहिए? कितने टाइम में अलग हो सकते हो? मिनट चाहिए, एक मिनट चाहिए वा एक सेकण्ड चाहिए? एक सेकण्ड में हो सकते हो? *पाण्डव एक सेकण्ड में एकदम अलग हो सकते हो?*

 

✧  *आत्मा अलग मालिक और कर्मेन्द्रियाँ कर्मचारी अलग, यह अभ्यास जब चाहो तब होना चाहिए।* अच्छा, अभी-अभी एक सेकण्ड में न्यारे और बाप के प्यारे बन जाओ। पॉवरफुल अभ्यास करो बस, मैं हूँ ही न्यारी।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  फ़रिश्ते स्वरूप की स्थिति में सदा रहते हो? फ़रिश्ते स्वरूप की लाइट में अन्य आत्माओं को भी लाइट ही दिखाई देगी। *हद के एक्टर्स जब हद के अन्दर अपने एक्ट करते दिखाई देते हैं तो लाइट के कारण अति सुन्दर स्वरूप दिखाई देते हैं। वही एक्टर, साधारण जीवन में, साधारण लाइट के अन्दर पार्ट बजाते हुए कैसे दिखाई देते हैं? रात दिन का अन्तर दिखाई देता है ना?* लाइट का फोकस उनके फीचर्स को परिवर्तित कर देता है। *ऐसे ही बेहद ड्रामा के आप हीरों- हीरोइन एक्टर्स, अव्यक्त स्थिति की लाइट के अन्दर हर एक्ट करने से क्या दिखाई देंगे? अलौकिक फ़रिश्ते।* साकारी की बजाय सूक्ष्म वतनवासी नज़र आयेंगे। साकारी होते हुए भी आकारी अनुभव होंगे। हर एक्ट हरेक को स्वत: ही आकर्षित करने वाला होगा। *जैसे आज हद का सिनेमा व ड्रामा कलियुगी मनुष्यों का आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। छोड़ना चाहते हुए और न देखना चाहते हुए भी हद के एक्टर्स की एक्ट अपनी ओर खींच लेती है, लेकिन उसका आधार लाइट है। ऐसे ही इस अन्तिम समय में माया के आकर्षण की अति के बाद अन्त होने पर, बेहद के हीरो एक्टर्स जो सदा जीरो स्वरूप में स्थित होते हुए जीरो बाप के साथ हर पार्ट बजाने वाले हैं और दिव्य ज्योति स्वरूप वाले जिनकी स्थिति भी लाइट की है और स्टेज पर हर पार्ट भी लाइट में हैं अर्थात् जो डबल लाइट वाले फ़रिश्ते हैं वे हर आत्मा को स्वत: ही अपनी तरफ़ आकर्षित करेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  अपना सौभाग्य बनाने ईश्वरीय सेवा में लग जाना"*

 

_ ➳  *मै तेजस्वी आत्मा फ़रिश्ते स्वरूप में, सूक्ष्मवतन पहुंच... जब मीठे बाबा दादा से दिल के जज्बात बयान करती हूँ... प्यारे बाबा दादा... मुझे असीम खुशियो का पता, ईश्वरीय सेवा में छुपा हुआ दिखाते है...* महज सेवाओ में छुपे खुशियो के अनन्त खजाने को देख, मै आत्मा अति रोमांचित हो उठती हूँ... एक तरफ *ईश्वरीय साथ और सेवाओ में अथाह खुशियो को बाँहों में समेटे... और दूसरी और अपने भविष्य राज्य भाग्य को स्पष्ट देख, आनन्दित हो झूम रही हूँ...*"

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा कोअपनी स्नेहिल तरंगों में डुबोते हुए कहते है:-* मेरे लाडले प्यारे बच्चे... *ईश्वरीय सेवाओ में दीवानो सा दिल अर्पण करके, प्रेम और खुशियो की अनन्त ऊंचाइयों को सहज ही पा सकते हो...* यह दिल सदा मनुष्यो को सौंप, जो दुखो को दामन में संजोया है... वह काफूर हो, गुलाबी खुशियो के फूलो से महक उठेगा... और सदा बाबा के मखमली हाथो में खिलता रहेगा..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को भीगी पलको से निहार रही हूँ:-* इतना प्यार, इतनी खुशियो को सहज सामने देख... प्रेम के असुंवन में भीग रही हूँ... प्रेम भावो में दीवानी हो कह रही हूँ... ओ मेरे प्यारे बाबा... *यह कौनसे पुण्य ने मेरा सोया भाग्य जगाया है... और यूँ आपके हाथो में जीवन थमाया है... ईश्वरीय सेवाओ में लगाकर, मुझे खुशियो में महाअमीर बनाया है..."*

 

  *मीठे बाबा मुझ दीवानी आत्मा को बाँहों में भरकर... प्रेम में भीगी मेरी पलको को अपनी मुस्कान से पोंछ रहे है... और कह रहे:-* मीठे बच्चे... मै विश्व पिता तो सब कुछ चुटकियो में कर सकता हूँ... पल भर में खुशियो भरे सतयुग सजा सकता हूँ... पर मेरे मीठे लाल... *तेरे नन्हे हाथो से करवाकर, अपने से ऊँचा देखने की चाहत लिये... मै पिता तेरे दर पर बड़ी उम्मीद लिए खड़ा हूँ..."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा की स्नेह भरे जज्बात सुनकर... मै आत्मा ईश्वर पिता को, स्वयं को, और अपने सुनहरे भाग्य को देख, गर्वित हो रही... और कह उठी:-* हाँ मेरे लाडले बाबा... आपकी सेवा ही जीवन का एकमात्र ध्येय है.. और *इन सेवाओ में छिपे खुशियो के अगाध खजाने ही मेरा खुबसूरत लक्ष्य है... मुझ अति भाग्यशाली आत्मा ने, भगवान की सेवा में ऊँगली मात्र क्या लगाई, कि खुशियां मेरी परछाई हो गई है..."*

 

  *प्यारे बाबा मेरी खुशनुमा मुस्कराहटों पर... दिल से कुर्बान हो गए और कहने लगे:-* फूल बच्चे... सच्ची खुशियां ही ईश्वर पुत्रो का खुबसूरत गहना है... और मेरे सिकीलधे बच्चे इन गहनों में सदा सजे रहे... यही आश एक पिता का दिल सदा करता है... *जिन खुशियो से जनमो महरूम रहे... वह एक कदम मात्र सेवा में कदमो तले बिछ जायेगी... जरा इन राहो पर कदम उठाकर तो देखो... जीवन खुशियो का अम्बार न बना दूँ तो फिर कहना..."*

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बापदादा को और कभी अपने खुबसूरत भाग्य को टुकुर टुकुर सी निहार रही हूँ:-* जादूगर बाबा की जादू भरी नजर, कैसे मेरा जीवन संवार रही....इस मीठी सोच में, मै बावरी सी हो, ईश्वरीय प्रेम में झूम उठी.. और कहने लगी मीठे बाबा... यह जीवन आपको अर्पित है, आपकी अमानत है *सर्वस्व बापदादा की सेवाओ में न्यौछावर कर... सच्ची खुशियो की अधिकारी हो... मै आत्मा मुस्कराती हुई, साकारी तन में लौट आती हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस रंग बिरंगी दुनिया में फंसना नही है*"

 

_ ➳  अपने आश्रम के क्लास रूम में अपने गॉडली स्टूडेंट स्वरूप में स्थित हो कर, अपने परम शिक्षक शिव बाबा के मधुर महावाक्य मैं सुन रही हूँ। *बाबा ने अपने सभी ब्राह्मण बच्चों को "तुम हो बेहद के सन्यासी" टाइटल देते हुए मुरली के माध्यम से अपने मधुर महावाक्य उच्चारण किये*। उन मधुर महावाक्यों की समाप्ति के बाद, अपने आश्रम के बाबा रूम मैं बैठ मैं बाबा के उन महावाक्यों को स्मृति में ला कर जैसे ही उन पर विचार सागर मंथन करने लगती हूँ *ऐसा अनुभव होता है जैसे मेरे सामने लगे ट्रांसलाइट के चित्र के स्थान पर साक्षात अव्यक्त बापदादा खड़े हैं और मुझे देख कर मन्द - मन्द मुस्करा रहें हैं*।

 

_ ➳  ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे बाबा के होंठ धीरे धीरे खुल रहें हैं और बाबा मुझ से कुछ कह रहे हैं। मैं एकटक बाबा को निहार रही हूँ। *बाबा के नयनों से एक बहुत तेज लाइट की धार निकलती है और मेरी भृकुटि से होती हुई सीधे मुझ आत्मा को टच करती है*। देखते ही देखते बाबा की वो लाइट माइट पा कर मैं अपने अव्यक्त स्वरूप में स्थित होने लगती हूँ। स्वयं को अब मैं एकदम हल्का अनुभव कर रही हूँ। *मुझे ऐसा लग रहा हूं जैसे मेरे पाँव धरती को नही छू रहे बल्कि धीरे - धीरे धरती से ऊपर उठ रहे हैं*। एक बहुत ही निराला अनुभव मैं आत्मा इस समय कर रही हूँ। मेरा यह लाइट स्वरूप मुझे असीम आनन्द की अनुभूति करवा रहा है।

 

_ ➳  इस अति सुंदर अव्यक्त स्थिति में स्थित, मेरी निगाहें जैसे ही दोबारा बाबा की ओर जाती है। बाबा के अधखुले होंठो से निकल रही अव्यक्त आवाज को अब मैं बिल्कुल स्पष्ट सुन रही हूँ। बाबा के हर संकल्प को अब मेरी बुद्धि बिल्कुल क्लीयर कैच कर रही है। *मैं स्पष्ट समझ रही हूँ कि बाबा मुझ से कह रहें हैं, मेरे बच्चे:- इस पुरानी दुनिया का तुम्हे कम्प्लीट सन्यास करना है"*। हद के सन्यासी तो घर - बार छोड़ जंगलो में चले जाते हैं। लेकिन तुम्हे बेहद का सन्यासी बन, घर - गृहस्थ में रहते मन बुद्धि से इस पुरानी दुनिया का कम्प्लीट सन्यास करना है। *तुम्हे प्रवृत्ति में रहते पर - वृति में रह अपना जीवन कमल पुष्प समान बना कर, सबको अपनी रूहानियत की खुशबू से महकाना है*।

 

_ ➳  इस अव्यक्त मिलन का भरपूर आनन्द लेते - लेते मैं अनुभव करती हूँ जैसे अव्यक्त बापदादा अब अपने अव्यक्त वतन की ओर जा रहें हैं और मुझे भी अपने साथ चलने का ईशारा दे रहें हैं। बापदादा का हाथ थामे, मैं अव्यक्त फ़रिशता अब धीरे - धीरे ऊपर उड़ रहा हूँ। *छत को क्रॉस कर, ऊपर की और उड़ता हुआ, आकाश में विचरण करता हुआ, आकाश को भी पार कर अब मै फ़रिशता बापदादा के साथ पहुंच जाता हूँ सूक्ष्म वतन*। अपने पास बिठा कर, अपनी स्नेह भरी दृष्टि से बाबा मुझे निहार रहें हैं। बाबा की दृष्टि से बाबा के सभी गुण मुझ में समाते जा रहें हैं।

 

_ ➳  बाबा की शक्तिशाली दृष्टि मुझमें एक अलौकिक रूहानी नशे का संचार कर रही हैं जिससे मैं फरिश्ता असीम रूहानी आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ। बाबा के हाथों का मीठा - मीठा स्पर्श मुझे बाबा के अपने प्रति अगाध प्रेम का स्पष्ट अनुभव करवा रहा है । मैं बाबा के नयनो में अपने लिए असीम स्नेह देख कर गद - गद हो रहा हूँ। *बाबा की दृष्टि से आ रही सर्वशक्तियों की लाइट माइट मुझमे असीम बल का संचार कर रही है*। स्वयं को परमात्म बल से भरपूर करके अब मैं बापदादा को निहारते हुए "बेहद के सन्यासी" बनने के उनके फरमान का पालन करने की उनसे दृढ़ प्रतिज्ञा कर वापिस साकारी दुनिया की ओर प्रस्थान करता हूँ। *अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ मैं फिर से अपने साकारी तन में प्रवेश कर जाता हूँ*।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर बाबा के फरमान को धारणा में लाने का अब मैं पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ। देह और देह की दुनिया में रहते हुए भी मन बुद्धि से इस दुनिया का कम्प्लीट सन्यास कर मैं स्वयं को इस नश्वर दुनिया से न्यारा अनुभव कर रही हूं। *सर्व सम्बन्धों का सुख बाबा से लेते हुए मैं देह और देह से जुड़े सम्बन्धों से सहज ही उपराम होती जा रही हूँ*। मन बुद्धि से पुरानी दुनिया का सन्यास, मुझे प्रवृति में रहते भी हर प्रकार के बोझ से मुक्त, लाइट स्थिति का अनुभव हर समय करवा रहा है।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मै सदा खुशी की खुराक खाने और खिलाने वाली खुशहाल और खुशनसीब          आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं एक भी संकल्प वा बोल व्यर्थ ना गंवाने वाली नॉलेजफुल आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  आप लोग सभी नये वर्ष में सिर्फ कार्ड देकर हैपी न्यु इयर नहीं करना लेकिन कार्ड के साथ हर एक आत्मा को दिल से रिगार्ड देना... *रिगार्ड का कार्ड देना और एक-दो को सौगात में छोटा-मोटी कोई भी चीजें तो देते ही होवह भी भले दो लेकिन उसके साथ-साथ दुआयें देना और दुआयें लेना...* कोई नहीं भी दे तो आप लेना... अपने वायब्रेशन से उसकी बद-दुआ को भी दुआ में बदल लेना... तो *रिगार्ड देना और दुआयें देना और लेना - यह है नये वर्ष की गिफ्ट...* शुभ भावना द्वारा आप दुआ ले लेना... अच्छा।   

 

✺   *ड्रिल :-  "रिगार्ड का कार्ड देकर दुआयें देने और दुआयें लेने का अनुभव"*

 

_ ➳  अपना लाइट का सूक्ष्म आकारी फ़रिशता स्वरूप धारण कर, अपने खुदा दोस्त, *अपने शिव साथी से अपने मन की बात कहने के लिए मैं अपने साकारी शरीर रूपी घर से बाहर निकलती हूँ और पहुंच जाती हूँ अपने शिव साथी के पास अव्यक्त वतन में...* यहां पहुंच कर मैं अपने खुदा दोस्त का आह्वान करती हूं जो पलक झपकते ही अपना धाम छोड़ कर, इस अव्यक्त वतन में पहुंच जाते हैं और आकर अव्यक्त ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में विराजमान हो जाते हैं...

 

_ ➳  अब मैं देख रही हूं अपने साथी, शिव बाबा को लाइट माइट स्वरुप में अपने बिल्कुल सामने... मुझे देख कर मुस्कराते हुए बापदादा मुझे अपने पास बुलाते हैं... *मुझे गले लगा कर, न्यू ईयर विश करते हैं और गिफ्ट के रूप में अपनी सर्वशक्तियों, सर्व गुणों और सर्व खजानों से मुझे भरपूर कर देते हैं...* अपने प्यारे मीठे शिव साथी से मीठी दृष्टि लेते हुए मन ही मन मैं अपने आप से सवाल करती हूं कि अपने भगवान साथी को मैं रिटर्न में न्यू ईयर की क्या गिफ्ट दूँ...! मेरे मन की बात मेरे साथी तुरन्त पढ़ लेते हैं... चेहरे पर गुह्य मुस्कराहट लाकर मेरे मीठे बाबा मुझे सामने देखने का इशारा करते हैं...

 

_ ➳  सामने एक बहुत ही सुंदर लिफ्ट को देख कर मैं प्रश्नचित निगाहों से अपने प्यारे मीठे खुदा दोस्त को देखती हूँ... *बाबा मुस्कराते हुए कहते हैं:- "ये न्यू ईयर का एक विशेष तोहफा है..." ये लिफ्ट साधारण लिफ्ट नही, ये दुआओं की लिफ्ट है*... यह कहकर बाबा मुझे उस लिफ्ट के अंदर ले जाते हैं... लिफ्ट में बैठते ही, स्मृति का स्विच ऑन करते ही मैं सेकेंड में तीनों लोकों की सैर करने लगती हूँ... *बाबा के मधुर महावाक्य सहज ही स्मृति में आने लगते हैं कि "ब्राह्मण जीवन मे दुआयें लिफ्ट का काम करती हैं जो पुरुषार्थ को तीव्र करती हैं..."*

 

_ ➳  इन महावाक्यों की स्मृति में खोई, अपने ख़ुदा दोस्त के साथ इस लिफ्ट में बैठी मैं पूरे वतन की सैर कर, आनन्दित हो रही हूं... तभी *बाबा की आवाज सुनाई देती है कि:- "इस लिफ्ट को पाने का साधन भी दुआओं की गिफ्ट है" अर्थात दुआयें देना और दुआयें लेना..." इसलिए नये वर्ष में सिर्फ कार्ड देकर हैपी न्यु इयर नहीं करना लेकिन कार्ड के साथ हर एक आत्मा को दिल से रिगार्ड देना... कोई नही दे तो भी आप देना... उनकी बद-दुआ को भी दुआ में बदल देना... शुभ भावना द्वारा आप दुआ ले लेना... अपने सभी आत्मा भाइयों को दुआओं की गिफ्ट देना, यही बाबा के लिए आपके गिफ्ट का रिटर्न है...*

 

_ ➳  बाबा को न्यू ईयर की गिफ्ट का रिटर्न देने के लिए अब मैं अपने सम्बन्ध संपर्क में आने वाली सर्व आत्माओं को बाबा के सामने वतन में इमर्ज करके, जाने अनजाने में हुई अपनी हर गलती के लिए उनसे माफी मांग रही हूँ... उनकी गलतियों के लिए भी अपने मन में उनके लिए कोई मैल ना रखते हुए उन्हें दिल से माफ कर रही हूँ... *बाबा से आ रही सर्वशक्तियां मुझ से निकल कर उन आत्माओ पर पड़ रही हैं और एक दूसरे के लिए मन में जो कड़वाहट थी वो धुल रही है... मन में अब किसी के लिए भी कोई बोझ कोई भारीपन नही है...*

 

_ ➳  परमात्म लाइट माइट से अब मैं भरपूर हो कर वापिस लौट रही हूँ... और अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ फिर से अपने साकारी शरीर रूपी घर में प्रवेश कर रही हूँ... *किसी भी आत्मा के लिए अब मेरे मन मे कोई द्वेष नही है*... अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को अब मैं स्नेह और रिगार्ड दे कर सहज ही उनकी दुआओं की पात्र बन रही हूँ... *इस संगमयुग पर "दुआयें देना और दुआयें लेना" यही मुझ ब्राह्मण आत्मा का कर्तव्य है...* इस बात को सदा स्मृति में रख, हर आत्मा के प्रति शुभभावना, शुभकामना रखते हुए अब मैं दुआओं की लिफ्ट पर बैठ सदा उड़ती कला का अनुभव कर रही हूं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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