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 07 / 03 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सवेरे सवेरे उठ बाप की याद में बैठे ?*

 

➢➢ *इस पुराने शारीर को भूल बाप की याद में रहे ?*

 

➢➢ *तेरे मेरे की हलचल को समाप्त कर रहम की भावना को इमर्ज किया ?*

 

➢➢ *व्यर्थ संकल्पों की हथोडी से समस्या के पत्थर को तोड़ने की बजाये हाई जम्प दे समस्या रुपी पहाड़ को पार किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जीवन में जो चाहिए अगर वह कोई दे देता है तो यही प्यार की निशानी होती है। तो बाप का आप बच्चों से इतना प्यार है जो जीवन के सुख- शान्ति की सब कामनायें पूर्ण कर देते हैं।* बाप सुख ही नहीं देते लेकिन सुख के भण्डार का मालिक बना देते हैं। *साथ-साथ श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींचने का कलम भी देते हैं, जितना चाहे उतना भाग्य बना सकते हो - यही परमात्म प्यार है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को श्रेष्ठ भाग्यवान समझते हो? भाग्य में क्या मिला? *भगवान ही भाग्य में मिल गया। स्वयं भाग्य विधाता भाग्य में मिल गया। इससे बड़ा भाग्य और क्या हो सकता है? तो सदा ये खुशी रहती है कि विश्व में सबसे बड़े ते बड़े भाग्यवान हम आत्मायें हैं।*

 

  हम नहीं, हम आत्मायें। आत्मायें कहेंगे तो कभी भी उल्टा नशा नहीं आयेगा। *देही-अभिमानी बनने से श्रेष्ठ नशा - ईश्वरीय नशा रहेगा। भाग्यवान आत्मायें हैं, जिन्हों के भाग्य का अब भी गायन हो रहा है।*

 

  *'भागवत' - आपके भाग्य का यादागार है। ऐसा अविनाशी भाग्य जो अब तक भी गायन होता है, इसी खुशी में सदा आगे बढ़ते रहो। कुमारियां तो निर्बन्धन, तन से भी निर्बन्धन, मन से भी निर्बन्धन। ऐसे निर्बन्धन ही उड़ती कला का अनुभव कर सकते हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अभी बापदादा सभी को चाहे यहाँ समुख बैठे हैं, चाहे देश-विदेश में दूर बैठे सुन रहे हैं या देख रहे हैं, सभी बच्चों को ड़ि्ल कराते हैं। सभी रेडी हो गये। *सब संकल्प मर्ज कर दो, अभी एक सेकण्ड में मन-बुद्धि द्वारा अपने स्वीट होम में पहुँच जाओ।*

 

✧  *अभी परमधाम से अपने सूक्ष्म वतन में पहुँच जाओ। अभी सूक्ष्मवतन से स्थूल साकार वतन में अपने राज्य स्वर्ग में पहुँच जाओ। अभी अपने पुरुषोत्तम संगमयुग में पहुँच जाओ। अभी मधुबन में आ जाओ।* ऐसे ही बार-बार स्वदर्शन चक्रधारी बन चक्र लगाते रहो। अच्छा।

 

✧  *अभी एक सेकण्ड में अपने मन से सब संकल्प समाप्त कर एक सेकण्ड में बाप के साथ परमधाम में ऊँचे ते ऊंचे स्थान, ऊँचे ते ऊंचा बाप, उनके साथ ऊँची स्थिति में बैठ जाओ।* और बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान बन विश्व की आत्माओं को शक्तियों की किरणें दो। अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  सदैव अपने को अकालमूर्त समझते चलेंगे तो अकाले मृत्यु से भी, अकाल से, सर्व समस्याओं से बच सकेंगे । *मानसिक चिन्तायें, मानसिक परिस्थितियों को हठाने का एक ही साधन याद रखना है - सिर्फ अपने इस पुराने शरीर के भान को मिटाना है। इस देह अभिमान को मिटाने से सर्व परिस्थितियाँ मिट जायेंगी ।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- योग से आत्मा को सतोप्रधान बनाना"*

 

_ ➳  सारी एक की ही महिमा है, एक का ही गायन है... *गाते भी हैं पतित पावन, जरूर पतित हैं तभी तो बुलाते हैं...* सतयुग में तो सुखी होते हैं, वहां कोई दुख नहीं, दुख का नाम नहीं निशान नहीं... तो बाप की भी कोई दरकार नहीं पड़ती... *अभी है घोर कलयुग, घोर अंधेरा... फिर हम ब्राह्मणों की अब रात पूरी हुई दिन शुरू हुआ है...* गाते भी है ब्रह्मा की रात, ब्रह्मा का दिन... तो अब बाप मिला है, मनमनाभव का मंत्र मिला है... *तो अब मैं आत्मा और सबसे बुद्धि का योग तोड़ एक शिव बाबा से जुडी हूं... 'एक बाप दूसरा न कोई' इसी तपस्या में मैं आत्मा तप रही हूं और गोरा पावन बन रही हूं...*

 

   *पतित पावन बाबा ब्रह्मा तन का आधार लिए ब्रह्मा मुख कमल से मुझ आत्मा से कहते हैं:-* "मीठी बच्ची... *21 जन्म सुख भोग 63 जन्म फिर तुमने अनेक विकर्म किये... जिससे फिर अब तुम्हारे सर पर पापों का बोझ चढ़ गया हैं...* बोझ चढ़ते-चढ़ते अब तुम आत्मा तमोप्रधान काली हो चुकी हो, अब तुम्हारे बुलाने पर क्योंकि मैं आया हूं... *तो अब, मनमनाभव के मंत्र को धारण कर गोरा बनो..."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी समझानी को  सर माथे पर रखते हुए मैं आत्मा प्यारे बाबा से बोली:-*  "हां मेरे मीठे बाबा... *आधाकल्प हुआ, माया ने बहुत कुतर कुतर की है...* आधाकल्प पतित होती होती मैं आत्माकाली और दुखी बन पड़ी थी बाबा... जिंदगी को अब कही रोशनी की किरणे मिली है... मैं आत्मा दुखों की दुनिया से निकल अब सुखों की दुनिया में पहुँची हूं... *भिन्न-भिन्न युक्तियां रच मैं आत्मा अब चलते फिरते उठते बैठते  आपकी याद द्वारा अपने विकर्मो को नष्ट करती जा रही हूं बाबा..."* 

 

  *ज्ञान सागर बाबा ज्ञान किरणों की बरसात मुझ आत्मा पर करते हुए बोले:-* "देखो बच्चे... *दुनिया वाले दिखाते भी है श्याम काला, फिर काली का चित्र भी बैठ बनाया है, परंतु इसका अर्थ नहीं जानते... अभी फिर तुम्हें सारा ज्ञान है... अभी तुम आत्मा नॉलेजफुल बाप के, नॉलेजफुल बच्चे बने हो...* सारा मदार है याद पर... जितना जितना फिर तुम मुझ बाप को याद करते जाओगे, बुद्धि भी स्वच्छ बनती जाएगी और तुम मेरे पास... फिर स्वर्ग कृष्णपुरी में चली जाओगी..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा की समझानी को स्वयं में धारण करते मैं आत्मा बाबा से बोली:-* "मीठे बाबा... *रोज मुरलियों में आप द्वारा मिली युक्तियों से मैं आत्मा स्वयं के पुरुषार्थ में तत्पर हूं... कभी कोठरी में बैठ आप के चित्र को निहारती, तो कभी पॉकेट में पड़े स्वयं के संपूर्ण चित्र को देख... अपने लक्षणों पर विजय पा रही हूं...* स्वयं को सदा उमंग-उत्साह से भर... मैं आत्मा संगमयुगी सम्पूर्ण फरिश्ते स्वरूप के बहुत नजदीक, खुद को देख रही हूं..."

 

  *करनकरावनहार बाबा मुझ निमित बाप के कार्य में सहयोगी आत्मा बच्ची से बोले:-* "मीठी बच्ची... *अब ज्वालामुखी याद द्वारा, पूरे उमंग उत्साह द्वारा औरों को भी उत्साह में रख, अभी सभी समस्याओं को संपूर्ण रुप से खत्म करो...* देखो ब्रह्मा बाप भी गेट पर खड़े आप सब का आहवान कर रहे हैं... बस अब आप बच्चो की ही सम्पूर्णता का इंतज़ार हैं,..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी समझानी पर गौर फरमाते मैं आत्मा बाबा से बोली:-* "मीठे बाबा... *ज्वालामुखी याद द्वारा अब मैं आत्मा स्वयं को उमंगो से भरी हुई देख रही हूं... याद रूपी अग्नि में तपते हुए, मैं आत्मा स्वयं को देख रही हूं... मैं आत्मा देख रही हूं, कैसे मुझ आत्मा का सारा किचड़ा भस्म होता जा रहा है... मैं आत्मा बेदाग स्वच्छ बन गई हूं...* मैं आत्मा श्याम से सुंदर बन अपने सम्पूर्ण स्वरूप को देख रही हूं..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  देही अभिमानी रहने की मेहनत करनी है*

 

_ ➳  एकान्त में बैठी एक दृश्य मैं इमर्ज करती हूँ और इस दृश्य में एक बहुत बड़े दर्पण के सामने स्वयं को निहारते हुए अपने आप से मैं सवाल करती हूँ कि मैं कौन हूँ ! *क्या इन आँखों से जैसा मैं स्वयं को देख रही हूँ मेरा वास्तविक स्वरूप क्या सच मे वैसा ही है! अपने आप से यह सवाल पूछते - पूछते मैं उस दर्पण में फिर से जैसे ही स्वयं को देखती हूँ, दर्पण में एक और दृश्य मुझे दिखाई देता है इस दृश्य में मुझे मेरा मृत शरीर दिखाई दे रहा है जो जमीन पर पड़ा है*। थोड़ी ही देर में कुछ मनुष्य वहाँ आते हैं और उस मृत शरीर को उठा कर ले जाते है और उसका दाह संस्कार कर देते हैं।

 

_ ➳  इस दृश्य को देख मैं मन ही मन विचार करती हूँ कि शरीर के किसी भी अंग में छोटा सा कांटा भी कभी चुभ जाता था तो मुझे कष्ट होता था। लेकिन अभी तो इस शरीर को जलाया जा रहा है फिर भी इसे कोई कष्ट क्यो नही हो रहा! *इसका अर्थ है कि इस शरीर के अंदर कोई शक्ति है और जब तक वो चैतन्य शक्ति शरीर में है तब तक यह शरीर जीवित है और हर दुख - सुख का आभास करता है लेकिन वो चैतन्य शक्ति जैसे ही इस शरीर को छोड़ इससे बाहर निकल जाती है ये शरीर मृत हो जाता है*। फिर किसी भी तरह का कोई एहसास उसे नही होता। अपने हर सवाल का जवाब अब मुझे मिल चुका है।

 

_ ➳  "मैं कौन हूँ" की पहेली सुलझते ही अब मैं उस चैतन्य शक्ति अपने निज स्वरूप को मन बुद्धि के दिव्य नेत्र से देख रही हूँ जो शरीर रूपी रथ पर विराजमान होकर रथी बन उसे चला रही है। *स्वराज्य अधिकारी बन मन रूपी घोड़े की लगाम को अपने हाथ मे थामते ही मैं अनुभव करती हूँ कि मैं आत्मा रथी अपनी मर्जी से जैसे चाहूँ वैसे इस शरीर रूपी रथ को चला सकती हूँ*। यह अनुभूति मुझे सेकण्ड में देही अभिमानी स्थिति में स्थित कर देती है और इस स्थिति में स्थित होकर मैं स्वयं को सहज ही देह से न्यारा अनुभव करते हुए बड़ी आसानी से देह रूपी रथ का आधार छोड़ इस रथ से बाहर आ जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने शरीर रूपी रथ से बाहर आकर अब मैं इस देह और इससे जुड़ी हर चीज को बिल्कुल साक्षी होकर देख रही हूँ जैसे मेरा इनसे कोई सम्बन्ध ही नही। *किसी भी तरह का कोई भी आकर्षण या लगाव अब मुझे इस देह के प्रति अनुभव नही हो रहा, बल्कि एक बहुत ही न्यारी और प्यारी बन्धनमुक्त स्थिति में मैं स्थित हूँ जो पूरी तरह से लाइट है और उमंग उत्साह के पँख लगाकर ऊपर उड़ने के लिए तैयार है*। इस डबल लाइट देही अभिमानी स्थित में स्थित मैं आत्मा ऐसा अनुभव कर रही हूँ जैसे मेरे शिव पिता के  प्यार की मैग्नेटिक पावर मुझे ऊपर अपनी और खींच रही है। *अपने प्यारे पिता के प्रेम की लग्न मे मग्न मैं आत्मा अपने विदेही पिता के समान विदेही बन, देह की दुनिया को छोड़ अब ऊपर आकाश की ओर जा रही हूँ*।

 

_ ➳  परमधाम से अपने ऊपर पड़ रही उनके अविनाशी प्रेम की मीठी - मीठी फुहारों का आनन्द लेती हुई मैं साकार लोक और सूक्ष्म लोक को पार करके, अति शीघ्र पहुँच जाती हूँ अपने शिव परम पिता परमात्मा के पास उनके निराकारी लोक में। *आत्माओं की ऐसी दुनिया, जहां देह और देह की दुनिया का संकल्प मात्र भी नही, ऐसी चैतन्य मणियों की दुनिया मे मैं स्वयं को देख रही हूँ*। चारों और चमकते हुए चैतन्य सितारे और उनके बीच मे अत्यंत तेजोमय एक ज्योतिपुंज जो अपनी सर्वशक्तियों से पूरे परमधाम को प्रकाशित करता हुआ दिखाई दे रहा हैं।

 

_ ➳  उस महाज्योति अपने शिव परम पिता परमात्मा से निकलने वाली सर्वशक्तियों की अनन्त किरणों की मीठी फ़ुहारों का भरपूर आनन्द लेने और उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए मैं निराकार ज्योति धीरे - धीरे उनके समीप जाती हूँ और उनकी सर्वशक्तियों की किरणो की छत्रछाया के नीचे जा कर बैठ जाती हूँ। *अपने प्यारे पिता के सानिध्य में बैठ, उनके प्रेम से, उनके गुणों और उनकी शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके अब मैं आत्माओं की निराकारी दुनिया से नीचे वापिस साकारी दुनिया मे लौट आती हूँ*।

 

_ ➳  कर्म करने के लिए फिर से अपने शरीर रूपी रथ पर आकर मैं विराजमान हो जाती हूँ किन्तु अब मै सदैव इस स्मृति में रह हर कर्म करती हूँ कि मैं आत्मा इस देह में रथी हूँ। *इस स्मृति को पक्का कर, कर्म करते हुए भी स्वयं को देह से बिल्कुल न्यारी आत्मा अनुभव करते हुए, देही अभिमानी बनने का अभ्यास मैं बार - बार करती रहती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं तेरे मेरे की हलचल को समाप्त कर रहम की भावना को इमर्ज करने वाली मर्सिफुल आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं व्यर्थ संकल्पों की हथौड़ी से समस्या के पत्थर को तोड़ने के बजाए हाई जंप दे समस्या रूपी पहाड़ को पार करने वाला डबल डाइट फरिश्ता हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा को फारेन वालों ने यह जो सेवा की थी - काल आफ टाइम वालों की, उसकी विधि अच्छी लगी कि छोटे से संगठन को समीप लाया... ऐसे हर जोन, हर सेन्टर अलग-अलग सेवा तो कर रहे हो लेकिन कोई सर्व वर्गों का संगठन बनाओ... *बापदादा ने कहा था कि बिखरी हुई सेवा तो बहुत है, लेकिन बिखरी हुई सेवा से कुछ समीप आने वाली योग्य आत्माओं का संगठन चुनो और समय प्रति समय उस संगठन को समीप लाते रहो ओर उन्हों को सेवा का उमंग बढ़ाओ...* बापदादा देखते हैं कि ऐसी आत्मायें हैं लेकिन अभी वह पावरफुल पालना, संगठित रूप में नहीं मिल रही है... अलग-अलग यथाशक्ति पालना मिल रही है, संगठन में एक दो को देखकर भी उमंग आता है... यह, ये कर सकता है, मैं भी कर सकता हूँ, मैं भी करूँगा, तो उमंग आता है... *बापदादा अभी सेवा का प्रत्यक्ष संगठित रूप में देखने चाहते हैं...* मेहनत अच्छी कर रहे हो, हर एक अपने वर्ग की, एरिया की, जोन की, सेन्टर की कर रहे हो, बापदादा खुश होते हैं... अब कुछ सामने लाओ...

 

✺   *ड्रिल :-  "संगठित रूप में पावरफुल पालना देने का अनुभव"*

 

_ ➳  अपने लाइट के फ़रिशता स्वरूप को धारण कर, मैं बापदादा के साथ सारे विश्व का भ्रमण कर रहा हूँ और बाबा के साथ स्थान - स्थान पर बने बाबा के सभी सेवा केंद्रों को देख रहा हूँ... *सभी सेवा केंद्रों की सेवायें बढ़ती जा रही हैं... दुखी अशांत आत्मायें इन सेवा केंद्रों पर आ कर शांति का अनुभव करके तृप्त हो रही हैं...* परमात्म पालना का अनुभव उनके जीवन को परिवर्तित कर रहा है... हर जोन, हर सेंटर

पर बहुत अच्छी तरह से सेवाएं हो रही हैं... बाबा के साथ इन सभी सेवा केंद्रों को देखता हुआ, मैं बाबा के मन मे चल रहे संकल्पो को पढ़ने का भी प्रयास कर रहा हूँ...

 

_ ➳  पूरे विश्व का भ्रमण करके, सभी सेवा स्थलों का निरीक्षण करके, अब मैं बापदादा के साथ वतन की ओर जा रहा हूँ... वतन में पहुंच कर बाबा सभी ब्राह्मण बच्चों को अपने सामने इमर्ज करते हैं और उन्हें निर्देश देते हैं कि:- *"अब बिखरी हुई सेवा से समीप आने वाली योग्य आत्माओं का संगठन चुनो और समय प्रति समय उस संगठन को समीप लाते हुए, उनमें सेवा का उमंग बढ़ाओ"*... संगठित रूप में पावरफुल पालना देने से सेवा वृद्धि को भी पायेगी और सेवाओं में सहज ही सफ़लतामूर्त बन जायेंगे। यह निर्देश दे कर बाबा सभी ब्राह्मण बच्चों को परमात्म शक्तियों से भरपूर कर रहें हैं...

 

_ ➳  अब सभी ब्राह्मण बच्चे बाबा के निर्देश अनुसार वापिस अपने सेवा केंद्रों पर लौट कर संगठित रूप में पावरफुल पालना देने का अनुभव यथाशक्ति बढ़ाते जा रहें हैं... *बापदादा के साथ मैं फ़रिशता फिर से सभी सेवा केंद्रों का भ्रमण कर रहा हूँ और देख रहा हूँ कि अलग अलग स्थानों पर अब अनेक ऐसे संगठन बन चुके हैं जहां बाबा के नए आने वाले और पुराने सभी ब्राह्मण बच्चों को संगठित रूप में पावरफुल पालना मिल रही है...* सभी उमंग उत्साह से स्वयं भी आगे बढ़ रहे हैं तथा एक दो को सहयोग दे कर उन्हें भी आगे बढ़ा रहें हैं...

 

_ ➳  संगठित रूप में पावरफुल पालना से सेवा स्थलों का वायुमण्डल पावरफुल बन रहा है जिससे सेवा भी वृद्धि को पाती जा रही है... *जैसे मन्दिर का वातावरण दूर से ही खींचता हैऐसे याद की खुशबू का संगठित वातावरण आत्माओं को दूर से ही आकर्षित कर रहा है...* आत्मायें स्वत: ही खिंचती चली आ रही हैं और संगठित रूप में पावरफुल पालना पा कर स्वयं को शक्तिशाली अनुभव कर रही हैं... दिलशिकस्त और निराश आत्मायें भी योग का संगठित बल पा कर स्वयं को हिम्मतवान अनुभव कर रही हैं...

 

_ ➳  अनेक प्रकार के विनाशी सुख शांति से विचलित हुई आत्मायें जो बाप को और स्वयं को भूल चुकी हैं, वे संगठित रूप की पावरफुल पालना पा कर ऐसा अनुभव कर रही है जैसे वे अपनी यथार्थ मंजिल पर पहुंच गई हैं... *हर सेवा स्थल पर संगठित रूप में ब्राह्मण आत्माओं की अव्यक्त स्थिति और उनकी रूहानी लाइट और माइट की स्थिति सभी आत्माओं को रूहानी पालना का अनुभव करवा कर उन्हें परमात्म प्यार की अनुभूति करवा रही हैं...* स्वयं को सभी परमात्म पालना में पलता हुआ अनुभव करके निरन्तर आगे बढ़ते हुए एक दूसरे को भी आगे बढ़ा रहे हैं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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