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 07 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *जितना स्वयं ज्ञान चंद्रमा के समीप हैं, उतना औरों को भी समीप सम्बन्ध में लाये ?*

 

➢➢ *स्वयं के लिए व दूसरों के लिए विघन विनाशक बनकर रहे ?*

 

➢➢ *सदैव चढ़ती कला का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *सदैव एकरस शक्तिशाली अवस्था का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जहाँ वाणी द्वारा कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है तो कहते हो-यह वाणी से नहीं समझेंगे, शुभ भावना से परिवर्तन होंगे। *जहाँ वाणी कार्य को सफल नहीं कर सकती, वहाँ साइलेन्स की शक्ति का साधन शुभ-संकल्प,शुभ-भावना, नयनों की भाषा द्वारा रहम और स्नेह की अनुभूति कार्य सिद्ध कर सकती है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सहज योगी हूँ"*

 

✧  सदा सहयोगी, कर्मयोगी, स्वत: योगी, निरन्तर योगी - ऐसी स्थिति का अनुभव करते हो? जहाँ सहज है वहाँ निरंतर है। सहज नहीं तो निरंतर नहीं। तो निरंतर योगी हो या अन्तर पड़ जाता है? *योगी अर्थात् सदा याद में मगन रहने वाले। जब सर्व सम्बन्ध बाप से हो गये तो जहाँ सर्व सम्बन्ध हैं वहाँ याद स्वत: होगी और सर्व सम्बन्ध हैं तो एक की ही याद होगी।* है ही एक तो सदा याद रहेगी ना।

 

✧  तो सदा सर्व सम्बन्ध से एक बाप दूसरा न कोई। सर्व सम्बन्ध से एक बाप... यही सहज विधि है, निरंतर योगी बनने की। जब दूसरा सम्बन्ध ही नहीं तो याद कहाँ जायेगी। *सर्व सम्बन्धों से सहजयोगी आत्मायें यह सदा स्मृति रखो। सदा बाप समान हर कदम में स्नेह और शक्ति दोनों का बैलेंस रखने से सफलता स्वत: ही सामने आती है। सफलता जन्म-सिद्ध अधिकार है।*

 

  बिजी रहने के लिए काम तो करना ही है लेकिन एक है मेहनत का काम, दूसरा है खेल के समान। जब बाप द्वारा शक्तियों का वरदान मिला है तो जहाँ शक्ति है वहाँ सब सहज है। *सिर्फ परिवार और बाप का बैलेंस हो तो स्वत: ही ब्लैसिंग प्राप्त हो जाती है। जहाँ ब्लैसिंग है वहाँ उड़ती कला है। न चाहते हुए भी सहज सफलता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी सुनना चाहते हो वा सम्पूर्ण बनने चाहते हो? सम्पूर्ण बनने के बाद सुनना होता होगा? *पहले है सुनना फिर है सम्पूर्ण बन जाना*। इतनी सभी प्वाइंट सुनी है उन सभी प्वाइंट का स्वरूप क्या है जो बनना है? सर्व सुने हुए प्वाइंट का स्वरुप क्या बनना है?

 

✧  *सर्व प्वाइंट का सार वा स्वरूप प्वाइंट (बिन्दी) ही बनना है*। सर्व प्वाइंट का सार भी प्वाइंट में आता है तो प्वाइंट रूप बनना है। प्वाइंट अति सुक्ष्म होता है जिसमे सभी समाया हुआ है।

 

✧  इस समय मुख्य पुरुषार्थ कोन - सा चल रहा है? अभी पुरुषार्थ है विस्तार को समाने का। *जिसको विस्तार को समाने का तरीका आ जाता है वही बापदादा के समान बन जाते है*। पहले भी सुनाया था ना कि समाना और समेटना है। जिसको समेटना आता है उनको समाना भी आता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *अगर निराकारी स्थिति में स्थित होकर निरहंकारी बनी तो निर्विकारी आटोमेटिकली हो ही जायेंगे। निरहंकारी बनते ज़रूर हो लेकिन निराकार होकर निरहंकारी नहीं बनते हो।* युक्तियों से अपने को अल्प समय के लिए निरहंकारी बनाते हो, लेकिन निरन्तर निराकारी स्थिति में स्थित होकर साकार में आकर यह कार्य कर रहा हूँ - यह स्मृति व अभ्यास नेचरल व नेचर न बनने के कारण निरन्तर निरहंकारी स्थिति में स्थित नहीं हो पाते हैं।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  ज्ञान सूर्य के रूहानी सितारों की भिन्न-भिन्न विशेषतायें"*

 

_ ➳  *निराला निराकारी शिव पिता, और ब्रह्मा सी प्यारी अलौकिक मां.... के साये में सनाथ बनी मै आत्मा... इतने अनोखे निराले प्यारे माँ पिता को पाकर.. जनमो के अनाथपन को कब का भूल गयी हूँ...* संगम के वरदानी समय पर भाग्य के यूँ उदय होने पर... खुशियो और आनन्द में रोमांचित हूँ... *वो भटकन वह दुःख भी, अब तो प्यारे है... जिन्होंने मुझे यूँ भगवान की गोद में लाकर छोड़ दिया... वह हर बात प्यारी है, जिसने मुझे भगवान के निच्छल प्रेम का प्याला पिला दिया है.*.. इसी मीठे चिंतन में मगन मै आत्मा... सूक्ष्म वतन में अपने सच्चे मातपिता से मिलने उड़ चलती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को चमकता सितारा बनाते हुए कहा :-* " मीठे प्यारे फूल बच्चे... *मीठे बाबा ने जो भाग्य का सितारा चमकाया है... सदा उसे ही देखते रहो... दूर से ही आपकी चमक की लाइट दिखती रहे...* ऐसा अभ्यास बढ़ाते चलो... *मा दाता, मा शिक्षक के साथ मा सतगुरु का भी पार्ट बजाकर... वरदाता बन मुक्ति जीवनमुक्ति दिलाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से मा सतगुरु की उपलब्धि पाकर आनन्द में डूबकर कहती हूँ :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... सुख की एक झलक को प्यासी मै आत्मा गुरुओ के पीछे घूम रही थी... *कि आप सतगुरु ने मुझे गले लगाकर, मा सतगुरु की सीट पर सजा दिया है... इस मीठे भाग्य का किस तरहा शुक्रिया करूँ.*.. प्यारे बाबा आपने और मेरे भाग्य ने मुझे किन ऊंचाइयों पर सजा दिया है..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा में मेरी सोयी शक्तियो को जगाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *सदा एकरस सम्पूर्ण चमकता सितारा हो... ऐसा स्वयं को प्रत्यक्ष कर, सदा सूर्य समान चमकते रहने का संकल्प करो.*.. भटकती थकी प्यासी आत्माओ को सच्चा रास्ता दिखाने वाले... लाइट हाउस बन कर, बाप दादा के दिल तख्त पर मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की प्यारी गोद में इठलाते हुए कहती हूँ :-* "मेरे प्यारे मनमीत बाबा... कभी स्वयं अज्ञान के अंधेरो में खो गयी थी... *आज भाग्य ने ज्ञान सितारा बनाकर विश्व में मुझे चमका दिया है... आपकी मीठी यादो संग में आत्मा विश्व को रौशन करने वाला, एकरस सम्पूर्ण सितारा बनकर, विश्व गगन पर बड़े ही शान से चमक रही हूँ..*.

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को हर बात में विन, नम्बर वन बनाते हुए कहते है :-* "सदा पुरुषोत्तम समझकर, चढ़ती कला में जाने वाले बनो... सदा उड़ो और उड़ाओ...सदा निश्चयबुद्धि विजयी रत्न है इस नशे में डूबे रहो... *ईश्वरीय खानों के मालिक मा सागर के खुमारी में रह... बीती को बिंदी लगाकर... खुशियो में झूमते आगे बढ़ो.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से पायी खुशियो की दौलत को गले लगाते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे दुलारे बाबा... *अपनी यादो के पंख देकर, मुझ आत्मा को खुशियो के आसमाँ में उड़ाने वाला खुबसूरत आत्मा परिंदा बना दिया है.*.. बीती को बिंदी में समाकर कितना हल्का प्यारा कर दिया है... ईश्वर ही मेरा साथी बनकर साथ है... भला अब किस बात की मुझे चिंता..."ईश्वर पिता से शक्तियो वरदानों को लेकर मै आत्मा... स्थूल जगत में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदैव एकरस शक्तिशाली स्थिति का अनुभव*"

 

_ ➳  जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अचल अडोल रह, उसे पार करने का बल देने वाले अपने सर्वशक्तिवान शिव बाबा का मैं मन ही मन शुक्रिया अदा करती हूँ जिन्होंने अपनी सर्वशक्तियों का बल मुझे देकर हर बात से उपराम होना सिखला दिया। *मेरे प्यारे मीठे बाबा ने आकर ज्ञान का तीसरा नेत्र देकर, जीवन की हर उलझी हुई पहेली को ऐसे सुलझा दिया कि किसी भी बात में मूँझने की दरकार ही नही रही*। शास्त्रों में कही एक - एक बात का वास्तविक अर्थ बताकर उसे प्रमाणित कर हर संशय को समाप्त कर दिया। *ऐसे हर बात को एकदम सहज बना कर, जीवन में सच्चे आनन्द का अनुभव करवाने वाले अपने प्यारे मीठे बाबा की याद में मैं मग्न हो कर बैठ जाती हूँ*।

 

_ ➳  कर्मेन्द्रियों की हलचल से परें अपनी शान्त स्वरूप स्थिति में स्थित होते ही जीवन की एक अद्भुत, मन को सुकून देने वाली रूहानी यात्रा पर मैं सहज ही चल पड़ती हूँ। *अपने सम्पूर्ण ध्यान को अपनी दोनों आईब्रोज में भृकुटि के मध्य भाग पर केंद्रित कर, मैं देख रही हूँ अपने दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप को और अपने इस अति सुन्दर स्वरूप को निहारते - निहारते मैं अपने पिता परमात्मा से मिलन मनाने की इस अति खूबसूरत आंतरिक यात्रा पर आगे बढ़ती हूँ*।

 

_ ➳  एक चमकते हुए सितारे के रूप में स्वयं को अनुभव करते हुए मैं देखती हूँ जैसे आकाश में चमकते हुए सितारे में से किरणे निकलती हैं ऐसे मुझ आत्मा रूपी सितारे में से भी शांति, प्रेम, आनंद, सुख, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति की सतरंगी किरणे निकल रही हैं। *अपने इस सतोगुणी स्वरूप पर अपने मन और बुद्धि को पूरी तरह फोकस कर अपने सत्य स्वरूप का, अपने गुणों और शक्तियों का भरपूर आनन्द लेते - लेते मैं भृकुटि की कुटिया से बाहर निकलती हूँ* और मन बुद्धि के विमान पर बैठ, देह और देह की दुनिया से किनारा कर, वाणी से परे अपने प्यारे पिता के निवार्ण धाम घर की और चल पड़ती हूँ।

 

_ ➳  पांचो तत्वों से पार, सूक्ष्म वतन से ऊपर अपने  निर्वाण धाम घर में, वाणी से परे की, निरसंकल्प अवस्था में स्थित होकर अपने प्यारे पिता के साथ मंगल मिलन मनाने का मैं भरपूर आनन्द ले रही हूँ। *हर संकल्प, विकल्प से परे यह आनन्दमयी अवस्था मुझे अतीन्द्रीय सुख का अनुभव करवा रही है। गहन सुखमय स्थिति की अनुभूति अपने शिव पिता परमात्मा के सानिध्य में मैं कर रही हूँ*। बाबा के समीप जाकर, बाबा के साथ अटैच होकर अब मैं उनसे आ रही लाइट, माइट से स्वयं को भरपूर कर, शक्तिशाली बन रही है।

 

_ ➳  बाबा की लाइट माइट से भरपूर हो कर डबल लाइट बन कर अब मैं वापिस लौट रही हूँ। अपनी साकारी देह में विराजमान हो कर, निरन्तर आत्मिक स्मृति में रहते हुए अपने शिव पिता की याद को सदा अपने हृदय में बसाये अब मैं सदा स्मृति स्वरूप रहती हूँ इसलिए *किसी भी बात में परेशान होने या अपनी स्थिति को खराब करने के बजाए, ज्ञान को ढाल बना कर, ज्ञान की उचित प्वाइंट को उचित समय पर यूज़ कर, अपनी शक्तिशाली स्व स्थिति में स्थित रहकर, अब मैं हर परिस्थिति पर सहज ही विजय प्राप्त कर रही हूँ*।

 

_ ➳  त्रिकालदर्शी बन तीनो कालों को स्मृति में रख अब मैं हर कर्म करती हूँ इसलिए *किसी भी प्रकार के संशय में आकर, किसी भी बात में मूँझने वा विचलित होने के बजाए निश्चय बुद्धि बन अचल, अडोल और एकरस स्थिति का अनुभव करते हुए मैं संगमयुग की मौजों का भरपूर आनन्द ले रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं बाप के साथ द्वारा पवित्रता रूपी स्वधर्म को सहज पालन करने वाली मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं त्रिकालदर्शी बनकर किसी भी बात को एक काल की दृष्टि से ना देख, हर बात में कल्याण समझने वाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  वरदाता कहो, विधाता कहो, भाग्यदाता कहो, ऐसे बाप द्वारा आप श्रेष्ठ आत्माओं को कितने टाइटल मिले हुए हैं! *दुनिया में कितने भी बड़े-बड़े टाइटल हों लेकिन आप श्रेष्ठ आत्माओं के एक टाइटिल के आगे वह अनेक टाइटिल्स भी कुछ नहीं हैं। ऐसी खुशी रहती है?*

 

✺  *"ड्रिल :- बाप द्वारा दिए गए भिन्न भिन्न टाइटल्स की स्मृति से ख़ुशी का अनुभव"*

 

_ ➳  मैं आत्मा एकांत में बैठकर स्व चिंतन करती हूँ... मैं आत्मा अंतर्मन की गहराईयों में उतर रही हूँ... *मैं आत्मा अपने श्रेष्ठ भाग्य का चिंतन कर रही हूँ... कितनी ही भाग्यवान आत्मा हूँ मैं... जो स्वयं भाग्यविधाता ही मुझे मिल गया...* सर्व खजानों का वरदाता ही मिल गया... जो मुझ आत्मा को शूद्र से ब्राह्मण बनाकर देवता बनने के लायक बना रहे हैं...

 

_ ➳  *प्यारे बाबा रोज मुझ आत्मा को भिन्न-भिन्न टाइटल्स से सुशोभित करते हैं...* मैं आत्मा प्यारे बाबा द्वारा दिए टाइटल्स को स्मृति में लाती हूँ... *मीठे बाबा रोज मुझ आत्मा को मीठे बच्चे, सिकीलधे बच्चे, लाडले बच्चे का टाइटल देते हैं...* ये टाइटल स्मृति में लाते ही मुझ आत्मा में मिठास भर जाता है... स्वयं भगवान की लाडली होने के एहसास से मैं आत्मा बाबा के प्यार दुलार के झूले में झूल रही हूँ... अतीन्द्रिय सुख की गहराईयों में डूब रही हूँ...

 

_ ➳  *मास्टर सर्व शक्तिमान के टाइटल में स्थित होते ही मैं आत्मा सर्व गुणों, शक्तियों की अनुभूति कर रही हूँ...* मुझ आत्मा की सभी कमी-कमजोरियां खत्म हो रही हैं... मैं आत्मा हलकी हो रही हूँ... मैं आत्मा हर प्रकार की परिस्थिति में विजयी होने का अनुभव कर रही हूँ... *विघ्न-विनाशक के टाइटल की स्मृति से मैं आत्मा निर्विघ्न बन रही हूँ... विघ्नों को तोहफा समझ आगे बढ रही हूँ...*

 

_ ➳  *त्रिकालदर्शी के टाइटल में स्थित होते ही मुझ आत्मा को तीनों कालों का दर्शन हो रहा है... मैं आत्मा साक्षीपन की स्थिति में स्थित हो रही हूँ...* विश्व कल्याणकारी, आधारमूर्त, उद्धारमूर्त' के टाइटल्स में स्थित होकर मैं आत्मा फरिश्ता बन... *सुख, शांति की शक्तियों को पूरे विश्व में फैला रही हूँ... बेहद का कल्याण कर रही हूँ...*

 

_ ➳  *बाबा के दिए एक-एक टाइटिल के आगे अल्पकालिक दुनियावी टाइटल्स कुछ भी नहीं हैं...* अब मैं आत्मा समय सन्दर्भ प्रमाण टाइटल्स को यूज कर उनका स्वरुप बन रही हूँ... अनुभवी मूर्त बन रही हूँ... हर कदम में सफलता प्राप्त कर विजय पताका लहरा रही हूँ... *अब मैं आत्मा बाबा द्वारा दिए भिन्न भिन्न टाइटल्स की स्मृति से सदा ख़ुशी का अनुभव करती हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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