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 07 / 04 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सर्विस में हड्डियां दी ?*

 

➢➢ *निश्चय के बल से अपनी अवस्था को अडोल बनाया ?*

 

➢➢ *सहजयोग को नेचर और नेचुरल बनाया ?*

 

➢➢ *ख़ुशी से सहन किया, मजबूरी से नहीं ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जहाँ वाणी द्वारा कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है तो कहते हो-यह वाणी से नहीं समझेंगे, शुभ भावना से परिवर्तन होंगे। *जहाँ वाणी कार्य को सफल नहीं कर सकती, वहाँ साइलेन्स की शक्ति का साधन शुभ-संकल्प,शुभ-भावना, नयनों की भाषा द्वारा रहम और स्नेह की अनुभूति कार्य सिद्ध कर सकती है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सहज योगी हूँ"*

 

✧  सदा सहयोगी, कर्मयोगी, स्वत: योगी, निरन्तर योगी - ऐसी स्थिति का अनुभव करते हो? जहाँ सहज है वहाँ निरंतर है। सहज नहीं तो निरंतर नहीं। तो निरंतर योगी हो या अन्तर पड़ जाता है? *योगी अर्थात् सदा याद में मगन रहने वाले। जब सर्व सम्बन्ध बाप से हो गये तो जहाँ सर्व सम्बन्ध हैं वहाँ याद स्वत: होगी और सर्व सम्बन्ध हैं तो एक की ही याद होगी।* है ही एक तो सदा याद रहेगी ना।

 

✧  तो सदा सर्व सम्बन्ध से एक बाप दूसरा न कोई। सर्व सम्बन्ध से एक बाप... यही सहज विधि है, निरंतर योगी बनने की। जब दूसरा सम्बन्ध ही नहीं तो याद कहाँ जायेगी। *सर्व सम्बन्धों से सहजयोगी आत्मायें यह सदा स्मृति रखो। सदा बाप समान हर कदम में स्नेह और शक्ति दोनों का बैलेंस रखने से सफलता स्वत: ही सामने आती है। सफलता जन्म-सिद्ध अधिकार है।*

 

  बिजी रहने के लिए काम तो करना ही है लेकिन एक है मेहनत का काम, दूसरा है खेल के समान। जब बाप द्वारा शक्तियों का वरदान मिला है तो जहाँ शक्ति है वहाँ सब सहज है। *सिर्फ परिवार और बाप का बैलेंस हो तो स्वत: ही ब्लैसिंग प्राप्त हो जाती है। जहाँ ब्लैसिंग है वहाँ उड़ती कला है। न चाहते हुए भी सहज सफलता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सभी सुनना चाहते हो वा सम्पूर्ण बनने चाहते हो? सम्पूर्ण बनने के बाद सुनना होता होगा? *पहले है सुनना फिर है सम्पूर्ण बन जाना*। इतनी सभी प्वाइंट सुनी है उन सभी प्वाइंट का स्वरूप क्या है जो बनना है? सर्व सुने हुए प्वाइंट का स्वरुप क्या बनना है?

 

✧  *सर्व प्वाइंट का सार वा स्वरूप प्वाइंट (बिन्दी) ही बनना है*। सर्व प्वाइंट का सार भी प्वाइंट में आता है तो प्वाइंट रूप बनना है। प्वाइंट अति सुक्ष्म होता है जिसमे सभी समाया हुआ है।

 

✧  इस समय मुख्य पुरुषार्थ कोन - सा चल रहा है? अभी पुरुषार्थ है विस्तार को समाने का। *जिसको विस्तार को समाने का तरीका आ जाता है वही बापदादा के समान बन जाते है*। पहले भी सुनाया था ना कि समाना और समेटना है। जिसको समेटना आता है उनको समाना भी आता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *अगर निराकारी स्थिति में स्थित होकर निरहंकारी बनी तो निर्विकारी आटोमेटिकली हो ही जायेंगे। निरहंकारी बनते ज़रूर हो लेकिन निराकार होकर निरहंकारी नहीं बनते हो।* युक्तियों से अपने को अल्प समय के लिए निरहंकारी बनाते हो, लेकिन निरन्तर निराकारी स्थिति में स्थित होकर साकार में आकर यह कार्य कर रहा हूँ - यह स्मृति व अभ्यास नेचरल व नेचर न बनने के कारण निरन्तर निरहंकारी स्थिति में स्थित नहीं हो पाते हैं।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- स्वर्ग के लायक बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा इस संगमयुग के रूहानी यूनिवर्सिटी में बैठी हूँ... ज्ञान सागर बाबा मुझ पर ज्ञान की बरसात कर रहे हैं... जिससे मुझ आत्मा की सारी अज्ञानता बाहर निकलती जा रही है... मैं आत्मा पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बन रही हूँ... स्वयं भगवान टीचर बनकर मुझे आदि-मध्य-अंत का ज्ञान दे रहे हैं...* मेरे जन्म-जन्म के अवगुणों को निकाल देवताई गुणों से श्रृंगार कर, स्वर्ग की राजाई के लायक बना रहे हैं... मैं आत्मा निश्चय बुद्धि बनकर, गॉडली स्टूडेंट के स्वमान में टिककर बैठ जाती हूँ, बाबा की शिक्षाओं को ग्रहण करने...

 

  *भविष्य की कमाई के लिए ज्ञान रत्नों से मुझे सजाते हुए मेरे सुप्रीम टीचर कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वरीय पढ़ाई और योग से ही सतयुगी बादशाही है... *इसलिए सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि होकर पढ़ाई से 21 जनमो का खुबसूरत भाग्य बनालो... संगम के वरदानी समय को याद और पढ़ाई से असीम कमाई की खान बना दो... ईश्वर पिता से पढ़कर अनन्त सुखो के मालिक बन जाओ...*

 

_ ➳  *21 जन्मों के वर्सा की अधिकारी बनने का पुरुषार्थ करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में ज्ञान रत्नों को पाकर दौलत मन्द होती जा रही हूँ... *21 जनमो के लिए अथाह सुखो को जमा कर मीठा मुस्करा रही हूँ... प्यारे बाबा आपने अपनी गोद में बिठा,सच्चे सुखो से सजा मेरा सदा का भाग्य चमका दिया है...*

 

  *अथाह ज्ञान रत्नों की खान मेरे नाम लिखते हुए प्रेम के सागर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता स्वयं धरा पर उतर कर राजयोग सिखा रहे... *ज्ञान रत्नों से मालामाल कर स्वर्ग के मीठे सुखो का अधिकारी बना रहे... तो पूरे निश्चय और दिली लगन से पढ़ाई कर श्रेष्ठतम भाग्य को अपनी तकदीर बना लो...* इन सुनहरे पलों का पूरा फायदा उठाओ...

 

_ ➳  *ज्ञान योग से ईश्वरीय रंगत में रंगकर, सात रंगों से सजी इन्द्रधनुष बनकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपको पाकर कितनी धन्य धन्य हो गई हूँ... प्यारे बाबा... आपने मेरी देह की दासता छुड़वाकर... *मुझे दमकती मणि सा चमकाया है... और अपनी फूलो सी गोद में बिठा विश्व मालिक बनाया है... असीम खानो को मेरी तकदीर में सजा मुझे शहंशाह बनाया है...*

 

  *अपने प्यार से मेरे मन में खुशियों के फूलों को खिलाकर मेरे बागबान बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *यह ईश्वरीय पढ़ाई ही सच्चे सुखो का आधार है और महा भाग्य बनाने वाली है... इसलिए इस पढ़ाई में हर साँस संकल्प से जुट जाओ... यह ज्ञान रत्न अथाह सुखो के भण्डार बनकर जीवन में खुशियो को छलकायेंगे...* ईश्वर पिता से सारी दौलत लेकर 21 जनमो की अमीरी के पर्याय बन मुस्कराओ...

 

_ ➳  *बाबा के स्नेह की रिमझिम से दिव्य मणि बन पुलकित होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा संगम पर आपके हाथ और साथ को पाकर कितनी निखर गई हूँ...* मेरी कुरूपता खत्म हो गई है, और सच्चे सौंदर्य से रोम रोम छलक उठा है... *प्यारे बाबा आपने अपने जादुई स्पर्श से मुझे ज्ञानवान धनवान् बना विश्व में सजा दिया है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- किसी भी बात में संशय नही उठाना है।*"

 

 _ ➳  इस सृष्टि रूपी विशाल रंगमंच पर चलने वाली सीन सीनरियो को देखने की इच्छा से अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ मैं फ़रिशता अपने साकारी शरीर से बाहर निकलता हूँ और सृष्टि रूपी भू लोक की सैर करने चल पड़ता हूँ। *धरती के आकर्षण से परे काफी ऊंचाई से मैं फ़रिशता धरती के चारों ओर का नजारा अपनी आंखों से स्पष्ट देख रहा हूँ*। इतनी ऊंचाई से देखने पर भू लोक का नज़ारा ऐसे लग रहा है जैसे मैं कोई बहुत बड़ा मंच देख रहा हूँ, जिस पर कोई ड्रामा अथवा नाटक चल रहा है। इस वैरायटी ड्रामा में वैरायटी एक्टर्स को वैरायटी पार्ट प्ले करते हुए मैं देख रहा हूँ।

 

 _ ➳  कोई गरीब है, कोई अमीर है। कोई दुखी है, कोई सुखी है। कोई हंस रहा है, कोई रो रहा है। कोई अत्याचार कर रहा है, कोई उस अत्याचार को सहने के लिए विवश है। *ये सब दृश्य देख कर मन मे विचार आता है कि सभी एक समान क्यो नही है! क्यो कोई दुखी और कोई सुखी है*! मन मे उठ रही इस दुविधा का हल जानने के लिए मैं फ़रिशता पहुंच जाता हूँ सूक्ष्म वतन अपने बाबा के पास। सूक्ष्म वतन में पहुंचते ही एक विचित्र दृश्य मुझे दिखाई देता है। मैं देख रहा हूँ सामने एक विशाल पर्दा है जिस पर वो सब सीन चल रही है जो मैं देखते हुए आ रहा था। जिसे देख कर मन मे विचार उठ रहे थे कि ऐसा क्यों? *लेकिन मैं देख रहा हूँ कि बाबा भी यही सब दृश्य यहाँ बैठ कर स्पष्ट देख रहें है लेकिन बाबा के चेहरे पर कोई दुविधा नही। बल्कि मुस्कराते हुए बाबा हर दृश्य को देख रहें हैं*।

 

 _ ➳  तभी उस पर्दे पर और भी भयानक मंजर दिखाई देता है। कहीं बाढ़ के कारण तबाही का दृश्य, तो कहीं भूकम्प के कारण गिरती हुई बड़ी बड़ी बिल्डिंग, कही बॉम्ब फटने से तबाह होते शहर, कहीं गृह युद्ध। लाशों के ढेर लगे हैं, लोग चीख रहें हैं, चिल्ला रहे हैं लेकिन बाबा के चेहरे पर अभी भी वही गुह्य मुस्कराहट देख कर मैं हैरान हो रहा हूँ। *बाबा मेरे मन की दुविधा जान कर अब मेरे पास आते हैं और मुझ से कहते हैं, बच्चे:- "त्रिकालदर्शी की सीट पर सेट हो कर ड्रामा की हर सीन को देखोगे तो कभी कोई संदेह या प्रश्न मन मे पैदा नही होगा"*। अब बाबा मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने पास बिठा लेते हैं और मास्टर त्रिकालदर्शी भव का वरदान दे कर, तीन बिंदियो की स्मृति का अविनाशी तिलक मेरे मस्तक पर लगा कर मुझे अपनी सर्वशक्तियों से भरपूर कर देते हैं।

 

 _ ➳  सर्वशक्ति सम्पन्न स्वरूप धारण करके, मस्तक पर तीन बिंदियो की स्मृति का अविनाशी तिलक लगाये अब मैं फ़रिशता वापिस साकारी दुनिया मे लौट रहा हूँ और फिर से अपने साकारी तन में प्रवेश कर रहा हूँ। किन्तु *अब मेरे मन मे कोई संदेह, कोई प्रश्न नही। ड्रामा की हर सीन को अब मैं साक्षी हो कर देख रही हूं*। त्रिकालदर्शी की सीट पर सेट हो कर ड्रामा की हर एक्ट को देखने से अब हर एक्ट एक खेल की भांति प्रतीत हो रही है और मनोरंजन का अनुभव हो रहा है।

 

 _ ➳  सृष्टि के आदि, मध्य, अंत के राज को जानने और स्वयं को केवल एक्टर समझ कर पार्ट बजाने से अब मैं हर फिक्र से मुक्त हो, बेफिक्र बादशाह बन जीवन का आनन्द ले रही हूं। *इस बात को अब मैं सदा स्मृति में रखती हूं कि इस विश्व नाटक में कोई किसी का मित्र/शत्रु नही है*। सभी पार्टधारी है और सभी अपना पार्ट एक्यूरेट बजा रहें हैं इसलिए क्या,क्यो और कैसे के सब सवालों से स्वयं को मुक्त कर, किसी भी बात में संशय ना उठाते हुए साक्षीदृष्टा बन इस सृष्टि ड्रामा में अपना पार्ट बजा रही हूं।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सहज योग को नेचर और नैचुरल बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं हर सब्जेक्ट में परफेक्ट रहने वाली आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव खुशी से सहन करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मजबूरी से सहन करने से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं खुशनसीब आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  वरदाता कहो, विधाता कहो, भाग्यदाता कहो, ऐसे बाप द्वारा आप श्रेष्ठ आत्माओं को कितने टाइटल मिले हुए हैं! *दुनिया में कितने भी बड़े-बड़े टाइटल हों लेकिन आप श्रेष्ठ आत्माओं के एक टाइटिल के आगे वह अनेक टाइटिल्स भी कुछ नहीं हैं। ऐसी खुशी रहती है?*

 

✺  *"ड्रिल :- बाप द्वारा दिए गए भिन्न भिन्न टाइटल्स की स्मृति से ख़ुशी का अनुभव"*

 

_ ➳  मैं आत्मा एकांत में बैठकर स्व चिंतन करती हूँ... मैं आत्मा अंतर्मन की गहराईयों में उतर रही हूँ... *मैं आत्मा अपने श्रेष्ठ भाग्य का चिंतन कर रही हूँ... कितनी ही भाग्यवान आत्मा हूँ मैं... जो स्वयं भाग्यविधाता ही मुझे मिल गया...* सर्व खजानों का वरदाता ही मिल गया... जो मुझ आत्मा को शूद्र से ब्राह्मण बनाकर देवता बनने के लायक बना रहे हैं...

 

_ ➳  *प्यारे बाबा रोज मुझ आत्मा को भिन्न-भिन्न टाइटल्स से सुशोभित करते हैं...* मैं आत्मा प्यारे बाबा द्वारा दिए टाइटल्स को स्मृति में लाती हूँ... *मीठे बाबा रोज मुझ आत्मा को मीठे बच्चे, सिकीलधे बच्चे, लाडले बच्चे का टाइटल देते हैं...* ये टाइटल स्मृति में लाते ही मुझ आत्मा में मिठास भर जाता है... स्वयं भगवान की लाडली होने के एहसास से मैं आत्मा बाबा के प्यार दुलार के झूले में झूल रही हूँ... अतीन्द्रिय सुख की गहराईयों में डूब रही हूँ...

 

_ ➳  *मास्टर सर्व शक्तिमान के टाइटल में स्थित होते ही मैं आत्मा सर्व गुणों, शक्तियों की अनुभूति कर रही हूँ...* मुझ आत्मा की सभी कमी-कमजोरियां खत्म हो रही हैं... मैं आत्मा हलकी हो रही हूँ... मैं आत्मा हर प्रकार की परिस्थिति में विजयी होने का अनुभव कर रही हूँ... *विघ्न-विनाशक के टाइटल की स्मृति से मैं आत्मा निर्विघ्न बन रही हूँ... विघ्नों को तोहफा समझ आगे बढ रही हूँ...*

 

_ ➳  *त्रिकालदर्शी के टाइटल में स्थित होते ही मुझ आत्मा को तीनों कालों का दर्शन हो रहा है... मैं आत्मा साक्षीपन की स्थिति में स्थित हो रही हूँ...* विश्व कल्याणकारी, आधारमूर्त, उद्धारमूर्त' के टाइटल्स में स्थित होकर मैं आत्मा फरिश्ता बन... *सुख, शांति की शक्तियों को पूरे विश्व में फैला रही हूँ... बेहद का कल्याण कर रही हूँ...*

 

_ ➳  *बाबा के दिए एक-एक टाइटिल के आगे अल्पकालिक दुनियावी टाइटल्स कुछ भी नहीं हैं...* अब मैं आत्मा समय सन्दर्भ प्रमाण टाइटल्स को यूज कर उनका स्वरुप बन रही हूँ... अनुभवी मूर्त बन रही हूँ... हर कदम में सफलता प्राप्त कर विजय पताका लहरा रही हूँ... *अब मैं आत्मा बाबा द्वारा दिए भिन्न भिन्न टाइटल्स की स्मृति से सदा ख़ुशी का अनुभव करती हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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