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 07 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *ज्ञान रत्नों को धारण कर गुणवान बनकर रहे ?*

 

➢➢ *"मैं आत्मा हूँ... आत्मा भाई से प्रैक्टिस करता हूँ" - ऐसी प्रैक्टिस की ?*

 

➢➢ *शुभ भावना व श्रेष्ठ भाव द्वारा सर्व के प्रिय बनकर रहे ?*

 

➢➢ *कर्म में योग का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जो निरन्तर तपस्वी हैं उनके मस्तक अर्थात् बुद्धि की स्मृति वा दृष्टि से सिवाए आत्मिक स्वरूप के और कुछ भी दिखाई नहीं देगा।* किसी भी संस्कार वा स्वभाव वाली आत्मा, उनके पुरुषार्थ में परीक्षा के निमित्त बनी हुई हो लेकिन हर आत्मा के प्रति सेवा अर्थात् कल्याण का संकल्प वा भावना ही रहेगी। दूसरी भावनायें उत्पन्न नहीं हो सकती।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं याद और सेवा के बैलेन्स द्वारा बाप की ब्लैसिंग अनुभव करने वाली विशेष आत्मा हूँ"*

 

  सदा याद और सेवा के बैलेन्स से बाप की ब्लैसिंग अनुभव करते हो? *जहाँ याद और सेवा का बैलेन्स है अर्थात् समानता है, वहाँ बाप की विशेष मदद अनुभव होती है। तो मदद ही आशीर्वाद है।*

 

  *क्योंकि बापदादा, और अन्य आत्माओंके माफिक आशीर्वाद नहीं देते हैं। बाप तो है ही अशरीरी, तो बापदादा की आशीर्वाद है - सहज, स्वत: मदद मिलना जिससे जो असम्भव बात हो वह सम्भव हो जाए। यही मदद अर्थात् आशीर्वाद है।* लौकिक गुरूओंके पास भी आशीर्वाद के लिए जाते हैं। तो जो असम्भव बात होती, वह अगर सम्भव हो जाती तो समझते हैं यह गुरू की आशीर्वाद है। तो बाप भी असम्भव से सम्भव कर दिखाते हैं।

 

  *दुनिया वाले जिन बातों को असम्भव समझते हैं, उन्हीं बातों को आप सहज समझते हो। तो यही आशीर्वाद है। एक कदम उठाते हो और पद्मों की कमाई जमा हो जाती है। तो यह आशीर्वाद हुई ना।* तो ऐसे बाप की व सतगुरू की आशीर्वाद के पात्र आत्मायें हो। दुनिया वाले पुकारते रहते हैं और आप प्राप्ति स्वरूप बन गये। 

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧   *जैसे योग में बैठने के समय कई आत्माओं को अनुभव होता जाता - यह ड्रिल कराने वाले न्यारी स्टेज पर हैं, ऐसे चलते - फिरते फरिश्ते - पन के साक्षात्कार होगे।* यहाँ बैठे हुए भी अनेक आत्माओं को, जो भी आपके सतयुगी फैमिली में समीप आने वाले होंगे उन्हों को आप लोगों के फरिश्ते रूप और भविष्य राज्य पद के दोनों इकट्ठे साक्षात्कार होंगे। जैसे शुरू में ब्रह्मा के सम्पूर्ण स्वरूप और श्रीकृष्ण का दोनों का साथ - साथ साक्षात्कार करते थे, ऐसे अब उन्हों को तुम्हारे डबल रूप का साक्षात्कार होगा। जैसे - जैसे नम्बरवार इस न्यारे स्टेज पर आते जायेंगे तो आप लोगों के भी यह डबल साक्षात्कार होंगे।

  

✧  अभी यह पूरी प्रैक्टिस हो जाए तो यहाँ - वहाँ से यही समाचार आना शुरू हो जायेंगे। जैसे शुरू में घर बैठे भी अनेक समीप आनेवाली आत्माओं को साक्षात्कार हुए ना। वैसे अब भी साक्षात्कार होंगे। *यहाँ बैठे भी बेहद में आप लोगों का सूक्ष्म स्वरूप सर्विस करेगा।* अब यही सर्विस रही हुई हैं।

 

✧  साकार में भी एक्जाम्पल तो देख लिया। सभी बातें नम्बरवार ड्रामा अनुसार होनी है। *जितना - जितना स्वयं आकारी फरिश्ते स्वरूप में होंगे उतना आपका फरिश्ता रूप सर्विस करेगा।* आत्मा को सारे विश्व का चक्र लगाने में कितना समय लगता है? तो अभी आप के सूक्ष्म स्वरूप भी सर्विस करेंगे। लेकिन जो इसी न्यारी स्थिति में होंगे। स्वयं फरिश्ते रूप में स्थित होंगे।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  ऐसे समय में जैसी स्थिति सुनाई उसके लिए विशेष कौनसी शक्ति की आवश्यकता होगी? *सेकण्ड के हार-जीत के खेल में कौन-सी शक्ति चाहिए? ऐसे समय में समेटने की शक्ति आवश्यक है।* जो अपने देह-अभिमान के संकल्प को, देह की दुनिया की परिस्थितियों के संकल्प को, क्या होगा?- इस हलचल के संकल्प को भी समेटना है। शरीर औार शरीर के सर्व सम्पर्क की वस्तुओं को भी व अपनी आवश्यकताओं के साधनों की प्राप्ति के संकल्प को भी समेटना है। *घर जाने के संकल्प के सिवाय अन्य किसी संकल्प का विस्तार न हो बस यही संकल्प हो। कि अब घर गया कि गया।* शरीर का कोई भी सम्बन्ध व सम्पर्क नीचे न ला सके। जैसे इस समय साक्षात्कार में जाने वाले साक्षात्कार के आधार पर अनुभव करते हैं कि मैं आत्मा इस आकाश तत्व से भी पार उड़ती हुई जा रही हूँ, ऐसे ही ज्ञानी एवं योगी आत्मायें ऐसा अनुभव करेंगी। उस समय ट्रान्स की मदद नहीं मिलेगी। ज्ञान और योग का आधार चाहिए। *इसके लिए अब से अकाल-तख्त-नशीन होने का अभ्यास चाहिए। जब चाहे अशरीरीपन का अनुभव कर सकें, बुद्धियोग द्वारा जब चाहे तब शरीर के आधार में आयें। 'अशरीरी भव।' का वरदान अपने कार्य में अब से लगाओ।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- देही-अभिमानी बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्मृतिपटल पर व्यक्त हो रहे सभी विचारों को फुल स्टॉप लगाकर एकांतवासी होकर सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठती हूँ... एक के अंत में मगन हो जाती हूँ...* धीरे-धीरे इस देह, देह की दुनिया से डिटैच होकर ऊपर उड़ते हुए, बादलों, पहाड़ों, चाँद, सितारों, आसमान से भी पार होती हुई पहुँच जाती हूँ... मेरे प्यारे बाबा के पास... और बाबा के सम्मुख बैठ बाबा की रूहानी बातों को प्यार से सुनती हूँ...

 

  *इस अंतिम जनम में देह अभिमान को छोड़कर देही अभिमानी बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... 21 जनमो के मीठे सुख आपकी दहलीज पर आने को बेकरार है... इन सुखो को जीने के लिये अपने सत्य स्वरूप के नशे से भर जाओ... *वरदानी संगम पर आत्मा अभिमानी के संस्कार को इस कदर पक्का करो कि अथाह सुख अथाह खुशियां दामन में सदा की सज जाएँ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने सत्य स्वरुप में चमकती हुई अपने स्वधर्म के गुण गाती हुई कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा शरीर के भान से निकल कर आत्मा होने की सत्यता से परिपूर्ण होती जा रही हूँ... *सातो गुणो से सजधज कर तेजस्वी होती जा रही हूँ... और नई दुनिया में अनन्त सुखो की स्वामिन् होती जा रही हूँ...*

 

  *दिव्य गुणों की खुशबू से मेरे जीवन को दिव्य बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह के भान ने उजले प्रकाश को धुंधला कर दुखो के कंटीले तारो में लहुलहानं सा किया है... अब आत्मिक ओज से स्वयं को भर लो... *अपने चमकते स्वरूप और गुणो की उसी खूबसूरती से फिर से दमक उठो... तो सुखो के अम्बार कदमो में सदा के बिछ जायेंगे...*

 

_ ➳  *आत्मदर्शन कर सर्वगुणों से सुसज्जित हो दिव्यता से ओतप्रोत होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपनी खोयी चमक वही खूबसूरत रंगत पुनः पाती जा रही हूँ... आत्मा अभिमानी होकर खुशियो में मुस्करा रही हूँ... *मीठे बाबा के प्यार में सतयुगी सुख अपने नाम करवा रही हूँ...*

 

  *संगम पर मेरे संग-संग चलते हुए मेरे क़दमों में फूल बिछाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *संगम के कीमती समय में सुखो की जागीर अपनी बाँहों में भरकर 21 जनमो तक अथाह खुशियों में मुस्कराओ...* ईश्वर पिता का सब कुछ अपने नाम कर लो... और खूबसूरत दुनिया के मालिक बन विश्व धरा पर इठलाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा आत्मिक स्वरुप की झलक और फलक से संगम के अमूल्य समय, श्वांस, संकल्पों को सफल करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कभी यूँ ईश्वर पिता के दिल पर इतराउंगी ... सब कुछ मेरी मुट्ठी में होगा... *भाग्य इतना खूबसूरत और ईश्वरीय प्यार के जादू में खिलेगा ऐसा मैंने भला कब सोचा था... ये प्यारे से ईश्वरीय पल मुझे 21 जनमो का सुख दिलवा रहे है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मैं अपने आत्मा भाई को सन्देश सुना रहा हूँ, ऐसी प्रेक्टिस करनी है*"

 

 _ ➳  परम पिता परमात्मा की संतान हम सभी आत्मा भाई - भाई हैं जो इस सृष्टि रंगमंच पर अपना - अपना पार्ट बजाने के लिए अवतरित हुए है। इस सृष्टि रूपी नाटक में हर आत्मा शरीर रूपी वस्त्र धारण कर अपना पार्ट बजा रही है। एक का पार्ट ना मिले दूसरे से। *इस वन्डरफुल सृष्टि ड्रामा के गुह्य राज को जान, सृष्टि चक्र के हर सीन को साक्षी होकर देखने का पुरुषार्थ करती हुई मैं आत्मा अपने ब्राह्मण स्वरूप की स्मृति में बैठ अब अपने सँगमयुगी ब्राह्मण जीवन के कर्त्तव्यों के बारे में विचार करती हूँ कि मेरा यह ब्राह्मण जीवन जो मेरे पिता परमात्मा की देन है, को मुझे परमात्म श्रीमत अनुसार सफल कर, अपने पिता के स्नेह का रिटर्न देना है*।

 

 _ ➳  स्वयं से यह दृढ़ प्रतिज्ञा कर, अपने पिता के इस फरमान को कि *"अपने को आत्मा समझ आत्मा भाई - भाई को ज्ञान देना है" को स्मृति में लाकर, आत्मिक स्मृति के पाठ को पक्का करने और स्वयं को परमात्म बल से भरपूर करने के लिए मैं अशरीरी स्थिति में स्थित होती हूँ*। देह से न्यारे अपने निराकार ज्योति स्वरूप में स्थित हो कर अपने मन बुद्धि को अपने निराकार महाज्योति शिव पिता परमात्मा पर एकाग्र करते ही उनसे आ रहे परमात्म करेंट को मैं अपने अंदर प्रवाहित होते हुए स्पष्ट अनुभव करती हूँ।

 

 _ ➳  जैसे मोबाइल को चार्जर के साथ लगा कर बिजली का स्विच ऑन करते ही मोबाईल की बैटरी चार्ज होने लगती है ऐसे ही स्मृति के स्विच को ऑन करते ही परमात्म शक्तियों के शक्तिशाली करेन्ट से मैं भी स्वयं को चार्ज होता हुआ स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ। *मुझे अनुभव हो रहा है कि परमात्म बल पा कर मुझ आत्मा की सोई हुआ शक्तियाँ पुनः जागृत हो रही हैं। मेरे शिव पिता परमात्मा से आ रहा सर्वशक्तियों का करेन्ट मैगनेट की भांति मुझे ऊपर अपनी ओर खींच रहा हैं*। परमात्म शक्तियों की मैजिकल पावर से मैं विदेही बन अब ऊपर की और उड़ रही हूँ। सेकेण्ड में आकाश और सूक्ष्म लोक को पार करके मैं पहुँच गई अपने शिव पिता परमात्मा की अनन्त शक्तियों की किरणों के बिल्कुल नीचे उनके पास उनके निजधाम में।

 

 _ ➳  अपने इस परमधाम घर मे अब मैं सर्वशक्तियों के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के बिल्कुल समीप हूँ और उनसे आ रही सर्वशक्तियों की शक्तिशाली किरणों को स्वयं में समा कर असीम ऊर्जावान बन रही हूँ। *अपने प्यारे, मीठे बाबा के सर्वगुणों, सर्वशक्तियों और सर्व खजानों को स्वयं में भर कर, अब मैं ईश्वरीय सेवा अर्थ वापिस साकार लोक की ओर आ रही हूँ*। साकार लोक में अपने साकार शरीर मे प्रवेश कर, अपने ब्राह्मण स्वरुप में स्थित हो कर, आत्मिक स्मृति में रह कर अब मैं अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाले सभी आत्मा भाइयों को परमात्म ज्ञान देकर, उनका कल्याण कर रही हूँ।

 

 _ ➳  जिस आत्मिक दृष्टि से बाबा अपने हर बच्चे को देखते है उसी आत्मिक स्मृति में स्थित होकर, सबको आत्मा भाई - भाई की दृष्टि से देखने के मूल मंत्र को अपने जीवन मे धारण कर, अपनी दृष्टि वृति को आत्मिक बनाकर अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सभी आत्माओं को अब मैं रूहानी स्नेह दे कर उन्हें सुख और शांति की अनुभूति करवा रही हूँ। *अपने शिव पिता परमात्मा द्वारा मिली हर ईश्वरीय सेवा को आत्मिक स्मृति में और अपने शिव पिता परमात्मा की याद में रह कर करने से हर सेवा में मैं सहज ही सफलता प्राप्त कर रही हूँ*। स्वयं को आत्मा समझ अपने सभी आत्मा भाइयों को वाणी द्वारा परमात्म सन्देश देने और उन्हें परमात्म प्रेम का अनुभव करवा कर उन्हें सच्चा ईश्वरीय मार्ग दिखाने की रूहानी सेवा अब मैं निरन्तर कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं शुभ भावना और श्रेष्ठ भाव द्वारा सर्व के प्रिय बन विजय माला में पिरोने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विजयी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव कर्म में योग का अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं कर्मयोगी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं संगमयुगी ब्राह्मण आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  दूसरी निशानी वा अनुभूति- जैसे भक्तों को वा आत्मज्ञानियों का व कोई-कोई परमात्म-ज्ञानियों को दिव्य दृष्टि द्वारा ज्योति बिन्दु आत्मा का साक्षात्कार होता है, तो साक्षात्कार अल्पकाल की चीज है, साक्षात्कार कोई अपने अभ्यास का फल नहीं है। यह तो ड्रामा में पार्ट वा वरदान है। *लेकिन एवररेडी अर्थात् साथ चलने के लिए समान बनी हुई आत्मा साक्षात्कार द्वारा आत्मा को नहीं देखेंगी लेकिन बुद्धियोग द्वारा सदा स्वयं को साक्षात् ज्योति बिन्दु आत्मा' अनुभव करेगी। साक्षात् स्वरूप बनना सदाकाल है और साक्षात्कार अल्पकाल का है। साक्षात स्वरूप आत्मा कभी भी यह नहीं कह सकती कि मैंने आत्मा का साक्षात्कार नहीं किया है। मैंने देखा नहीं है। लेकिन वह अनुभव द्वारा साक्षात् रूप की स्थिति में स्थित रहेंगी।* जहाँ साक्षात स्वरूप होगा वहाँ साक्षात्कार की आवश्यकता नहीं। ऐसे साक्षात आत्मा स्वरूप की अनुभूति करने वाले अथार्टी से, निश्चय से कहेंगे कि मैंने आत्मा को देखा तो क्या लेकिन अनुभव किया है। क्योंकि देखने के बाद भी अनुभव नहीं किया तो फिर देखना कोई काम का नहीं। *तो ऐसे साक्षात् आत्म-अनुभवी चलते-फिरते अपने ज्योति स्वरूप का अनुभव करते रहेंगे।*

 

✺  *"ड्रिल :- बुद्धियोग द्वारा सदा स्वयं को साक्षात् 'ज्योति बिन्दु आत्मा' अनुभव करना*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन की मधुर स्मृतियों को स्मृति में रख पहुँच जाती हूँ शांति स्तम्भ...* जहाँ प्यारे बापदादा बाहें पसारे खड़े मुस्कुरा रहे हैं... मैं आत्मा बाबा की बाँहों में सिमट जाती हूँ... और बाबा को कहती हूँ बाबा- अब घर ले चलो... इस आवाज़ की दुनिया से पार ले चलो... बापदादा बोले:- बच्चे- मैं अपने साथ ले जाने के लिए ही आया हूँ... साथ जाने के लिए एवररेडी बनो... बिंदु रूप में स्थित हो जाओ...

 

_ ➳  बापदादा मेरे सामने कई जन्मों के हिसाब-किताब के विस्तार रूपी वृक्ष को इमर्ज करते हैं... *मुझ आत्मा के देह के स्मृति की शाखाएं, देह के संबंधो की शाखाएं, देह के पदार्थो की शाखाएं, भक्ति मार्ग की शाखाएं, विकर्मों के बंधनों की शाखाएं, कर्मभोगों की शाखाएं ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के हिसाब-किताब का बहुत बड़ा वृक्ष मेरे सामने खड़ा है...* कई जन्मों से मुझ आत्मा ने इस वृक्ष को आत्म विस्मृति के कारण बड़ा कर दिया... *देहभान के पानी से, देह अभिमान के खाद से इस वृक्ष की कई शाखाएं निकल आईं हैं...*

 

_ ➳  मैं आत्मा बाबा को निहारते हुए बाबा की याद में खो जाती हूँ... बाबा के दोनों हाथों से, मस्तक से दिव्य तेजस्वी किरणें निकलकर मुझ पर पड़ रही हैं... *बाबा की याद की लगन की अग्नि प्रज्वलित हो रही है... इस अग्नि में सारा वृक्ष जलकर भस्म हो रहा है...* सारी शाखाएं टूटकर भस्म हो रही हैं... देह के, देह के संबंधो के, देह के पदार्थो के, सर्व प्रकार के विस्तार का वृक्ष भस्म हो रहा है... कई जन्मों के विकर्म दग्ध हो रहे हैं... मैं आत्मा सभी प्रकार के कर्मभोगों से मुक्त हो रही हूँ...

 

_ ➳  *पूरा वृक्ष जलकर भस्म हो गया अब सिर्फ बची मैं बीजरूप आत्मा जो इस विस्तार रूपी वृक्ष के नीचे दबी पड़ी थी...* मैं बीज स्वरुप, बिंदु रूप आत्मा हीरे समान चमक रही हूँ... कितना ही हल्का महसूस कर रही हूँ... *मैं दिव्य सितारा, दिव्य ज्योति, दिव्य मणि, दिव्य प्रकाश का पुंज हूँ...* मुझ आत्मा का वास्तविक स्वरुप कितना ही सुन्दर है...

 

_ ➳  *मैं बिंदु आत्मा बिंदु बाप के साथ उड़ चली अपने मूलवतन...* अपने असली घर में, अपने असली स्वरुप में, अपने असली पिता के सामने मैं आत्मा दिव्य, अलौकिक अनुभूतियाँ कर रही हूँ... मैं आत्मा अपने निज गुणों को धारण कर अपने निज स्वरुप की साक्षात अनुभूति कर रही हूँ... साक्षात् आत्मा स्वरूप की स्थिति में स्थित हो रही हूँ... *मैं आत्मा अपने स्वरुप का साक्षात्कार भी कर रही हूँ और साक्षात् आत्म-अनुभवी बन चलते-फिरते अपने ज्योति बिंदु स्वरूप का अनुभव भी कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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