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 07 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *आवाज़ से परे जाने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *माया के विकराल रूप पर स्नेह की शीतलता डाली ?*

 

➢➢ *"हम सभी पूर्वज और पूज्य आत्माएं हैं" - यह नशा रहा ?*

 

➢➢ *हर सेकंड नया उमंह उत्साह अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *'मेरा तो एक बाबा', और मेरा सब-कुछ इस 'एक मेरे' में समा जाए। तो एकाग्रता की शक्ति अव्यक्त फरिश्ता स्थिति का सहज अनुभव करायेगी।* जहाँ चाहो, जैसे चाहो, जितना समय चाहो उतना और ऐसा मन एकाग्र हो जाए *इसको कहा जाता हैं मन वश में हैं। इस एकाग्रता की शक्ति से स्वत: ही एकरस फरिश्ता स्वरूप की अनुभूति होती है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वराज्य अधिकारी बेफिक्र बादशाह हूँ"*

 

✧  सदा अपने को राजा समझते हो? *सेल्फ पर राज्य है अर्थात् स्वराज्य अधिकारी हो। और दूसरे कौनसे राजा हो? बेफिक्र बादशाह। बेफिक्र बादशाह इस समय बनते हो। क्योंकि सतयुग में फिक्र वा बेफिक्र का ज्ञान ही नहीं है।* कल क्या थे और आज क्या बने हो! बेफिक्र बादशाह बन गये ना! बेफिक्र बनने से भण्डारे भरपूर हो गये हैं।

 

✧  ब्राह्मण जीवन अर्थात् बेफिक्र बादशाह। स्वराज्य मिला-सब-कुछ मिला। स्वराज्य मिला है? कभी कोई कर्मेन्द्रियां तो धोखा नहीं देती? *कभी-कभी थोड़ा खेल करती हैं तो कन्ट्रोलिंग पावर या रूलिंग पावर कम है। तो सदैव चलते-फिरते यह स्मृति सदा रहे कि-मैं स्वराज्य अधिकारी बेफिक्र बादशाह हूँ। बाप आया ही है आप सबके फिक्र लेने के लिए। तो फिक्र दे दिया ना।* थोड़ा छिपाके तो नहीं रखा है?

 

✧  *पॉकेट चेक करके देखो। बुद्धि रूपी, मन रूपी पॉकेट दोनों ही देखो। जब हैं ही बाप के बच्चे, तो बच्चे बेफिक्र होते हैं। क्योंकि बाप दाता है, तो दाता के बच्चों को क्या फिक्र है!*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *संगमयुग के ब्राह्मण जीवन की विशेषता है ही - सार रूप में स्थित हो सदा सुख-शान्ति के, खुशी के, ज्ञान के, आनंद के झूले में झूलना।* सर्व प्राप्तियों के सम्पन स्वरूप के अविनाशी नशे में स्थित रहो। सदा चेहरे पर प्राप्ति ही प्राप्ति है - उस सम्पन स्थिति की झलक और फलक दिखाई दे। जब सिर्फ स्थूल धन से सम्पन विनाशी राजाई प्राप्त करने वाले राजाओं के चेहरे पर भी द्वापर के आदि में वह चमक थी। *यहाँ तो अविनाशी प्राप्ति है तो कितनी रूहानी झलक और फलक चेहरे से दिखाई देगी!*

 

✧  ऐसे अनुभव करते हो? वा सिर्फ अनुभव सुन करके खुश होते हो! पाण्डव सेना विशेष है ना! पाण्डव सेना को देख हर्षित जरूर होते हैं। लेकिन *पाण्डवों की विशेषता है उन्हें सदा बहादुर दिखाते हैं, कमजोर नहीं।* अपने यादगार चित्र देखे हैं ना। चित्रों में भी महावीर दिखाते हैं ना। तो बापदादा भी सभी पाण्डवों को विशेष रूप से, सदा विजयी, सदा बाप के साथी अर्थात पाण्डवपति के साथी, बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान स्थिति में सदा रहें, यही विशेष स्मृति का वरदान दे रहे हैं।

 

✧  *भले नये भी आये हो लेकिन हो तो कल्प पहले के अधिकारी आत्मायें।* इसलिए सदा अपने सम्पूर्ण अधिकार को पाना ही है - इस नशे और निश्चय में सदा रहना। समझा। अच्छा। सदा सेकण्ड में बुद्धि को एकाग्र कर, सर्व प्राप्तियों को अनुभव कर, सदा सर्व शक्तियों को समय प्रमाण प्रयोग में लाते, सदा एक बाप में सारा संसार अनुभव करने वाले, ऐसे सम्पन और समान श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *'सम्पूर्ण अर्थात् समाधान स्वरूप'। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा, समस्या ले जाने वाला भी समस्या भूल जाता था।* क्या लेकर आया और क्या ले करके गया। यह अनुभव किया ना। *समस्या की बातें बोलने की हिम्मत नहीं रही। क्यों कि सम्पूर्ण स्थिति के आगे बचपन का खेल अनुभव करते थे। इसलिए समाप्त हो जाती थी। इसको कहते हैं - 'समाधान स्वरूप'।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बाप समान बनना"*

 

_ ➳  आज ब्राह्मण जीवन की खूबसूरती को जब मै आत्मा... निहारती हूँ तो मीठे आनन्द से भर जाती हूँ... मीठे *बाबा ने मीठे बोल, मीठी चाल, स्नेह भरी दृष्टि और दिल की विशालता देकर...मुझे जन्नत की हूर सजा दिया है.*.. पहले यह जीवन देह के प्रभाव में कितना कड़वा और कँटीला था... मीठे बाबा ने प्यार का सोने का पानी डालकर... मेरे मन बुद्धि को कितना उजला सच्चा और खुबसूरत बना दिया है... *भगवान ही तो यह जादु कर सकता था... और भगवान ने आकर ही मुझे खुबसूरत कृति सा सजाया है.*.. मीठे बाबा की रोम रोम से आभारी मै आत्मा...शुकराना करने वतन में उड़ चलती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को गुणो और शक्तियो में आप समान बनाते हुए कहा :-*"मीठे प्यारे फूल बच्चे... *दिलाराम बाबा को दिल अर्पित करने वाले, महान भाग्य के धनी हो.*.. सब कुछ मीठे बाबा को सौपने वाले, समर्थ और सच्चे आशिक हो... समर्थ की निशानी है... हर संकल्प बोल कर्म संस्कार बाप समान होगा... यही निरन्तर याद की अवस्था है... मीठे बाबा की यादो में सदा खोये हुए सदा के मायाजीत बन मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा भगवान को अपने दिल में समाकर हर पल उसकी यादो में डूबकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे साथी बाबा... मै आत्मा देह के प्रभाव में अपने दिल के 100 टुकड़े करके जगह जगह बांटा करती थी... और *आज आपने मेरे सारे टुकड़ो को जोड़ कर, खुबसूरत दिल सजाकर, अपने दिल की तिजोरी में ही बन्द कर दिया है.*.. अब मुझे जिंदगी के दुःख तपन की कोई परवाह ही नही... मेरा जीवन भगवान के हाथो में सदा के लिए सुरक्षित हो गया है...

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को सेवा के नये आयामो को समझाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *सदा यह स्म्रति रहे कि हम है ही फ़रिश्ते... सब कुछ बाबा का है... मेरा कुछ भी नही इस भाव में सदा हल्के फ़रिश्ते बन मुस्कराते रहो.*.. सदा निराकार आकर और साकार को फॉलो करने वाले स्वराज्य अधिकारी... किंग और क्वीन बनकर, बापदादा के दिल तख्त पर मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की ज्ञान मणियो को सुनकर मन्त्रमुग्ध झूमती हुई कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा *आपकी मीठी यादो की छाँव में कितनी हल्की निश्चिन्त और बेफिक्री से भरी हुई फ़रिश्ता बन गयी हूँ.*.. स्वयं भगवान मेरा साथी हो गया है... तो मै आत्मा हर फ़िक्र से परे हो गयी हूँ... अपने हर संकल्प, बोल, कर्म को बाप समान सजाकर, किस कदर खुबसूरत हो गयी हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपने शानदार भाग्य का नशा दिलाते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... कितना प्यारा और खुबसूरत भाग्य है कि स्वयं भगवान ने दिल की तिजोरी में छुपा कर रखा है... *पवित्रता की धरोहर से जीवन को श्रेष्ठ बनाकर क्या से क्या बन रहे हो... यह प्राप्ति औरो को भी कराओ..*. सबके जीवन आप समान खुशियो से महकाओ... सबकी आशाये पूर्ण करने वाले महादानी वरदानी बनो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा के प्यार की बरसात में भीगते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मनमीत बाबा... *आपने मेरा हाथ थामकर, मुझे देह के कंटीले जंगल से निकाल... खुबसूरत ज्ञान परी बना दिया है.*.. मै आत्मा भगवान को वरने वाली... उसके दिल में सजने वाली, शिव प्रियतमा ही गयी हूँ... शिव साजन को चुनकर, सारा ब्रह्माण्ड बाँहो में भर रही हूँ... और यह भाग्य हर दिल पर सजा रही हूँ..." मीठे बाबा को अपने जज्बात अर्पित कर... मै आत्मा स्थूल धरा पर उतर आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  आवाज से परे जाने का अभ्यास करना*"

 

_ ➳  वाणी से परे अपने स्वीट साइलेन्स होम में जाकर, वानप्रस्थ स्थिति का अनुभव करने के लिए, अंतर्मुखता की गुफा में बैठ, मन और मुख का मौन धारण कर, एकांतवासी बनते ही मैं अनुभव करती हूँ कि जैसे सम्पूर्ण मौन की शक्ति धीरे - धीरे मेरे अन्दर एक अद्भुत आंतरिक बल का संचार कर रही है। *यह आंतरिक बल मेरे शरीर के भिन्न - भिन्न अंगों में बिखरी हुई मेरी सारी चेतना को समेटने लगा है। शरीर का एक - एक अंग जैसे शिथिल होने लगा है और श्वांसों की गति बिल्कुल धीमी हो गई है*। अपने शरीर मे आये इस परिवर्तन को महसूस करते हुए मैं अनुभव कर रही हूँ जैसे धीरे - धीरे मैं सवेंदना शून्य होती जा रही हूँ और देह के भान से परे एक अति आनन्दमयी स्थिति में स्थित हो गई हूँ।

 

_ ➳  इस अति खूबसूरत स्थिति में मैं स्वयं को एक प्वाइंट ऑफ लाइट के रूप में देख रही हूँ जिसमे से निकल रही लाइट और माइट मन को तृप्त कर रही है। ये प्वाइंट ऑफ लाइट एक अति सूक्ष्म शाइनिंग स्टार के रूप में मेरे मस्तक पर चमकती हुई मुझे अनुभव हो रही है। *मन बुद्धि के दिव्य नेत्र से अपने इस अति सुंदर स्वरूप को निहारते हुए मैं गहन आनन्द के सुखद अनुभव में डूबती जा रही हूँ*। देह के हर आकर्षण से मुक्त करता मेरा ये मन को लुभाने वाला स्वरूप जिससे मैं आज दिन तक अनजान थी उस स्वरूप का अनुभव करवाने वाले अपने प्यारे पिता का दिल से मैं बार - बार शुक्राना करती हूँ और अपने इस स्वरूप का भरपूर आनन्द लेते - लेते उनकी मीठी याद में खो जाती हूँ जो मुझे सेकण्ड में वाणी से परे मेरे निर्वाण धाम घर मे ले जाती है।

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता के इस निर्वाण धाम घर मे आकर मैं वाणी से परे वानप्रस्थ स्थिति का अनुभव कर रही हूँ। *एक गहन शांति, एक गहन निस्तब्धता इस शांतिधाम घर मे छाई  हुई है जो शांति की दिव्य अनुभूति करवाकर मेरी जन्म - जन्म से शांति की तलाश में भटकने की सारी वेदना को मिटाकर मुझे असीम सुकून दे रही है*। ऐसा लग रहा है जैसे शांति की शीतल लहरें दूर - दूर से आकर बार - बार मुझ आत्मा को स्पर्श करके अपनी सारी शीतलता मेरे अंदर समाकर चली जाती हैं। इन शीतल लहरों की शीतलता को स्वयं में समाते - समाते अब मैं शान्ति के सागर अपने प्यारे पिता के समीप जा रही हूँ।

 

_ ➳  वो शांति का सागर मेरा प्यारा पिता जो अपनी अनन्त शक्तियों की किरणों रूपी बाहों को फैलाये मेरा आह्वान कर रहा है। अपने उस शांति सागर प्यारे पिता के पास पहुँच उनकी किरणों रूपी बाहों में जा कर मैं समा जाती हूँ। *उनकी शक्तिशाली किरणों के रूप में उनके अविरल प्रेम की अनन्त धाराएं मेरे ऊपर बरसने लगती हैं और अपने अथाह प्रेम से मुझे तृप्त करने लगती हैं*। बीज रूप स्थिति में स्थित होकर बीज रूप अपने प्यारे बाबा से यह मंगल मिलन मनाना मन को एक गहन परमआनन्द की अनुभूति करवा रहा है। बाबा से आती सर्वशक्तियों की किरणों की मीठी - मीठी फुहारे मेरे अंदर असीम बल भर रही हैं

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता के निष्काम प्रेम और उनकी शक्तियों का बल स्वयं में भरकर, अपने स्वीट साइलेन्स होम में अपने प्यारे *बाबा के साथ बिताए अनमोल पलों को मीठी यादो के रूप में अपने मन और बुद्धि में सँजो कर, अब मैं वापिस पार्ट बजाने के लिए आवाज की दुनिया में वापिस लौट आती हूँ और आकर अपनी देह में भृकुटि के अकाल तख्त पर विराजमान हो जाती हूँ*। देह का आधार लेकर, साकार सृष्टि पर अपना पार्ट बजाते हुए इस बात को अब मैं सदा स्मृति में रखती हूँ कि यह मेरी वानप्रस्थ अवस्था है और मुझे वाणी से परे स्वीट होम जाना है। यह स्मृति देह में रहते भी मुझे देह से न्यारा और प्यारा अनुभव करवाती है।

 

_ ➳  *देह और देही दोनों को अलग - अलग देखते हुए अशरीरी बनने का अभ्यास बार - बार करने से अब मैं देह और देह की दुनिया से सहज ही उपराम होती जा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं समर्पण भाव से सेवा करते सफलता प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा अपने स्वमान की सीट पर सेट रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव सर्व शक्तियों को आर्डर मानते अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं स्वमानधारी आत्मा  हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  अभी तक पांच ही विकारों के व्यर्थ संकल्प मैजारिटी के चलते हैं। फिर चाहे कोई भी विकार हो। ये क्योंये क्याऐसा होना नहीं चाहिएऐसा होना चाहिए... या कामन बात बापदादा सुनाते हैं कि ज्ञानी आत्माओं में या तो अपने गुण काअपनी विशेषता का अभिमान आता है या तो *जितना आगे बढ़ते हैं उतना अपनी किसी भी बात में कमी को देख करकेकमी अपने पुरुषार्थ की नहीं लेकिन नाम मेंमान मेंशान मेंपूछने मेंआगे आने मेंसेन्टर इन्चार्ज बनाने मेंसेवा मेंविशेष पार्ट देने में - ये कमीये व्यर्थ संकल्प भी विशेष ज्ञानी आत्माओं के लिए बहुत नुकसान करता है। और आजकल ये दो ही विशेष व्यर्थ संकल्प का आधार है।*

➳ _ ➳  तो आप जब सेवा पर जाओ तो एक दिन की दिनचर्या नोट करना और चेक करना कि एक दिन में इन दोनों में से चाहे अभिमान या दूसरे शब्दों में कहो अपमान - मेरे को कम क्योंमेरा भी ये पद होना चाहिएमेरे को भी आगे करना चाहिएतो ये अपमान समझते हो ना। तो ये दो बातें *अभिमान और अपमान - यही दो आजकल व्यर्थ संकल्प का कारण है। इन दोनों को अगर न्योछावर कर दिया तो बाप समान बनना कोई मुश्किल नहीं है।*

✺   *ड्रिल :-  "अभिमान और अपमान के व्यर्थ संकल्प से मुक्त होने का अनुभव"*

➳ _ ➳  सावन का महीना और चारों तरफ हरियाली ही हरियाली खिलते हुए फूलों की महक के बीच मैं आज सावन का झूला झूल रही हूं... और मेरे आस-पास मेरी सहेलियां मुझे झूला झूला रहे हैं... आज हम सभी मिलकर मधुर गीत गुनगुना रही हैं... इस झूमते हुए मौसम में आज चारों तरफ खुशी के माहौल में मैं आत्मा झूला झूल रही हूं... *झूला झूलते झूलते मैं अपने आप को ऊंचाइयों तक पहुंचाने का प्रयत्न कर रही हूं... और धीरे-धीरे मेरा झूला गति को प्राप्त करता है... और मैं अपने आप को सबसे ऊंची स्थिति पर पाकर सौभाग्यशाली अनुभव कर रही हूं...* मुझे उस झूले से अन्य आत्माएं बहुत ही छोटी छोटी नजर आ रही हैं... मेरी ऊंचाई और आत्माओं से बहुत ऊंची हो गई है...

➳ _ ➳  और अब मैं कुछ देर अपनी इस ऊंची अवस्था में अपने आप को अनुभव करते-करते मैं हवाओं के साथ अपने मन बुद्धि से सूक्ष्म वतन पहुंच जाती हूँ... सूक्षम वतन का यह सफेद प्रकाश मेरे अंदर शीतलता उत्पन्न कर रहा है... सामने बापदादा मुझे अपनी बाहें फैलाए अपने पास बुला रहे हैं... मैं दौड़कर बापदादा के पास जाती हूँ... और अपने आप को उसी स्थिति का स्मरण कराते हुए बापदादा से कहती हूँ... बाबा आज मैं अपने आप को अन्य आत्माओं से ऊंची स्थिति में अनुभव कर रही हूं... मुझे इस स्थिति में बहुत ही आनंद आ रहा है... बाबा मुझे उसी समय रोकते हुए कहते हैं... कि नहीं मेरे बच्चे बेशक तुम अपने पुरुषार्थ से अन्य आत्माओं से ऊंची स्थिति में पहुंच जाओ... लेकिन याद रहे कि अपने को कभी भी अभिमानी स्थिति का आभास भी नहीं होने देना है... अपने चाल चलन से अन्य आत्माओं के प्रति हमेशा विनम्र और सहज सरल स्वभाव ही रखना... *अगर अपने पुरुषार्थ से तुम ऊंची स्थिति को पाकर किसी भी प्रकार का अभिमान करते हो तो तुम्हारी अन्य आत्माओं से यह ऊंची स्थिति नहीं कहलाएगी... सरल और सहज स्वभाव में रहते हुए विनम्रता का गुण अपने अंदर धारण करना होगा...*

➳ _ ➳  बापदादा के इतना कहने पर मैं बाबा को कहती हूं... बाबा मुझे आपकी इस बात का हमेशा स्मरण रहेगा... बाबा मेरी यह बात सुनकर मुस्कुरा कर मेरे सर पर हाथ रख देते हैं... और मैं मन ही मन बहुत प्रसन्न होती हूँ... कुछ देर रुकने के बाद बाबा से असीम प्यार करते हुए जैसे ही मैं वापस प्रस्थान करने लगती हूँ... तो बाबा मुझे रोकते हुए मेरा हाथ पकड़ते हुए मुझे कहते हैं... रुको बच्चे मैं तुम्हें एक बात और कहना चाहता हूँ... कि *मीठे बच्चे तुम अगर कितना भी सेवा में ऊंची स्थिति पर चले जाओ... और सेवा में कभी कोई आत्मा आपको कुछ कठोर शब्द कहें तो उन शब्दों को प्रभु अर्पण कर दिया करें... और उस आत्मा को हमेशा शुभ भावना ही देते रहें... सेवार्थी भाव की स्थिति में कभी भी अपमान शब्द का संकल्प या अनुभव नहीं होना चाहिए...* अगर हमें अपमान और मान का संदर्भ होगा तो हम कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे...

➳ _ ➳  मेरे मीठे बाबा के ये अनमोल शब्द सुनकर मैं आत्मा अपने आपको बहुत ही भाग्यशाली अनुभव कर रही हूं... और अब मैं अपनी मन बुद्धि से वापस अपने इस स्थूल देह में अवतरित हो जाती हूं... इसलिए यहाँ आकर मैं बाबा की कही हुई हर बात को अपने अंदर समा लेती हूं... और सदा उसी स्मृति स्वरूप में रहती हूं... इस सुहाने मौसम में झूला झूलते हुए मैं आत्मा अपनी सहेलियों से अपना झूला मन्दगति पर करवाती हूं... *और धीरे से उस झूले से उतरकर मैं अन्य आत्माओं को भी उस झूले पर बिठाकर उसके आनंद का अनुभव करा रही हूं... और बापदादा को बार-बार धन्यवाद कर रही हूं...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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