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 07 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपने ऊपर आपेही रहम किया ?*

 

➢➢ *मनुष्यों को देवता बनाने की सेवा की ?*

 

➢➢ *संकल्प और बोल के विस्तार को सार में लाये ?*

 

➢➢ *स्वभाव, संस्कार, समबन्ध, संपर्क में लाइट रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *एकान्तवासी अर्थात् कोई भी एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित होना।* चाहे बीजरूप स्थिति में स्थित हो जाओ, चाहे लाइट-हाउस, माइट-हाउस स्थिति में स्थित हो जाओ अर्थात् विश्व को लाइट-माइट देने वाले-इस अनुभूति में स्थित हो जाओ। *तो यह एक मिनट की स्थिति भी स्वयं को और औरों को भी बहुत लाभ दे सकती है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं नवजीवन वाली ब्राह्मण आत्मा हूँ"*

 

✧  *अपने को नव जीवन अर्थात् ब्राह्मण जीवन वाली आत्मायें अनुभव करते हो? सभी ब्रह्मण आत्मायें हो? तो नये जीवन में आपकी जन्म पत्री बदल गयी है या थोड़ी-थोड़ी पुरानी भी है? तो ब्राह्मणों की जन्म पत्री क्या है? आदि देवी-देवता हो और अभी बी.के. हो ना, पक्के?*

 

✧  *तो आपकी रोज की जन्म पत्री क्या है? गुरुवार अच्छा है, बुद्धवार अच्छा नहीं है, क्या कहेंगे? (हर दिन अच्छा है) तो जन्म पत्री बदल गयी ना। ब्राह्मणों की जन्म पत्री में तीनों ही काल अच्छे से अच्छा है। जो हुआ वह भी अच्छा और जो हो रहा है वो और अच्छा और जो होने वाला है वह बहुत-बहुत-बहुत अच्छा।*

 

✧  *सिर्फ कहने मात्र नहीं लेकिन ब्राह्मण जीवन की जन्म पत्री सदा ही अच्छे से अच्छी है। सभी के मस्तक पर श्रेष्ठ तकदीर की लकीर खींची हुई है। अपने तकदीर की लकीर देखी है? अच्छी है ना?*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बाह्यमुखता में आना सहज है लेकिन *अन्तर्मुखी का अभ्यास अभी समय प्रमाण बहुत चाहिए।*

कई बच्चे कहते हैं - एकान्तवासी बनने का समय नहीं मिलता, अन्तर्मुखी स्थिति का अनुभव करने का समय नहीं मिलता क्योंकि सेवा की प्रवृत्ति, वाणी के शक्ति की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है।

 

✧  लेकिन इसके लिए कोई इकट्ठा आधा वा एक घण्टा निकालने की आवश्यकता नहीं है। *सेवा की प्रवृति में रहते भी बीच-बीच मे इतना समय मिल सकता है* जो एकान्तवासी बनने का अनुभव करो। एकान्तवासी अर्थात कोई भी एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित होना चाहे बीजरूप स्थिति में स्थित हो जाओ, चाहे लाइटहाउस, माइट-हाउस स्थिति में स्थित हो जाओ अर्थात *विश्व को लाइट-माइट देने वाले* - इस अनुभूति में स्थित हो जाओ।

 

✧  *चाहे फरिश्ते-पन की स्थिति द्वारा औरों को भी अव्यक्त स्थित का अनुभव कराओ।* एक सेकण्ड वा एक मिनट अगर इस स्थिति में एकाग्र हो स्थित हो जाओ तो *यह एक मिनट की स्थिति स्वयं आपको और औरों को भी वहुत लाभ दे सकती है।* सिर्फ इसकी प्रैक्टिस चाहिए।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ किसी को भी देखते हो तो आत्मिक वृत्ति से, आत्मिक दृष्टि से मिलते हो। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि। *अगर वृत्ति और दृष्टि में आत्मिक दृष्टि है तो सृष्टि कैसी लगेगी? आत्माओं की सृष्टि कितनी बढ़िया होगी।* शरीर को देखते भी आत्मा को देखेंगे। शरीर तो साधन है। लेकिन इस साधन में विशेषता आत्मा की है ना। आत्मा निकल जाती है तो शरीर के साधन की क्या वैल्यु है। *आत्मा नहीं है तो देखने से भी डर लगता है। तो विशेषता तो आत्मा की है। प्यारी भी आत्मा लगती है।* तो ब्राह्मणों के संसार में स्वत: चलते-फिरते आत्मिक दृष्टि, आत्मिक वृत्ति है इसलिए कोई दु:ख का नाम-निशान नहीं। क्योंकि दु:ख होता है तो शरीर भान से। *अगर शरीरभान को भूलकर आत्मिक-स्वरूप में रहते हैं तो सदा सुख-ही-सुख है। सुखदायी-सुखमय जीवन।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप आयें हैं भक्तों को भक्ति का फल देने"*

 

_ ➳  मैं आत्मा मधुबन बाबा की कुटिया में बैठे बाबा को निहारती हुई सोचती हूँ... जिस भगवान् को पाने के लिए मैं ना जाने कहाँ-कहाँ भटक रही थी... भक्ति के कितने आडम्बरों में फसी थी... आज वो मेरे सम्मुख बैठा है... *मैं भगवान को ढूँढ रही थी... और भगवान् ने स्वयं मुझे ढूंढकर अपना वारिस बना लिया... अपनी सारी प्रॉपर्टी का हकदार बना दिया... मुझे मेरी भक्ति का फल ज्ञान देकर मेरे भाग्य का पिटारा खोल दिया...*

 

  *देवी-देवता कुल की स्मृति दिलाकर पुजारी से पूज्य बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... अभी कल ही की तो बात है मीठे सुखो में खेलपाल करते देवता तुम्ही तो थे... उन सुखद स्मृतियों को पुनः ताजा करो... *ईश्वर पिता आये है पुजारी से फिर से वही खुबसूरत देवता सजाने... तो विश्व पिता के सच्चे प्यार में अपने सुनहरे भाग्य की मीठी याद में झूम जाओ...*

 

_ ➳  *मन दर्पण में स्वयं के मीठे स्वरुप को गुण, शक्तियों से सजाती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार में देवताओ सी सज संवर रही हूँ... *भक्ति का फल मुझे भगवान मिल गया है... ईश्वर पिता के सारे खजाने जागीरे अब मेरे है...* मै भाग्यशाली आत्मा पुनः देवता घराने में आने वाली हूँ... यह ख़ुशी हर पल मुझे रोमांचित कर रही है...

 

  *भटकते बच्चों की भटकन को समाप्त कर अपनी मीठी गोदी के झूले में झुलाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... जिस मीठे पिता को दर दर खोज रहे थे... गुफाओ और तपस्याओ में ढूंढ रहे थे, *वह भक्ति का फल मीठा स्वर्ग हथेली पर लेकर धरा पर उतर आया है...* विकारो में धूमिल बच्चों को देवताई श्रंगार से सुनहरा सजा रहे है... अब पूजा नही, पूजनीय बनना है... अपने सुंदर कुल में जाना है...

 

_ ➳  *ज्ञान के उजाले में अपने सपनों को साकार होते हुए देख ख़ुशी से मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा देह की संगति में असुर कुल की हो गयी थी... *प्यारे बाबा आपने मेरा अविनाशी दमकता स्वरूप दिखाकर मुझे देवी भाग्य दिलाया है...* मै महान खुशनसीब आत्मा देवता बन स्वर्ग धरा परअनन्त सुखो की अधिकारी बन रही हूँ... वाह मेरा खुबसूरत भाग्य...

 

  *अपनी कमाल जादूगरी से मेरे सारे जीवन को खुशहाल करते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... साधारण देह में छुपे हुए चमकीली मणि हो... मनुष्य मात्र नही देवता कुल के देव हो... अपने इस मीठे भाग्य के नशे में झूम जाओ... *और ईश्वरीय यादो में, अपने उसी वर्से को, अथाह खजानो को पाकर मीठे सुखो को लूटो... सारे सम्बन्ध् मीठे बाबा से जोड़कर उसके प्रेम में भीग जाओ...*

 

_ ➳  *बाबा की मीठी दृष्टि से निहाल होकर तहे दिल से धन्यवाद करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मुझ आत्मा ने तो कभी ऐसे ख़्वाब भी न संजोये थे कि...  प्यारा पिता यूँ अचानक गोद में उठा लेगा... *देह के मटमैले पन को धोकर मुझे देवता बना देगा... सारे सम्बन्धो का सुख देकर मुझे भरपूर कर देगा... मीठे प्यारे बाबा  मै आत्मा हर रोम से शुक्रगुजार हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपने ऊपर आपे ही रहम करना है*"

 

_ ➳  एक एकांत स्थान पर बैठ मैं विचार कर रही हूँ कि सत्यता का बोध ना होंने के कारण सभी मनुष्य मात्र दैहिक सुखों को पाने की लालसा में भगवान से कृपा ही मांगते रहते हैं। *बेचारे इस बात से सर्वथा अनजान है कि जिन सुखों को पाने के लिय परमात्मा की कृपा मांग रहें है उनसे मिलने वाला सुख और शांति तो विनाशी है, क्षण भंगुर है। सच्चा सुख और शांति तो परमात्मा द्वारा बताए उस सत्य मार्ग में चल कर ही मिल सकती है जो वो स्वयं इस समय आ कर बता रहें हैं*। टीचर बन ऐसी पढ़ाई पढा रहें हैं जिसे पढ़ना स्वयं पर आपे ही कृपा करना है। क्योंकि राजयोग की जो पढ़ाई इस समय भगवान आ कर पढा रहें हैं उसे अच्छी रीति पढ़ना और जीवन मे धारण करना भविष्य 21 जन्मो के लिए ऐसी श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने वाला है जिसके बाद किसी कृपा या आशीर्वाद की दरकार ही नही रहेगी।

 

_ ➳  बाबा यह पढ़ाई पढ़ाकर 21 जन्मो के लिए जीवन को सुख, शान्ति और सम्पन्नता से भरपूर कर देते हैं। तो कितनी सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो उस भगवान से पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिल रहा है। *दुनिया उस भगवान के दर्शनों की प्यासी है और वो भगवान टीचर बन हर रोज मेरे सन्मुख आकर ज्ञान रत्नों से मेरी बुद्धि रूपी झोली को भर देता है। ज्ञान के अखुट खजाने मुझ पर लुटाकर मुझे हर रोज मालामाल कर देता है*। स्वयं भगवान मुझे पढ़ाते है मन मे यह विचार आते ही एक अनोखी खुशी और नशे से मैं आत्मा भरपूर होने लगती हूँ और अपने टीचर बाप से मिलने की लगन मन मे लेकर उनकी याद में अपने मन और बुद्धि को स्थिर करके बैठ जाती हूँ। 

 

_ ➳  मन बुद्धि जैसे ही एकाग्र होते हैं वैसे ही मैं आत्मा अशरीरी स्थिति में स्थित होने लगती है और देह भान से मुक्त, अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ। *अपने सत्य स्वरूप में टिकते ही मैं महसूस करती हूँ जैसे मैं आत्मा देही इस देह में होते हुए भी इस देह से अटैच नही हूँ। देख रही हूँ मैं स्वयं को एक चैतन्य दीपक के रूप में जो भृकुटि की कुटिया में जगमग करता हुआ बहुत ही सुन्दर और लुभावना दिखाई दे रहा है*। अपने इस स्वरूप में मैं अपने अंदर समाये गुणों और शक्तियों का अनुभव करके आनन्दविभोर हो रही हूँ। मेरे अंदर निहित गुण और शक्तियाँ प्रकाश की रंग बिरंगी किरणों के रूप में मुझ से निकल कर मेरे चारों और फैल रही हैं। *औंस की रिमझिम फ़ुहारों की तरह मुझ आत्मा से निकल रहे गुणों और शक्तियों के वायब्रेशन्स मेरे चारों और वायुमण्डल में फैल कर मेरे ही ऊपर बरस कर मुझे गहन शीतलता प्रदान कर रहें हैं*। 

 

_ ➳  अपने गुणों और शक्तियों की रिमझिम फ़ुहारों का आनन्द लेती हुई मैं आत्मा अब देह की कुटिया से बाहर आ गई हूँ और देख रही हूँ अपने जड़ शरीर को जो जमीन पर लेटा हुआ है। जिसमे अब किसी भी प्रकार की कोई हलचल नही है। अपने इस शरीर को साक्षी होकर देखते हुए, इसके आकर्षण से मुक्त होकर अब मैं इससे दूर ऊपर आकाश की ओर उड़ रही हूँ। *सेकण्ड में 5 तत्वों की साकारी और फरिश्तों की आकारी दुनिया को पार करके मैं पहुँच गई हूँ अपनी निराकारी दुनिया मूल वतन में ज्ञानसागर अपने प्यारे शिव पिता के पास*। उनकी शक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ मैं अनुभव कर रही हूँ जैसे ज्ञान सागर शिव बाबा से आ रही ज्ञान की रिमझिम फुहारें अति तीव्र वेग के साथ मेरे उपर बरस रही हैं और मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट को जलाकर भस्म कर रही हैं।

 

_ ➳  विकारो की कट जैसे - जैसे उतर रही है मेरा स्वरूप परिवर्तित हो रहा है। मेरी चमक बढ़ रही है और दूर - दूर तक फैल रही है। अपने इस तेजोमय स्वरूप को देख मैं आत्मा आनन्द विभोर हो रही हूँ। *ज्ञान की शीतल फुहारें निरन्तर मेरे ऊपर बरस रही है। ऐसा लग रहा है जैसे ज्ञान सागर बाबा की शीतल किरणो का स्पर्श पाकर मैं आत्मा भी बाप समान मास्टर ज्ञान का सागर बन गई हूँ। ज्ञान की शक्ति से भरपूर होकर मैं आत्मा अब परमधाम से नीचे लौट रही हूँ*। साकार सृष्टि पर, अपने साकार तन में मैं आत्मा प्रवेश कर अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो चुकी हूँ और पढ़ाई पर अब मैं पूरा अटेंशन दे रही हूँ। *टीचर बन मेरे प्यारे पिता मुरली के माध्यम से जो पढ़ाई मुझे हर रोज पढ़ाने आते हैं उसे अच्छी रीति पढ़कर, जीवन मे धारण करके, बाप से कृपा मांगने के बजाए मैं आप ही स्वयं पर कृपा करती जा रही हूँ और सबको यह पढ़ाई पढा कर उन्हें भी आप समान बनाती जा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं संकल्प और बोल के विस्तार को सार में लाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अन्तर्मुखी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा स्वभाव, संस्कार, संबंध, संपर्क में सदा लाइट रहती हूँ  ।*

   *मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा बोझमुक्त हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *ब्राह्मण जीवन की मूड सदा चियरफुल और केयरफुल। मूड बदलना नहीं चाहिए।* फिर रायल रूप में कहते हैं आज मुझे बड़ी एकान्त चाहिए। क्यों चाहिए? क्योंकि सेवा वा परिवार से किनारा करना चाहते हैंऔर कहते हैं शान्ति चाहिएएकान्त चाहिए। आज मूड मेरा ऐसा है। तो मूड नहीं बदली करो। कारण कुछ भी होलेकिन आप कारण को निवारण करने वाले होकि कारण में आने वाले हो? निवारण करने वाले। ठेका क्या लिया है? *कान्ट्रैक्टर हो नातो क्या कान्ट्रैक्ट लिया हैकि प्रकृति की मूड भी चेंज करेंगे।* प्रकृति को भी चेंज करना है ना? *तो प्रकृति को परिवर्तन करने वाले अपने मूड को नहीं परिवर्तन कर सकते?*

 

 _ ➳  मूड चेंज होती है कि नहींकभी-कभी होती है? *फिर कहेंगे सागर के किनारे पर जाकर बैठते हैंज्ञान सागर नहींस्थूल सागर।* फारेनर्स ऐसे करते हैं ना? *या कहेंगे आज पता नहीं अकेला, अकेला लगता है। तो बाप का कम्बाइण्ड रूप कहाँ गया?* अलग कर दिया? कम्बाइण्ड से अकेले हो गयेक्या इसी को प्यार कहाँ जाता हैंतो किसी भी प्रकार का मूडएक होता है - मूड आफवह है बड़ी बात, लेकिन मूड परिवर्तन होना यह भी ठीक नहीं। मूड आफ वाले तो बहुत भिन्न-भिन्न प्रकार के खेल दिखाते हैं, बापदादा देखते हैंबड़ों को बहुत खेल दिखाते हैं या अपने साथियों को बहुत खेल दिखाते हैं। ऐसा खेल नहीं करो। क्योंकि बापदादा का सभी बच्चों से प्यार है। बापदादा यह नहीं चाहता कि जो विशेष निमित्त हैंवह बाप समान बन जाएं और बाकी बने या नहीं बनेंनहीं। *सबको समान बनाना ही हैयही बापदादा का प्यार है।* 

 

✺   *ड्रिल :-  "बाप के साथ कम्बाइण्ड रह सदा चियरफुल और केयरफुल रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा एक शांत स्थान पर प्रकृति के बीच बैठी हूँ... चारों ओर हरे भरे पेड़ दिखाई दे रहे हैं और यहां की शान्ति मुझ आत्मा में समा रही है... मैं आत्मा अब इस देह को छोड़कर अपने बापदादा के पास सूक्ष्म वतन में आकर ठहरी हूँ... *मेरे बापदादा बेहद प्यार भरी दृष्टि मुझे दे रहे हैं और मैं आत्मा अपने बाबा की शक्तिशाली किरणों से चमक उठी हूँ...*

 

 _ ➳  बाबा के सानिध्य में आकर मैं आत्मा एकदम चियरफुल हो गई हूं... बाबा की स्नेह भरी दृष्टि से ये समझ मुझ आत्मा में भर रही है कि मैं आत्मा हर परिस्थिति में चियरफुल हूँ... *मैं आत्मा चाहे सबके साथ हूँ चाहे अकेले हूँ मेरा मूड सदा खुशनुमा है...*

 

 _ ➳  मेरे मीठे बाबा आपने मुझे विश्व परिवर्तन की ज़िम्मेदारी सौंपी है... मुझे प्रकृति को भी श्रेष्ठ वाइब्रेशन दे उसे भी परिवर्तित करना है... इसके लिए मुझे सर्वप्रथम स्वयं को परिवर्तित करना है... बाबा आपकी ये शक्तिशाली किरणें मेरे पुराने स्वभाव संस्कार को भी परिवर्तित कर रही है... *मेरे स्थूल और सूक्ष्म पुराने संस्कार स्वभाव आपकी शीतल किरणों से भस्म हो रहे हैं...*

 

 _ ➳  मीठे बाबा आप अपना हज़ार भुजाओं वाला हाथ मेरे सिर पर रखते हैं और मैं आत्मा अब आपके साथ कंबाइंड रूप में हूँ... आपके साथ कंबाइंड हो मैं आत्मा अब बेहद शक्तिशाली हो गयी हूँ... *आपके साथ कंबाइंड रूप का अनुभव करते हुए मैं आत्मा अब हर परिस्थिति में चियरफुल हूँ... और सर्व आत्माओं के प्रति केयरफुल हूँ...* और मेरा मूड हर जगह हर समय चियरफुल है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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