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 07 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *उल्टी सुलटी बातों से सावधान रहे ?*

 

➢➢ *"भगवान हमें देवता बना रहे हैं" - इसी ख़ुशी में रहे ?*

 

➢➢ *पावरफुल दर्पण द्वारा सभी को स्वयं का साक्षातकार कराया ?*

 

➢➢ *शिक्षाओं को स्वरुप में लाकर ज्ञान स्वरुप, प्रेम स्वरुप बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *एकान्तवासी अर्थात् कोई भी एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित होना।* चाहे बीजरूप स्थिति में स्थित हो जाओ, चाहे लाइट-हाउस, माइट-हाउस स्थिति में स्थित हो जाओ अर्थात् विश्व को लाइट-माइट देने वाले-इस अनुभूति में स्थित हो जाओ। *तो यह एक मिनट की स्थिति भी स्वयं को और औरों को भी बहुत लाभ दे सकती है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं नवजीवन वाली ब्राह्मण आत्मा हूँ"*

 

✧  *अपने को नव जीवन अर्थात् ब्राह्मण जीवन वाली आत्मायें अनुभव करते हो? सभी ब्रह्मण आत्मायें हो? तो नये जीवन में आपकी जन्म पत्री बदल गयी है या थोड़ी-थोड़ी पुरानी भी है? तो ब्राह्मणों की जन्म पत्री क्या है? आदि देवी-देवता हो और अभी बी.के. हो ना, पक्के?*

 

✧  *तो आपकी रोज की जन्म पत्री क्या है? गुरुवार अच्छा है, बुद्धवार अच्छा नहीं है, क्या कहेंगे? (हर दिन अच्छा है) तो जन्म पत्री बदल गयी ना। ब्राह्मणों की जन्म पत्री में तीनों ही काल अच्छे से अच्छा है। जो हुआ वह भी अच्छा और जो हो रहा है वो और अच्छा और जो होने वाला है वह बहुत-बहुत-बहुत अच्छा।*

 

✧  *सिर्फ कहने मात्र नहीं लेकिन ब्राह्मण जीवन की जन्म पत्री सदा ही अच्छे से अच्छी है। सभी के मस्तक पर श्रेष्ठ तकदीर की लकीर खींची हुई है। अपने तकदीर की लकीर देखी है? अच्छी है ना?*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बाह्यमुखता में आना सहज है लेकिन *अन्तर्मुखी का अभ्यास अभी समय प्रमाण बहुत चाहिए।*

कई बच्चे कहते हैं - एकान्तवासी बनने का समय नहीं मिलता, अन्तर्मुखी स्थिति का अनुभव करने का समय नहीं मिलता क्योंकि सेवा की प्रवृत्ति, वाणी के शक्ति की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है।

 

✧  लेकिन इसके लिए कोई इकट्ठा आधा वा एक घण्टा निकालने की आवश्यकता नहीं है। *सेवा की प्रवृति में रहते भी बीच-बीच मे इतना समय मिल सकता है* जो एकान्तवासी बनने का अनुभव करो। एकान्तवासी अर्थात कोई भी एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित होना चाहे बीजरूप स्थिति में स्थित हो जाओ, चाहे लाइटहाउस, माइट-हाउस स्थिति में स्थित हो जाओ अर्थात *विश्व को लाइट-माइट देने वाले* - इस अनुभूति में स्थित हो जाओ।

 

✧  *चाहे फरिश्ते-पन की स्थिति द्वारा औरों को भी अव्यक्त स्थित का अनुभव कराओ।* एक सेकण्ड वा एक मिनट अगर इस स्थिति में एकाग्र हो स्थित हो जाओ तो *यह एक मिनट की स्थिति स्वयं आपको और औरों को भी वहुत लाभ दे सकती है।* सिर्फ इसकी प्रैक्टिस चाहिए।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ किसी को भी देखते हो तो आत्मिक वृत्ति से, आत्मिक दृष्टि से मिलते हो। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि। *अगर वृत्ति और दृष्टि में आत्मिक दृष्टि है तो सृष्टि कैसी लगेगी? आत्माओं की सृष्टि कितनी बढ़िया होगी।* शरीर को देखते भी आत्मा को देखेंगे। शरीर तो साधन है। लेकिन इस साधन में विशेषता आत्मा की है ना। आत्मा निकल जाती है तो शरीर के साधन की क्या वैल्यु है। *आत्मा नहीं है तो देखने से भी डर लगता है। तो विशेषता तो आत्मा की है। प्यारी भी आत्मा लगती है।* तो ब्राह्मणों के संसार में स्वत: चलते-फिरते आत्मिक दृष्टि, आत्मिक वृत्ति है इसलिए कोई दु:ख का नाम-निशान नहीं। क्योंकि दु:ख होता है तो शरीर भान से। *अगर शरीरभान को भूलकर आत्मिक-स्वरूप में रहते हैं तो सदा सुख-ही-सुख है। सुखदायी-सुखमय जीवन।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- रूप बसंत बन अपने मुख से सदैव ज्ञान रत्न ही निकालना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एकांत में बैठी ये विचार कर रही हूं कि कितनी भाग्यशाली हूँ मैं जो भगवान ने मुझे चुन लिया...* जिसको सारी दुनिया ढूंढ रही है वो भगवान मुझे इतनी सहज रीति मिल गया... मैं अपने दिल की हर बात शिव बाबा से कर सकती हूं... जीवन कितना महक उठा है... *रूप बसंत बन बाबा की यादों में खोई रहती हूं और हर रोज़ ज्ञान रत्नों से अपनी झोली भरती हूँ... ये विचार करते करते मैं आत्मा उड़ चलती हूँ निज वतन में...* यहाँ बाबा अपनी प्यार भरी बाहें फैलाये खड़े हैं और में नन्ही परी बन बाबा की बाहों में समा जाती हूं...

 

  *मीठे बाबा मुझ आत्मा को समझानी देते हुए कहते हैं:-* " मीठे प्यारे फूल बच्चे... *रूप बसंत बन बाप की याद में रहना ही इस समय को सफल करना है... ज्ञान रत्नों का बीज बोना ही अब तुम्हारा एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए...* बाप की याद में रह अपने विकर्मों के बोझे को खत्म करो कि अब घर चलना है..."

 

_ ➳  *बाबा की स्नेह भरी बातें सुनकर मैं बाबा से कहती हूँ:-* "मेरे जीवन आधार मेरे मीठे बाबा... आपने मुझे ये जीवन देकर मेरे दामन को खुशिओं से भर दिया  है... *क्या यह जीवन था दुखों से भरा हुआ आपने आकर इसे इतना खूबसूरत बना दिया है... मुझे दुखों से निकाल एक आनंदमय जीवन दे दिया है...* मैं आत्मा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूल रही हूं... ज्ञान का बीज झाड़ बनकर पूरे विश्व को प्रकाशित कर रहा है..."

 

   *बाबा मेरे सर को सहलाते हुए बोले:-* "मीठी बच्ची... बाप की याद ही तुम्हे अलौकिक बनाएगी... *ज्ञान रत्नों की कमाई ही तुम्हें सदा काल के लिए धनवान बनाएगी... जितना हो सके बाप को याद करो... संगम पर मिले इस सुहावने समय का सदुपयोग कर जीवन को सुखों से भर लो...* बाप का हाथ पकड़ अपनी राहों के हर कांटे को फूल बना लो और अपनी जीवन यात्रा को सुखमय बनाओ..."

 

_ ➳  *बाबा के मीठे मीठे महावाक्यों को अपने में धारण कर मैं आत्मा बाबा से बोली:-* "हां मेरे दिलाराम बाबा... अज्ञान में मैं आत्मा अपना असली स्वरूप भूल गयी थी... *अब आपने आकर मुझे स्मृति दिलाई है मैं अपने स्वरूप को पाकर धन्य धन्य हो गयी हूँ... मैं गुणहीन, शक्तिहीन थी आपने आकर मुझे निखार दिया है..."*

 

  *बाबा मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर कहते हैं:-* "मीठे लाडले फूल बच्चे... ईश्वरीय याद ही जीवन को सजाती है और जीने की कला सिखाती है... *यादों के झूले में बैठकर अपने पिता परमात्मा की याद में डूबे रहना ही सच्ची कमाई है...* इससे अपने खजानों को भरकर इनका दान करने से ही तुम नई दुनिया के सुखों के मालिक बनते हो... *21 जन्म की राजाई लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाओ... ज्ञान रत्नों के बीज बोकर अपने आने वाले समय के लिए खजाने भरपूर करो...*"

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा को बहुत प्यार से निहारते हुए कहती हूँ:-* "बाबा... आपने मेरा जीवन खुशिओं से भर दिया है... *मुझे अपनी गोद में बिठाकर ईश्वरीय प्यार से मालामाल कर दिया है... शायद ही मुझ जैसा कोई भाग्यवान होगा जिसकी झोली परमात्म प्यार से भरी रहती है...* बाबा आपने मुझे दिव्य अलौकिक जन्म देकर मेरे जीवन की हर इच्छा को पूरा कर दिया है... मैं आपका कितना भी आभार प्रकट करूँ कम ही लगता है... मैं आत्मा बाबा को अपने दिल की गहराई से शुक्रिया कर अपने साकारी तन में लौट आती हूँ..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अन्धो की लाठी बनना है*

 

_ ➳  ज्ञान के नेत्र से वंचित सभी मनुष्य आत्मायें आज नयनहीन हो गई हैं और अज्ञान अंधकार में भटक कर दुखी और अशांत हो रही हैं इसलिए पुकार रही है "नयनहीन को राह दिखाओ प्रभु, दर - दर ठोकर खाऊँ मैं"। *तो उनकी पुकार सुन, उन पर रहम करने, उन्हें अज्ञान अंधकार से निकालने और ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र देने के लिए ही भगवान आये हुए हैं और नयनहीनो को सच्ची राह दिखा रहें हैं*। 

 

_ ➳  कितनी महान सौभाग्यशाली हैं वो आत्मायें जिन्होंने ज्ञान का दिव्य नेत्र प्रदान करने वाले अपने त्रिलोकीनाथ भगवान को पहचान, उनसे ज्ञान का दिव्य नेत्र प्राप्त कर लिया है और अज्ञान अंधकार से बाहर निकल कर ज्ञान के सोझरे में आ गई हैं। *उस सोझरे में आते ही आत्मा जो अज्ञानवश अनेक प्रकार के बंधनों में बंधी थी। वो सारे बन्धन एक - एक करके टूट रहे हैं और सारे सम्बन्ध केवल उस एक ज्ञान सागर भगवान के साथ जुड़ने से, जीवन जो नीरस हो चुका था वो परमात्म प्रेम के रस से आनन्दमय होने लगा है*। 

 

_ ➳  एकांत में बैठ यह विचार करते हुए अपने भगवान बाप को मैं कोटि - कोटि धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने मुझे ज्ञान का तीसरा नेत्र देकर मेरे जीवन मे उजाला ही उजाला कर दिया। उनके इस उपकार का रिटर्न अब मुझे उनका सहयोगी बन कर अवश्य देना है। *अपने पिता के फरमान पर चल अज्ञान अंधकार में भटक रही ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र दे कर उन्हें भटकने से छुड़ाना ही अब मेरे इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है*। इस लक्ष्य को पाने का दृढ़ संकल्प करके, अपने ज्ञान सागर बाबा की मीठी याद में बैठ अतीन्द्रिय सुख का आनन्द लेने के लिए मैं कर्मेंद्रिय के आकर्षण से स्वयं को मुक्त करती हूँ और *स्वराज्य अधिकारी बन मन को परमात्म प्रेम की लगन में मग्न हो जाने का आदेश देकर, अपना सारा ध्यान  अपने स्वरूप पर एकाग्र कर लेती हूँ*।

 

_ ➳  मन बुद्धि को पूरी तरह अपने स्वरूप पर फोकस करके अपने स्वरूप का आनन्द लेने में मैं मगन हो जाती हूँ। *अपने अंदर निहित गुणों और शक्तियों का अनुभव करते हुए, मनबुद्धि की लगाम को थामे, मैं निराकार चमकती हुई ज्योति अब भृकुटि सिहांसन को छोड़ ऊपर की ओर उड़ान भर कर सेकेण्ड में आकाश को पार कर लेती हूँ* और सूक्ष्म वतन से होती हुई लाल प्रकाश की एक खूबसूरत दुनिया में प्रवेश करती हूँ। आत्माओं की यह निराकारी दुनिया मेरे शिव पिता का घर परमधाम है जहाँ पहुँच कर मन को गहन सुकून मिल रहा है। अथाह शांति की अनुभूति हो रही है। 

 

_ ➳  गहन शन्ति का सुखद अनुभव करके अब मैं अपनी बुद्धि रूपी झोली को ज्ञान के अखुट खजानों से भरपूर करने के लिए और ज्ञान की शक्ति स्वयं में भरने के लिए अपने ज्ञान सागर शिव पिता के पास पहुँचती हूँ और उनसे आ रही सर्वशक्तियों और सर्वगुणों की किरणों की छत्रछाया के नीचे जा कर बैठ जाती हूँ। *ज्ञान की शक्तिशाली किरणो का फव्वारा मेरे ज्ञान सागर शिव पिता से सीधा मुझ आत्मा पर प्रवाहित होने लगता है। इस शक्ति को स्वयं में धारण कर, अपनी बुद्धि रूपी झोली को ज्ञान के अखुट अविनाशी खजानों से भरपूर करके ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र देने की ईश्वरीय सेवा करने के लिए मैं वापिस साकारी दुनिया मे लौट आती हूँ*।

 

_ ➳  अपने साकार तन में प्रवेश करके अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर रूहानी सेवाधारी बन अब मैं ज्ञान सागर अपने शिव पिता द्वारा मिले ज्ञान रत्नों को स्वयं में धारण कर *ज्ञान स्वरुप बन, अपने सम्बन्ध - सम्पर्क में आने वाली सभी ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र देकर, उन्हें अज्ञान अंधकार से निकाल ज्ञान सोझरे में लाने की सेवा करते हुए अनेकों आत्माओं को मुक्ति जीवन मुक्ति का सच्चा रास्ता दिखाकर उनका कल्याण कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं पावरफुल दर्पण द्वारा सभी को स्वयं का साक्षात्कार कराने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं साक्षात्कारमूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा शिक्षाओं को सदा स्वरूप में लाती हूँ  ।*

   *मैं ज्ञान स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

   *मैं प्रेम स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *ब्राह्मण जीवन की मूड सदा चियरफुल और केयरफुल। मूड बदलना नहीं चाहिए।* फिर रायल रूप में कहते हैं आज मुझे बड़ी एकान्त चाहिए। क्यों चाहिए? क्योंकि सेवा वा परिवार से किनारा करना चाहते हैंऔर कहते हैं शान्ति चाहिएएकान्त चाहिए। आज मूड मेरा ऐसा है। तो मूड नहीं बदली करो। कारण कुछ भी होलेकिन आप कारण को निवारण करने वाले होकि कारण में आने वाले हो? निवारण करने वाले। ठेका क्या लिया है? *कान्ट्रैक्टर हो नातो क्या कान्ट्रैक्ट लिया हैकि प्रकृति की मूड भी चेंज करेंगे।* प्रकृति को भी चेंज करना है ना? *तो प्रकृति को परिवर्तन करने वाले अपने मूड को नहीं परिवर्तन कर सकते?*

 

 _ ➳  मूड चेंज होती है कि नहींकभी-कभी होती है? *फिर कहेंगे सागर के किनारे पर जाकर बैठते हैंज्ञान सागर नहींस्थूल सागर।* फारेनर्स ऐसे करते हैं ना? *या कहेंगे आज पता नहीं अकेला, अकेला लगता है। तो बाप का कम्बाइण्ड रूप कहाँ गया?* अलग कर दिया? कम्बाइण्ड से अकेले हो गयेक्या इसी को प्यार कहाँ जाता हैंतो किसी भी प्रकार का मूडएक होता है - मूड आफवह है बड़ी बात, लेकिन मूड परिवर्तन होना यह भी ठीक नहीं। मूड आफ वाले तो बहुत भिन्न-भिन्न प्रकार के खेल दिखाते हैं, बापदादा देखते हैंबड़ों को बहुत खेल दिखाते हैं या अपने साथियों को बहुत खेल दिखाते हैं। ऐसा खेल नहीं करो। क्योंकि बापदादा का सभी बच्चों से प्यार है। बापदादा यह नहीं चाहता कि जो विशेष निमित्त हैंवह बाप समान बन जाएं और बाकी बने या नहीं बनेंनहीं। *सबको समान बनाना ही हैयही बापदादा का प्यार है।* 

 

✺   *ड्रिल :-  "बाप के साथ कम्बाइण्ड रह सदा चियरफुल और केयरफुल रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा एक शांत स्थान पर प्रकृति के बीच बैठी हूँ... चारों ओर हरे भरे पेड़ दिखाई दे रहे हैं और यहां की शान्ति मुझ आत्मा में समा रही है... मैं आत्मा अब इस देह को छोड़कर अपने बापदादा के पास सूक्ष्म वतन में आकर ठहरी हूँ... *मेरे बापदादा बेहद प्यार भरी दृष्टि मुझे दे रहे हैं और मैं आत्मा अपने बाबा की शक्तिशाली किरणों से चमक उठी हूँ...*

 

 _ ➳  बाबा के सानिध्य में आकर मैं आत्मा एकदम चियरफुल हो गई हूं... बाबा की स्नेह भरी दृष्टि से ये समझ मुझ आत्मा में भर रही है कि मैं आत्मा हर परिस्थिति में चियरफुल हूँ... *मैं आत्मा चाहे सबके साथ हूँ चाहे अकेले हूँ मेरा मूड सदा खुशनुमा है...*

 

 _ ➳  मेरे मीठे बाबा आपने मुझे विश्व परिवर्तन की ज़िम्मेदारी सौंपी है... मुझे प्रकृति को भी श्रेष्ठ वाइब्रेशन दे उसे भी परिवर्तित करना है... इसके लिए मुझे सर्वप्रथम स्वयं को परिवर्तित करना है... बाबा आपकी ये शक्तिशाली किरणें मेरे पुराने स्वभाव संस्कार को भी परिवर्तित कर रही है... *मेरे स्थूल और सूक्ष्म पुराने संस्कार स्वभाव आपकी शीतल किरणों से भस्म हो रहे हैं...*

 

 _ ➳  मीठे बाबा आप अपना हज़ार भुजाओं वाला हाथ मेरे सिर पर रखते हैं और मैं आत्मा अब आपके साथ कंबाइंड रूप में हूँ... आपके साथ कंबाइंड हो मैं आत्मा अब बेहद शक्तिशाली हो गयी हूँ... *आपके साथ कंबाइंड रूप का अनुभव करते हुए मैं आत्मा अब हर परिस्थिति में चियरफुल हूँ... और सर्व आत्माओं के प्रति केयरफुल हूँ...* और मेरा मूड हर जगह हर समय चियरफुल है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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