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 07 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सच्चाई से अपना चार्ट रखा ?*

 

➢➢ *योगबल से काम विकार पर विजय प्राप्त की ?*

 

➢➢ *विघन प्रूफ चमकीली फ़रिश्ता ड्रेस धारण की ?*

 

➢➢ *अभ्यास पर पूरा पूरा अटेंशन दिया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  कर्मातीत अर्थात् कर्म के किसी भी बंधन के स्पर्श से न्यारे। ऐसा ही अनुभव बढ़ता रहे। *कोई भी कार्य स्पर्श न करे और करने के बाद जो रिजल्ट निकलती है उसका भी स्पर्श न हो, बिल्कुल ही न्यारापन अनुभव होता रहे। जैसे कि दूसरे कोई ने कराया और मैंने किया।* निमित्त बनने में भी न्यारापन अनुभव हो। *जो कुछ बीता, फुलस्टाप लगाकर न्यारे बन जाओ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सदा हर्षित रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  अपने को सदा हर्षित रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करते हो? *हर्षितमुख, हर्षितचित। इसकी यादगार आपके यादगार चित्रों में भी  दिखाते हैं। कोई भी देवी या देवता की मूर्ति बनायेंगे तो उसमें चेहरा जो दिखाते हैं, वह सदा हर्षित दिखाते हैं।*

 

  अगर कोई सीरीयस (गम्भीर) चेहरा होगा तो देवता का चित्र नहीं मानेंगे। *तो हर्षितमुख रहने का इस समय का गुण आपके यादगार चित्रों में भी है। हर्षितमुख अर्थात् सदा सर्वप्राप्तियों से भरपूर। जो भरपूर होता है वही हर्षित रह सकता है। अगर कोई भी अप्राप्ति होगी तो हर्षित नहीं रहेंगे।* कितनी भी हर्षित रहने की कोशिश करें, बाहर से हंसेंगे लेकिन दिल से नहीं।

 

  कोई बाहर से हंसते हैं तो मालूम पड़ जाता है-यह दिखावे का हँसना है, सच्च नहीं। *तो आप सब दिल से सदा मुस्काराते रहो। कभी चेहरे पर दु:ख की लहर न आये। किसी भी परिस्थिति में दु:ख की लहर नहीं आनी चाहिए क्योंकि दु:ख की दुनिया छोड़ दी, संगम की दुनिया में आ गये।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आप विदेश से आते हो तो बापदादा भी विदेश से आते हैं। *सबसे दूर-से-दूर से आते हैं लेकिन आते सेकण्ड में हैं।*

 

✧  आप सभी भी सेकण्ड में उडती कला का अनुभव करते हो? सेकण्ड में उड सकते हो? *इतने डबल लाइट हो, संकल्प किया और पहुँच गये।*

 

✧  *परमधाम कहा और पहुँचे, ऐसी प्रैक्टिस है?* कहाँ अटक तो नहीं जाते हो? कभी कोई बादल तंग तो नहीं करते हैं, केयरफुल भी हो और क्लियर भी, ऐसे है ना! (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ ड्रिल बहुत अच्छी लग रही थी। यह रोज़ हर एक को करनी चाहिए। ऐसे नहीं हम बिजी हैं। *बीच में समय प्रति समय एक सेकण्ड चाहे कोई बैठा भी हो, बात भी कर रहा हो, लेकिन एक सेकण्ड उनको भी ड़िल करा सकते हैं और स्वयं भी अभ्यास कर सकते हैं। कोई मुश्किल नहीं है। दो-चार सेकण्ड भी निकालना चाहिए इससे बहुत मदद मिलेगी। नहीं तो क्या होता है, सारा दिन बुद्धि चलती रहती है ना तो विदेही बनने में टाइम लग जाता है और बीच बीच में अभ्यास होगा तो जब चाहें उसी समय हो जायेंगे क्योंकि अन्त में सब अचानक होना है।* तो अचानक के पेपर में यह विदेही पन का अभ्यास बहुत आवश्यक है। ऐसे नहीं बात पूरी हो जाये और विदेही बनने का पुरुषार्थ ही करते रहें। तो सूर्यवंशी तो नहीं हुए ना। इसलिए जितना जो बिजी है, उतना ही उसको बीच-बीच में यह अभ्यास करना ज़रूरी है। फिर सेवा में जो कभी-कभी थकावट होतीे, कभी कुछ-न-कुछ आपस में हलचल हो जाती है, वह नहीं होगा। अभ्यासी होंगे ना। एक सेकण्ड में न्यारे होने का अभ्यास होगा, तो कोई भी बात हुई एक सेकण्ड में अपने अभ्यास से इन बातों से दूर हो जायेंगे। *सोचा और हुआ। युद्ध नहीं करनी पड़े। युद्ध के संस्कार, मेहनत के संस्कार सूर्यवंशी बनने नहीं देंगे। लास्ट घड़ी भी युद्ध में ही जायेगी, अगर विदेही बनने का सेकण्ड में अभ्यास नहीं है तो।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- देही-अभिमानी बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्मृतिपटल पर व्यक्त हो रहे सभी विचारों को फुल स्टॉप लगाकर एकांतवासी होकर सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठती हूँ... एक के अंत में मगन हो जाती हूँ...* धीरे-धीरे इस देह, देह की दुनिया से डिटैच होकर ऊपर उड़ते हुए, बादलों, पहाड़ों, चाँद, सितारों, आसमान से भी पार होती हुई पहुँच जाती हूँ... मेरे प्यारे बाबा के पास... और बाबा के सम्मुख बैठ बाबा की रूहानी बातों को प्यार से सुनती हूँ...

 

  *इस अंतिम जनम में देह अभिमान को छोड़कर देही अभिमानी बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... 21 जनमो के मीठे सुख आपकी दहलीज पर आने को बेकरार है... इन सुखो को जीने के लिये अपने सत्य स्वरूप के नशे से भर जाओ... *वरदानी संगम पर आत्मा अभिमानी के संस्कार को इस कदर पक्का करो कि अथाह सुख अथाह खुशियां दामन में सदा की सज जाएँ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने सत्य स्वरुप में चमकती हुई अपने स्वधर्म के गुण गाती हुई कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा शरीर के भान से निकल कर आत्मा होने की सत्यता से परिपूर्ण होती जा रही हूँ... *सातो गुणो से सजधज कर तेजस्वी होती जा रही हूँ... और नई दुनिया में अनन्त सुखो की स्वामिन् होती जा रही हूँ...*

 

  *दिव्य गुणों की खुशबू से मेरे जीवन को दिव्य बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह के भान ने उजले प्रकाश को धुंधला कर दुखो के कंटीले तारो में लहुलहानं सा किया है... अब आत्मिक ओज से स्वयं को भर लो... *अपने चमकते स्वरूप और गुणो की उसी खूबसूरती से फिर से दमक उठो... तो सुखो के अम्बार कदमो में सदा के बिछ जायेंगे...*

 

_ ➳  *आत्मदर्शन कर सर्वगुणों से सुसज्जित हो दिव्यता से ओतप्रोत होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपनी खोयी चमक वही खूबसूरत रंगत पुनः पाती जा रही हूँ... आत्मा अभिमानी होकर खुशियो में मुस्करा रही हूँ... *मीठे बाबा के प्यार में सतयुगी सुख अपने नाम करवा रही हूँ...*

 

  *संगम पर मेरे संग-संग चलते हुए मेरे क़दमों में फूल बिछाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *संगम के कीमती समय में सुखो की जागीर अपनी बाँहों में भरकर 21 जनमो तक अथाह खुशियों में मुस्कराओ...* ईश्वर पिता का सब कुछ अपने नाम कर लो... और खूबसूरत दुनिया के मालिक बन विश्व धरा पर इठलाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा आत्मिक स्वरुप की झलक और फलक से संगम के अमूल्य समय, श्वांस, संकल्पों को सफल करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कभी यूँ ईश्वर पिता के दिल पर इतराउंगी ... सब कुछ मेरी मुट्ठी में होगा... *भाग्य इतना खूबसूरत और ईश्वरीय प्यार के जादू में खिलेगा ऐसा मैंने भला कब सोचा था... ये प्यारे से ईश्वरीय पल मुझे 21 जनमो का सुख दिलवा रहे है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- यथार्थ रीति बाप को याद करने वा आत्म अभिमानी बनने की मेहनत करनी है*"

 

_ ➳  कितनी महान सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जिसे भगवान ने स्वयं आकर अपना यथार्थ परिचय दिया। जिस भगवान को महा मण्डलेश्वर साधु सन्यासी बेअन्त कहते रहे उसने स्वयं आकर सारे उलझे हुए प्रश्नों को सुलझा कर अगम अगोचर के सारे भेद खोल दिये। *मैं आत्मा हूँ, परम पिता परमात्मा की सन्तान, एक छोटा सा स्टार सर्व गुणों सर्वशक्तियों से सम्पन्न हूँ मेरे इस यथार्थ  स्वरूप का मुझे अनुभव करवा कर मेरे प्यारे पिता ने मेरे अंदर फैले अज्ञान अंधकार को मिटाकर ज्ञान का सोझरा मेरे जीवन मे कर दिया*। जैसे मैं आत्मा बिंदी हूँ वैसे मेरे पिता भी बिंदी है किन्तु गुणों में सिंधु के समान है। उनका यह यथार्थ परिचय पाकर मन को जैसे एक सुकून मिल गया है।

 

_ ➳  जिस भगवान को दुनिया भिन्न - भिन्न नामों और रूपों से याद कर रही है उसे यथार्थ रीति कोई नही जानता इसलिए उससे आज दिन तक दूर हैं। *अपने उस बिंदी बाप को मैंने कितना सहज रीति जान लिया और उसे यथार्थ बिंदी रूप में जानकर याद करने से कितनी अखुट प्राप्तियों की मैं अधिकारी आत्मा बन गई। मेरे जैसा भाग्यवान इस संसार मे ओर कोई नही जो स्वयं भगवान बाप बन मेरी पालना कर रहें हैं*। ईश्वरीय गोद मे मैं पल रही हूँ यह विचार कर, मन ही मन अपने भाग्य का गुणगान करते हुए, अपने प्यारे पिता का मैं दिल से कोटि - कोटि शुक्रिया अदा करती हूँ जिन्होंने करोड़ो आत्माओं में से मुझे चुना और अपना यथार्थ परिचय देकर अपना बच्चा बना लिया। 

 

_ ➳  अपने यथार्थ स्वरूप में टिक कर, बाप जो है जैसा है उसे उसके यथार्थ बिंदी स्वरूप में याद करके, *सेकेण्ड में पदमों की कमाई जमा करने के लिए, अपने यथार्थ बिंदी स्वरूप में अब मैं स्वयं को स्थित करने के लिए मन बुद्धि को सभी दुनियावी बातों से हटाकर पूरी तरह अपने मस्तक पर एकाग्र करती हूँ*। स्वयं को मैं देह से न्यारी आत्मा निश्चय करती हूँ और पूरी एकाग्रता के साथ इसी संकल्प में टिक जाती हूँ। *सेकण्ड में मेरा सत्य स्वरूप एक अति सूक्ष्म प्वाइंट ऑफ लाइट के रूप में भृकुटि पर चमकता हुआ मुझे स्पष्ट अनुभव होने लगता है*।

 

_ ➳  देख रही हूँ मैं अपने उस अति सुंदर, लुभावने सतोगुणी स्वरूप को जो सुख, शांति, पवित्रता, प्रेम, आनन्द, ज्ञान और शक्ति से सम्पन्न, एक अति सूक्ष्म स्टार के रूप में भृकुटि के अकालतख्त पर विराजमान हो कर चमक रहा है। *इस चमकते हुए चैतन्य सितारे में से निकल रही प्रकाश की रंग बिरंगी किरणें मेरे चारों और शक्तिशाली वायब्रेशन्स फैला कर मुझे असीम तृप्ति का अनुभव करवा रही हैं*। स्वयं से निकल रहे रंग बिरंगे प्रकाश की एक - एक किरण को निहारते, अपने अनादि सत्य स्वरूप का भरपूर आनन्द लेकर अब मैं भृकुटि की कुटिया से बाहर आ जाती हूँ और अपने आस पास की वस्तुओं को साक्षी होकर देखने लगती हूँ। *अपने आस पास की हर वस्तु यहाँ तक कि अपनी देह के आकर्षण से भी मैं पूरी तरह मुक्त हूँ। इन सबके बीच में होते हुए भी मैं जैसे इनसे न्यारी और प्यारी हूँ*।

 

_ ➳  मन को आनन्दित करने वाले अपने अति न्यारे और प्यारे स्वरूप का अनुभव करते - करते अब मैं मन बुद्धि के विमान पर बैठ, अपने बिंदी बाप से मिलने उनके धाम की ओर चल पड़ती हूँ। एक खूबसूरत रूहानी यात्रा पर निरन्तर आगे बढ़ते हुए, आकाशमण्डल को पार कर सूक्ष्म वतन से होती हुई उससे भी परे मैं पहुँच गई हूँ अपने प्यारे पिता के पास उनके परमधाम घर में।  *देख रही हूँ मैं अपने पारलौकिक बिंदी बाप को अपने बिल्कुल सामने एक ज्योतिपुंज के रूप में। उनके पास जाकर, उनकी सर्वशक्तियों की अनन्त किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ अब मैं उनके स्नेह की शीतल फुहारों को अपने ऊपर बरसता हुआ स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*। बाबा की सर्वशक्तियों की अनन्त किरणें निरन्तर मेरे ऊपर प्रवाहित होकर, मेरी सोई हुई शक्तियों को पुनः जागृत कर रही हैं। और मुझे सर्वशक्तियों से सम्पन्न बना रही हैं। 

 

_ ➳  अपने बिंदी बाप से यथार्थ मिलन मना कर, परमात्म स्नेह और परमात्म शक्तियों से भरपूर होकर मैं आत्मा अब वापिस साकारी दुनिया में लौट रही हूँ। अपने साकार तन मे प्रवेश कर भृकुटि पर विराजमान होकर अब मैं देह और देह की दुनिया मे फिर से अपना पार्ट बजा रही हूँ। *बाप जो है जैसा है, उसे यथार्थ बिंदी रूप में जान कर याद करते हुए मैं परमात्म स्नेह और परमात्म बल प्राप्त करने के साथ - साथ, परमात्म याद रूपी योग अग्नि में अपने विकर्मों को दग्ध करने का भी पुरुषार्थ बड़ी सहजता से कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं विघ्न प्रूफ चमकीली फरिश्ता ड्रेस धारण करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं सदा विघ्न विनाशक आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा अभ्यास पर पूरा पूरा अटेंशन देती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा फर्स्ट डिवीजन में नंबर लेकर आती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा तीव्र पुरुषार्थी हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. *अभी समय के प्रमाण आप हर निमित्त बनी हुईसदा याद और सेवा में रहने वाली आत्माओं को स्व परिवर्तन द्वारा विश्व परिवर्तन का वायब्रेशन पावरफुल और तीव्रगति का बढ़ाना है।* चारों ओर मन का दु:ख और अशान्तिमन की परेशानियां बहुत तीव्रगति से बढ़ रही हैं। *बापदादा को विश्व की आत्माओं के ऊपर रहम आता है। तो जितना तीव्रगति से दु:ख की लहर बढ़ रही है उतना ही आप सुख दाता के बच्चे अपने मन्सा शक्ति सेमन्सा सेवा व सकाश की सेवा से, वृत्ति से चारों ओर सुख की अंचली का अनुभव कराओ।* बाप को तो पुकारते ही हैं लेकिन आप पूज्य देव आत्माओं को भी किसी न किसी रूप से पुकारते रहते हैं। तो *हे देव आत्मायेंपूज्य आत्मायें अपने भक्त आत्माओं को सकाश दो।* साइन्स वाले भी सोचते हैं ऐसी इन्वेन्शन निकालें जो दु:ख समाप्त हो जाएसाधन सुख के साथ दु:ख भी देता है लेकिन दु:ख न होसिर्फ सुख की प्राप्ति हो उसका सोचते जरूर हैं। लेकिन स्वयं की आत्मा में अविनाशी सुख का अनुभव नहीं है तो दूसरों को कैसे दे सकते हैं। लेकिन आप सबके पास सुख का, शान्ति का, नि:स्वार्थ सच्चे प्यार का स्टाक जमा है।

 

 _ ➳  2. जमा की तो खुशी होती है लेकिन खर्च का हिसाब नहीं निकाला तो समय पर धोखा मिल जायेगा। जमा का खाता भी देखो लेकिन साथ-साथ अपने प्रति खर्च कितना किया। *दूसरे को कोई गुण दिया, शक्ति दीज्ञान का खजाना दिया वह खर्च नहीं हैवह जमा के खाते में जमा होता है लेकिन अपने प्रति समय प्रति समय खर्च किया तो खाता खाली हो जाता है।* इसीलिए अच्छे विशाल बुद्धि से चेकिंग करो।

 

✺   *ड्रिल :-  "विश्व की आत्माओं को सुख की अंचली का अनुभव कराना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा इस साकारी शरीर में... भ्रकुटी के मध्य में विराजमान हूँ... *मैं आत्मा चमकता हुआ सितारा हूँ... उड़ चलता हूँ परमधाम की ओर... मेरे प्रेम के... शांति के... सुख के सागर परमपिता परमात्मा शिव बाबा के पास... उनसे शांति की... शक्ति की... प्रेम की... सुख की रंग - बिरंगी किरणें मुझ आत्मा पर पड़ रही है...* और मैं आत्मा इन शक्तियों से भरपूर हो रही हूँ... मुझ आत्मा के चारों ओर एक शक्तिशाली... आभामंडल बन गया है... जिसका प्रभाव दूर - दूर तक फैल रहा है... अब मैं आत्मा वापस उड़ कर पहुँच जाती हूँ... विश्‍व ग्लोब पर...

 

 _ ➳  मैं आत्मा सुख - शांति का फरिश्ता... विश्‍व के ग्लोब पे विराजमान हूँ... मुझ आत्मा से सुख - शांति और शक्ति की किरणें... निरंतर प्रवाहित हो रही है... *मुझ आत्मा के सम्मुख... विश्व की समस्त दुखी, अशांत और पीड़ित आत्माएँ विराजमान है... और मैं आत्मा इन सब आत्माओं को... सुख की अंचली का अनुभव करा रही हूँ...* सबके दुख दूर कर... सुख का अनुभव करवा रही हूँ... *रहम दिल बाप की... मैं मास्टर रहम दिल संतान... सबकी पीड़ा दूर कर रही हूँ...*

 

 _ ➳  *अभी समय के प्रमाण मैं निमित्त बनी हुई आत्मा... सदा याद और सेवा में रहने वाली आत्मा... स्व परिवर्तन द्वारा विश्व परिवर्तन करने के लिए... पावरफुल वायब्रेशन तीव्रगति से फैला रही हूँ...* मुझ आत्मा के इस वाइब्रेशन के संपर्क में... जो भी आत्मा आ रही है... वो स्वतः ही परिवर्तित हो रही है... और अपने परमपिता की ओर आकर्षित हो रही है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा बापदादा से प्राप्त सुख - शांति की शक्तियों को... सारे विश्व में फैला रही हूँ... *विश्व में तीव्रगति से फैल रही दु:ख की लहर को समाप्त करने के लिए... मैं आत्मा सुख दाता की संतान... अपनी मन्सा शक्ति से... मन्सा सेवा से... सकाश की सेवा से... और वृत्ति से चारों ओर सुख की अंचली का सब आत्माओं को अनुभव करा रही हूँ...* मैं पूज्य ईष्ट देवी अपने भक्तों को सुख शांति के वाइब्रेशन दे रही हूँ... उनको वरदानों से भरपूर कर उनका उद्धार कर रही हूँ...

 

 _ ➳  *साइन्स की इन्वेन्शन से निकले साधन... सुख के साथ दुख भी देते हैं... लेकिन मुझ आत्मा के पास परमात्मा से प्राप्त... सच्चा सुख का... शान्ति का... नि:स्वार्थ प्रेम का स्टॉक जमा है... जो सभी आत्माओं को सच्चा सुख और शांति का ही अनुभव करवा रहा है... मैं आत्मा इन जमा शक्तियों को... सर्व आत्माओं के कल्याण के लिए यूज कर रही हूँ... दूसरे को कोई गुण दिया... शक्ति दी... ज्ञान का खजाना दिया... वह खर्च नहीं है... वह जमा के खाते में जमा होता है... लेकिन अपने प्रति समय प्रति समय खर्च किया तो खाता खाली हो जाता है...* इसीलिए अब मैं आत्मा  विशाल बुद्धि से चेकिंग कर... इन खजानों को... बापदादा के बताये अनुसार विश्व कल्याण अर्थ यूज करती हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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