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 07 / 12 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *संग दोष से बचे रहे ?*

 

➢➢ *"कदम कदम पर बाबा की श्रीमत पर चलेंगे" - यह अपने साथ प्रण किया ?*

 

➢➢ *एक्व्रता के राज़ को जान वरदाता को राज़ी रखा ?*

 

➢➢ *मनसा और वाचा दोनों सेवाएं साथ साथ कर डबल फल प्राप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  *जैसे कोई भी व्यक्ति दर्पण के सामने खड़ा होते ही स्वयं का साक्षात्कार कर लेता है, वैसे आपकी आत्मिक स्थिति, शक्ति रुपी दर्पण के आगे कोई भी आत्मा आवे तो वह एक सेकेण्ड में स्व स्वरुप का दर्शन वा साक्षात्कार कर ले।* आपके हर कर्म में, हर चलन में रुहानियत की अट्रेक्शन हो। *जो स्वच्छ, आत्मिक बल वाली आत्मायें हैं वह सबको अपनी ओर आकर्षित जरूर करती हैं।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी आत्मा हूँ"*

 

  बाप-दादा बच्चों को पहला-पहला टाइटिल देते हैं 'स्वदर्शन चक्रधारी'। बाप-दादा द्वारा मिला हुआ टाइटिल स्मृति में रहता है? *जितना-जितना स्वदर्शन चक्रधारी बनेंगे उतना मायाजीत बनेंगे।* तो स्वदर्शन चक्र चलाते रहते हो? स्वदर्शन चक्र चलाते-चलाते कब स्व के बजाय पर-दर्शन चक्र तो नहीं चल जाता? 

 

✧  स्वदर्शन चक्रधारी बनने वाले स्व-राज्य और विश्व राज्य के अधिकारी बन जाते हैं। स्वराज्य अधिकारी अभी बने हो? *जो अभी स्वराज्य अधिकारी बनते वही भविष्य राज्य अधिकारी बन सकते हैं।* राज्य अधिकारी बनने के लिए कन्ट्रोलिंग पावर चाहिए।

 

✧  *जब जिस कर्म इन्द्रिय द्वारा जो कर्म कराने चाहें वह करा सकते, इसको कहा जाता है 'अधिकारी'।* ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर है? कभी आंखे वह मुख धोखा तो नहीं देते। जब कन्ट्रोलिंग पावर होती है तो कोई भी कर्मेन्द्रिय कभी संकल्प रूप में भी धोखा नहीं दे सकती।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *यह कर्मेन्द्रियाँ हमारी साथी हैं, कर्म की साथी हैं लेकिन मैं न्यारा और प्यारा हूँ अभी एक सेकण्ड में अभ्यास दोहराओ।* (बापदादा ने ड़िल कराई) सहज लगता है कि मुश्किल है? सहज है तो सारे दिन में कर्म के समय यह स्मृति इमर्ज करो, तो कर्मातीत स्थिति का अनुभव सहज करेंगे।

 

✧  क्योंकि सेवा वा कर्म को छोड सकते हो? छोडेगे क्या? करना ही है। तपस्या में बैठना यह भी तो कर्म है तो बिना कर्म के वा बिना सेवा के तो रह नहीं सकते हो और रहना भी नहीं है। क्योंकि *समय कम है और सेवा अभी भी बहुत है।* सेवा की रूपरेखा बदली है।

 

✧  लेकिन अभी भी कई आत्माओं का उल्हना रहा हुआ है। इसलिए *सेवा और स्व-पुरुषार्थ दोनों का बैलेन्स रखो।* ऐसे नहीं कि सेवा में बहुत बिजी थे ना इसलिए स्व-पुरुषार्थ कम हो गया। नहीं। और ही सेवा में स्व-पुरुषार्थ का अटेन्शन ज्यादा चाहिए। क्योंकि *माया को आने की मार्जिन सेवा में बहुत प्रकार से होती है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  आजकल की दुनिया में ड्रामा के अतिरिक्त और कौन-सी वस्तु है जो ऐसे फ़रिश्तों के नयनों जैसी आकर्षण करने वाली हैं? टी.वी.। *जैसे टी.वी. द्वारा इस संसार की कैसी-कैसी सीन-सीनरियाँ देखते हुए कई आकर्षित होते अर्थात् गिरती कला में जाते हैं ऐसे ही फ़रिश्तों के नयन दिव्य दूर-दर्शन का काम करेंगे। हर एक के नयनों द्वारा सिर्फ इस संसार के ही नहीं लेकिन तीनों लोकों के दर्शन करेंगे। ऐसे फ़रिश्तों के मस्तक में चमकती हुई मणि, आत्माओं को सर्च-लाइट व लाइट हाउस के समान स्वयं का स्वरूप, स्वमार्ग और श्रेष्ठ मंज़िल का स्पष्ट साक्षात्कार करायेंगी। ऐसे फ़रिश्तों के युक्तियुक्त बोल अर्थात् अमूल्य बोल, हर भिखारी आत्मा की रत्नों से झोली भरपूर करेंगे।* जो गायन है देवतायें भी भक्तों पर प्रसन्न हो फूलों की वर्षा करते हैं- ऐसे आप श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा विश्व की आत्माओं के प्रति सर्व शक्तियों, सर्व गुणों तथा सर्व वरदानों की पुष्प-वर्षा सर्व के प्रति होगी।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अविनाशी सर्जन से कुछ भी छिपाना नहीं"*

 

_ ➳  मैं आत्मा... इस संगमयुग में... *ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में... मनुष्य से देवता बनने की... ईश्वरीय गुणों को धारण करने की पढ़ाई पढ़ रही हूँ...* मैं आत्मा... शांतिवन के उपवन में... बैठी... निहार रहीं हूँ सभी *आत्माओं को जो मधुबन आयी हैं... अपने भाग्य को... सौभाग्य में बदलने... 21 जन्मों का स्वराज्य अधिकार प्राप्त करने... सजनी अपने साजन से मिलने... बच्चे अपने बाप से मिलने... मित्र अपने सखा से मिलने... शिष्य अपने गुरु से मिलने और माँ अपने बच्चे से मिलने आए हैं...* सब को देख में आत्मा एक अलौकिक स्वप्न में विहर रहीं हूँ... मैं देख रहीं हूँ... अपने आप को... पांडव भवन में... बाबा के कमरे में... जहाँ बाबा मुरली चला रहे हैं... सभी आत्मायें बैठी हैं... *बाबा से अलौकिक पढ़ाई पढ़ रहीं हैं...*

 

  *सफ़ेद संदली पे बैठे बाबा ने कहा :-* "मेरे सिकीलधे बच्चें... कल्प के बिछड़े बच्चे... अब मिले हो... *जन्म मरण के खेल को खेल खेल कर थक गए हो...* गोरे से काले हो गए हो... *अपनी शक्तियों से बेखबर शक्तिहीन हो गए हों... मुझ और खुद के भी अस्तित्व से अनजान बन गए हो...* सतयुगी स्वराज्य अधिकारी के पदाधिकारी... विश्वकल्याणकारी आत्मायें... अब क्या बन गई हो... अपने ओरिजिनल गुण... संस्कारो को... कहाँ खो कर आयी हो..."

 

_ ➳  *बाबा की अमी दृष्टि देख कर मैं आत्मा बाबा से कहती हूँ :-* "मेरे बाबा... *सौभाग्य हमारा जो आप मिले... अहोभाग्य हमारा जो हमें सच्चा सच्चा गीता का ज्ञान मिला... अपनी सच्ची पहचान मिली...* इस कलियुग में... हमें आप का सहारा मिला... दर दर भटकते... दर दर की ठोकरे खाते... लड़खड़ाते पैरो को... मंजिल मिल गई... *कोटि बार शुक्रिया बाबा जो आपने हमें ढूंढा... सहारा दीया... स्वराज्य अधिकारी के लायक बनाया..."*

 

  *गुल गुल गुलो के बागबान समान मेरे बाबा बोले :-* "मेरी राज दुलारी... मेरी लाडली बच्ची... तुझे तो मैंने दिल से ढूंढा हैं... अपने दिलतख्त पर बिठाया हैं... *तेरी जन्मों की पुकार को... जन्मों की भक्ति को फलस्वरूप बनाने आया हूँ... इस अलौकिक पढ़ाई को... इस ईश्वरीय श्रीमत को... पूरे तन-मन-धन से यथार्थ रीति पढ़ना और पढ़ाना... सेवा का सरताज बनना और बनाना..."*

 

_ ➳  *अलौकिक तेज से भरपूर मेरे बाबा को मैं आत्मा कहती हूँ :-* "मेरे प्यारे बाबा... इस कलियुगी वातावरण में... *मैं आत्मा... स्वर्ण से कंकड़ बन गई हूँ... तू जो मिला... स्वर्ग के द्वार खुल गए... इस अप्रतिम पढ़ाई से... अवर्णनीय स्वर्ग की प्राप्ति हो गई है... सतयुगी गुणों और संस्कारों की स्वरूप बन गई हूँ... सच्ची सेवाधारी बन... सेवा के लक्ष्य को प्राप्त कर रहीं हूँ..."*

 

  *सुख के सागर... मेरे प्यारे बाबा बोले :-* "रूहानी गुलाब सी मेरी प्यारी बच्ची... *यह अविनाशी ज्ञान यज्ञ है... अपने विकर्मों को... स्वाहा कर...* मुझ गुरु को अपने पुराने स्वभाव संस्कार का दान दे दो... बदले में 21 जन्मों का स्वराज्य अधिकार प्राप्त कर लो... *मैं तुम्हारा बाप हूँ... तो टीचर भी हूँ... गुरु भी हूँ... तो कोई भी विकर्मों का बोझ हो... मुझसे छुपाना नहीं... अपनी गलती... मुझे बता कर फ्री हो जाना... अपने भाग्य की लकीर को कटने मत देना... 21 जन्मो की सतयुगी बादशाही को... भूल से भी विकर्मों को छुपा कर गवा मत देना..."*

 

_ ➳  *प्यार भरी आँखो से बाबा के हाथ चूमती मैं आत्मा... बाबा से कहती हूँ :-* "मेरे बाबा... *आप की सतयुगी पढ़ाई ने... आपकी श्रीमत ने... इस संगमयुग में... मुझ आत्मा को कमल पुष्प समान बना दिया हैं... कौड़ी की कीमत थी मेरी... तूने हीरे तुल्य बना दिया है...* अब विकार मुक्त जीवन... तन-मन-धन सब बन गया हैं... *जन्मों जन्म के सुक्ष्म ते सूक्ष्म पाप को भी मैं आत्मा योग अग्नि में स्वाहा कर रहीं हूँ... और यह जीवन संगमयुग का सफल कर रहीं हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- संगदोष से सदा बचे रहना है*"

 

_ ➳  "संग तारे, कुसंग बौरे" मुरली में आने वाली इस कहावत को स्मृति में ला कर मैं विचार करती हूँ कि आज दिन तक आसुरी दुनिया के आसुरी मनुष्यों का संग करते - करते मेरी बुद्धि कितनी मलीन हो गई थी जो अपने ही आत्मा भाईयों के गुणों को ना देख उनके अवगुणों को देख उनकी निंदा करने लगी थी। किन्तु *भगवान बाप ने आ कर, अपना सत्य संग देकर, मुझ पत्थर बुद्धि को पारस बुद्धि बना दिया। ज्ञान का दिव्य चक्षु दे कर, मुझ आत्मा को होली हंस बना कर, अवगुण रूपी पत्थर को छोड गुण रूपी मोती चुगना सिखा दिया*।

 

_ ➳  ऐसे होली हंस बनाने वाले अपने प्यारे मीठे शिव बाबा का शुक्रिया अदा करने के लिए, अब मैं अपने निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित होती हूँ और *मन बुद्धि की उस मीठी रूहानी यात्रा पर चल पड़ती हूँ जो सीधी मुझे मेरे ज्ञान सूर्य अति मीठे, अति प्यारे, सिकीलधे बाबा तक ले जाती है*। मन बुद्धि की यात्रा पर चलते, अनेक सुंदर, अद्भुत अनुभूतियाँ करते, मैं अपने निराकार बाबा के पास उनकी निराकारी दुनिया की ओर बढ़ रही हूँ।

 

_ ➳  आकाश मण्डल को पार करके, सूक्ष्म लोक को पार करते हुए अब मैं स्वयं को अपनी रूहानी मंजिल के बिल्कुल समीप अनुभव कर रही हूँ। *मेरे शिव पिता की शक्तिशाली किरणों का एक दिव्य आभामंडल मुझे मेरे चारों और दिखाई दे रहा है*। इस आभामंडल के बिल्कुल बीचों - बीच गहन आनन्द की अनुभूति करते हुए मैं अपने शिव पिता के अति समीप जा रही हूँ। *समीपता की इस स्थिति में सिवाय दो बिंदुओं के और कुछ भी मुझे दिखाई नही दे रहा*। मेरे अति समीप ज्योति बिंदु शिवबाबा और उनके बिल्कुल सामने मैं ज्योति बिंदु आत्मा।

 

_ ➳  अपने निराकार ज्योति बिंदु बाबा की किरणों के साये में मैं स्वयं को देख रही हूँ। उनकी शक्तिशाली किरणों रूपी बाहों में समा कर मैं उनकी सर्वशक्तियों को स्वयं में भरता हुआ महसूस कर रही हूँ। *बाबा की शक्तिशाली किरणों का तेज प्रवाह निरन्तर मुझ आत्मा में प्रवाहित हो कर, मुझे भी बाप समान बना रहा है*। सर्वशक्तिवान बाप की सन्तान स्वयं को मैं मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा के रूप में देख रही हूँ और स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। *परमात्म संग का रंग स्वयं पर चढ़ा हुआ मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳  परमात्म शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके और अपने शिव पिता परमात्मा के अविनाशी संग के रंग में स्वयं को रंग कर अब मैं वापिस साकारी दुनिया की ओर लौट रही हूँ । मेरे शिव पिता परमात्मा के अविनाशी संग का रंग अब मुझे आसुरी दुनिया के आसुरी मनुष्यो के संग से दूर कर रहा है। *आसुरी दुनिया और आसुरी मनुष्यों के बीच रहते हुए भी उनकी आसुरी वृति का अब मुझ पर कोई प्रभाव नही पड़ता*। निंदा, चुगली करने वालों के संग से दूर, केवल अपने शिव पिता परमात्मा के संग में सदा रहते हुए अब मैं सदा परमात्म प्रेम की मस्ती में खोई रहती हूँ और हर प्रकार के कुसंग से बची रहती हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं एकव्रता के राज को जान वरदाता को राजी करने वाली सर्व सिद्धि स्वरूप    आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं मन्सा और वाचा दोनों सेवाएं साथ-साथ करके डबल फल प्राप्त करने वाली सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  ब्रह्मा बाप का त्याग ड्रामा में विशेष नूंधा हुआ है। *आदि से ब्रह्मा बाप का त्याग और आप बच्चों का भाग्य नूंधा हुआ है।* सबसे नम्बरवन त्याग का एक्जैम्पुल ब्रह्मा बाप बना। त्याग उसको कहा जाता है - *जो सब कुछ प्राप्त होते हुए त्याग करे।* समय अनुसार, समस्याओं के अनुसार *त्याग श्रेष्ठ त्याग नहीं है।* शुरू से ही देखो *तन, मन, धन, सम्बन्ध, सर्व प्राप्ति होते हुए त्याग किया।* नये- बच्चे संकल्प शक्ति से फास्ट वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं। तो सुना ब्रह्मा के त्याग की कहानी।

 

 _ ➳  ब्रह्मा  का फल आप बच्चों को मिल रहा है। *तपस्या का प्रभाव इस मधुबन भूमि में समाया हुआ है।* साथ में बच्चे भी हैंबच्चों की भी तपस्या है लेकिन निमित्त तो ब्रह्मा बाप कहेंगे। जो भी मधुबन तपस्वी भूमि में आते हैं तो ब्राह्मण बच्चे भी अनुभव करते हैं कि *यहाँ का वायुमण्डलयहाँ के वायब्रेशन सहजयोगी बना देते हैं।* योग लगाने की मेहनत नहींसहज लग जाता है और कैसी भी आत्मायें आती हैंवह कुछ न कुछ अनुभव करके ही जाती हैं। ज्ञान को नहीं भी समझते लेकिन *अलौकिक प्यार और शान्ति का अनुभव करके ही जाते हैं। कुछ न कुछ परिवर्तन करने का संकल्प करके ही जाते हैं।* यह है ब्रह्मा और ब्राह्मण बच्चों की तपस्या का प्रभाव। 

 

✺   *ड्रिल :-  "मधुबन तपोभूमि की स्मृति से अलौकिक प्यार और शांति का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा मधुबन की मधुर स्मृतियों को स्मृति में रख पहुँच जाती हूँ शान्ति स्तम्भ... *जहाँ प्यारे बापदादा बाहें पसारे खड़े मुस्कुरा रहे हैं... मैं आत्मा बाबा की बाँहों में सिमट जाती हूँ... और बाबा को कहती हूँ बाबा- अब घर ले चलो... इस आवाज़ की दुनिया से पार ले चलो... बापदादा बोले:- बच्चे- मैं अपने साथ ले जाने के लिए ही आया हूँ... साथ जाने के लिए एवररेडी बनो... ब्रह्मा बाप समान त्यागी बनो...* बिंदु रूप में स्थित हो जाओ...

 

 _ ➳  *धन्य है आबू की धरती, जिस पर जहाँ- तहाँ फरिश्ते विचरण कर रहे हैं...* जिधर भी नजर जा रही है फरिश्ते ही घूमते नजर आ रहे हैं... जैसे की फरिश्तों की दुनिया को छोड़ कर सारे फरिश्ते इस धरा पर उतर आये हों... कैसा अद्भुत नजारा है यह जिसे निरन्तर देखते रहने का मन हो रहा है... *यहाँ-वहाँ फरिश्ते सर्व आत्माओं पर अपनी निःस्वार्थ स्नेह, निश्चल प्रेम वा सौहार्द भरी दिव्य रूहानी दृष्टि डालकर मनुष्य आत्माओं को परम सुख-शांति वा खुशी की अनुभूति करा रहे हैं...*  

 

_ ➳  मैं आत्मा ब्रह्मा बाबा के त्याग की कहानी शिव बाबा से सुन... अन्दर ही अन्दर दृढ़ संकल्प करती हूँ... *मुझ आत्मा को भी बाप समान बनना ही है...* जिस प्रकार ब्रह्मा बाबा ने पहली मुलाकात में ही अपना सारा व्यापार, सारे रिश्ते-नाते, समेट लिए... *उसी प्रकार मुझ आत्मा को भी अपना सब कुछ समेट लेने की शक्ति बापदादा से मिल रही है...* बापदादा की दृष्टि से निकलती हुई शक्ति की किरणें मुझ आत्मा में समा रही है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा देख रही हूँ... ब्रहमा बाबा के साथ-साथ ब्राह्मण बच्चों की तपस्या का प्रभाव मधुबन भूमि में समाया हुआ है... *यहाँ का वायुमंडल यहाँं के वाइब्रेशन मुझे सहज योगी बना देते हैं...* मैं आत्मा देख रही हूँ... कोई भी ब्राह्मण आत्मा जो मधुबन तपस्वी भूमि में आती है... तो अनुभव करती हैं कि... *यहाँ योग लगाने की मेहनत नहीं करनी पड़ती, सहज ही लग जाता है...* मैं आत्मा देख रही हूँ... कैसी भी आत्माएं आती हैं... वह कुछ ना कुछ अनुभव करके ही जाती हैं... ज्ञान को नहीं समझते लेकिन *अलौकिक प्यार और शांति का अनुभव करके ही जाते हैं...*

   

 _ ➳  *मैं आत्मा सदा बाप समान विश्व हूँ...* बाबा जैसी दृष्टि, बाबा जैसी वृत्ति, बाबा जैसी स्मृति, सदा बाप समान साक्षी दृष्टा स्थिति में स्थित रहने का अभ्यास करती हूँ... *मैं मास्टर ब्रहमा हूँ... मेरी चलन, दृष्टि, वृत्ति बाबा जैसी हो रही है... बाबा मेरी मस्तक मणि हैं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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