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 08 / 01 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"मैं आत्मा हूँ.. आत्मा से बात करती हूँ.." - यह अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *एक मिनट की एकाग्र स्थिति द्वारा शक्तिशाली अनुभव किया ?*

 

➢➢ *हर संकल्प, बोल में पवित्रता का वाइब्रेशन समाया रहा ?*

 

➢➢ *कर्म करते बीच बीच में फ़रिश्ता स्वरुप व निराकरी स्वरुप की मन की एक्सरसाइज की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जितना अव्यक्त लाइट रुप में स्थित होंगे, उतना शरीर से परे का अभ्यास होने के कारण यदि दो-चार मिनट भी अशरीरी बन जायेंगे, तो मानों जैसे कि चार घण्टे का आराम कर लिया। *ऐसा समय आयेगा जो नींद के बजाए चार-पाँच मिनट अशरीरी बन जायेंगे और शरीर को आराम मिल जायेगा। लाइट स्वरूप के स्मृति को मजबूत करने से हिसाब-किताब चुक्त करने में भी लाइट रुप हो जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी सफलता मूर्त आत्मा हूँ"*

 

   सभी अपने को स्वदर्शन चक्रधारी समझते हो, बाप की जितनी महिमा है, उसी महिमा स्वरुप बने हो? *जैसे बाप के हर कर्म चरित्र के रुप अभी भी गाये जाते हैं ऐसे आपके भी हर कर्म चरित्र समान हो रहे हैं? ऐसे चरित्रवान बने हो, कभी साधारण कर्म तो नहीं होते हैं?*

 

  *जो बाप के समान स्वदर्शन चक्रधारी बने हैं उनसे कभी भी साधारण कर्म हो नहीं सकते। जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता समाई हुई होगी। सफलता होगी या नहीं होगी, यह संकल्प भी नहीं उठ सकता। निश्चय होगा- सफलता हुई पड़ी है।*

 

 *स्वदर्शन चक्रधारी मायाजीत होंगे। मायाजीत होने के कारण सफलतामूर्त होंगे। और जो सफलतामूर्त होंगे वह सदा हर कदम में पद्मापद्मपति होंगे।* ऐसे पद्मापद्मपति अनुभव करते हो? इतनी कमाई जमा कर ली है जो 21 जन्मों तक चलती रहे सूर्यवंशी अर्थात् 21 जन्मों के लिए जमा करने वाले। तो सदा हर सेकेण्ड में जमा करते रहो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जो एक सेकण्ड में अपने संकल्प को जहाँ चाहे, जो सोचना चाहे वही सोच चलता रहे, ऐसे जो समझते हैं, वह हाथ उठाओ। *एक सेकण्ड में माइण्ड कन्ट्रोल हो जाए, ऐसे सेकण्ड में हो सकता है?* अगर कर सकते हो तो हाथ उठाओ।

 

✧  ऐसे कहने से नहीं, अगर कन्ट्रोल होता है तो हाथ उठाओ?

अच्छा जिन्होंने नहीं हाथ उठाया उन्हों को क्या एक मिनट लगता है? या उससे भी ज्यादा लगता है? *अभी यह अभ्यास वहुत जरूरी है क्योंकि अंत के समय यह अभ्यास वहुत काम में आयेगा।*

 

✧  जैसे इस शरीर के आरगन्स को, बाँह है, पाँव है, इनको सेकण्ड में जहाँ लेकर जाने चाहो वहाँ ले जा सकते हो ना! ऐसे मन-बुद्धि को भी मेरी कहते हो ना। *जब मन के मालिक हो, यह सूक्ष्म आरगन्स हैं, तो इसके ऊपर कन्ट्रोल क्यों नहीं?*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् साक्षात्कार कराने वाले।* जैसे अभी गोल्डन जुबली का दृश्य देखा। यह तो एक रमणीक पार्ट बजाया। लेकिन जब फाइनल दृश्य होगा उसमें तो आप साक्षात्कार कराने वाले होंगे या देखने वाले होंगे? क्या होंगे ? हीरो एक्टर हो ना! अभी इमर्ज करो वह दृश्य कैसा होगा। इसी अन्तिम दृश्य के लिए अभी से त्रिकालदर्शी बन देखो कि कैसा सुन्दर दृश्य होगा और कितने सुन्दर हम होंगे। *सजे-सजाये दिव्य गुणमूर्त फ़रिश्ते सो देवता, इसके लिए अभी से अपने को सदा फ़रिश्ते स्वरूप की स्थिति का अभ्यास करते हुए आगे बढ़ते चलो।* जो चार विशेष सब्जेक्ट हैं- ज्ञान मूर्त, निरन्तर यादमूर्त, सर्व दिव्यगुणमर्त, अथक सेवामूर्त- एक दिव्य गुण की भी कमी होगी तो १६ कला सम्पन्न नहीं कहेंगे। १६ कला, सर्व और सम्पूर्ण यह तीनों महिमा हैं। सर्वगुण सम्पन्न कहते हो, सम्पूर्ण निर्विकारी कहते हो और १६ कला सम्पन्न कहते हो। तीनों विशेषतायें चाहिएँ। *१६ कला अर्थात् सम्पन्न भी चाहिए, सम्पूर्ण भी चाहिए और सर्व भी चाहिए।* तो यह चेक करो। सुनाया था ना कि यह वर्ष बहुतकाल के हिसाब में जमा होने का है फिर बहुतकाल का हिसाब समाप्त हो जायेगा, फिर थोड़ा काल कहने में आयेगा, बहुतकाल नहीं। *बहुतकाल के पुरुषार्थ की लाइन में आ जाओ। तभी बहुतकाल का राज्य भाग्य प्राप्त करने के अधिकारी बनेंगे।* नहीं तो बहुत काल का राज्य भाग्य बदल कुछ कम राज्य भाग्य प्राप्त होने के अधिकारी बनेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पावन बनने के लिए याद की यात्रा में रहना"*

 

_ ➳  अमृतवेला का ये सुहानी पल रात के अँधेरे को ख़तम कर सुबह की रोशनी की ओर रुख कर रहा है... वैसे ही कलियुगी अंधियारे को चीरते हुए ये संगमयुग... सतयुग की ओर ले जा रहा है... *प्यारे बाबा जब से आयें हैं, संगम की हर घडी ही अमृतवेला बन गई है... जो सदा सुखों की ओर ले जाती है... हर पल ही कितना सुहावना हो गया है... इतनी पावन, सुन्दर वेला में मैं आत्मा प्यारे बाबा से प्यारी-प्यारी बातें करने पहुँच जाती हूँ पावन वतन में...*

 

  *मेरे मन मंदिर में अपनी मूरत बसाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... कितने मीठे खिले से महकते फूल से धरा पर उतरे थे पर खेलते खेलते काले पतित हो गए... *अब इस देह की दुनिया से निकल ईश्वर पिता की सोने सी यादो में स्वयं को उसी दिव्यता से दमकाओ क्योकि अब सुनहरी सुखो भरी दुनिया में चलना है...*

 

_ ➳  *निराकारी बाबा की यादों में स्वर्णिम सुखों को अपने नाम करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा अपने खोये रूप को सौंदर्य को आपकी यादो में पुनः पा रही हूँ... *कंचन काया और कंचन महल की अधिकारी बन रही हूँ और इस दुनिया से उपराम हो रही हूँ...*

 

  *अपने रूहानी नैनों से पावनता की खुशबू फैलाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *ईश्वर पिता के साथ का समय बहुत कीमती है... यादो में रहकर अपने सच्चे दमकते स्वरूप को पाकर सुखो की दुनिया में मुस्कराओ...* यादो में अपनी दिव्यता और शक्तियो को फिर से पाकर सुंदर तन और मन से सुन्दरतम दुनिया के रहवासी बनो...

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्रभु की यादों की धारा में बहकर सुन्दर कमल बन खिलते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपनी खोयी सुंदरता को पाकर मुस्करा रही हूँ...* दिव्य गुणो को धारण कर पवित्रता के श्रृंगार से सजकर देवताई स्वरूप में देवताओ की दुनिया घूम रही हूँ...

 

  *रूहानी यादों में मेरे मन के चमन को खिलाकर मेरे रूहानी बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *सिर्फ बाबा की यादे ही एकमात्र उपाय है जो इस पतित तन और मन को खुबसूरत और पवित्र बना सकता है... तो इस समय को यादो में भर दो... अपने पुरुषार्थ को तीव्र कर स्वयं को निखारने में पूरी तन्मयता से जुट जाओ...* क्योकि अब पवित्र दुनिया में चलने और सुख लेने का समय हो गया है...

 

_ ➳  *एक की लगन में मगन होकर जीवन में मिठास भरकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा जनमो के कालेपन को आपकी मीठी यादो में धो रही हूँ...* वही सुंदर देवताई स्वरूप पा रही हूँ और सुख और शांति की दुनिया की अधिकारी होकर मीठे सुखो में खिलखिला रही हूँ... *यादो में पावन बनकर खिल उठी हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- स्वयं की दृष्टि को पवित्र बनाने के लिए चलते फिरते आत्मिक दृष्टि का अभ्यास करना*"

 

_ ➳  "मैं शुद्ध पवित्र आत्मा हूँ" इस श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर सेट होते ही अपने सम्पूर्ण स्तोप्रधान अनादि स्वरूप में मैं स्थित हो जाती हूँ। *अपने इस सत्य स्वरूप की स्मृति में टिकते ही मैं अनुभव करती हूँ स्वयं को इस साकार देह में भृकुटि के मध्य विराजमान एक परम पवित्र चमकते हुए दिव्य सितारे के रूप में जिसमे पवित्रता की अनन्त शक्ति है*। देख रही हूँ मैं इस सितारे में से निकल रही पवित्रता की किरणों को जो मेरे मस्तक से निकल कर चारों ओर फैल रही हैं। मेरे चारों और पवित्रता की श्वेत रश्मियों का एक बहुत सुंदर औरा निर्मित हो गया है।

 

_ ➳  पवित्रता की किरणों से निर्मित श्वेत प्रकाश के कार्ब को धारण किये मैं आत्मा अब अपनी साकार देह से बाहर निकलती हूँ और चल पड़ती हूँ पवित्रता की उस दुनिया की ओर, जहाँ पतित पावन मेरे शिव पिता परमात्मा का निवास हैं। *सेकण्ड में पाँच तत्वों की  साकारी दुनिया को पार कर, मैं पहुँच जाती हूँ उस पवित्र लोक, ब्रह्मलोक में*। मैं देख रही हूँ अपने सामने पवित्रता के सागर, पतित पावन अपने प्राणेश्वर निराकार शिव पिता को, जिनसे निकल रही पवित्रता की श्वेत किरणें पूरे ब्रह्मलोक में फैल रही हैं। *पवित्रता की इन किरणो को स्वयं में समाते हुए मैं धीरे -धीरे अपने प्यारे बाबा के बिल्कुल नजदीक जा रही हूँ*।

 

_ ➳  जितना मैं बाबा के समीप जा रही हूँ उतना ही मेरे अंदर पवित्रता का प्रकाश बढ़ता जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे चारों और पवित्र योग की ज्वाला प्रज्वलित हो रही है और मैं आत्मा बाबा से निकलती ज्वाला स्वरूप पवित्र किरणों को ग्रहण कर रही हूँ। *योग अग्नि से निकलती इन पवित्र ज्वाला स्वरूप किरणों में मुझ आत्मा की अनेक जन्मों की अपवित्रता जल कर भस्म हो रही है*। साथ ही साथ मुझ आत्मा के अनेक जन्मों के विकर्म भी स्वाहा हो रहे हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे विकार बीज सहित दग्ध हो रहे हैं। *63 जन्मों से विकारों की अग्नि में जलती हुई मैं आत्मा योग अग्नि में तप कर अब स्वयं को सच्चे सोने के समान एक दम शुद्ध अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳  शुद्ध और पावन बन कर मैं आत्मा परमधाम से नीचे आती हूँ और सफेद प्रकाश से प्रकाशित फरिश्तो की आकारी दुनिया में प्रवेश करती हूँ। बापदादा के इस अव्यक्त वतन में आकर अपने लाइट के सम्पूर्ण फ़रिशता स्वरुप को मैं धारण करती हूँ और बापदादा के सामने पहुँच जाती हूँ। *बापदादा के लाइट माइट स्वरूप से पवित्रता का अनन्त प्रकाश निकल रहा है जिसकी किरणे पूरे सूक्ष्म लोक में फैल रही हैं*। चारों और फैला पवित्रता का यह प्रकाश, पवित्रता की शक्तिशाली किरणों के रूप में निरन्तर मुझ फ़रिश्ते में समा रहा है। *ऐसा लग रहा है जैसे एक तेज करेन्ट मेरे अंदर प्रवाहित हो रहा है जो मेरे अंदर विधमान अपवित्रता के अंश को भी जलाकर मुझे डबल लाइट बना रहा है*।

 

_ ➳  इस डबल लाइट स्थिति में मैं स्वयं को कमल आसन पर विराजमान पवित्रता के अवतार के रूप में देख रही हूँ जो पवित्रता की अनन्त शक्ति से भरपूर है। *इसी डबल लाइट स्वरूप के साथ अब मैं सूक्ष्म लोक से नीचे साकार लोक में आती हूँ और अपने शुद्ध, पवित्र अनादि ज्योति बिंदु स्वरुप को धारण कर, अपने साकार तन में प्रवेश कर अपने ब्राह्मण स्वरुप में स्थित हो जाती हूँ*। "मैं शुद्ध, पवित्र आत्मा हूँ" इसी "स्मृति की पवित्रता" द्वारा अपनी वृति और दृष्टि को पवित्र बनाकर, अपने सम्बन्ध, सम्पर्क में आने वाली सभी आत्माओ को उनके दैहिक स्वरूप में ना देखते हुए, उन्हें उनके परम पूज्य स्वरूप में देखने का फाउंडेशन अब मैं मजबूत कर रही हूँ।

 

_ ➳  स्वयं को सदा कमल आसन पर विराजमान अनुभव करते, लौकिक और अलौकिक दोनों परिवार के सम्पर्क में आते, सभी को परम पूज्य स्वरूप में देखने का अभ्यास मुझे सदा मेरे शुद्ध पवित्र स्वरूप में स्थित रखता है। *अपने शुध्द पवित्र स्वरुप में सदा स्थित रहने से, अपने मस्तक पर निरन्तर सफ़ेद मणि के समान चमकता हुआ पवित्रता का प्रकाश मुझे सदा अनुभव होता है जो मेरे चारों और पवित्रता का आभामंडल निर्मित कर, मुझे हर प्रकार की अपवित्रता से दूर रखता है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं हर संकल्प, हर बोल में पवित्रता का वाइब्रेशन समा कर ब्रह्माचारी बनने वाली ब्राह्मण आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं एक मिनट की एकाग्र स्थिति द्वारा शक्तिशाली अनुभव करने कराने वाली एकान्तवासी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सदा शक्तियों को कोई को 4 भुजा, कोई को 6 भुजा, कोई को 8 भुजा, कोई को 16 भुजासाधरण नही दिखाते है... यह *भुजाये सर्व शक्तियों का सूचक हैं... इसलिए सर्वशक्तिवान द्वारा प्राप्त अपनी शक्तियों को इमर्ज करो...* इसके लिए यह नही सोचो की समय आने पर इमर्ज हो जायेंगी लेकिन सारे दिन मे स्वयं प्रति भिन्न-भिन्न शक्तियाँ यूज करके देखो...

 

 _ ➳  सबसे पहला अभ्यास स्वराज्य अधिकार सारे दिन में कहाँ तक कार्य में लगता है? *मैं तो हूँ ही आत्मा मालिकयह नही... मालिक हो के आर्डर करो और चेक करो कि हर कर्मेंन्द्रियां मुझ राजा के लव और ला में चलते है?* आर्डर करें 'मनमनाभव' और मन जाये निगेटिव और वेस्ट थाट्स मेंक्या यह लव और ला रहा? आर्डर करें मधुरता स्वरूप बनना है और समस्या अनुसार, परिस्थिति अनुसार क्रोध का महारूप नही लेकिन सूक्ष्म रूप में भी आवेश वा चिड़चिड़ापन आ रहा हैक्या यह आर्डर है? आर्डर में हुआ? आर्डर करें *हमें निर्मान बनना है और वायुमण्डल अनुसार सोचो कहां तक दबकर चलेंगे, कुछ तो दिखाना चाहिए...* क्या मुझे ही दबना हैमुझे ही मरना है! मुझे ही बदलना है? क्या यह लव और आर्डर है

 

 _ ➳  इसलिए विश्व के ऊपरचिल्लाना वाले दुःखी आत्माओं के ऊपर रहम करने के पहले अपने ऊपर रहम करो... अपना अधिकार संम्भालो। *आगे चल आपको चारों ओर सकाश देने कावायब्रेशन देने कामन्सा द्वारा वायुमंडल बनाने का बहुत कार्य करना है...* पहले भी सुनाया की अभी तक जो जो जहां तक सेवा के निमित्त हैबहुत अच्छी की है और करेंगे भी लेकिन अभी समय प्रमाण तीव्रगति और बेहद सेवा की आवश्यकता है...

 

 _ ➳  *तो अभी पहले हर दिन को चेक करो 'स्वराज्य अधिकार' कहाँ तक रहा?* आत्मा मालिक होके कर्मेन्द्रियों को चलाये... स्मृति स्वरूप रहे की मैं मालिक इन साथियों से, सहयोगियों से कार्य करा रहा हूँ... *स्वरूप  नशा रहे तो स्वतः ही यह सब कर्मेन्द्रियां आपके आगे जी हाजिरजी हजूर स्वतः ही करेंगी...* मेहनत नही करनी पडेगी... आज व्यर्थ संकल्प को मिटाओ, आज संस्कार को मिटाओआज निर्णय शक्ति को प्रगट करो... एक धक से सब कर्मेन्द्रियां और मन-बुद्धि-संस्कार जो आप चाहते है वह करेंगी...

 

✺   *ड्रिल :-  "कर्मेन्द्रियों को लव और ला से चलाकर स्वराज्य अधिकारी बनने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अपनी सोई हुई सर्वशक्तियों को पुनः जागृत कर, सर्व शक्ति सम्पन्न स्वरूप बनने के लिए मैं अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित हो कर, सर्वशक्तिवान शिव पिता परमात्मा की याद में बैठ जाती हूँ... और सेकण्ड में अशरीरी बन, अपनी साकारी देह से बाहर निकल कर, सर्वशक्तिवान अपने शिव पिता परमात्मा के पास चल पड़ती हूँ... *मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं स्पष्ट देख रही हूँ एक ज्योति पुंज भृकुटि सिहांसन से निकल कर, चारों और प्रकाश फैलाता हुआ ऊपर आकाश की ओर जा रहा है...* आकाश को पार करके, उससे परे सूक्ष्म लोक को पार करके मैं ज्योति पुंज, प्वाइंट ऑफ लाइट पहुंच गई लाल प्रकाश की दुनिया परमधाम में...

 

 _ ➳  स्वयं को देख रही हूँ मैं सर्वशक्तिवान शिव पिता परमात्मा के सम्मुख जिनसे निकल रही सर्वशक्तियों का प्रकाश मुझ आत्मा पर पड़ रहा हैं... *सर्वशक्तियों के इस प्रकाश के मुझ आत्मा पर पड़ते ही, मेरी सोई हुई शक्तियां पुनः इमर्ज हो रही हैं...* स्वयं को मैं सातों गुणों और अष्ट शक्तियों से सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ... सर्वशक्तियों से सम्पन्न हो कर अब मैं परमधाम से नीचे सूक्ष्म लोक में प्रवेश कर रही हूँ और अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर मे विराजमान हो कर बापदादा के पास जा रही हूँ...

 

 _ ➳  अपने सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ अब मैं बापदादा के सामने उपस्थित हूँ और देख रही हूं बापदादा से अलग - अलग शक्ति की अलग अलग - लाइट निकल रही है... एक - एक शक्ति की लाइट जैसे - जैसे मुझ पर पड़ रही है वैसे - वैसे मेरे सूक्ष्म शरीर पर उस शक्ति की सूचक भुजा निर्मित होती जा रही हैं... *देखते ही देखते अष्ट शक्तियों की अष्ट भुजायें मुझमें निर्मित हो गई है और मेरा स्वरूप अष्ट भुजाधारी दुर्गा का बन गया है...* अपने इसी अष्ट भुजाधारी स्वरूप के साथ अब मैं सूक्ष्म लोक से वापिस साकारी लोक में आकर अपने ब्राह्मण स्वरूप में प्रवेश कर रही हूँ...

 

 _ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं अपने अष्ट भुजाधारी स्वरूप को सदैव स्मृति में रख समय और परिस्थिति के अनुसार उचित समय पर उचित शक्ति का प्रयोग करके सहज ही मायाजीत बन रही हूँ... *अपने सर्वशक्ति सम्पन्न स्वरूप को सदैव इमर्ज रखने के लिए अब मैं हर कर्म स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सेट हो कर कर रही हूँ...* "इस शरीर रूपी रथ पर विराजमान मैं आत्मा राजा हूँ" इस स्मृति में रहने से अब हर कर्मेन्द्रिय मेरी इच्छानुसार कार्य कर रही है... *सदा स्मृति स्वरूप रहने से अब हर कर्मेन्द्रिय मेरी साथी और सहयोगी बन गई है...*

 

 _ ➳  सदैव मालिक पन के नशे में रहने से सर्व कर्मेन्द्रियां मेरे आगे जी हाजिरजी हजूर करने लगी है... *अब व्यर्थ संकल्पो, पुराने स्वभाव संस्कारों को मिटाने में मुझे मेहनत नही करनी पड़ रही, बल्कि स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सेट रहने से परखने और निर्णय करने की शक्ति सहज ही प्रगट हो रही है...* इसलिए परख कर उचित समय पर उचित निर्णय लेने से अब हर कार्य मे मैं सहज ही सफ़लतामूर्त बन रही हूँ... मन बुद्धि की लगाम अपने हाथ मे लेकर अब मैं अपने मन बुद्धि को जहां चाहूँ वहां लगा कर सर्व प्राप्ति सम्पन्न स्वरूप बन गई हूँ... *अपने इस ब्राह्मण जीवन मे कर्मेन्द्रियों को लव और ला से चलाकर स्वराज्य अधिकारी बनने का अनुभव अब मैं निरन्तर कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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