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 08 / 01 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *श्रीमत में मानमत मिक्स तो नहीं की ?*

 

➢➢ *एक दो को सच्चा मान दिया ?*

 

➢➢ *रूहानी एक्सरसाइज और सेल्फ कण्ट्रोल द्वारा महीनता का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *हर सेकंड, हर कदम श्रीमत पर एक्यूरेट रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जितना अव्यक्त लाइट रुप में स्थित होंगे, उतना शरीर से परे का अभ्यास होने के कारण यदि दो-चार मिनट भी अशरीरी बन जायेंगे, तो मानों जैसे कि चार घण्टे का आराम कर लिया। *ऐसा समय आयेगा जो नींद के बजाए चार-पाँच मिनट अशरीरी बन जायेंगे और शरीर को आराम मिल जायेगा। लाइट स्वरूप के स्मृति को मजबूत करने से हिसाब-किताब चुक्त करने में भी लाइट रुप हो जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी सफलता मूर्त आत्मा हूँ"*

 

   सभी अपने को स्वदर्शन चक्रधारी समझते हो, बाप की जितनी महिमा है, उसी महिमा स्वरुप बने हो? *जैसे बाप के हर कर्म चरित्र के रुप अभी भी गाये जाते हैं ऐसे आपके भी हर कर्म चरित्र समान हो रहे हैं? ऐसे चरित्रवान बने हो, कभी साधारण कर्म तो नहीं होते हैं?*

 

  *जो बाप के समान स्वदर्शन चक्रधारी बने हैं उनसे कभी भी साधारण कर्म हो नहीं सकते। जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता समाई हुई होगी। सफलता होगी या नहीं होगी, यह संकल्प भी नहीं उठ सकता। निश्चय होगा- सफलता हुई पड़ी है।*

 

 *स्वदर्शन चक्रधारी मायाजीत होंगे। मायाजीत होने के कारण सफलतामूर्त होंगे। और जो सफलतामूर्त होंगे वह सदा हर कदम में पद्मापद्मपति होंगे।* ऐसे पद्मापद्मपति अनुभव करते हो? इतनी कमाई जमा कर ली है जो 21 जन्मों तक चलती रहे सूर्यवंशी अर्थात् 21 जन्मों के लिए जमा करने वाले। तो सदा हर सेकेण्ड में जमा करते रहो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जो एक सेकण्ड में अपने संकल्प को जहाँ चाहे, जो सोचना चाहे वही सोच चलता रहे, ऐसे जो समझते हैं, वह हाथ उठाओ। *एक सेकण्ड में माइण्ड कन्ट्रोल हो जाए, ऐसे सेकण्ड में हो सकता है?* अगर कर सकते हो तो हाथ उठाओ।

 

✧  ऐसे कहने से नहीं, अगर कन्ट्रोल होता है तो हाथ उठाओ?

अच्छा जिन्होंने नहीं हाथ उठाया उन्हों को क्या एक मिनट लगता है? या उससे भी ज्यादा लगता है? *अभी यह अभ्यास वहुत जरूरी है क्योंकि अंत के समय यह अभ्यास वहुत काम में आयेगा।*

 

✧  जैसे इस शरीर के आरगन्स को, बाँह है, पाँव है, इनको सेकण्ड में जहाँ लेकर जाने चाहो वहाँ ले जा सकते हो ना! ऐसे मन-बुद्धि को भी मेरी कहते हो ना। *जब मन के मालिक हो, यह सूक्ष्म आरगन्स हैं, तो इसके ऊपर कन्ट्रोल क्यों नहीं?*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् साक्षात्कार कराने वाले।* जैसे अभी गोल्डन जुबली का दृश्य देखा। यह तो एक रमणीक पार्ट बजाया। लेकिन जब फाइनल दृश्य होगा उसमें तो आप साक्षात्कार कराने वाले होंगे या देखने वाले होंगे? क्या होंगे ? हीरो एक्टर हो ना! अभी इमर्ज करो वह दृश्य कैसा होगा। इसी अन्तिम दृश्य के लिए अभी से त्रिकालदर्शी बन देखो कि कैसा सुन्दर दृश्य होगा और कितने सुन्दर हम होंगे। *सजे-सजाये दिव्य गुणमूर्त फ़रिश्ते सो देवता, इसके लिए अभी से अपने को सदा फ़रिश्ते स्वरूप की स्थिति का अभ्यास करते हुए आगे बढ़ते चलो।* जो चार विशेष सब्जेक्ट हैं- ज्ञान मूर्त, निरन्तर यादमूर्त, सर्व दिव्यगुणमर्त, अथक सेवामूर्त- एक दिव्य गुण की भी कमी होगी तो १६ कला सम्पन्न नहीं कहेंगे। १६ कला, सर्व और सम्पूर्ण यह तीनों महिमा हैं। सर्वगुण सम्पन्न कहते हो, सम्पूर्ण निर्विकारी कहते हो और १६ कला सम्पन्न कहते हो। तीनों विशेषतायें चाहिएँ। *१६ कला अर्थात् सम्पन्न भी चाहिए, सम्पूर्ण भी चाहिए और सर्व भी चाहिए।* तो यह चेक करो। सुनाया था ना कि यह वर्ष बहुतकाल के हिसाब में जमा होने का है फिर बहुतकाल का हिसाब समाप्त हो जायेगा, फिर थोड़ा काल कहने में आयेगा, बहुतकाल नहीं। *बहुतकाल के पुरुषार्थ की लाइन में आ जाओ। तभी बहुतकाल का राज्य भाग्य प्राप्त करने के अधिकारी बनेंगे।* नहीं तो बहुत काल का राज्य भाग्य बदल कुछ कम राज्य भाग्य प्राप्त होने के अधिकारी बनेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ब्राहमण सो देवता बनने के नशे में रहना"*

 

_ ➳  *अमृतवेले के रूहानी समय में मैं आत्मा बगीचे के झूले में बाबा की गोदी में बैठी हूँ... बाबा की गोदी के झूले में झूलती हुई उनके रूहानी प्यार में समाती जा रही हूँ...* अभी तक जिस भगवान को ढूंढ रही थी, दुनिया वाले जिसे अभी भी ढूंढ रहे हैं, अब मैं भाग्यशाली आत्मा उनकी गोद में बैठ उनकी पालना और शिक्षाएं ले रही हूँ... मीठे बाबा प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मुझे वरदानों, खजानों से भरपूर करते हैं... *मैं आत्मा बाबा का दिल से शुक्रिया करती हुई उनसे रूह-रिहान करती हूँ... बाबा मुझे अपनी श्रेष्ठ मत देकर श्रेष्ठ बनाते हैं...*

 

  *प्यार के मीठे तराने सुनाकर प्रेम रस में मुझे भिगोते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... साधारण मनुष्य मात्र से खुबसूरत देवताई राज्य भाग्य वाले... महानतम भाग्य को पा रहे हो... तो श्रीमत के हाथ को सदा थाम कर दिल से शुक्रिया के नगमे गुनगुनाते रहो... *सच्चे प्यार के सागर से हर पल प्रेम सुधा का रसपान करो... और रूहानी प्रेम की बदली बन विश्व धरा को सिक्त करो...."*

 

_ ➳  *प्यारे प्रभु का साथ पाकर उनके हाथों में हाथ डालकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपके सच्चे प्यार की चन्दन महक में खोयी सी विश्व धरा को प्रेम तरंगो से सराबोर कर रही हूँ... *श्रीमत के मखमली हाथो में बेफिक्र सी खुशियो के अनन्त आसमाँ में झूम रही हूँ... सच्चे प्रेम में खोकर मदमस्त हो गई हूँ..."*

 

  *प्यार के चन्दन से मेरे जीवन फुलवारी को महकाकर खुशियों से मेरी झोली भरते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... जिस ईश्वर पिता की खोज में दर दर भटक रहे थे... *आज उनकी फूलो सी गोद में देवताई स्वरूप को पा रहे हो... तो ऐसे मीठे बाबा पर दिल का सारा स्नेह उंडेल कर... सच्चे प्रेम का पर्याय बन जाओ... श्रीमत को दिल की गहराइयो से अपनाकर जीवन को सुखो के स्वर्ग में बदल दो..."*

 

_ ➳  *बाबा की श्रीमत पर चलते हुए दैवीय गुणों की धारणा करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा आपकी बाँहों में अनन्त सुखो की हकदार हो गई हूँ... प्यारे बाबा सुख की एक बून्द को कभी व्याकुल *मै आत्मा,आज आपकी यादो में देवताओ सा निखर रही हूँ...मनुष्य मत पर पाये दुखो के दलदल से निकल श्रीमत से सम्पूर्ण सुखी हो गयी हूँ..."*

 

  *अपने पलकों पर बिठाकर मेरे भाग्य को संवारते हुए मीठे प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता मनुष्य से देवताओ सा श्रृंगार कर... स्वर्गधरा पर सजा रहे है... *ऐसे मीठे पिता का रोम रोम से शुक्रिया कर... सच्चे प्यार से दिल, सदा का आबाद करो... सच्ची मत को अपनाकर... दिव्यता से सम्पन्न हो, अनोखे सुखो को दामन में भर लो..."*

 

_ ➳  *बाबा के प्यार की लहरों में लहराती हुई स्वर्ग सुखों की अधिकारी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... *मैं आत्मा किन शब्दों में आपकी दरियादिली का शुक्रिया करूँ... मीठे बाबा मेरे, मै आत्मा तो दुखो को ही अपनी तकदीर मान ली थी... आपने तो मुझे देवतुल्य बना दिया है...* और असीम मीठे सुखो से मेरा जीवन संवार दिया है..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपनी मनमत पर नही चलना है*"

 

_ ➳  आबू की ऊँची पहाड़ी पर, अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ, प्रकृति के सुंदर नजारो का मैं आनन्द ले रही हूँ और प्यार के सागर बाबा के प्यार की किरणों रूपी बाहों के आगोश में समा कर बाबा के प्यार की गहराई को अनुभव कर, मन ही मन आनंदित हो रही हूँ। *जैसे एक माँ अपने बच्चे के ऊपर अपना सारा स्नेह उड़ेलती हुई बलिहार जाती है ऐसे अपने शिव पिता को भी माँ के रुप अनुभव करते, अपने ऊपर बरसने वाले उनके स्नेह में समाई ममता को मैं महसूस कर रही हूँ*। यह ममतामई स्नेह की अनुभूति मुझे देह से न्यारा बना रही है।

 

_ ➳  देह से बिल्कुल अलग एक चमकता हुआ चैतन्य सितारा बन अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों के झूले में झूलता हुआ अब मैं स्वयं को देख रही हूँ। *ऐसा लग रहा है जैसे शिव माँ अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों के झूले में झुलाती हुई मीठी लोरी देकर मुझे सुला रही है*। और मैं धीेरे - धीरे नींद के आगोश में समाती जा रही हूँ। *अर्धनिद्रा की अवस्था मे स्वयं को अब मैं अपने लाइट माइट स्वरूप में एक नन्हे से छोटे से बच्चे के रूप में देख रही हूँ*।

 

_ ➳  बापदादा अपनी गोद मे मुझे बिठाकर बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए अपने हाथ से मुझे टोली खिला रहें हैं। *मेरे साथ मीठी मीठी रूह रिहान कर रहें हैं। मेरा हाथ थामे आबू की पहाड़ी की सैर करवा रहें हैं। मेरे साथ अलग - अलग तरह से खेल पाल कर रहें हैं*। बापदादा के कम्बाइंड स्वरूप में अपनी शिव माँ की शक्तियों की किरणों के आंचल में बैठ उनकी ममतामयी गोद का सुख और अपने ब्रह्मा बाप का लाड़ - प्यार पाकर मन ही मन अपने इस सर्वश्रेष्ठ भाग्य पर मैं गौरान्वित हो रहा हूँ।

 

_ ➳  अपने नन्हे बालक स्वरूप में बापदादा से माँ बाप दोनों की कम्बाइंड पालना का असीम सुख लेकर अपने बालक स्वरूप से अपने सम्पूर्ण फ़रिश्ता स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं बापदादा के साथ उनके अव्यक्त वतन की ओर जा रहा हूँ। *आबू की पहाड़ी से उड़कर सारे विश्व का भ्रमण करते हुए बापदादा के साथ मैं फ़रिश्ता अब साकार लोक को पार कर, उससे और ऊपर फ़रिशतो की अव्यक्त दुनिया मे प्रवेश करता हूँ* और फ़रिशतो की दुनिया के अति सुंदर नजारों का आनन्द लेते हुए जा कर प्यारे बापदादा के साथ बैठ जाता हूँ।

 

_ ➳  अपनी शक्तिशाली दृष्टि से मुझे भरपूर करके बाबा मुझे "बालक सो मालिक" का टाइटल देते हुए बालक सो मालिकपन के बैलेंस द्वारा हर कार्य मे सदा सफलता प्राप्त करने का वरदान देते हैं। *बाबा से विजय का तिलक लेते हुए मन ही मन अब मैं बाबा को वचन देता हूँ कि सदा बालक सो मालिकपन की स्मृति में रहते हुए बालक बन बाबा की उंगली थामे कदम - कदम पर बाबा की मत पर चलते हुए, बाबा से मिले सर्व खजानों, सर्व गुणों और सर्व शक्तियों को मालिक बन यूज़ करूँगा*। अपनी मनमत पर कभी नही चलूँगा।

 

_ ➳  बाबा को मन ही मन यह वचन दे कर, उसे पूरा करने के लिए अब मैं अपने सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ वापिस साकारी दुनिया में आ जाता हूँ और अपने साकारी तन में आ कर विराजमान हो जाता हूँ। अपने ब्राह्मण स्वरूप में रहते हुए अब मैं सदा बालक सो मालिकपन की स्मृति में रहते हुए हर कर्म कर रही हूँ। *बालक बन हाँजी का पाठ पक्का कर बाबा की शिक्षाओं को मान कर, मालिक बन उन्हें अपने जीवन मे धारण कर रही हूँ। अपनी मनमत पर कभी ना चलते हुए केवल एक बाबा की मत पर चलकर, अपने कर्मो को श्रेष्ठ बना कर अब मैं स्वयं के साथ -साथ अनेकों आत्माओं का भी कल्याण कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं रूहानी एक्सरसाइज और सेल्फ कन्ट्रोल द्वारा महीनता का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं फरिश्ता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हर सेकंड, हर कदम श्रीमत पर एक्यूरेट चलती हूँ  ।*

   *मैं महान आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा आज्ञाकार हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सदा शक्तियों को कोई को 4 भुजा, कोई को 6 भुजा, कोई को 8 भुजा, कोई को 16 भुजासाधरण नही दिखाते है... यह *भुजाये सर्व शक्तियों का सूचक हैं... इसलिए सर्वशक्तिवान द्वारा प्राप्त अपनी शक्तियों को इमर्ज करो...* इसके लिए यह नही सोचो की समय आने पर इमर्ज हो जायेंगी लेकिन सारे दिन मे स्वयं प्रति भिन्न-भिन्न शक्तियाँ यूज करके देखो...

 

 _ ➳  सबसे पहला अभ्यास स्वराज्य अधिकार सारे दिन में कहाँ तक कार्य में लगता है? *मैं तो हूँ ही आत्मा मालिकयह नही... मालिक हो के आर्डर करो और चेक करो कि हर कर्मेंन्द्रियां मुझ राजा के लव और ला में चलते है?* आर्डर करें 'मनमनाभव' और मन जाये निगेटिव और वेस्ट थाट्स मेंक्या यह लव और ला रहा? आर्डर करें मधुरता स्वरूप बनना है और समस्या अनुसार, परिस्थिति अनुसार क्रोध का महारूप नही लेकिन सूक्ष्म रूप में भी आवेश वा चिड़चिड़ापन आ रहा हैक्या यह आर्डर है? आर्डर में हुआ? आर्डर करें *हमें निर्मान बनना है और वायुमण्डल अनुसार सोचो कहां तक दबकर चलेंगे, कुछ तो दिखाना चाहिए...* क्या मुझे ही दबना हैमुझे ही मरना है! मुझे ही बदलना है? क्या यह लव और आर्डर है

 

 _ ➳  इसलिए विश्व के ऊपरचिल्लाना वाले दुःखी आत्माओं के ऊपर रहम करने के पहले अपने ऊपर रहम करो... अपना अधिकार संम्भालो। *आगे चल आपको चारों ओर सकाश देने कावायब्रेशन देने कामन्सा द्वारा वायुमंडल बनाने का बहुत कार्य करना है...* पहले भी सुनाया की अभी तक जो जो जहां तक सेवा के निमित्त हैबहुत अच्छी की है और करेंगे भी लेकिन अभी समय प्रमाण तीव्रगति और बेहद सेवा की आवश्यकता है...

 

 _ ➳  *तो अभी पहले हर दिन को चेक करो 'स्वराज्य अधिकार' कहाँ तक रहा?* आत्मा मालिक होके कर्मेन्द्रियों को चलाये... स्मृति स्वरूप रहे की मैं मालिक इन साथियों से, सहयोगियों से कार्य करा रहा हूँ... *स्वरूप  नशा रहे तो स्वतः ही यह सब कर्मेन्द्रियां आपके आगे जी हाजिरजी हजूर स्वतः ही करेंगी...* मेहनत नही करनी पडेगी... आज व्यर्थ संकल्प को मिटाओ, आज संस्कार को मिटाओआज निर्णय शक्ति को प्रगट करो... एक धक से सब कर्मेन्द्रियां और मन-बुद्धि-संस्कार जो आप चाहते है वह करेंगी...

 

✺   *ड्रिल :-  "कर्मेन्द्रियों को लव और ला से चलाकर स्वराज्य अधिकारी बनने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अपनी सोई हुई सर्वशक्तियों को पुनः जागृत कर, सर्व शक्ति सम्पन्न स्वरूप बनने के लिए मैं अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित हो कर, सर्वशक्तिवान शिव पिता परमात्मा की याद में बैठ जाती हूँ... और सेकण्ड में अशरीरी बन, अपनी साकारी देह से बाहर निकल कर, सर्वशक्तिवान अपने शिव पिता परमात्मा के पास चल पड़ती हूँ... *मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं स्पष्ट देख रही हूँ एक ज्योति पुंज भृकुटि सिहांसन से निकल कर, चारों और प्रकाश फैलाता हुआ ऊपर आकाश की ओर जा रहा है...* आकाश को पार करके, उससे परे सूक्ष्म लोक को पार करके मैं ज्योति पुंज, प्वाइंट ऑफ लाइट पहुंच गई लाल प्रकाश की दुनिया परमधाम में...

 

 _ ➳  स्वयं को देख रही हूँ मैं सर्वशक्तिवान शिव पिता परमात्मा के सम्मुख जिनसे निकल रही सर्वशक्तियों का प्रकाश मुझ आत्मा पर पड़ रहा हैं... *सर्वशक्तियों के इस प्रकाश के मुझ आत्मा पर पड़ते ही, मेरी सोई हुई शक्तियां पुनः इमर्ज हो रही हैं...* स्वयं को मैं सातों गुणों और अष्ट शक्तियों से सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ... सर्वशक्तियों से सम्पन्न हो कर अब मैं परमधाम से नीचे सूक्ष्म लोक में प्रवेश कर रही हूँ और अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर मे विराजमान हो कर बापदादा के पास जा रही हूँ...

 

 _ ➳  अपने सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ अब मैं बापदादा के सामने उपस्थित हूँ और देख रही हूं बापदादा से अलग - अलग शक्ति की अलग अलग - लाइट निकल रही है... एक - एक शक्ति की लाइट जैसे - जैसे मुझ पर पड़ रही है वैसे - वैसे मेरे सूक्ष्म शरीर पर उस शक्ति की सूचक भुजा निर्मित होती जा रही हैं... *देखते ही देखते अष्ट शक्तियों की अष्ट भुजायें मुझमें निर्मित हो गई है और मेरा स्वरूप अष्ट भुजाधारी दुर्गा का बन गया है...* अपने इसी अष्ट भुजाधारी स्वरूप के साथ अब मैं सूक्ष्म लोक से वापिस साकारी लोक में आकर अपने ब्राह्मण स्वरूप में प्रवेश कर रही हूँ...

 

 _ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं अपने अष्ट भुजाधारी स्वरूप को सदैव स्मृति में रख समय और परिस्थिति के अनुसार उचित समय पर उचित शक्ति का प्रयोग करके सहज ही मायाजीत बन रही हूँ... *अपने सर्वशक्ति सम्पन्न स्वरूप को सदैव इमर्ज रखने के लिए अब मैं हर कर्म स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सेट हो कर कर रही हूँ...* "इस शरीर रूपी रथ पर विराजमान मैं आत्मा राजा हूँ" इस स्मृति में रहने से अब हर कर्मेन्द्रिय मेरी इच्छानुसार कार्य कर रही है... *सदा स्मृति स्वरूप रहने से अब हर कर्मेन्द्रिय मेरी साथी और सहयोगी बन गई है...*

 

 _ ➳  सदैव मालिक पन के नशे में रहने से सर्व कर्मेन्द्रियां मेरे आगे जी हाजिरजी हजूर करने लगी है... *अब व्यर्थ संकल्पो, पुराने स्वभाव संस्कारों को मिटाने में मुझे मेहनत नही करनी पड़ रही, बल्कि स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सेट रहने से परखने और निर्णय करने की शक्ति सहज ही प्रगट हो रही है...* इसलिए परख कर उचित समय पर उचित निर्णय लेने से अब हर कार्य मे मैं सहज ही सफ़लतामूर्त बन रही हूँ... मन बुद्धि की लगाम अपने हाथ मे लेकर अब मैं अपने मन बुद्धि को जहां चाहूँ वहां लगा कर सर्व प्राप्ति सम्पन्न स्वरूप बन गई हूँ... *अपने इस ब्राह्मण जीवन मे कर्मेन्द्रियों को लव और ला से चलाकर स्वराज्य अधिकारी बनने का अनुभव अब मैं निरन्तर कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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