━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 08 / 02 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपना चार्ट देखा की अपनी भाई भाई की दृष्टि कहाँ तक रहती है ?*

 

➢➢ *अपनी जुबां पर कण्ट्रोल रखा ?*

 

➢➢ *हर घड़ी को अंतिम घड़ी समझ सदा एवररेडी रहे ?*

 

➢➢ *ला अपने हतः में तो नहीं उठाया ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  एक तरफ मन्सा सेवा दूसरे तरफ मन्सा एक्सरसाइज। अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता। जैसे शरीर का नाम पक्का है। दूसरे को भी कोई बुलायेगा तो आप ऐसे-ऐसे करेंगे। तो *मैं आत्मा हूँ, आत्मा का संसार बापदादा, आत्मा का संस्कार ब्राह्मण सो फरिश्ता, फरिश्ता सो देवता। तो यह मन की ड्रिल करना। मैं आत्मा, मेरा बाबा।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारा और एक बाप के प्यारा हूँ"*

 

 सदा अपने को कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारे और एक बाप के प्यारे, ऐसा अनुभव करते हो? *जो न्यारा वही प्यारा और जो प्यारा वही न्यारा।* तो कमल समान हो या वातावरण में रहकर उसके प्रभाव में आ जाते हो? जहाँ भी जो भी पार्ट बजा रहे हो वहाँ पार्ट बजाते पार्ट से सदा न्यारे रहते हो या पार्ट के प्यारे बन जाते हो, क्या होता है?

 

  कभी योग लगता, कभी नहीं लगता इसका भी कारण क्या है? न्यारेपन की कमी। *न्यारे न होने के कारण प्यार का अनुभव नहीं होता। जहाँ प्यार नहीं वहाँ याद कैसे आयेगी! जितना ज्यादा प्यार उतना ज्यादा याद। बाप के प्यार के बजाए दूसरों के प्यारे हो जाते हो तो बाप भूल जाता है। पार्ट से न्यारा और बाप का प्यारा बनो, यही लक्ष्य और प्रैक्टिकल जीवन हो।* लौकिक में पार्ट बजाते प्यारे बने तो प्यार का रिटर्न क्या मिला? कांटों की शैया ही मिली ना! बाप के प्यार में रहने से सेकण्ड में क्या मिलता है? अनेक जन्मों का अधिकार प्राप्त हो जाता है। तो सदा पार्ट बजाते हुए न्यारे रहो।

 

  *सेवा के कारण पार्ट बजा रहे हो। सम्बन्ध के आधार पर पार्ट नहीं, सेवा के सम्बन्ध से पार्ट। देह के सम्बन्ध में रहने से नुकसान है, सेवा का पार्ट समझ कर रहो तो न्यारे रहेंगे। अगर प्यार दो तरफ है तो एकरस स्थिति का अनुभव नहीं हो सकता है।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  बापदादा वाली एक्सरसाइज याद है? *अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता। यह है चलते-फिरते बाप और दादा के प्यार का रिटेन तो अभी-अभी यह रूहानी एक्सरसाइज करो।*

 

✧  सेकण्ड में निराकारी, सेकण्ड में फरिश्ता (बापदादा ने ड़िल कराई) अच्छा - *चलते-फिरते सारे दिन में यह एक्सरसाइज बाप की सहज याद दिलायेगी।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  *सिर्फ बिंदु और एक , उसके आगे विस्तार में जाने की दरकार नही हैं। विस्तार में जाना हैं तो सर्विस प्रति।* अगर सर्विस नही तो बिंदु और एक। उसके आगे अपनी बुद्धि को चलाने की अधिक आवश्यकता नही हैं।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अभी सबकी वानप्रस्थ अवस्था है, अब वाणी से परे घर जाना है"*

 

_ ➳  *अमृतवेले के रूहानी समय में मेरे लाडले बच्चे कह, मीठे बाबा अपनी मीठी आवाज से मुझे जगाते हैं... प्यारे बाबा के प्यारे मधुर स्वर कानों में गूंजते ही मैं आत्मा उठकर बैठ जाती हूँ और प्यारे बाबा को गुड मॉर्निंग कहकर उनकी बाँहों में सिमट जाती हूँ...* प्यारे बाबा मुझे अपनी गोद में उठाकर मधुबन की पहाड़ियों पर ले जाते हैं और आसमान में एक सीन इमर्ज कर इस सृष्टि नाटक को दिखाते हैं... कैसे मैं आत्मा परमधाम से इस सृष्टि पर पार्ट बजाने आई...? सतोप्रधान से तमोप्रधान कैसे बनी...? और अब मुझे फिर से सतोप्रधान, पावन बनकर घर वापिस जाना है... 

 

  *वाणी से परे शांति की दुनिया शांतिधाम के नज़ारे दिखाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... अब ईश्वरीय गोद में बैठे हो... तो हर मेहनत से मुक्त हो... अब भक्त नही हो अधिकारी बच्चे हो... *अब मांगना नही है हक से अधिकार लेना है... महिमा गानी नही है महिमा योग्य बन कर बाप दादा को दिखाना है... अब आवाज नही आवाज से परे अपने निज स्वरूप का आनंद लेना है... और ख़ुशी से मुस्कराना है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा वानप्रस्थी बन मीठे बाबा की यादों में मगन होकर कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में देह भान से परे हो अतीन्द्रिय सुख में डूब गयी हूँ... *मन की गुफा में बैठी सीधे बापदादा के दिल पर मीठी सी दस्तक दे रही हूँ... और यादो में हर मेहनत से मुक्त होकर आसमानों में उड़ रही हूँ...*

 

  *अपने प्यार की मीठी डोर से मुझे बांधकर अपने दिल में बिठाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *जब पिता परमधाम में था तो बहुत पुकारा अब जो पिता सम्मुख है इतना करीब है तो दूरियां खत्म होकर मीठी मीठी नजदीकियां है...* अब दिल का गहरा नाता है और यादो में इशारो की मूक अभियक्ति है... और भीतर ही भीतर सुनने सुनाने का दिल को नशा सा छाया है...

 

_ ➳  *मीठे बाबा की याद में डूबकर शांतिधाम की शांति को अपने अन्दर समाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा...मै आत्मा मुख के मौन में डूबी ईश्वरीय प्यार का आनन्द ले रही हूँ... *मीठे बाबा ने मुझे हर मेहनत से छुड़ा दिया है... हर थकान से छुड़ाकर मुझे मीठे सुख भरा सुकून का जीवन दे दिया है... और आवाज से परे पर दिल से करीब का राज सिखा दिया है...*

 

  *वंडरफुल रूहानी धाम में ले जाने के लिए पुरुषार्थ की युक्तियाँ बताते हुए वंडरफुल रूहानी बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... हजार हाथो से ईश्वर पिता सामने है जितने चाहे उतने खजाने अपने नाम लिखवा सकते हो... *अब दया करुणा की बात नही अधिकारीपन का नशा है... तो फिर यह पुकार कैसी... अब तो दिल ही दिल में गुफ़्तुगू का ईश्वरीय मौसम छाया है... इस ईश्वरीय प्यार के समन्दर में बस डूब जाओ...*

 

_ ➳  *सुहाने सफ़र की तैयारियों में जुटकर स्वयं को खजानों से सजाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा ईश्वरीय प्यार में इस कदर खोयी हूँ कि भीतर ही भीतर गहरी बाबा के दिल में समा गयी हूँ...* अब मै आत्मा इशारो में प्रियतम बाबा को प्यार करने का हुनर सीख गयी हूँ... पुकारो से मुक्त हूँ...

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपनी पढ़ाई का रजिस्टर रखना है*

 

_ ➳  अंतर्मुखता की गुफा में बैठ, अपने प्यारे शिव बाबा को याद करते - करते मैं अपने आप से बात करती हूँ कि जिस भगवान को पाने के लिए दुनिया यहाँ - वहाँ भटक रही है वो भगवान मुझे कितनी सहज रीति मिल गए और स्वयं आकर स्वयं से मिलने का कितना सहज रास्ता भी बता दिया। *63 जन्मों से आत्मा जिनके दर्शनो की प्यासी थी वो स्वयं आकर मेरे इन नयनो में समा गये तो ऐसे भगवान बाप पर मुझे कितना ना बलिहार जाना चाहिए! उनकी निरन्तर याद में रह, विकर्मों के खाते को अब मुझे जल्दी ही चुकतू कर लेना चाहिए*।

 

_ ➳  यह चिंतन करते हुए अब मैं अपने आप से सवाल करती हूँ कि बाबा ने 8 घण्टे की याद का जो लक्ष्य हम बच्चों को दिया है तो क्या मैं उस लक्ष्य पर चलने का पुरुषार्थ कर रही हूँ! यह चेकिंग करने के लिए मुझे याद का रजिस्टर रखना होगा। *एक व्यापारी भी अपना मुनाफा और नुकसान देखने के लिए पूरा पोतामेल रखता है और हर चीज रजिस्टर में नोट करता है। तो जब हद का विनाशी धन कमाने वाले व्यापारी भी रजिस्टर रख अपने मुनाफे और नफे का सारा रिकार्ड रखते हैं तो यहां तो भविष्य 21 जन्मों के अविनाशी सौदे की बात है*। इसलिए मुझे भी अपने इस अविनाशी सौदे में अपना नफा और फायदा देखने के लिए रजिस्टर अवश्य रखना है ताकि याद का जो लक्ष्य बाबा ने दिया है उसे मैं पूरा कर सकूँ।

 

_ ➳  मन ही मन याद का रजिस्टर ठीक रखने की स्वयं से प्रतिज्ञा करके अब मैं अपने प्यारे पिता की याद में पूरी तरह अपने मन और बूद्धि को एकाग्र करते हुए, याद की यात्रा पर दौड़ी पहनती हूँ। *अपने सारे शरीर से चेतना को समेट कर अपने सम्पूर्ण ध्यान को भृकुटि के मध्य भाग पर एकाग्र करते ही मैं अपने निराकारी स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ और सेकेण्ड में बिंदु बन, हर बात को बिंदु लगाकर, अपने बिंदु पिता से मिलने के लिए उनके निराकारी वतन की और चल पड़ती हूँ*। एक चमकती हुई चैतन्य शक्ति मैं आत्मा प्वाइंट ऑफ लाइट बन अब भृकुटि सिहांसन से उतर कर, देह से बाहर आ जाती हूँ और सीधे ऊपर आकाश की ओर प्रस्थान कर जाती हूँ। सारे संसार की गतिविधियों को साक्षी होकर देखते हुए मैं इस नश्वर संसार को पार करती हूँ और सूर्य, चाँद, सितारों से भी ऊपर, सूक्ष्म लोक को पार करके पहुँच जाती हूँ सबसे ऊँच ते ऊँच उस ब्रह्नलोक में जहाँ मेरे प्यारे शिव बाबा रहते हैं।

 

_ ➳  लाल प्रकाश से प्रकाशित आत्माओं की निराकारी दुनिया इस ब्रह्मलोक में आकर मैं इस अन्तहीन ब्रह्मांड की अब सैर कर रही हूँ। *चारों और फैले गहन शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स को स्वयं में समाते हुए शांति के गहन अनुभव में डूबकर मैं पहुँच गई हूँ शांति के सागर अपने प्यारे पिता के पास जो सूर्य के समान तेजोमय स्वरूप में अपना अनन्त प्रकाश फैलाते हुए मुझे मेरे सामने दिखाई दे रहें हैं*। उनसे निकल रहे, सर्वगुणों, सर्वशक्तियों के प्रकाश की एक - एक किरण को मैं उनके समीप बैठ कर निहार रही हूँ और इस अति खूबसूरत दृश्य का अनुभव करके आनन्द विभोर हो रही हूँ। इन किरणों को निहारते हुए मैं इन्हें स्वयं में समाता हुआ अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  एक - एक गुण और एक - एक शक्ति की अनन्त किरणे मेरे अंदर समाकर मुझे सर्वगुणों और सर्वशक्तियों से भरपूर कर रही हैं। स्वयं को मैं सर्वगुणों, सर्वशक्तियों से सम्पन्न होता स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ। एक अद्भुत शक्ति का संचार जैसे मेरे अंदर हो रहा है और मुझे बहुत शक्तिशाली बना रहा है। *यह शक्ति योग अग्नि बन कर मेरे ऊपर चढ़ी विकारों की कट को जलाकर भस्म कर रही है। मेरे विकर्म विनाश हो रहें हैं और मैं डबल लाइट बनती जा रही हूँ*। अपने प्यारे पिता की याद से अपने विकर्मों को दग्ध करके, हल्की हो कर मैं आत्मा कर्म करने और साकार मनुष्य सृष्टि पर फिर से अपना पार्ट प्ले करने के लिए वापिस उसी साकारी दुनिया मे लौट रही हूँ और आकर अपने साकार तन में प्रवेश कर रही हूँ।

 

_ ➳  फिर से शरीर का आधार लेकर अब मैं कर्म कर रही हूँ किन्तु साथ ही साथ याद की यात्रा पर भी चलने का पूरा पुरुषार्थ अब मैं कर रही हूँ। *याद का रजिस्टर ठीक रखने के लिए अब मैं याद का पूरा चार्ट रख अपनी चेकिंग करने के साथ - साथ निरन्तर याद में रहने का पूरा अटेंशन देकर, अपने लक्ष्य को पाने की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ*।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं हर घड़ी को अन्तिम घड़ी समझ सदा एवररेडी रहने वाली तीव्र पुरुषार्थी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *अपने हाथ में लॉ उठाना भी क्रोध का अंश है, मैं इस क्रोध के अंश से भी मुक्त होने वाली लॉफुल आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *कभी भी यह नहीं सोचना कि जो हम कर रहे हैं, जो हो रहा है वह बापदादा नहीं देखते हैं। इसमें कभी अलबेले नहीं होना।* अगर कोई भी बच्चा अपने दिल का चार्ट पूछे तो बापदादा बता सकते हैं लेकिन अभी बताना नहीं है। बापदादा हर एक महारथी, घोड़ेसवार... सबका चार्ट देख रहे हैं। *कई बार तो बापदादा को बहुत तरस आता है, हैं कौन और करते क्या हैं?* लेकिन जैसे ब्रह्मा बाप कहते थे ना - याद है क्या कहते थे? गुड़ जाने गुड़ की गोथरी जाने। शिवबाबा जाने और ब्रह्मा बाबा जाने क्योंकि *बापदादा को तरस बहुत पड़ता है लेकिन ऐसे बच्चे बापदादा के रहम के संकल्प को टच नहीं कर सकते, कैच नहीं कर सकते।*

 

 _ ➳  इसीलिए बापदादा ने कहा - भिन्न-भिन्न प्रकार का रायल अलबेलापन बाप देखते रहते हैं। आज बापदादा कह ही देते हैं कि तरस बहुत पड़ता है। *कई बच्चे ऐसे समझते हैं कि सतयुग में तो पता ही नहीं पड़ेगा कौन क्या था, अभी तो मौज मना लो। अभी जो कुछ करना है कर लो। कोई रोकने वाला नहीं, कोई देखने वाला नहीं। लेकिन यह गलत है।* सिर्फ बापदादा नाम नहीं सुनाते, नाम सुनायें तो कल ठीक हो जाएं। तो *बापदादा सभी बच्चों को फिर से इशारा दे रहे हैं कि समय सब प्रकार से अति में जा रहा हे। माया भी अपना अति का पार्ट बजा रही है, प्रकृति भी अपना अति का पार्ट बजा रही है। ऐसे समय पर ब्राह्मण बच्चों का अपने तरफ अटेन्शन भी अति अर्थात् मन-वचन-कर्म में अति में चाहिए। साधारण पुरुषार्थ नहीं।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अटेन्शन रख रायल अलबेलेपन से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं ज्योति पुंज... चमकती हुई मणि... परमधाम में... महाज्योति शिवबाबा के सम्मुख हूँ... उनसे निकल रही अनन्त किरणें मेरे चारों ओर फैल रही हैं... *सर्वशक्तियों के इस प्रभा मण्डल ने ज्वाला स्वरूप धारण कर लिया है... इससे उठ रही लपटों में मैं आत्मा स्वयं को तपता हुआ अनुभव कर रही हूँ... मेरे पुराने स्वभाव संस्कार... इस योग अग्नि से जल कर भस्म हो रहे हैं... मेरी खोई हुई सर्वशक्तियां पुनः जागृत हो रहीं हैं...* 

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने पुराने संस्कार... अलबेलेपन के संस्कार को... अंतर्मुखी हो चेक कर रही हूँ... कि कौन कौन सी बातें मुझे आगे बढ़ने में बाधा डाल रहीं हैं... मैं उन सभी आदतों को सूक्ष्म रूप से चेक करती हूँ... *मैं आत्मा मनमनाभव स्थिति में रह... याद की यात्रा को बढ़ा रही हूँ... हर कर्म... बाबा की याद में रहकर उमंग उत्साह से कर रही हूँ...*  

 

 _ ➳  मैं आत्मा स्वयं को वरदाता बाप के सम्बन्ध से *बालक सो मालिक* की स्मृति दिलाती हूँ कि कैसे बाबा ने हमें अपने सर्व खज़ानों से... सर्व प्राप्तियों से भरपूर कर... मालिक बना दिया... *मैं आत्मा सर्व खजानों के मालिक... जिस खजाने से अप्राप्त कोई वस्तु नहीं... ऐसे मालिक बन सदा उमंग उत्साह में रहती हूँ...*  

 

 _ ➳  मैं आत्मा तीव्र पुरुषार्थ कर... योगयुक्त स्थिति में रह हर कर्म कर रही हूँ... सवेरे अमृतवेले उठ... बाबा से मिलन मनाने के लिये... सर्वप्राप्ति सम्पन्न बनने के लिये... स्वयं को उत्साहित करती हूँ... जागरूक करती हूँ... *मनसा वाचा कर्मणा... अपने ऊपर पूरा अटेंशन रखती हूँ... ऐसा अनुभव करती हूँ... जैसे बाबा मेरी हर एक्ट को... मेरे हर संकल्प को चेक कर रहें हों...* मुझे बाबा से की गयी हर प्रतिज्ञा को... श्रीमत अनुसार पूरा करना ही है...  

 

 _ ➳  *मैं आत्मा शक्ति स्वरूप बन अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बना रही हूँ... मैं आत्मा सवेरे उठते ही पुरुषार्थ में शक्ति भरने की कोई न कोई पॉइंट विशेष रूप से बुद्धि में याद रखती हूँ...* स्वयं को याद दिलाती हूँ कि अब साधारण पुरुषार्थ के दिन नहीं... अब मैं आत्मा नम्बरवन में आने के लिए... मायाजीत बनने के लिए... विशेष पुरुषार्थ कर रही हूँ...

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━