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 08 / 02 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *रूप बसंत बन मुख से सदैव रतन निकाले ?*

 

➢➢ *ज्ञान और योग में तीखा बन अपना और दूसरों का कल्याण किया ?*

 

➢➢ *प्रवृति के विस्तार में रहते फ़रिश्तेपन का साक्षातकार किया ?*

 

➢➢ *आत्मा रुपी दीपक में ज्ञान का घृत डाला ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  एक तरफ मन्सा सेवा दूसरे तरफ मन्सा एक्सरसाइज। अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता। जैसे शरीर का नाम पक्का है। दूसरे को भी कोई बुलायेगा तो आप ऐसे-ऐसे करेंगे। तो *मैं आत्मा हूँ, आत्मा का संसार बापदादा, आत्मा का संस्कार ब्राह्मण सो फरिश्ता, फरिश्ता सो देवता। तो यह मन की ड्रिल करना। मैं आत्मा, मेरा बाबा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारा और एक बाप के प्यारा हूँ"*

 

 सदा अपने को कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारे और एक बाप के प्यारे, ऐसा अनुभव करते हो? *जो न्यारा वही प्यारा और जो प्यारा वही न्यारा।* तो कमल समान हो या वातावरण में रहकर उसके प्रभाव में आ जाते हो? जहाँ भी जो भी पार्ट बजा रहे हो वहाँ पार्ट बजाते पार्ट से सदा न्यारे रहते हो या पार्ट के प्यारे बन जाते हो, क्या होता है?

 

  कभी योग लगता, कभी नहीं लगता इसका भी कारण क्या है? न्यारेपन की कमी। *न्यारे न होने के कारण प्यार का अनुभव नहीं होता। जहाँ प्यार नहीं वहाँ याद कैसे आयेगी! जितना ज्यादा प्यार उतना ज्यादा याद। बाप के प्यार के बजाए दूसरों के प्यारे हो जाते हो तो बाप भूल जाता है। पार्ट से न्यारा और बाप का प्यारा बनो, यही लक्ष्य और प्रैक्टिकल जीवन हो।* लौकिक में पार्ट बजाते प्यारे बने तो प्यार का रिटर्न क्या मिला? कांटों की शैया ही मिली ना! बाप के प्यार में रहने से सेकण्ड में क्या मिलता है? अनेक जन्मों का अधिकार प्राप्त हो जाता है। तो सदा पार्ट बजाते हुए न्यारे रहो।

 

  *सेवा के कारण पार्ट बजा रहे हो। सम्बन्ध के आधार पर पार्ट नहीं, सेवा के सम्बन्ध से पार्ट। देह के सम्बन्ध में रहने से नुकसान है, सेवा का पार्ट समझ कर रहो तो न्यारे रहेंगे। अगर प्यार दो तरफ है तो एकरस स्थिति का अनुभव नहीं हो सकता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा वाली एक्सरसाइज याद है? *अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता। यह है चलते-फिरते बाप और दादा के प्यार का रिटेन तो अभी-अभी यह रूहानी एक्सरसाइज करो।*

 

✧  सेकण्ड में निराकारी, सेकण्ड में फरिश्ता (बापदादा ने ड़िल कराई) अच्छा - *चलते-फिरते सारे दिन में यह एक्सरसाइज बाप की सहज याद दिलायेगी।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *सिर्फ बिंदु और एक , उसके आगे विस्तार में जाने की दरकार नही हैं। विस्तार में जाना हैं तो सर्विस प्रति।* अगर सर्विस नही तो बिंदु और एक। उसके आगे अपनी बुद्धि को चलाने की अधिक आवश्यकता नही हैं।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- देही-अभिमानी होकर बैठना"*

➳ _ ➳ *मैं आत्मा स्मृतिपटल पर व्यक्त हो रहे सभी विचारों को फुल स्टॉप लगाकर एकांतवासी होकर सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठती हूँ... एक के अंत में मगन हो जाती हूँ...* धीरे-धीरे इस देह, देह की दुनिया से डिटैच होकर ऊपर उड़ते हुए, बादलों, पहाड़ों, चाँद, सितारों, आसमान से भी पार होती हुई पहुँच जाती हूँ... मेरे प्यारे बाबा के पास... और बाबा के सम्मुख बैठ बाबा की रूहानी बातों को प्यार से सुनती हूँ...

❉ *इस अंतिम जनम में देह अभिमान को छोड़कर देही अभिमानी बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... 21 जनमो के मीठे सुख आपकी दहलीज पर आने को बेकरार है... इन सुखो को जीने के लिये अपने सत्य स्वरूप के नशे से भर जाओ... *वरदानी संगम पर आत्मा अभिमानी के संस्कार को इस कदर पक्का करो कि अथाह सुख अथाह खुशियां दामन में सदा की सज जाएँ...*

➳ _ ➳ *मैं आत्मा अपने सत्य स्वरुप में चमकती हुई अपने स्वधर्म के गुण गाती हुई कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा शरीर के भान से निकल कर आत्मा होने की सत्यता से परिपूर्ण होती जा रही हूँ... *सातो गुणो से सजधज कर तेजस्वी होती जा रही हूँ... और नई दुनिया में अनन्त सुखो की स्वामिन् होती जा रही हूँ...*

❉ *दिव्य गुणों की खुशबू से मेरे जीवन को दिव्य बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह के भान ने उजले प्रकाश को धुंधला कर दुखो के कंटीले तारो में लहुलहानं सा किया है... अब आत्मिक ओज से स्वयं को भर लो... *अपने चमकते स्वरूप और गुणो की उसी खूबसूरती से फिर से दमक उठो... तो सुखो के अम्बार कदमो में सदा के बिछ जायेंगे...*

➳ _ ➳ *आत्मदर्शन कर सर्वगुणों से सुसज्जित हो दिव्यता से ओतप्रोत होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपनी खोयी चमक वही खूबसूरत रंगत पुनः पाती जा रही हूँ... आत्मा अभिमानी होकर खुशियो में मुस्करा रही हूँ... *मीठे बाबा के प्यार में सतयुगी सुख अपने नाम करवा रही हूँ...*

❉ *संगम पर मेरे संग-संग चलते हुए मेरे क़दमों में फूल बिछाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *संगम के कीमती समय में सुखो की जागीर अपनी बाँहों में भरकर 21 जनमो तक अथाह खुशियों में मुस्कराओ...* ईश्वर पिता का सब कुछ अपने नाम कर लो... और खूबसूरत दुनिया के मालिक बन विश्व धरा पर इठलाओ...

➳ _ ➳ *मैं आत्मा आत्मिक स्वरुप की झलक और फलक से संगम के अमूल्य समय, श्वांस, संकल्पों को सफल करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कभी यूँ ईश्वर पिता के दिल पर इतराउंगी ... सब कुछ मेरी मुट्ठी में होगा... *भाग्य इतना खूबसूरत और ईश्वरीय प्यार के जादू में खिलेगा ऐसा मैंने भला कब सोचा था... ये प्यारे से ईश्वरीय पल मुझे 21 जनमो का सुख दिलवा रहे है...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  अन्धो की लाठी बनना है*

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ज्ञान के नेत्र से वंचित सभी मनुष्य आत्मायें आज नयनहीन हो गई हैं और अज्ञान अंधकार में भटक कर दुखी और अशांत हो रही हैं इसलिए पुकार रही है "नयनहीन को राह दिखाओ प्रभु, दर - दर ठोकर खाऊँ मैं"। *तो उनकी पुकार सुन, उन पर रहम करने, उन्हें अज्ञान अंधकार से निकालने और ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र देने के लिए ही भगवान आये हुए हैं और नयनहीनो को सच्ची राह दिखा रहें हैं*। 

➳ _ ➳ 
कितनी महान सौभाग्यशाली हैं वो आत्मायें जिन्होंने ज्ञान का दिव्य नेत्र प्रदान करने वाले अपने त्रिलोकीनाथ भगवान को पहचान, उनसे ज्ञान का दिव्य नेत्र प्राप्त कर लिया है और अज्ञान अंधकार से बाहर निकल कर ज्ञान के सोझरे में आ गई हैं। *उस सोझरे में आते ही आत्मा जो अज्ञानवश अनेक प्रकार के बंधनों में बंधी थी। वो सारे बन्धन एक - एक करके टूट रहे हैं और सारे सम्बन्ध केवल उस एक ज्ञान सागर भगवान के साथ जुड़ने से, जीवन जो नीरस हो चुका था वो परमात्म प्रेम के रस से आनन्दमय होने लगा है*। 

➳ _ ➳ 
एकांत में बैठ यह विचार करते हुए अपने भगवान बाप को मैं कोटि - कोटि धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने मुझे ज्ञान का तीसरा नेत्र देकर मेरे जीवन मे उजाला ही उजाला कर दिया। उनके इस उपकार का रिटर्न अब मुझे उनका सहयोगी बन कर अवश्य देना है। *अपने पिता के फरमान पर चल अज्ञान अंधकार में भटक रही ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र दे कर उन्हें भटकने से छुड़ाना ही अब मेरे इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है*। इस लक्ष्य को पाने का दृढ़ संकल्प करके, अपने ज्ञान सागर बाबा की मीठी याद में बैठ अतीन्द्रिय सुख का आनन्द लेने के लिए मैं कर्मेंद्रिय के आकर्षण से स्वयं को मुक्त करती हूँ और *स्वराज्य अधिकारी बन मन को परमात्म प्रेम की लगन में मग्न हो जाने का आदेश देकर, अपना सारा ध्यान  अपने स्वरूप पर एकाग्र कर लेती हूँ*।

➳ _ ➳ 
मन बुद्धि को पूरी तरह अपने स्वरूप पर फोकस करके अपने स्वरूप का आनन्द लेने में मैं मगन हो जाती हूँ। *अपने अंदर निहित गुणों और शक्तियों का अनुभव करते हुए, मनबुद्धि की लगाम को थामे, मैं निराकार चमकती हुई ज्योति अब भृकुटि सिहांसन को छोड़ ऊपर की ओर उड़ान भर कर सेकेण्ड में आकाश को पार कर लेती हूँ* और सूक्ष्म वतन से होती हुई लाल प्रकाश की एक खूबसूरत दुनिया में प्रवेश करती हूँ। आत्माओं की यह निराकारी दुनिया मेरे शिव पिता का घर परमधाम है जहाँ पहुँच कर मन को गहन सुकून मिल रहा है। अथाह शांति की अनुभूति हो रही है। 

➳ _ ➳ 
गहन शन्ति का सुखद अनुभव करके अब मैं अपनी बुद्धि रूपी झोली को ज्ञान के अखुट खजानों से भरपूर करने के लिए और ज्ञान की शक्ति स्वयं में भरने के लिए अपने ज्ञान सागर शिव पिता के पास पहुँचती हूँ और उनसे आ रही सर्वशक्तियों और सर्वगुणों की किरणों की छत्रछाया के नीचे जा कर बैठ जाती हूँ। *ज्ञान की शक्तिशाली किरणो का फव्वारा मेरे ज्ञान सागर शिव पिता से सीधा मुझ आत्मा पर प्रवाहित होने लगता है। इस शक्ति को स्वयं में धारण कर, अपनी बुद्धि रूपी झोली को ज्ञान के अखुट अविनाशी खजानों से भरपूर करके ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र देने की ईश्वरीय सेवा करने के लिए मैं वापिस साकारी दुनिया मे लौट आती हूँ*।

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अपने साकार तन में प्रवेश करके अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर रूहानी सेवाधारी बन अब मैं ज्ञान सागर अपने शिव पिता द्वारा मिले ज्ञान रत्नों को स्वयं में धारण कर *ज्ञान स्वरुप बन, अपने सम्बन्ध - सम्पर्क में आने वाली सभी ज्ञान नयनहीन आत्माओं को ज्ञान नेत्र देकर, उन्हें अज्ञान अंधकार से निकाल ज्ञान सोझरे में लाने की सेवा करते हुए अनेकों आत्माओं को मुक्ति जीवन मुक्ति का सच्चा रास्ता दिखाकर उनका कल्याण कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं प्रवृति के विस्तार में रहते फरिश्ते पन का साक्षात्कार कराने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं साक्षात्कार मूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ *मैं आत्मा ख़ुशी को कायम रखती हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा रूपी दीपक में ज्ञान का घृत रोज डालती हूँ ।*
✺ *मैं प्रसन्नचित्त आत्मा हूँ ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *कभी भी यह नहीं सोचना कि जो हम कर रहे हैं, जो हो रहा है वह बापदादा नहीं देखते हैं। इसमें कभी अलबेले नहीं होना।* अगर कोई भी बच्चा अपने दिल का चार्ट पूछे तो बापदादा बता सकते हैं लेकिन अभी बताना नहीं है। बापदादा हर एक महारथी, घोड़ेसवार... सबका चार्ट देख रहे हैं। *कई बार तो बापदादा को बहुत तरस आता है, हैं कौन और करते क्या हैं?* लेकिन जैसे ब्रह्मा बाप कहते थे ना - याद है क्या कहते थे? गुड़ जाने गुड़ की गोथरी जाने। शिवबाबा जाने और ब्रह्मा बाबा जाने क्योंकि *बापदादा को तरस बहुत पड़ता है लेकिन ऐसे बच्चे बापदादा के रहम के संकल्प को टच नहीं कर सकते, कैच नहीं कर सकते।*

 

 _ ➳  इसीलिए बापदादा ने कहा - भिन्न-भिन्न प्रकार का रायल अलबेलापन बाप देखते रहते हैं। आज बापदादा कह ही देते हैं कि तरस बहुत पड़ता है। *कई बच्चे ऐसे समझते हैं कि सतयुग में तो पता ही नहीं पड़ेगा कौन क्या था, अभी तो मौज मना लो। अभी जो कुछ करना है कर लो। कोई रोकने वाला नहीं, कोई देखने वाला नहीं। लेकिन यह गलत है।* सिर्फ बापदादा नाम नहीं सुनाते, नाम सुनायें तो कल ठीक हो जाएं। तो *बापदादा सभी बच्चों को फिर से इशारा दे रहे हैं कि समय सब प्रकार से अति में जा रहा हे। माया भी अपना अति का पार्ट बजा रही है, प्रकृति भी अपना अति का पार्ट बजा रही है। ऐसे समय पर ब्राह्मण बच्चों का अपने तरफ अटेन्शन भी अति अर्थात् मन-वचन-कर्म में अति में चाहिए। साधारण पुरुषार्थ नहीं।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अटेन्शन रख रायल अलबेलेपन से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं ज्योति पुंज... चमकती हुई मणि... परमधाम में... महाज्योति शिवबाबा के सम्मुख हूँ... उनसे निकल रही अनन्त किरणें मेरे चारों ओर फैल रही हैं... *सर्वशक्तियों के इस प्रभा मण्डल ने ज्वाला स्वरूप धारण कर लिया है... इससे उठ रही लपटों में मैं आत्मा स्वयं को तपता हुआ अनुभव कर रही हूँ... मेरे पुराने स्वभाव संस्कार... इस योग अग्नि से जल कर भस्म हो रहे हैं... मेरी खोई हुई सर्वशक्तियां पुनः जागृत हो रहीं हैं...* 

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने पुराने संस्कार... अलबेलेपन के संस्कार को... अंतर्मुखी हो चेक कर रही हूँ... कि कौन कौन सी बातें मुझे आगे बढ़ने में बाधा डाल रहीं हैं... मैं उन सभी आदतों को सूक्ष्म रूप से चेक करती हूँ... *मैं आत्मा मनमनाभव स्थिति में रह... याद की यात्रा को बढ़ा रही हूँ... हर कर्म... बाबा की याद में रहकर उमंग उत्साह से कर रही हूँ...*  

 

 _ ➳  मैं आत्मा स्वयं को वरदाता बाप के सम्बन्ध से *बालक सो मालिक* की स्मृति दिलाती हूँ कि कैसे बाबा ने हमें अपने सर्व खज़ानों से... सर्व प्राप्तियों से भरपूर कर... मालिक बना दिया... *मैं आत्मा सर्व खजानों के मालिक... जिस खजाने से अप्राप्त कोई वस्तु नहीं... ऐसे मालिक बन सदा उमंग उत्साह में रहती हूँ...*  

 

 _ ➳  मैं आत्मा तीव्र पुरुषार्थ कर... योगयुक्त स्थिति में रह हर कर्म कर रही हूँ... सवेरे अमृतवेले उठ... बाबा से मिलन मनाने के लिये... सर्वप्राप्ति सम्पन्न बनने के लिये... स्वयं को उत्साहित करती हूँ... जागरूक करती हूँ... *मनसा वाचा कर्मणा... अपने ऊपर पूरा अटेंशन रखती हूँ... ऐसा अनुभव करती हूँ... जैसे बाबा मेरी हर एक्ट को... मेरे हर संकल्प को चेक कर रहें हों...* मुझे बाबा से की गयी हर प्रतिज्ञा को... श्रीमत अनुसार पूरा करना ही है...  

 

 _ ➳  *मैं आत्मा शक्ति स्वरूप बन अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बना रही हूँ... मैं आत्मा सवेरे उठते ही पुरुषार्थ में शक्ति भरने की कोई न कोई पॉइंट विशेष रूप से बुद्धि में याद रखती हूँ...* स्वयं को याद दिलाती हूँ कि अब साधारण पुरुषार्थ के दिन नहीं... अब मैं आत्मा नम्बरवन में आने के लिए... मायाजीत बनने के लिए... विशेष पुरुषार्थ कर रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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