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 08 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *जो भी अन्दर कांटे हैं, उनकी जांच कर निकाला ?*

 

➢➢ *आत्माओं का कल्याण करने में समय दिया ?*

 

➢➢ *फुल स्टॉप द्वारा श्रेष्ठ स्थिति रुपी मैडल प्राप्त किया ?*

 

➢➢ *हर परिस्थिति रुपी पहाड़ को पार कर अपनी मंजिल को प्राप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  एक तरफ मन्सा सेवा दूसरे तरफ मन्सा एक्सरसाइज। अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता। जैसे शरीर का नाम पक्का है। दूसरे को भी कोई बुलायेगा तो आप ऐसे-ऐसे करेंगे। तो *मैं आत्मा हूँ, आत्मा का संसार बापदादा, आत्मा का संस्कार ब्राह्मण सो फरिश्ता, फरिश्ता सो देवता। तो यह मन की ड्रिल करना। मैं आत्मा, मेरा बाबा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारा और एक बाप के प्यारा हूँ"*

 

 सदा अपने को कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारे और एक बाप के प्यारे, ऐसा अनुभव करते हो? *जो न्यारा वही प्यारा और जो प्यारा वही न्यारा।* तो कमल समान हो या वातावरण में रहकर उसके प्रभाव में आ जाते हो? जहाँ भी जो भी पार्ट बजा रहे हो वहाँ पार्ट बजाते पार्ट से सदा न्यारे रहते हो या पार्ट के प्यारे बन जाते हो, क्या होता है?

 

  कभी योग लगता, कभी नहीं लगता इसका भी कारण क्या है? न्यारेपन की कमी। *न्यारे न होने के कारण प्यार का अनुभव नहीं होता। जहाँ प्यार नहीं वहाँ याद कैसे आयेगी! जितना ज्यादा प्यार उतना ज्यादा याद। बाप के प्यार के बजाए दूसरों के प्यारे हो जाते हो तो बाप भूल जाता है। पार्ट से न्यारा और बाप का प्यारा बनो, यही लक्ष्य और प्रैक्टिकल जीवन हो।* लौकिक में पार्ट बजाते प्यारे बने तो प्यार का रिटर्न क्या मिला? कांटों की शैया ही मिली ना! बाप के प्यार में रहने से सेकण्ड में क्या मिलता है? अनेक जन्मों का अधिकार प्राप्त हो जाता है। तो सदा पार्ट बजाते हुए न्यारे रहो।

 

  *सेवा के कारण पार्ट बजा रहे हो। सम्बन्ध के आधार पर पार्ट नहीं, सेवा के सम्बन्ध से पार्ट। देह के सम्बन्ध में रहने से नुकसान है, सेवा का पार्ट समझ कर रहो तो न्यारे रहेंगे। अगर प्यार दो तरफ है तो एकरस स्थिति का अनुभव नहीं हो सकता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा वाली एक्सरसाइज याद है? *अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता। यह है चलते-फिरते बाप और दादा के प्यार का रिटेन तो अभी-अभी यह रूहानी एक्सरसाइज करो।*

 

✧  सेकण्ड में निराकारी, सेकण्ड में फरिश्ता (बापदादा ने ड़िल कराई) अच्छा - *चलते-फिरते सारे दिन में यह एक्सरसाइज बाप की सहज याद दिलायेगी।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *सिर्फ बिंदु और एक , उसके आगे विस्तार में जाने की दरकार नही हैं। विस्तार में जाना हैं तो सर्विस प्रति।* अगर सर्विस नही तो बिंदु और एक। उसके आगे अपनी बुद्धि को चलाने की अधिक आवश्यकता नही हैं।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाबा का बच्चों द्वारा भारत को सुखधाम बनाना"*

 

_ ➳ मीठे मधुबन के डायमण्ड हॉल में दादी गुलजार के तन में विराजे... अपने प्रियतम बाबा को मै आत्मा निहारते हुए... अपने महान भाग्य को देख रही हूँ... कि जनमो की भटकन और दुखो के थपेड़ो के बीच... *यूँ जीवन में ईश्वर, सुखद झोके की तरह... जीवन में सुखो की ठंडक लायेगा*... और मेरा बिगड़ा हुआ भाग्य यूँ इस तरहा ईश्वरीय हाथो में संवर जायेगा... यह तो मन की कभी कल्पनायें भी न थी... *आज भगवान की गोद में बैठकर नाजो से पल रही हूँ.*.. और 21 जनमो के लिए साहूकार बन रही हूँ... यह भाग्य की जादूगरी नही तो भला और क्या है... *लाखो दिल बिछे थे... उस पर मर मिटने के लिए... और उसने सिर्फ मुझे अपने दिल में सजा लिया*...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सतयुगी अमीरी से भरते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... जब घर से निकले थे, कितने खुबसूरत खिले फूल थे, और सुखो की अमीरी से भरपूर थे... अब देह भान के प्रभाव ने किस कदर गरीबी से भर दिया है... तो *अब ईश्वर पिता की यादो भरा हाथ पकड़कर... फिर से वही सुखो की दौलत और खुशियो भरी दुनिया के पुनः मालिक बन जाओ.*..

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से अपना खोया वजूद और सुखो की दुनिया को पुनः पाते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके बिना, कितना भटकी और दुखो में गहरे घिरी थी... आपने प्यारे बाबा आकर... मुझे सदा के सुख से भरपूर कर दिया है.. मै आत्मा, *आपके साये में अपनी सच्ची चमक और गुणो की दौलत से पुनः अमीर हो रही हूँ.*..

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी सुखो की सत्ता और देवताई शानो शौकत से सजाते हुए कहा :-* " मीठे प्यारे लाडले बच्चे... सदा ईश्वरीय यादो में खोकर... जनमो के दुखो से मुक्त हो जाओ... *सारा भारत फिर से सोने की चिड़िया बन चहक उठे... हर दिल ईश्वरीय यादो में अपने खोये राज्य को पुनः पाकर 21 जनमो के लिए साहूकार बन जाये.*.. यही चाहत ईश्वर पिता अपने दिल में लिए इस धरा पर उतर आया है..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की दिली चाहत को पूरा करने के लिए सम्पूर्ण समर्पित होकर कहती हूँ ;-* "मीठे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में जो सुखो से निखर उठी हूँ... *यही खुशियां हर दिल पर बाँट कर, उन्हें आप समान दौलतमंद बना रही हूँ.*.. सत्य भरी राहो पर चलाकर... हर दिल को सुखो से सजा रही हूँ... पूरे भारत को ज्ञान रत्नों से साहूकार बना रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को गुणो और शक्तियो की दौलत से भरकर सदा के लिए साहूकार बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता ने जो आप बच्चों पर ज्ञान रत्नों की खानों को लुटाया है... उसे अपनी बाँहों में भरकर, सदा के लिए अमीरी से भरपूर हो जाओ... *भारत जो अपनी अमीरी के लिए विख्यात था... वह अमीरी पुनः बाँहों में लौट आये..*. इसलिए याद और ज्ञान के समन्दर में गहरी डुबकी लगाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को असीम स्नेह से भरे दिल से निहारते हुए कहती हूँ :-* "सच्चे साथी बाबा मेरे... सिवाय भगवान के मेरी खोयी अमीरी मेरे सुखो की जागीर मुझ आत्मा... को कोई लौटा ही नही सकता था सिवाय मेरे प्यारे बाबा के...मीठे बाबा *आपने मेरे खोये सुख मेरे दामन में पुनः सजाये है... और मै आत्मा अपने इस मीठे भाग्य पर नाज कर रही हूँ.*.."प्यारे बाबा से यूँ रुहरिहानं कर मै आत्मा... साकारी तन में लौट आयी..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अविनाशी ज्ञान रत्नों का सौदा कर किसी का भी कल्याण करने में समय देना है*"

 

_ ➳  ज्ञान के सागर अपने शिव पिता परमात्मा द्वारा मुरली के माध्यम से हर रोज प्राप्त होने वाले मधुर महावाक्यों को एकांत में बैठ मैं पढ़ रही हूँ और *पढ़ते - पढ़ते अनुभव कर रही हूँ कि ब्रह्मा मुख द्वारा अविनाशी ज्ञान के अखुट खजाने लुटाते मेरे शिव पिता परमात्मा परमधाम से नीचे साकार सृष्टि पर आकर मेरे सम्मुख विराजमान हो गए हैं*। अपने मुख कमल से मेरी रचना कर मुझे ब्राह्मण बनाने वाले मेरे परम शिक्षक शिव बाबा, ब्रह्मा बाबा की भृकुटि पर बैठ ज्ञान की गुह्य बातें मुझे सुना रहें हैं और *मैं ब्राह्मण आत्मा ज्ञान के सागर अपने शिव पिता के सम्मुख बैठ, ब्रह्मा मुख से उच्चारित मधुर महावाक्यों को बड़े प्यार से सुन रही हूँ और ज्ञान रत्नों से अपनी बुद्धि रूपी झोली को भरपूर कर रही हूँ*।

 

_ ➳  मुरली का एक - एक महावाक्य अमृत की धारा बन मेरे जीवन को परिवर्तित कर रहा है। *आज दिन तक अज्ञान अंधकार में मैं भटक रही थी और व्यर्थ के कर्मकांडो में उलझ कर अपने जीवन के अमूल्य पलों को व्यर्थ गंवा रही थी*। धन्यवाद मेरे शिव पिता परमात्मा का जिन्होंने ज्ञान का तीसरा नेत्र देकर मुझे अज्ञान अंधकार से निकाल मेरे जीवन मे सोझरा कर दिया। अपने शिव पिता परमात्मा के समान महादानी बन अब मुझे उनसे मिलने वाले अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान सबको कर, सबको अज्ञान अंधकार से निकाल सोझरे में लाना है।

 

_ ➳  अपने शिव पिता के स्नेह का रिटर्न अब मुझे उनके फरमान पर चल, औरो को आप समान बनाने की सेवा करके अवश्य देना है। *अपने आप से यह प्रतिज्ञा करते हुए मैं देखती हूँ मेरे सामने बैठे बापदादा मुस्कराते हुए बड़े प्यार से मुझे निहार रहें हैं। उनकी मीठी मधुर मुस्कान मेरे दिल मे गहराई तक समाती जा रही है*। उनके नयनों से और भृकुटि से बहुत तेज दिव्य प्रकाश निकल रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे प्रकाश की सहस्त्रो धारायें मेरे ऊपर पड़ रही है और उस दिव्य प्रकाश में नहाकर मेरा स्वरूप बहुत ही दिव्य और लाइट का बनता जा रहा है। *मैं देख रही हूँ बापदादा के समान मेरे लाइट के शरीर में से भी प्रकाश की अनन्त धारायें निकल रही हैं और चारों और फैलती जा रही हैं*।

 

_ ➳  अब बापदादा मेरे पास आ कर मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर अपने सभी अविनाशी खजाने, गुण और शक्तियां मुझे विल कर रहें हैं। *बाबा के हस्तों से निकल रहे सर्व ख़ज़ानों, सर्वशक्तियों को मैं स्वयं में समाता हुआ स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*। बापदादा मेरे सिर पर अपना वरदानी हाथ रख मुझे "अविनाशी ज्ञान रत्नों के महादानी भव" का वरदान दे रहें हैं। वरदान दे कर, उस वरदान को फलीभूत कर, उसमे सफलता पाने के लिए बाबा अब मेरे मस्तक पर विजय का तिलक दे रहें हैं। *मैं अनुभव कर रही हूँ मेरे लाइट माइट स्वरूप में मेरे मस्तक पर जैसे ज्ञान का दिव्य चक्षु खुला गया है जिसमे से एक दिव्य प्रकाश निकल रहा है और उस प्रकाश में ज्ञान का अखुट भण्डार समाया है*।

 

_ ➳  महादानी बन, अपने लाइट माइट स्वरूप में सारे विश्व की सर्व आत्माओ को अविनाशी ज्ञान रत्न देने के लिए अब मैं सारे विश्व मे चक्कर लगा रही हूँ। मेरे मस्तक पर खुले ज्ञान के दिव्य चक्षु से निकल रही लाइट से ज्ञान का प्रकाश चारों और फैल रहा है और सारे विश्व में फैल कर विश्व की सर्व आत्माओं को परमात्म परिचय दे रहा हैं। *सर्व आत्माओं को परमात्म अवतरण का अनुभव हो रहा है। सभी आत्मायें अविनाशी ज्ञान रत्नों से स्वयं को भरपूर कर रही हैं*। सभी का बुद्धि रूपी बर्तन शुद्ध और पवित्र हो रहा है। ज्ञान रत्नों को बुद्धि में धारण कर सभी परमात्म पालना का आनन्द ले रहे हैं।

 

_ ➳  लाइट माइट स्वरूप में विश्व की सर्व आत्माओं को अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान दे कर, अब मैं साकार रूप में अपने साकार ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर महादानी बन मुख द्वारा अपने सम्बन्ध संपर्क में आने वाली सभी आत्माओं को आविनाशी ज्ञान रत्नों का दान दे कर, सभी को अपने पिता परमात्मा से मिलाने की सेवा निरन्तर कर रही हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में, डबल लाइट स्थिति का अनुभव करते अपनी स्थिति से मैं अनेको आत्माओं को परमात्म प्यार का अनुभव करवा रही हूँ। परमात्म प्यार का अनुभव करके वो सभी आत्मायें अब परमात्मा द्वारा मिलने वाले अविनाशी ज्ञान रत्नों को धारण कर अपने जीवन को खुशहाल बना रही हैं*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं फुलस्टॉप द्वारा श्रेष्ठ स्थिति रूपी मैडल प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं आत्मा महावीर हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हर परिस्थिति रूपी पहाड़ को सदा पार कर लेती हूँ  ।*

   *मैं सदैव अपनी मंजिल को प्राप्त करने वाला उड़ता पंछी  हूँ  ।*

   *मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *कभी भी यह नहीं सोचना कि जो हम कर रहे हैं, जो हो रहा है वह बापदादा नहीं देखते हैं। इसमें कभी अलबेले नहीं होना।* अगर कोई भी बच्चा अपने दिल का चार्ट पूछे तो बापदादा बता सकते हैं लेकिन अभी बताना नहीं है। बापदादा हर एक महारथी, घोड़ेसवार... सबका चार्ट देख रहे हैं। *कई बार तो बापदादा को बहुत तरस आता है, हैं कौन और करते क्या हैं?* लेकिन जैसे ब्रह्मा बाप कहते थे ना - याद है क्या कहते थे? गुड़ जाने गुड़ की गोथरी जाने। शिवबाबा जाने और ब्रह्मा बाबा जाने क्योंकि *बापदादा को तरस बहुत पड़ता है लेकिन ऐसे बच्चे बापदादा के रहम के संकल्प को टच नहीं कर सकते, कैच नहीं कर सकते।*

 

 _ ➳  इसीलिए बापदादा ने कहा - भिन्न-भिन्न प्रकार का रायल अलबेलापन बाप देखते रहते हैं। आज बापदादा कह ही देते हैं कि तरस बहुत पड़ता है। *कई बच्चे ऐसे समझते हैं कि सतयुग में तो पता ही नहीं पड़ेगा कौन क्या था, अभी तो मौज मना लो। अभी जो कुछ करना है कर लो। कोई रोकने वाला नहीं, कोई देखने वाला नहीं। लेकिन यह गलत है।* सिर्फ बापदादा नाम नहीं सुनाते, नाम सुनायें तो कल ठीक हो जाएं। तो *बापदादा सभी बच्चों को फिर से इशारा दे रहे हैं कि समय सब प्रकार से अति में जा रहा हे। माया भी अपना अति का पार्ट बजा रही है, प्रकृति भी अपना अति का पार्ट बजा रही है। ऐसे समय पर ब्राह्मण बच्चों का अपने तरफ अटेन्शन भी अति अर्थात् मन-वचन-कर्म में अति में चाहिए। साधारण पुरुषार्थ नहीं।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अटेन्शन रख रायल अलबेलेपन से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं ज्योति पुंज... चमकती हुई मणि... परमधाम में... महाज्योति शिवबाबा के सम्मुख हूँ... उनसे निकल रही अनन्त किरणें मेरे चारों ओर फैल रही हैं... *सर्वशक्तियों के इस प्रभा मण्डल ने ज्वाला स्वरूप धारण कर लिया है... इससे उठ रही लपटों में मैं आत्मा स्वयं को तपता हुआ अनुभव कर रही हूँ... मेरे पुराने स्वभाव संस्कार... इस योग अग्नि से जल कर भस्म हो रहे हैं... मेरी खोई हुई सर्वशक्तियां पुनः जागृत हो रहीं हैं...* 

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने पुराने संस्कार... अलबेलेपन के संस्कार को... अंतर्मुखी हो चेक कर रही हूँ... कि कौन कौन सी बातें मुझे आगे बढ़ने में बाधा डाल रहीं हैं... मैं उन सभी आदतों को सूक्ष्म रूप से चेक करती हूँ... *मैं आत्मा मनमनाभव स्थिति में रह... याद की यात्रा को बढ़ा रही हूँ... हर कर्म... बाबा की याद में रहकर उमंग उत्साह से कर रही हूँ...*  

 

 _ ➳  मैं आत्मा स्वयं को वरदाता बाप के सम्बन्ध से *बालक सो मालिक* की स्मृति दिलाती हूँ कि कैसे बाबा ने हमें अपने सर्व खज़ानों से... सर्व प्राप्तियों से भरपूर कर... मालिक बना दिया... *मैं आत्मा सर्व खजानों के मालिक... जिस खजाने से अप्राप्त कोई वस्तु नहीं... ऐसे मालिक बन सदा उमंग उत्साह में रहती हूँ...*  

 

 _ ➳  मैं आत्मा तीव्र पुरुषार्थ कर... योगयुक्त स्थिति में रह हर कर्म कर रही हूँ... सवेरे अमृतवेले उठ... बाबा से मिलन मनाने के लिये... सर्वप्राप्ति सम्पन्न बनने के लिये... स्वयं को उत्साहित करती हूँ... जागरूक करती हूँ... *मनसा वाचा कर्मणा... अपने ऊपर पूरा अटेंशन रखती हूँ... ऐसा अनुभव करती हूँ... जैसे बाबा मेरी हर एक्ट को... मेरे हर संकल्प को चेक कर रहें हों...* मुझे बाबा से की गयी हर प्रतिज्ञा को... श्रीमत अनुसार पूरा करना ही है...  

 

 _ ➳  *मैं आत्मा शक्ति स्वरूप बन अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बना रही हूँ... मैं आत्मा सवेरे उठते ही पुरुषार्थ में शक्ति भरने की कोई न कोई पॉइंट विशेष रूप से बुद्धि में याद रखती हूँ...* स्वयं को याद दिलाती हूँ कि अब साधारण पुरुषार्थ के दिन नहीं... अब मैं आत्मा नम्बरवन में आने के लिए... मायाजीत बनने के लिए... विशेष पुरुषार्थ कर रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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