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 08 / 04 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *संग दोष से अपनी संभाल की ?*

 

➢➢ *काम महाशत्रु से हार तो नही खायी ?*

 

➢➢ *सदा पावरफुल वृत्ति द्वारा बेहद की सेवा में तत्पर रहे ?*

 

➢➢ *बोल और चाल चलन प्रभावशाली रख सेवा में सफलता प्राप्त की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *कोई भी खजाना कम खर्च करके अधिक प्राप्ति कर लेना, यही योग का प्रयोग है।* मेहनत कम सफलता ज्यादा इस विधि से प्रयोग करो। जैसे समय वा संकल्प श्रेष्ठ खजाने हैं, तो संकल्प का खर्च कम हो लेकिन प्राप्ति ज्यादा हो। *जो साधारण व्यक्ति दो चार मिनट संकल्प चलाने के बाद, सोचने के बाद सफलता या प्राप्ति कर सकता है वह आप एक दो सेकेण्ड में कर सकते हो, इसको कहते हैं कम खर्चा बाला नशीन। खर्च कम करो लेकिन प्राप्ति 100 गुणा हो इससे समय की वा संकल्प की जो बचत होगी वह औरों की सेवा में लगा सकेंगे, दान पुण्य कर सकेंगे, यही योग का प्रयोग है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कोटो में कोई हूँ"*

 

✧  सदा बाप और वर्सा दोनों की स्मृति रहती है? *बाप कौन और वर्सा क्या मिला है यह स्मृति स्वत: समर्थ बना देती है। ऐसा अविनाशी वर्सा जो एक जन्म में अनेक जन्मों की प्रालब्ध बनाने वाला है, ऐसा वर्सा कभी मिला है? अभी मिला है, सारे कल्प में नहीं।*

 

  *तो सदा बाप और वर्सा इसी स्मृति से आगे बढ़ते चलो। वर्से को याद करने से सदा खुशी रहेगी और बाप को याद करने से सदा शक्तिशाली रहेंगे। शक्तिशाली आत्मा सदा मायाजीत रहेगी और खुशी है तो जीवन है।* अगर खुशी नहीं तो जीवन क्या? जीवन होते भी ना के बराबर है। जीते हुए भी मृत्यु के समान है।

 

  *जितना वर्सा याद रहेगा उतनी खुशी। सदा खुशी रहती है? ऐसा वर्सा कोटो में कोई को मिलता है और हमें मिला है। यह स्मृति कभी भी भूलना नहीं। जितनी याद उतनी प्राप्ति। सदा याद और सदा प्राप्ति की खुशी।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बीज में कौन - सी शक्ति है? वृक्ष के विस्तार को अपने में समाने की। *तो अब क्या पुरुषार्थ करना है? बीज स्वरूप स्थिती में स्थित होने का अर्थात अपने विस्तार को समाने का*। तो यह चेक करो।

 

✧  विस्तार करना तो सहज है लेकिन विस्तार को समाना सरल हुआ है? आजकल साइंस वाले भी विस्तार को समेटने का ही पुरुषार्थ कर रहे है। *साइंस पावर वाले भी तुम साइलेन्स की शक्तिवालों से काँपी करते है*। जैसे - जैसे साइलेन्स की शक्ति सेना इन्वेन्शन करती है फिर साइंस अपने रूप से इन्वेन्शन करती है।

 

✧  जैसे - जैसे यहाँ रिफाइन होते जाते है वैसे ही साइंस भी रिफाइन होती जाती है। जो बातें पहले उन्हों को भी असम्भव लगती थी वह अब सम्भव होती जा रही है। वैसे ही *यहाँ भी असम्भव बातें सरल और सम्भव होती जाती है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *ऐसे विशेष आत्माओं को अपने अव्यक्त स्थिति में, अपनी रूहानी लाइट और माइट की स्थिति द्वारा लाइट-हाउस और माइट-हाउस बन एक स्थान पर रहते हुए भी चारों ओर अलौकिक रूहानी सर्विस की भावना और वृत्ति द्वारा सर्विस करनी चाहिए। इसको कहते हैं बेहद की सर्विस।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- फूल बन सबको सुख देना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा की कुटिया में बैठी हूँ... कुटिया चारों तरफ से रंग बिरंगे फूलों से सजी हुई बहुत सुंदर लग रही है...* बाबा से अलौकिक प्रकाश निकल कर मुझ में समाता जा रहा है, मैं आत्मा बहुत हल्का अनुभव कर रही हूं...* बाबा अपने हाथों में मेरा हाथ लेकर मुझे सैर पर ले जाते हैं , और एक सुंदर बगीचे में मेरे साथ टहलने लगते हैं... मैं आत्मा मन ही मन ये विचार कर रही हूं कि कितना सुंदर बाग है और ये फूल चारों तरफ अपनी खुशबु बिखेरते कितने प्यारे लग रहे हैं...

 

  *बाबा मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर बोले:-* "मीठे बच्चे... जैसे बाप सबको सुख देते हैं वैसे ही सबको फूल बन सुख देना है... सुख दाता बाप के बच्चे कभी किसी को दुख नहीं दे सकते... *बाप की श्रीमत है, ना दुख दो न दुख लो* रूहे गुलाब बन सबको सुख  देना है और दुआओं का खाता जमा करना है... *बाप की श्रीमत को धारण कर बाप से  21 जन्म की प्रालब्ध लेनी है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा की प्यार भरी समझानी को अपने में समाते हुए बाबा से बोली:-* " हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपसे प्यार और दुलार पाकर स्वयं को दिव्य ज्ञान से सुसज्जित देख कर आनंद के सागर में डुबकियाँ लगा रही हूं... *आपकी श्रीमत पाकर मेरा जीवन अलौकिक शक्ति से और दिव्यता से चमक उठा है... मैं आत्मा कितनी भाग्यशाली हूं जिसको परमात्मा की पालना मिली... अपने भाग्य को देख मैं आत्मा असीम सुख का अनुभव कर रही हूं...*

 

  *बाबा एक बहुत सुंदर गुलाब को अपने हाथ में लेकर मुझे दिखाते हुए बोले:-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... इस फूल में कितने कांटे हैं फिर भी सबकी नजर इस फूल पर ही पड़ती है क्योंकि फूल की सुंदरता, महक और मन को मोहने वाले सौंदर्य को देख कर सबका मन खिल जाता है ऐसे ही तुम्हें भी सुख देने वाला फूल बन सबको बाप समान सुख देना है... *बाप तुम्हें ज्ञान के खज़ानों से माला माल करने आये हैं,* इस ज्ञान को धारण कर तुम्हें दूसरों को भी कराने की सेवा करनी है... *इस पतित दुनिया से उपराम बनने के लिए इस ज्ञान सागर में रोज़ स्नान करो... निरंतर ज्ञान स्नान से तुम्हारे विकर्म विनाश हो जाएंगे और तुम पवित्र दुनिया के मालिक बन जाएंगे...*

 

_ ➳  *ज्ञान रत्नों से अलंकृत होकर बाबा की मधुर वाणी को दिल में समाते हुए मैं आत्मा बाबा से कहती हूं:-* " प्राण प्यारे बाबा मेरे... मैं जन्मों जन्मों से भटकती हुई आज अपने दिलाराम बाबा को पाकर खुशी से झूम रही हूं... *अपने स्वरूप को निखरता हुआ देख कर मन में अपार खुशी का अनुभव कर रही हूं...* जीवन इतना खूबसूरत हो जाएगा कभी सोचा न था... *मेरी मंज़िल मुझे मिल गयी है आपकी श्रीमत को धारण कर मैं आत्मा निखर गयी हूं... आपका स्नेह और साथ पाकर मैं अतीन्द्रिय सुख के झूले में निरंतर झूल रही हूं...*

 

  *बाबा मेरे सर पर बहुत प्यार से हाथ फेरते हुए कहते हैं:-* " मेरे नैनों के नूर मेरे लाडले बच्चे... तुम्हारा भाग्य तुम्हारे ही हाथों में है जितना चाहे उतना बना सकते हो... दुनिया में कितनी आत्माएं भटक रही है उनको ठिकाना मिल जाये ऐसा अपना स्वरूप बनाओ... तुम्हें देख दूसरे भी अपने जीवन को परमात्म प्रेम से भरें ऐसा आत्मिक स्वरूप प्रत्यक्ष करो... एक बाप दूसरा न कोई इस मंत्र को सदैव स्मृति में रखो... *एक बाप से योग लगाकर अपने विकर्मों को भस्म कर मेरे साथ चलने की तैयारी करो... पवित्र बने बिना तुम मेरे साथ जा नही सकते इसलिए अशरीरी पन का निरंतर अभ्यास करो... सम्पूर्ण पवित्र बन बाप से पूरा वर्सा लो...*

 

_ ➳  *बाबा की मीठी मीठी बातों को स्वयं में धारण करते हुए मैं आत्मा बाबा से कहती हूं:-* "मेरे मीठे जादूगर बाबा... आपने तो मेरा जीवन सचमुच कितना दिव्य बना दिया है... मैं क्या से क्या हो गयी हूँ ,अपने भाग्य को देख कर मेरा मन खुशी के गीत गा रहा है और झूम झूम कर नाच रहा है... मैं आत्मा कितना भी शुक्रिया करूं कम ही लगता है... आपकी रहमतों के आगे तो शुक्रिया शब्द भी बहुत छोटा लग रहा है... *मेरी बुद्धि को पत्थर से पारस बुद्धि बना दिया है... ज्ञान रत्नों से आपने मेरा श्रृंगार कर मेरे स्वरूप को निखार दिया है... आपकी श्रीमत पाकर मैं आत्मा धन्य धन्य हो गयी हूँ... मीठे बाबा को दिल की गहराइयों से शुक्रिया कर मैं आत्मा अपने साकार तन में लौट आती हूं...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *ड्रिल :- माया की ग्रहचारी से बचने के लिए मुख से सदैव ज्ञान रत्न निकालने हैं*"

 

_ ➳  अविनाशी ज्ञान रत्नों से मुझ आत्मा का श्रृंगार करने वाले ज्ञान सागर *अपने प्यारे शिव प्रीतम से मिलने की जैसे ही मन में इच्छा जागृत होती है। वैसे ही मैं आत्मा सजनी ज्ञान रत्नों का सोलह श्रृंगार कर चल पड़ती हूँ ज्ञान के अखुट खजानो के सौदागर अपने शिव प्रीतम के पास*। उनके साथ अपने प्यार की रीत निभाने के लिए देह और देह के साथ जुड़े सर्व संबंधों को तोड़, निर्बंधन बन, ज्ञान की पालकी में बैठ मैं आत्मा मन बुद्धि की यात्रा करते हुए अब जा रही हूं उनके पास।

 

_ ➳  उनका प्यार मुझे अपनी ओर खींच रहा है और उनके प्रेम की डोर में बंधी मैं बरबस उनकी ओर खिंचती चली जा रही हूँ। *उनके प्यार में अपनी सुध-बुध खो चुकी मैं आत्मा सजनी सेकंड में इस साकार वतन और सूक्ष्म वतन को पार कर पहुंच जाती हूं परमधाम अपने शिव साजन के पास*। ऐसा लग रहा है जैसे वह अपनी किरणों रूपी बाहें फैलाए मेरा ही इंतजार कर रहे हैं। उनके प्यार की किरणों रूपी बाहों में मैं समा जाती हूं। उनके निस्वार्थ और निश्छल प्यार से स्वयं को भरपूर कर, तृप्त होकर मैं आ जाती हूँ सूक्ष्म लोक।

 

_ ➳  लाइट का फरिश्ता स्वरूप धारण कर मैं फ़रिशता पहुंच जाता हूं अव्यक्त बापदादा के सामने। अव्यक्त बापदादा की आवाज मेरे कानों में स्पष्ट सुनाई दे रही है। *बाबा कह रहे हैं, हे आत्मा सजनी आओ:- "ज्ञान रत्नों का श्रृंगार करने के लिए मेरे पास आओ"।* बाप दादा की आवाज सुनकर मैं फ़रिशता उनके पास पहुंचता हूं। बाबा अपने पास बिठाकर बड़ी प्यार भरी नजरों से मुझे निहारने लगते हैं और अपनी सर्व शक्तियों रूपी रंग बिरंगी किरणों से मुझे भरपूर करने लगते हैं।

 

_ ➳  सर्वशक्तियों से मुझे भरपूर करके बाबा अब मुझे एक बहुत बड़े हॉल के पास ले आते हैं। जिसमें अमूल्य हीरे जवाहरात, मोती, रत्न आदि बिखरे पड़े हैं। किंतु उस पर कोई भी ताला चाबी नहीं है। उनकी चमक और सुंदरता को देखकर मैं आकर्षित होकर उस हॉल के बिल्कुल नजदीक पहुंच जाता हूं। *बाबा मुझे उस हॉल के अंदर ले जाते हैं और मुझसे कहते हैं:- "ये अविनाशी ज्ञान रत्न है। इन अविनाशी रत्नों का ही आपको श्रृंगार करना है"।* कितना लंबा समय अपने अविनाशी साथी से अलग रहे तो श्रृंगार करना ही भूल गए, अविनाशी खजानों से भी वंचित हो गए। किंतु अब बहुत काल के बाद जो सुंदर मेला हुआ है तो इस मेले से सेकेंड भी वंचित नहीं रहना।

 

_ ➳  यह कहकर बाबा उन ज्ञान रत्नों से मुझे श्रृंगारने लगते हैं। *मेरे गले मे दिव्य गुणों का हार और हाथों में मर्यादाओं के कंगन पहना कर बाबा मुझे सर्व ख़ज़ानों से भरपूर करने लगते है*। सुख, शांति, पवित्रता, शक्ति और गुणों से अब मैं फ़रिशता स्वयं को भरपूर अनुभव कर रहा हूँ। बाबा ने मुझे ज्ञान रत्नों के खजानों से मालामाल करके सम्पत्तिवान बना दिया है। सर्वगुणों और सर्वशक्तियों के श्रृंगार से सजा मेरा यह रूप देख कर बाबा खुशी से फूले नही समा रहे। बाबा जो मुझ से चाहते हैं, बाबा की उस आश को मैं आत्मा सजनी बाबा के नयनो में स्पष्ट देख रही हूं।

 

_ ➳  मन ही मन अपने शिव प्रीतम से मैं वादा करती हूँ कि ज्ञान रत्नों के श्रृंगार से अब मैं आत्मा सदा सजी हुई रहूँगी और मुख से सदैव ज्ञान रत्न ही निकालूंगी। *अपने शिव साथी से यह वादा करके अपनी फ़रिशता ड्रेस को उतार अब धीरे-धीरे मैं आत्मा वापिस इस देह में अवतरित हो गयी हूँ*। अब मैं बाबा से मिले सर्व ख़ज़ानों से स्वयं को सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ। जैसे मेरे अविनाशी साजन ने मुझ आत्मा को गुणों  और शक्तियों के गहनों से सजाया है वैसे ही मैं आत्मा भी वरदानीमूर्त बन अब अपने सम्बन्ध-सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को अपने मुख से ज्ञान रत्नों का दान दे कर उन्हें भी परमात्म स्नेह और शक्तियों का अनुभव करवा रही हूं।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सदा पावरफुल वृत्ति द्वारा बेहद की सेवा में तत्पर रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं हद की बातों से मुक्त्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा बोल और चाल चलन को सदैव प्रभावशाली बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सेवा में सदा सफलता प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं निष्काम सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  मेहनत से छुटने की विधि- मेरा-पन समाप्त करोः- बापदादा सभी बच्चों को मेहनत से छुड़ाने आये हैं। आधाकल्प बहुत मेहनत की अब मेहनत समाप्त। उसकी सहज विधि सुनाई है, *सिर्फ एक शब्द याद करो - मेरा बाबा'। मेरा बाबा कहने में कोई भी मेहनत नहीं। मेरा बाबा कहो तो, दुख देने वाला मेरामेरा' सब समाप्त हो जायेगा। जब अनेक मेरा है तो मुश्किल है, एक मेरा हो गया तो सब सहज हो गया। बाबा-बाबा कहते चलो तो भी सतयुग में आ जायेंगे।* मेरा पोत्रा, मेरा धोत्रा, मेरा घर, मेरी बहू... अब यह जो मेरे-मेरे की लम्बी लिस्ट है इसे समाप्त करो। अनेकों को भुलाकर एक बाप को याद करो तो मेहनत से छूट आराम से खुशी के झूले में झूलते रहेंगे। सदा बाप की याद के आराम में रहो।

 

✺  *"ड्रिल :- मेरा बाबा शब्द की स्मृति से अनेको मेरा मेरा भूलने का अनुभव"*

 

_ ➳  *मेरा बाबा शब्द की रूहानी चुम्बकीय शक्ति से... मैं आत्मा प्यारे बाबा की याद में खींची चली जा रही हूँ...* मैं आत्मा मुक्त गगन की पंछी बन ऊपर उड रही हूँ... सांसारिक डाल की पकड को छोड रही हूँ... सर्व बन्धनों से छूट रही हूँ... *मेरा बाबा शब्द के जादू से मैं आत्मा डाल की पंछी से उड़ता पंछी बन रही हूँ...* मैं उड़ता पंछी पंच तत्वों की दुनिया से परे सूक्ष्मलोक पहुँच जाती हूँ...

 

_ ➳  *मेरा बाबा, प्यारा बाबा, मीठा बाबा कहते-कहते... मैं आत्मा बाबा के सामने बैठ जाती हूँ... बापदादा के रूहानी नैनों से अलौकिक, पारलौकिक रुहानी प्रेम छलक रहा है...* मुझ आत्मा का देहभान छूट रहा है... मैं आत्मा देही-अभिमानी बन रही हूँ... मुझ आत्मा का देह के सम्बन्धियों से मोह खत्म हो रहा है... *मुझ आत्मा का इस पुरानी दुनिया, पुरानी वस्तु-वैभव का आकर्षण ख़तम हो रहा है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा कई जन्मों से मेरा तन, मेरा मन, मेरा धन करते-करते दुखी, अशांत हो गई थी...* मेरा-मेरा करते मैं स्वयं को ही भूल गई... अपने पिता को भूल गई... अपने असली घर को ही भूल गई थी... मेरा बाबा शब्द की स्मृति से मैं आत्मा अपने स्व स्वरूप की स्मृति में टिक रही हूँ... *मुझ आत्मा को अपने असली पिता, असली घर, असली लक्ष्य स्पष्ट दिख रहा है...*

 

_ ➳  *मेरा बाबा शब्द में अनेकों मेरा-मेरा समा रहा है...* मैं आत्मा सबकुछ भूल एक बाबा को ही याद करती हूँ... मैं आत्मा विनाशी चीजों के मेरे-मेरे से किनारा कर रही हूँ... अविनाशी वर्से की अधिकारी बन रही हूँ... मैं आत्मा मेहनत से छूट रही हूँ... सहजयोगी बन रही हूँ... *अब मैं आत्मा मेरा बाबा शब्द की स्मृति से अनेको मेरा मेरा भूलकर... सदा बाबा की याद की खुशी के झूले में झूलने का अनुभव कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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