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 08 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *हर कर्म में नवीनता का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *बाप से मिलन की मौज का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *स्वयं को अचल अडोल आत्मा अनुभव किया ?*

 

➢➢ *सफलता के सितारे बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे वह तपस्वी सदैव आसन पर बैठते हैं, ऐसे आप अपनी एकरस आत्मा की स्थिति के आसन पर विराजमान रहो। इस आसन को नहीं छोड़ो तब सिंहासन मिलेगा।* आपकी हर कर्मेन्द्रिय से देह-अभिमान का त्याग और आत्म-अभिमानी की तपस्या प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं हिम्मत से बाप की मदद प्राप्त करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  *हिम्मते बच्चे मददे बाप। बच्चों की हिम्मत पर सदा बाप की मदद पद्मगुणा प्राप्त होती है। बोझ तो बाप के ऊपर है। लेकिन ट्रस्टी बन सदा बाप की याद से आगे बढ़ते रहो। बाप की याद ही छत्रछाया है।* पिछला हिसाब सूली है लेकिन बाप की मदद से काँटा बन जाता है।

 

  *परिस्थितियाँ आनी जरूर हैं क्योंकि सब कुछ यहाँ ही चुक्तु करना है। लेकिन बाप की मदद काँटा बना देती है, बड़ी बात को छोटा बना देती है क्योंकि बड़ा बाप साथ है। सदा निश्चय से आगे बढ़ते रहो। हर कदम में ट्रस्टी। ट्रस्टी अर्थात् सब कुछ तेरा, मेरा-पन समाप्त*

 

  *गृहस्थी अर्थात् मेरा। तेरा होगा तो बड़ी बात, छोटी हो जायेगी और मेरा होगा तो छोटी बात, बड़ी हो जायेगी। तेरा-पन हल्का बनाता है और मेरा-पन भारी बनाता है।* तो जब भी भारी अनुभव करो तो चेक करो कि कहाँ मेरा-पन तो नहीं? मेरे को तेरे में बदली कर दो तो उसी घड़ी हल्के हो जायेंगे, सारा बोझ एक सेकेण्ड में समाप्त हो जायेगा।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  शुरू में सभी साक्षात्कार हुए है। *फरिश्ते रूप में सम्पूर्ण स्टेज और पुरुषार्थी स्टेज दोनों अलग - अलग अनुभव थे।* जैसे साकार ब्रह्मा और सम्पूर्ण ब्रह्मा का अलग - अलग साक्षात्कार होता था, वैसे अनन्य बच्चों के साक्षात्कार भी होंगे।

 

✧  हंगामा जब होगा तो साकार शरीर द्वारा तो कुछ कर नहीं सकेंगे और प्रभाव भी इस सर्वीस से पडेगा। जैसे शुरू में भी साक्षात्कार से ही प्रभाव हुआ ना। परोक्ष - अपरोक्ष अनुभव से प्रभाव डाला। वैसे अन्त में भी यही सर्वीस होनी है। *अपने सम्पूर्ण स्वरूप का साक्षात्कार अपने आप को होता है?*

 

✧  अभी शक्तियों को पुकारना शुरू हो गया है। अभी परमात्मा को कम पुकारते है, शक्तियों की पुकार तेज रफ्तार से चालू हो गई है। तो ऐसी प्रैक्टिस बीच - बीच में करनी है। *आदत पड जाने से फिर बहुत आनंद फील होगा।* एक सेकण्ड में आत्मा शरीर से न्यारी हो जायेगी, प्रैक्टिस हो जायेगी। अभी यही पुरुषार्थ करना है। अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *रूहानी गुलाब जो सदा अपने रूहानियत की स्थिति में स्थित रहते हुए सर्व को भी रूहानियत की दृष्टि से देखने वाले, सदा मस्तकमणि को देखने वाले हैं।* साथ-साथ अपनी रूहानियत की स्थिति से सदा अर्थात् हर समय सर्व आत्माओं को अपनी स्मृति, दृष्टि और वृत्ति से रूहानी बनाने के शुभ संकल्पों में रहने वाले *अर्थात् हर समय योगी तू आत्मा सेवाधारी आत्मा हो कर चलने वाले* - ऐसे रूहानी गुलाब चारों ओर फुलवारी के बीच बहुत थोड़े कही कही देखे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  तपस्या अर्थात बाप से मौज मनाना"*

 

_ ➳  सुबह की गुलाबी सी धूप में सूर्य की सुनहरी किरणों को... गुलाब के फूलो पर गिरते हुए देख रही हूँ... कि *ये किरणे किस तरहा गुलाब के सौंदर्य में चार चाँद लगा रही है... उनका रूप लावण्य किस कदर चमक उठा है.*.. और फिर मै आत्मा अपने ज्ञान सूर्य बाबा की यादो में खो जाती हूँ... मुझ आत्मा के देह की संगति में कंटीले स्वरूप.... *कैसे मेरे बाबा ने अपनी शक्तियो और गुणो की किरणों में... रूहानियत से भर कर खिला हुआ, खुशबूदार फूल बना दिया है... कि आज मेरी सुगन्ध का विश्व मुरीद हो गया है..*. मुझे जो सौंदर्य मिला है वह स्वयं भगवान ने दिया है... जो पूरे विश्व में कहीं और मिल ही नही सकता है... सारा विश्व इस खूबसूरती को चाह रहा है... और *यह मेरी जागीर बन गया है क्योकि सिर्फ मेरे पास ही तो भगवान है.*..

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को देहभान से न्यारा बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... मीठे बाबा के साथ की ऊँगली पकड़कर... इस देह भान से उबर कर... स्वयं को आत्मिक स्वरूप में स्थित करो... इस पतित और विकारो से ग्रसित दुनिया में लिप्त रहकर... बुद्धि को और ज्यादा मलिन न करो... *ईश्वर पिता की यादो भरे हाथ को पकड़कर, बेहद के सन्यासी बनकर मुस्कराओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से देवताई श्रंगार पाकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा आपकी छत्रछाया में दुखो की दुनिया से निकलकर... सुखो भरी छाँव में आ गयी हूँ... *हद के दायरों से निकलकर, बेहद की सन्यासी बन, असीम खुशियो से भर गयी हूँ.*.. मेरा जीवन खुशनुमा बहारो से भर गया है..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को कांटे से खुशबूदार फूल बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... संगम के वरदानी समय में ईश्वरीय यादो की बहारो से सजे... खुशनुमा मौसम में अपने महान भाग्य के मीठे गीत गाओ... *पतित दुनिया की हदो से निकलकर... बेहद के गगन में, खुशियो भरा उन्मुक्त पंछी बन उड़ जाओ..*. बेहद के सन्यासी बन तपस्या में खो जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की बाँहों में अपना सतयुगी भाग्य सजाकर कहती हूँ :-* "ओ मेरे प्यारे बाबा... *आपने मेरा जीवन खुशियो का चमन बना दिया है... ज्ञान और याद की रौनक से झिलमिला कर, आत्मिक भाव में जगमगा दिया है.*.. मै आत्मा देह की सारी सीमाओ से निकल कर... बेहद के आसमाँ में खुशियो की परी बनकर उड़ रही हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सतयुगी दुनिया का मालिक बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... सदा ईश्वरीय यादो में खोये रहो... भगवान को पाकर भी, अब देह की मिटटी में मनबुद्धि के हाथो को पुनः मटमैला न करो...इस पतित दुनिया में स्वयं को और न फंसाओ... *बेहद के वैराग्य को अपनाकर, यादो में मन बुद्धि को निर्मलता से सजाकर... असीम सुखो के अधिकारी बन मुस्कराओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की श्रीमत को दिल में समाकर जीवन को खुबसूरत बनाकर कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे... आपने मेरा जीवन बेहद के सन्यास से भरकर, कितना हल्का और प्यारा कर दिया है... मन और बुद्धि व्यर्थ से निकलकर... अब कितनी प्यारी और सुखदायी हो गयी है... *मेरे सारे बोझ काफूर हो गए है, और मै आत्मा बेफ़िक्र बादशाह बनकर मुस्करा रही हूँ.*.."मीठे बाबा को अपना प्यारा मन और बुद्धि की झलक दिखाकर, मै आत्मा... कर्मक्षेत्र पर लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- हर कर्म में नवीनता का अनुभव*"

 

_ ➳  स्वयं भगवान की पालना में पलने वाली मैं ब्राह्मण आत्मा कितनी पदमापदम सौभाग्य शाली हूँ जो मेरा एक - एक सेकेण्ड परमात्म पालना के झूले में झूलते हुए बीतता है। *जिस भगवान के दर्शनों की दुनिया प्यासी है वो भगवान मेरे हर दिन की शुरुआत से लेकर रात के सोने तक मेरे साथ रहता है*। अमृत वेले बड़े प्यार से मीठे बच्चे कहकर मुझे उठाता है। वरदानो से मेरी झोली भरता है। टीचर बन मुझे पढ़ाता है। चलते फिरते उठते बैठते हर कर्म करते मेरा साथी बन मेरे साथ रहता है। *अपनी श्रेष्ठ मत देकर मुझे श्रेष्ठ कर्म करना सिखलाता है। सर्व सम्बन्धो का मुझे सुख देता है*। 

 

_ ➳  ऐसे अपने सर्वश्रेष्ठ संगमयुगी ब्राह्मण जीवन की अनमोल प्राप्तियों की स्मृति में खोई अपने प्यारे प्रभु के प्रेम की लगन में मग्न मैं आत्मा उनसे मिलने के लिए आतुर हो उठती हूँ और *मन मे अपने प्यारे प्रियतम की मीठी सी सुखद याद को समाये, मन बुद्धि के विमान पर सवार होकर उनसे मिलने उनके धाम की ओर चल पड़ती हूँ*। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे प्रियतम बाबा मुझे सहज ही अपनी ओर खींच रहें हैं और मैं देह, देह की दुनिया के आकर्षण से मुक्त होकर, बस उनकी ओर खिंचती चली जा रही हूँ। 

 

_ ➳  कुछ ही क्षणों की अद्भुत रूहानी यात्रा को पूरा कर मैं पहुँच जाती हूँ अपने प्यारे शिव पिता के पास। लाइट की एक ऐसी दुनिया जहाँ चारों और चमकती हुई मणियां जगमग कर रही है। इस परमधाम घर में मैं स्वयं को अपने प्यारे प्रभु के सम्मुख देख रही हूँ। *बाबा के साथ अटैच होकर उनसे आ रही लाइट, माइट से मैं स्वयं को भरपूर कर रही हूँ। बाबा से आ रही सर्वशक्तियाँ मुझमे असीम बल भर कर मुझे शक्तिशाली बना रही है*। मैं डबल स्थिति में सहज ही स्थित होती जा रही हूँ। हर बोझ, हर बन्धन से मैं स्वयं को मुक्त अनुभव कर रही हूँ। 

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता परमात्मा के सानिध्य में गहन सुख की अनुभूति करके, और उनकी लाइट माइट से भरपूर हो कर डबल लाइट बन कर अब मैं वापिस लौट रही हूँ। *फिर से साकारी दुनिया मे आकर, अपनी साकारी देह में विराजमान हो कर, अपने प्यारे प्रभु के स्नेह के रस का रसपान करने वाली एकरस आत्मा बन, अब मैं सुबह से लेकर रात तक संगमयुग की मौजों के नजारों का अनुभव करते हुए अपने पिता परमात्मा के स्नेह में सदा समाई रहती हूँ*।  मेरे शिव पिता का निस्वार्थ प्रेम देह और देह की दुनिया से मुझे नष्टोमोहा बना रहा है।

 

_ ➳  अपनी हजारों भुजाओं के साथ बाबा चलते, फिरते, उठते, बैठते हर समय मुझे अपने साथ प्रतीत होते हैं। बाबा के प्रेम का रंग मुझ पर इतना गहरा चढ़ चुका है कि मेरे हर कर्म में बाबा अब सदा मेरे साथ रहते हैं। *अपने पिता परमात्मा के साथ, संगमयुग की मौजों के नजारों का अनुभव मुझे अतीन्द्रीय सुख के झूले सदा झुलाता रहता है। भोजन खाती हूँ तो बाबा के साथ मौज में खाती हूँ। चलती हूँ तो भाग्यविधाता बाप के हाथ मे हाथ देकर चलती हूँ*। ज्ञान अमृत पीती हूँ तो ज्ञानदाता बाप के साथ पीती हूँ। कर्म करती हूँ तो करावनहार बाप के साथ स्वयं को निमित समझ करती हूँ। सोती हूँ तो बाबा की याद की गोदी में सोती हूँ। उठती हूँ तो भी भगवान के साथ रूह - रिहान करके उठती हूँ। 

 

_ ➳  *सारी दिनचर्या में बाबा को साथ रख, खाते, पीते याद की मौज में रहते बेफ़िक्र बादशाह बन अपने निश्चिन्त ब्राह्मण जीवन का मैं भरपूर आनन्द ले रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं शुद्ध संकल्प और श्रेष्ठ संग द्वारा हल्के बन खुशी की डान्स करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अलौकिक फरिश्ता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा परमात्मा प्यार की पालना का स्वरूप हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव सहजयोगी जीवन जीती हूँ  ।*

   *मैं सहजयोगी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  चलते फिरते, बैठते, बातचीत करते पहली अनुभूति- यह शरीर जो हिसाबकिताब के वृक्ष का मूल तना है जिससे यह शाखायें प्रकट होती हैं, यह देह और आत्मा रूपी बीज, दोनों ही बिल्कुल अलग हैं। ऐसे आत्मा न्यारेपन का चलते फिरते बार-बार अनुभव करेंगे। नालेज के हिसाब से नहीं कि आत्मा और शरीर अलग हैं। लेकिन शरीर से अलग मैं आत्मा हूँ! यह अलग वस्तु की अनुभूति हो। *जैसे स्थूल शरीर के वस्त्र और वस्त्र धारण करने वाला शरीर अलग अनुभव होता है ऐसे मुझ आत्मा का यह शरीर वस्त्र है, मैं वस्त्र धारण करने वाली आत्मा हूँ। ऐसा स्पष्ट अनुभव हो। जब चाहे इस देह भान रूपी वस्त्र को धारण करें, जब चाहे इस वस्त्र से न्यारे अर्थात् देहभान से न्यारे स्थिति में स्थित हो जायें। ऐसा न्यारेपन का अनुभव होता है?* वस्त्र को मैं धारण करता हूँ या वस्त्र मुझे धारण करता है?चैतन्य कौन? मालिक कौन? तो एक निशानी - न्यारेपन की अनुभूति'। अलग होना नहीं है लेकिन मैं हूँ ही अलग।

 

✺  *"ड्रिल :- 'शरीर से अलग मैं आत्मा हूँ' - ऐसा स्पष्ट अनुभव करना*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एकांत में बैठकर व्यर्थ संकल्पों की बहती हुई बाढ़ से किनारा कर मन के अंतर्द्वार खोलकर अन्दर प्रवेश करती हूँ...* चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा है... मैं आत्मा और अन्दर अंतर्मन की गहराईयों में प्रवेश करती हूँ... अंतर्मन के अँधेरे कमरे में एक बुझती-जगती हुई, टिमटिमाती हुई लाइट दिखाई दे रही है... *इस लाइट के चारों ओर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, देह अभिमान, कई जन्मों के विकर्म और विकारों रूपी राक्षस इस दीपक के घृत को पी रहे थे...*

 

_ ➳  मैं आत्मा इन राक्षसों से निपटने प्यारे बाबा को बुलाती हूँ... प्यारे बाबा तुरंत आ जाते हैं... बाबा का हाथ पकड़ मैं आत्मा अंतर्मन में प्रवेश करती हूँ... प्यारे बाबा के हाथों से शक्तिशाली किरणें निकल रही हैं... प्यारे बाबा की याद की शक्ति रूपी किरणों से इन सभी राक्षसों का खात्मा हो रहा है... *देह का भान, देह के बंधन, देह के पदार्थ, पुराने स्वभाव-संस्कार, सभी कमी-कमजोरियां भस्म होकर राख बन रही हैं... योग की तेज हवाएं इस राख को भी बाहर फेंक रही हैं...*

 

_ ➳  अब मीठे बाबा इस दीपक में ज्ञान का घृत डालते हैं... *ज्ञान के घृत से टिमटिमाता हुआ दिया जगमगाता हुआ जलने लगता है...* अंतर्मन का कमरा चारों ओर से प्रकाशित हो रहा है... ये जगमगाता हुआ चैतन्य दीपक मैं आत्मा हूँ... *अब मुझ आत्मा के अंतर्मन में कोई भी किचड़ा नहीं है... पूरा कमरा बिल्कुल साफ़ हो चुका है... ज्ञान, योग से प्रकाशित हो चुका है...*

 

_ ➳  *सर्व बंधनों से मुक्त मैं आत्मा इस देह की मालिक हूँ...* इस देह रूपी वस्त्र को धारण कर मैं आत्मा सर्व कर्म कर रही हूँ... *इस विनाशी देह में रहकर अपना पार्ट बजाने वाली मैं अविनाशी आत्मा हूँ...* मैं तो एक अशरीरी आत्मा हूँ... इस शरीर को धारण कर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करती हूँ... ये मन, बुद्धि भी मुझ आत्मा के ही सूक्ष्म शक्तियां हैं... मैं आत्मा अज्ञानता वश इनके अधीन होकर दुखी हो गई थी... अब मैं आत्मा इनको अपने अधीन कर जैसा चाहे वैसा कर्म करा रही हूँ...

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ कि मैं इस देह से बिल्कुल अलग हूँ...* मैं आत्मा जब चाहे तब इस शरीर रूपी वस्त्र को धारण कर सकती हूँ... जब चाहे तब इस शरीर रूपी वस्त्र को छोडकर कहीं भी जा सकती हूँ... मैं आत्मा जब चाहे तब इस शरीर से डिटैच होकर न्यारेपन का अनुभव करती हूँ... *अब मैं आत्मा चलते-फिरते सदा इसी न्यारेपन की स्थिति में स्थित रहती हूँ कि मैं ये शरीर नहीं बल्कि देहरूपी वस्त्र धारण करने वाली चैतन्य आत्मा हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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