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 08 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सपूत बच्चा बन सर्विस का सबूत दिया ?*

 

➢➢ *ज्ञान धन पात्र देखकर किया ?*

 

➢➢ *सदा मोल्ड होने की विशेषता से संपर्क और सेवा में सफल हुए ?*

 

➢➢ *सर्वशक्तियों को अपना साथी बना निर्विघन सफलता प्राप्त की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *आप ब्राह्मण आदि रत्न विशेष तना हो। तना से सबको सकाश पहुँचती है। तो कमजोरों को बल दो।* अपने पुरुषार्थ का समय दूसरों को सहयोग देने में लगाओ। दूसरों को सहयोग देना अर्थात् अपना जमा करना। *अभी ऐसी लहर फैलाओ-देना है, देना है, देना ही देना है। देने में लेना समाया हुआ है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *" मैं होली हँस हूँ"*

 

  सदा अपने को होली हंस समझते हो? होली हंस का कर्तव्य क्या है? *व्यर्थ और समर्थ को परखना। वो तो कंकड़ और रत्न को अलग करता लेकिन आप होली हंस समर्थ को धारण करते हो, व्यर्थ को समाप्त करते हो। तो समर्थ और व्यर्थ, इसको परखना और परिवर्तन करना-यह है होली हंस का कर्तव्य।*

 

  सारे दिन में व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ सम्बन्ध-सम्पर्क जो भी होता है, उस व्यर्थ को समाप्त करना-यह है होली हंस। कोई कितना भी व्यर्थ बोले लेकिन आप व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन कर दो। *व्यर्थ को अपनी बुद्धि में स्वीकार नहीं करो। अगर एक भी व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म स्वीकार किया तो एक व्यर्थ अनेक व्यर्थ को जन्म देगा। एक व्यर्थ बोल भी स्पर्श हो गया तो वह अनेक व्यर्थ का अनुभव करायेगा, जिसको आप लोग कहते हो-फीलिंग आ गई।*

 

  एक व्यर्थ संकल्प की फीलिंग आई तो वह फीलिंग को बढ़ायेगी। इसीलिए व्यर्थ की पैदाइस बहुत फास्ट होती है-चाहे कर्म हो, चाहे क्या भी हो। एक व्यर्थ बोल बोलेंगे तो उसे सिद्ध करने के लिए कितने व्यर्थ बोल बोलने पड़ेंगे! जैसे लोग कहते हैं ना-एक झूठ को सिद्ध करने के लिए कितने झूठ बोलने पड़ते हैं! तो *व्यर्थ का खाता समाप्त हो जाये और सदा समर्थ का खाता जमा होता रहे। वो व्यर्थ आपको दे लेकिन आप परिवर्तन कर समर्थ धारण करो। इतनी तीव्र परिवर्तन-शक्ति चाहिए।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *संस्कार का स्वरूप क्या होगा?किसी के पास कर्मभोग के रूप में आयेंगे, किसी के पास कर्म सम्बन्ध के बन्धन के रूप में आयेंगे। किसी के पास व्यर्थ संकल्प के रूप में आयेंगे। किसी के पास विशेष अलबेलेपन और आलस्य के रूप में आयेंगे।* ऐसे चारों ओर का हलचल का वातावरण होगा।

 

✧  राज्यसत्ता, धर्मसत्ता, विज्ञानसता और अनेक प्रकार के बाहुबल सब अपनी सताओं की हलचल में होंगे। ऐसे *समय पर फुलस्टॉप लगाना आयेगा या क्वेचन मार्क सामने आयेगा?* क्या होगा? इतनी समेटने की शक्ति अनुभव करते हो।

 

✧  *देखते हुए न देखो, सुनते हुए न सुनो। प्रकृति की हलचल देख प्रकृतिपति बन प्रकृति को शान्त करो।* अपने फुलस्टॉप की स्टेज से प्रकृति की हलचल को स्टॉप करो। तमोगुणी से सतीगुणी स्टेज में परिवर्तन करो। ऐसा अभ्यास है? ऐसे समय का आह्वान कर रहे हो ना?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ अवतार अर्थात् ऊपर से आने वाली आत्मा। *मूलवतन की स्थिति में स्थित हो ऊपर से नीचे आओ।* नीचे से ऊपर नहीं जाओ। है ही परमधाम निवासी आत्मा, सतोप्रधान आत्मा। *अपने आदि-अनादि स्वरूप की स्मृति में रहो फिर क्या हो जायेगा? स्वंय भी निर्बन्धन और जिन्हों की सेवा के निमित्त बने हो वह भी निर्बन्धन हो जायेंगे।* जैसे साकार बाप को देखा, क्या याद रहा? बाप के साथ मैं भी कर्मातीत स्थिति में हूँ या देवताई बचपन रूप में। अनादि आदि रूप सदा स्मृति में रहा तो फ़ालो फ़ादर।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- प्योरिटी को धारण करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अमृतवेले के समय अमृत पान करने चार धामों की यात्रा पर निकल पड़ती हूँ...* मन-बुद्धि के रॉकेट में बैठ अपने घर मधुबन पहुँच जाती हूँ... बाबा का कमरा, बाबा की कुटिया और हिस्ट्री हाल की रूहानी यात्रा करते हुए मैं आत्मा शांति स्तम्भ के सामने बैठ जाती हूँ... *मुस्कुराते हुए, दोनों हाथों को फैलाए मेरे प्राण प्यारे बाबा मुझे अपनी बाँहों में ले लेते हैं और शांति की ठंडी-ठंडी किरणें बरसाते हुए मीठी शिक्षाएं देते हैं...*

 

  *पवित्रता के सागर मेरे प्यारे बाबा पवित्र किरणों को बरसाते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे.... ईश्वर पिता की गोद में बैठ कमल फूल सी पवित्रता से सज जाओ... *मनसा वाचा कर्मणा पवित्र होकर सम्पूर्ण पवित्रता से विश्व मालिक बन खुशियो में झूम जाओ... पावनता से सजधज कर ईश्वर पिता के सहयोगी बन... सदा के सुखो में मुस्कराओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा लक्ष्य सोप से अपने मटमैलेपन को धोकर पवित्रता का कवच धारण करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी फूलो सी गोद में, रूहानी गुलाब सी खिल उठी हूँ... *आपकी यादो में पायी पावन खुशबु से... पूरे विश्व को सुवासित कर रही हूँ... पवित्रता की सुगन्ध में हर दिल को महका रही हूँ...*

 

  *पवित्रता के सितारों से सजाकर मेरे जीवन को कंचन बनाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *फूल से बच्चों को दुखो के जंगल में भटकते देख... विश्व पिता को भला कैसे चैन आये... बच्चों के सुख की चाहना दिल में लिये धरा पर उतर आये... फिर से पावनता में खिलाकर अनन्त सुखो का अधिकारी सजाये...* तब कही विश्व पिता करार सा पाये... पवित्रता की चुनर ओढ़ा कर देव तुल्य बनाये...

 

_ ➳  *पवित्रता के मैनर्स धारण कर हीरे जैसा नया जीवन पाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा देह के भान से निकल पवित्रता से सजकर पुनः देवताई सुखो की अधिकारी बन रही हूँ...* प्यारे बाबा विश्व परिवर्तन के महान कार्य में... पावनता से सहयोगी बनकर ईश्वरीय दिल जीतने वाली भाग्यवान हो गयी हूँ...

 

  *रूहानी नजरों से निहाल कर पावन बनाते हुए मेरे प्यारे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... देह के झूठे मटमैले आवरण से बाहर निकल... अपने दमकते स्वरूप को स्मृतियों में भर लो... *ईश्वरीय बाँहों में पावनता से भरपूर हो जाओ... विकारो की कालिमा से मुक्त होकर, उज्ज्वल धवल तेजस्वी रूप में खिल कर... पावन तरंगो से विश्व धरा को तरंगित करो...*

 

_ ➳  *पावनता के रिमझिम से अतीन्द्रिय सुखों में झूमती हुई, बाबा को शुक्रिया करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा पावनता को पाकर कितनी अनोखी और अमूल्य हो गयी हूँ... आपने मुझे कौड़ी से हीरे सा बनाकर दिल तख्त पर सजा लिया है...* मुझे दिव्यता से भरकर देवताई सुखो से सजा दिया है... मै आत्मा आपकी रोम रोम से ऋणी हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- श्रीमत पर स्वयं को श्रेष्ठ बनाना है*"

 

_ ➳  अपने सम्पूर्ण निर्विकारी अनादि और आदि स्वरुप को स्मृति में लाते ही मन बुद्धि से मैं पहुंच जाती हूँ परमधाम। यहां मैं आत्मा अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप में स्थित हूँ। *निराकारी आत्माओं की इस दुनिया में  अपनी स्वर्णिम किरणे बिखेरते हुए एक चमकते हुए सितारे के रुप में मैं स्वयं को देख रही हूं*। मेरा यह दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप मन को लुभाने वाला है। अपने इस सम्पूर्ण निर्विकारी स्वरूप में मैं आत्मा सातों गुणों से, सर्वशक्तियों से सम्पन्न हूँ। मेरे सामने महाज्योति मेरे शिव पिता परमात्मा एक ज्योतिपुंज के रूप में अपनी सर्वशक्तियों रूपी अनन्त किरणों के साथ सुशोभित हो रहें हैं।

 

_ ➳  अपने शिव पिता परमात्मा के साथ आत्माओं की निराकारी दुनिया मे रहने वाली मैं सम्पूर्ण निर्विकारी आत्मा ड्रामा अनुसार पार्ट बजाने के लिए सृष्टि रंगमंच पर उतरती हूँ। *प्रकृतीक सौंदर्य से परिपूर्ण, एक स्वर्णिम दुनिया सतयुग में अपने सम्पूर्ण निर्विकारी देवताई स्वरुप को धारण किये मैं इस सुंदर धरा पर अवतरित होती हूँ जो मेरे पिता परमात्मा ने मेरे लिए रची है*। मेरा यह सम्पूर्ण निर्विकारी देवताई स्वरूप सोलह कलाओं से सम्पन्न है। दैवी गुणों से सजी मैं चैतन्य देवी अति शोभायमान लग रही हूं। मुख पर दिव्य आभा और दिव्य मुस्कराहट मन को लुभा रही है।

 

_ ➳  अपने इस देवताई स्वरूप को देख मन ही मन आनन्दित होते हुए अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर याद करती हूं अपने शिव पिता परमात्मा को जिन्होंने ने मुझे ऐसा बनाया। *अपने प्यारे मीठे बाबा की याद मन मे उनसे मिलने की तीव्र इच्छा जागृत कर देती है और जैसे ही मैं उन्हें मिलने के लिए पुकारती हूँ। मेरे दिलराम शिव बाबा सेकण्ड में मेरे पास दौड़े चले आते हैं और आ कर अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में मुझे भर लेते हैं*। अपने शिव पिता परमात्मा की किरणों रूपी बाहों में समा कर इस नश्वर देह और देह की दुनिया को जैसे मैं बिल्कुल भूल जाती हूँ। केवल मेरे दिलाराम शिव बाबा मुझे दिखाई दे रहें हैं और मुझ पर निरन्तर बरसता हुआ उनका प्यार मुझे असीम आनन्द से भरपूर कर रहा है।

 

_ ➳  अपनी बाहों के झूले में झुलाते हुए मेरे मीठे शिव बाबा मुझे अपने साथ इस छी छी विकारी दुनिया से दूर, अपने निर्विकारी धाम की ओर ले कर चल पड़ते हैं। *मैं देख रही हूं एक चमकती हुई ज्योति मैं आत्मा स्वयं को महाज्योति अपने शिव पिता की किरणों रूपी बाहों के झूले में, साकारी दुनिया से दूर ऊपर की ओर जाते हुए*। पांच तत्वों की इस दुनिया के पार, सूक्ष्म लोक से भी पार अपने शिव पिता के साथ मैं पहुंच गई निर्वाणधाम अपने असली घर। शिव पिता के साथ कम्बाइंड हो कर अब मैं स्वयं को उनकी सर्वशक्तियों से भरपूर कर रही हूं। *बाबा से आ रही सर्वशक्तियों का स्वरूप ज्वालामुखी बन कर मुझ आत्मा द्वारा किये हुए 63 जन्मो के विकर्मों को दग्ध कर रहा है*। विकारों की कट उतरने से मैं आत्मा सच्चा सोना बनती जा रही हूं। मुझ आत्मा की चमक करोड़ो गुणा बढ़ती जा रही है। स्वयं को मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूं।

 

_ ➳  अपने शिव पिता की लाइट माइट से स्वयं को भरपूर करके डबल लाइट बन अब मैं वापिस साकारी दुनिया मे अपने साकारी तन में आ कर विराजमान हो जाती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर *अब मैं बाबा की श्रीमत पर चल सम्पूर्ण निर्विकारी बनने का पुरुषार्थ कर रही हूं। बाबा की याद मेरे अंदर बल भर रही है और बाबा की शिक्षाओं को जीवन मे धारण करने से मेरे बोल सहज ही योगयुक्त औऱ युक्तियुक्त, मनसा वृति शक्तिशाली तथा कर्म श्रेष्ठ बन रहे हैं*। बाबा की श्रीमत पर चल अपने कर्मो को श्रेष्ठ बनाकर और बाबा की याद से सर्वशक्ति सम्पन्न स्वरूप बन कर अब मैं अपने श्रेष्ठ कर्मो द्वारा सर्व आत्माओं को भी श्रेष्ठता का अनुभव करवा रही हूं।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सदा मोल्ड होने की विशेषता सम्पन्न आत्मा हूँ।*

   *मैं संपर्क और सेवा में सफल होने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सफलतामूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सर्वशक्ति सम्पन्न हूँ  ।*

   *मैं आत्मा निर्विघ्न सफलता प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं विघ्न विनाशक आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳   *कुमारी वा सेवाधारी के बजाय अपने को शक्ति स्वरूप समझो:- सदा अपना शिव-शक्ति स्वरूप स्मृति में रहता हैशक्ति स्वरूप समझने से सेवा में भी सदा शक्तिशाली आत्माओं की वृद्धि होती रहेगी। जैसी धरनी होती है वैसा फल निकलता है। तो जितनी अपनी स्वयं की शक्तिशाली स्टेज बनातेवायुमण्डल को शक्ति स्वरूप बनाते उतना आत्मायें भी ऐसी आती हैं।* नहीं तो कमजोर आत्मायें आयेंगी और उनके पीछे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। तो सदा अपना शिव-शक्ति स्वरूप' स्मृति भव'। कुमारी नहींसेवाधारी नहीं - शिव शक्ति'। सेवाधारी तो बहुत हैंयह टाइटल तो आजकल बहुतों को मिल जाता है लेकिन आपकी विशेषता है - शिव शक्ति कम्बाइन्ड'। इसी विशेषता को याद रखो। सेवा की वृद्धि में सहज और श्रेष्ठ अनुभव होता रहेगा। सेवा करने के लिफ्ट की गिफ्ट जो मिली है उसका रिटर्न देना है। रिटर्न क्या हैशक्तिशाली - सफलता मूर्त्त।

 

✺   *"ड्रिल :- सदा अपना शिव शक्ति स्वरुप स्मृति में रहना*"

 

_ ➳  मैं आत्मा अपना फ़रिश्ता स्वरुप में बापदादा के साथ पूरे ब्रह्माण्ड में घूम रही हूँ... घूमते घूमते हम एक प्रदेश में पहुँच जाते हैं *जहाँ हरियाली ही हरियाली हैं... चारो और प्रकृति का असीम सौंदर्य हैं... धरती नीली रंग की चुंदरी ओढ़े मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू फैला रही हैं... खुशबूदार रंग बिरंगी फूलों की खुशबू का साम्राज्य छाया हुआ हैं...* और मैं आत्मा यह असीम सुखद नजारा देख कर हर्षित हो रही हूँ... सभी आत्मायें अपने-अपने लौकिक पार्ट को सुखरूप होकर निभा रहे थे...

 

_ ➳  बापदादा मेरा हाथ पकड़कर ले चलते हैं एक ऐसी जगह पर जहाँ मेरा मन बहुत ही विचलित हो जाता हैं... *बंजर जमीन... न मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू न खुश्बूदार हवा का झोंका हैं... मानों बच्चे से बिछुड़ी हुई माँ बैठी हैं अपने बच्चे के इंतजार में... जैसे बारिश की इंतजार में बैठी हैं बंजर जमीन...* और यह नजारा देखकर मन ही मन बाबा को पूछ रही हूँ बाबा यह सब क्या हैं और क्यूँ ऐसा हो रहा हैं... क्या यह भूमि का दोष हैं कि आत्माओं की शक्तियां क्षीण होती जा रही हैं...

 

_ ➳  बापदादा मेरी मनोस्थिति को जान कर मुझ आत्मा को अपने पास बिठाकर मुझ आत्मा को एक सीन दिखा रहा है... *एक खेत में बैठे सभी आत्मायें बापदादा का आह्वान कर रहे हैं...* खेत में अच्छी फसल हो जाये... खेत धन धान्य से भरपूर हो जाये... जमीन अखूट खजानों का भंडार बन जाये... बंजर जमीन से हीरे मोती तुल्य अनाज की हरियाली छा जाये... और *मैं आत्मा देख रही हूँ कि बापदादा स्वयं इस खेत में खड़े हैं और पूरी धरती को प्यार से दृष्टि दे रहे हैं... और बंजर खेत को अपने रूहानी हाथों से प्यार से नहला रहे हैं...*

 

_ ➳  और *देखते ही देखते बंजर खेत हीरे मोती तुल्य धन धान्य से भरपूर हो गया...* हरियाली ही हरियाली छा गयीं ... बंजर खेत फलद्रुप हो गया और सभी आत्मायें बापदादा का शुक्रिया कर रही हैं... और उनको देख के दूसरे खेत में भी सभी आत्मायें बापदादा का आह्वान करने लग गये हैं... धीरे धीरे पूरे बंजर प्रदेश में *बापदादा की शक्तियों रूपी बारिश की वर्षा से बंजर प्रदेश को फलद्रुप बनता देख... सभी खेत में बापदादा का झंडा लहराता देख* मैं आत्मा ख़ुशी से झूम उठती हूँ... *बापदादा के सुनहरे बोल "अपने चहरे और चलन से बापदादा को प्रत्यक्ष करो... शक्ति स्वरुप हो... शक्तियों की वर्षा करो..."*

 

_ ➳  मैं आत्मा यह सुनहरे बोल को अपने दिल में सुवर्ण अक्षरों में अंकित करके... सर्व शक्तियों को अपने में धारण कर... शक्ति स्वरूपा बन हर सेवा को बापदादा की श्रीमत पर परिपूर्ण करती जा रही हूँ... *जैसी धरनी वैसा फल यह स्लोगन को यथार्थ रीति जान अपने आप की सभी कमी कमजोरियों को... विकारों को योग अग्नि में स्वाहा करती जा रही हूँ... अपने शक्ति स्वरुप से शक्तियों की वर्षा बापदादा के संग करती जा रही हूँ...* पूरे वायुमंडल को शक्तिस्वरूप बनाती जा रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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