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 08 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कभी भी अहंकार में तो नहीं आये ?*

 

➢➢ *ज्ञान की नयी नयी बातों को अच्छी रीति समझा व समझाया ?*

 

➢➢ *एक बाप की याद में सदा मगन एह एकरस अवस्था का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *दृढ़ निश्चय से अपने भाग्य को निश्चित किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बीजरूप स्थिति का अनुभव करने के लिए एक तो मन और बुद्धि दोनों को पावरफुल ब्रेक चाहिए और मोड़ने की भी शक्ति चाहिए। इसी को ही याद की शक्ति वा अव्यक्ति शक्ति कहा जाता है। अगर ब्रेक नहीं दे सके तो भी ठीक नहीं। अगर टर्न नहीं कर सके तो भी ठीक नहीं।* तो ब्रेक देने और मोड़ने की शक्ति से बुद्धि की शक्ति व्यर्थ नहीं जायेगी। इनर्जी जितना जमा होगी उतना ही परखने की, निर्णय करने की शक्ति बढ़ेगी।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं ऊँचे से ऊँची श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ"*

 

✧  जैसे ऊंचे से ऊंचा बाप है ऐसे हम आत्मायें भी ऊंचे से ऊंची श्रेष्ठ आत्मायें हैं-यह अनुभव करते हुए चलते हो? *क्योंकि दुनिया वालों के लिये तो सबसे श्रेष्ठ, ऊंचे से ऊंचे हैं बाप के बाद देवतायें। लेकिन देवताओंसे ऊंचे आप ब्राह्मण आत्मायें हो, फरिश्ते हो-ये दुनिया वाले नहीं जानते। देवता पद को इस ब्राह्मण जीवन से ऊंचा नहीं कहेंगे। ऊंचा अभी का ब्राह्मण जीवन है।* देवताओंसे भी ऊंचे क्यों हो, उसको तो अच्छी तरह से जानते हो ना।

 

✧  *देवता रूप में बाप का ज्ञान इमर्ज नहीं होगा। परमात्म मिलन का अनुभव इस ब्राह्मण जीवन में करते हो, देवताई जीवन में नहीं। ब्राह्मण ही देवता बनते हैं लेकिन इस समय देवताई जीवन से भी ऊंच हो, तो इतना नशा सदा रहे, कभी-कभी नहीं। क्योंकि बाप अविनाशी है और अविनाशी बाप जो ज्ञान देते हैं वह भी अविनाशी है, जो स्मृति दिलाते हैं वह भी अविनाशी है, कभी-कभी नहीं।* तो यह चेक करो कि सदा यह नशा रहता है वा कभी-कभी रहता है? मजा तो तब आयेगा जब सदा रहेगा। कभी रहा, कभी नहीं रहा तो कभी मजे में होंगे, कभी मूँझे हुए रहेंगे। तो अभी-अभी मजा, अभी-अभी मूँझ नहीं, सदा रहे। जैसे यह श्वास सदा ही चलता है ना। यदि एक सेकण्ड भी श्वास रुक जाये या कभी-कभी चले तो उसे जीवन कहेंगे? तो इस ब्राह्मण जीवन में निरन्तर मजे में हो? अगर मजा नहीं होगा तो मूँझेंगे जरूर।

 

✧  आधा कल्प हार खाई, अभी विजय प्राप्त करने का समय है तो विजय के समय पर भी यदि हार खायेंगे तो विजयी कब बनेंगे? *इसलिये इस समय सदा विजयी। विजय जन्म-सिद्ध अधिकार है। अधिकार को कोई छोड़ते नहीं, लड़ाई-झगड़ा करके भी लेते हैं और यहाँ तो सहज मिलता है। विजय अपना जन्म-सिद्ध अधिकार है।* अधिकार का नशा वा खुशी रहती है ना? हद के अधिकार का भी कितना नशा रहता है! प्राइम मिनिस्टर को भूल जायेगा क्या कि मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ? सोयेगा, खायेगा तो भूलेगा क्या कि मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ? तो हद का अधिकार और बेहद का अधिकार कितना भी कोई भुलाये भूल नहीं सकता। माया का काम है भुलाना और आपका काम है विजयी बनना क्योंकि समझ है ना कि विजय और हार क्या है? हार के भी अनुभवी हैं और विजय के भी अनुभवी हैं। तो हार खाने से क्या हुआ और विजय प्राप्त करने से क्या हुआ-दोनों के अन्तर को जानते हो इसलिये सदा विजयी हैं और सदा रहेंगे। क्योंकि अविनाशी बाप और अविनाशी प्राप्ति के अधिकारी हम आत्मायें हैं-यह सदा इमर्ज रूप में रहे।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अब ऐसा कौन है जिसको एक मिनट भी फुर्सत नहीं मिल सकती? जैसे पहले ट्रैफिक कन्ट्रोल का प्रोग्राम बना तो कई सोचते थे - यह कैसे हो सकता? सेवा की प्रवृति बहुत बडी है, बिजी रहते हैं। लेकिन *लक्ष्य रखा तो हो रहा है ना प्रोग्राम चला रहा है ना।*

 

✧  *सेन्टर्स पर यह ट्रैफिक कन्ट्रोल का प्रोग्राम चलाते हो वा कभी मिस करते, कभी चलाते?* यह एक ब्राह्मण कुल की रीति-रसम है, नियम है। जैसे और नियम आवश्यक समझते हो, ऐसे *यह भी स्व-उन्नति के लिए वा सेवा की सफलता के लिए, सेवाकेन्द्र के वातावरण के लिए आवश्यक है।*

 

✧  ऐसे अन्तर्मुखी, एकान्तवासी बनने के अभ्यास के लक्ष्य को लेकर अपने दिल की लगन से बीच-बीच में समय निकाली। *महत्व जानने वाले को समय स्वत: ही मिल जात है।* महत्व नहीं है तो समय भी नहीं मिलता। *एक पॉवरफुल स्थिति में अपने मन को, बुद्धि को स्थित करना ही एकान्तवासी बनना है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *लास्ट समय चारों ओर व्यक्तियों का, प्रकृति का हलचल और आवाज़ होगा - चिल्लाने का, हिलाने का - यही वायुमण्डल होगा। ऐसे समय पर ही सेकण्ड में अव्यक्त फरिश्ता सो निराकारी अशरीरी आत्मा हूँ - यह अभ्यास ही विजयी बनायेगा। यह स्मृति सिमरणी अर्थात् विजय माला में लायेगी। इसलिये यह अभ्यास अभी से अति आवश्यक है। इसको कहते हैं- प्रकृतिजीत, मायाजीत।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  अपने से बड़ों का रिगार्ड रखना*

 

_ ➳  मीठे मधुबन के डायमण्ड हॉल में, मै भाग्यवान आत्मा... प्यारे बाबा से मिलन मना रही हूँ... और सोच सोचकर अभिभूत हूँ... कितनी मेहनत करके, भगवान ने मुझे देह के दलदल रुपी दुर्गन्ध से निकाल कर... *गुणो की प्रतिमूर्ति बना दिया है... सिवाय मीठे बाबा के भला, किसको मेरी यूँ फ़िक्र थी... कौन मुझे यूँ प्यारा और मीठा... फिर से बना सकता था... सिवाय मेरे बाबा के.*.. आज जीवन पवित्रता और दिव्यता की अनोखी अदाओ से सजकर... विश्व को मेरा जो दीवाना बना रहा है... वह मेरे मीठे बाबा का मुझको दिया हुआ असीम प्यार है... *जिसने मुझ आत्मा को, देह आम से आत्मा खास बना कर.*.. विश्व जगत में अलौकिकता से चमका दिया है...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को कर्म की गुह्य गति को समझाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *आत्मिक भाव में स्थित रहकर... सदा एक दूसरे को सम्मान देकर, गुणो की लेनदेन करो.*.. देह ने जो सीमाओ में बांध कर, दिल को जो छोटा कर दिया था... अब अपने असली स्वरूप, आत्मिक भाव में डूबकर... दिल को अपनी विशालता से पुनः सजाओ...विश्व कल्याण कारी बनकर हर कर्म को करो कि... आपका कर्म सबके लिए प्रेरणा बने..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के अमृत वचनो को सुनकर अति आनन्द में डूबकर कहती हूँ :-* "मेरे सच्चे सहारे बाबा... आपने मेरे जीवन में आकर... इस मटमैले विकारी जीवन को गुणो के फूलो सा सुगन्धित बनाकर... मुझे इस विश्व धरा पर, अनोखा सजा दिया है... *अब मै आत्मा खुशियो की, और श्रेष्ठ कर्मो की मिसाल बनकर, हर दिल को श्रेष्ठता से सजाती जा रही हूँ.*.."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को अति मीठा और प्यारा बनाकर कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... मीठे बाबा की प्यार भरी छाँव में खिलकर... सदा गुणो और शक्तियो की झलक हर कर्म में दिखाओ... आत्मिक गुणो से हर कर्म को सजाओ... *सदा यह स्म्रति रहे कि आप विशेष आत्माओ का... हर कर्म सारे संसार के लिए पथ प्रदर्शक का कार्य करता है.*..इसलिए हर कर्म को श्रीमत प्रमाण कर, जग को दीवाना बनाओ...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के ज्ञान रत्नों को पाकर खुशियो में झूमते हुए कहती हूँ :-* "सच्चे सच्चे सखा मेरे... मै आत्मा विकारो की गलियो में खोकर... अपने गुणो और शक्तियो को पूर्णतः खो बेठी थी... मीठे बाबा आपने आकर मुझ पर इतनी मेहनत कर, मुझे फिर से गुणवान बनाया है... अब मै आत्मा *अपने हर कर्म में ईश्वरीय अदा दिखाकर... हर दिल को आदर और सम्मान देती जा रही हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सर्वगुण सम्पन्न बनाकर देवताई राज्य तिलक देते हुए कहा:-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... देह के भान में आकर, अपने मौलिक गुणो को पूरी तरहा खो बेठे थे... *अब जो प्यारे बाबा ने सच्चे अहसासो से भरा है... तो हर कर्म में उन मीठी अनुभूतियों को झलकाओ.*.. हर कर्म श्रीमत के रंग में रंगा हो... हर दिल आपसे खुशियां पाये... ऐसा मीठा प्यारा और निराला ईश्वर पुत्र बनकर, जीवन का हर कार्य करो...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से अमूल्य शिक्षाये पाकर, संवरे हुए जीवन को देख, प्रफुल्लित होकर कहती हूँ :-*"सच्चे सच्चे खिवैया बाबा... मीठे बाबा आपने जीवन को मूल्यों से सजाकर, मुझे कितना महान बना दिया है... अब मेरा कर्म असाधारण और महानता से सज गया है... *हर दिल मुझसे पूछता है... कि इतना मीठा, प्यारा और निराला, भला तुम्हें किसने बनाया है... मै मुस्करा कर कहती हूँ सिर्फ मेरे मीठे बाबा ने.*..."मीठे बाबा से दिली रुहरिहान् कर मै आत्मा... अपने कर्मक्षेत्र पर आ गयी...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इसी खुशी में रहना है कि हम हैं स्वदर्शन चक्रधारी*"

 

_ ➳  हम सो, सो हम इस शब्द के वास्तविक अर्थ का ज्ञान सिवाय परमात्मा के और कोई भी मनुष्य आज तक बता नही सका। *बड़े - बड़े वेद, ग्रंथ, और शास्त्र लिखने वालो ने तो हम सो, सो हम का अर्थ आत्मा सो परमात्मा, परमात्मा सो आत्मा बता कर, परमात्मा को ही सर्वव्यापी कह सारी दुनिया को ही अज्ञान अंधकार में डाल दिया*। मन ही मन यह चिंतन करती अपने प्यारे प्रभु का मैं शुक्रिया अदा करती हूँ जिन्होंने आकर इस सत्यता का बोध कराया और हम सो, सो हम का यथार्थ अर्थ बताकर हमे हमारे 84 जन्मो के सर्वश्रेष्ठ पार्ट की स्मृति दिलाई।

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता का मन ही मन धन्यवाद करके मैं हम सो, सो हम की स्मृति में जैसे ही स्थित होती हूँ, बुद्धि में स्वदर्शन चक्र स्वत: ही फिरने लगता है और मेरे 84 जन्मो की कहानी भिन्न - भिन्न स्वरूपों में मेरी आँखों के आगे चित्रित होने लगती है। *हम सो, सो हम अर्थात ब्राह्मण सो देवता, सो क्षत्रिय, सो वैश्य, सो शूद्र, सो फिर से ब्राह्मण बनने के बीच का पूरा चक्र अब अलग - अलग स्वरूपों में बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं देख रही हूँ*।

 

_ ➳  स्वदर्शन चक्रधारी बन बुद्धि में अपने 84 जन्मो का चक्र फिराते हुए, सबसे पहले मैं देख रही हूँ अपना अनादि स्वरूप जो परमधाम में एक चमकते हुए चैतन्य सितारे के रूप में मुझे दिखाई दे रहा है। *सर्व गुणों, सर्वशक्तियों से सम्पन्न, सम्पूर्ण सतोप्रधान, सच्चे सोने के समान चमकता हुआ मेरा यह सत्य स्वरूप मन को लुभा रहा है*। अपने इस स्वरूप का गहराई से अनुभव करने के लिए मन बुद्धि के विमान पर बैठ मैं पहुँच गई हूँ अपनी निराकारी दुनिया परमधाम में और अपने प्यारे पिता के सम्मुख बैठ अपने इस सम्पूर्ण सतोप्रधान अनादि स्वरूप का भरपूर आनन्द ले रही हूँ।

 

_ ➳  अपने इस अनादि स्वरूप में अपने अंदर निहित सातों गुणों और अष्ट शक्तियों का अनुभव करके मैं आत्मा तृप्त हो कर अब अपने आदि स्वरूप का अनुभव करने के लिए मन बुद्धि से पहुँच गई हूँ उस स्वर्णिम दुनिया में जहाँ अपरमअपार सुख, शांति और सम्पन्नता है। *दुख का यहाँ कोई नाम निशान नही। ऐसी सुखों से भरी अति सुंदर, मन भावन दुनिया में अपने आपको अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई स्वरूप में मैं देख रही हूँ जो 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम है*।

 

_ ➳  सतोप्रधान प्रकृति के सुन्दर नज़ारो और स्वर्ग के सुखों का अनुभव करके अब मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्र से देख रही हूँ अपने पूज्य स्वरूप को जो पवित्रता की शक्ति से सम्पन्न है। *अष्ट भुजाओं के रूप में अष्ट शक्तियों को धारण किये, अपने अष्ट भुजाधारी दुर्गा स्वरूप में मैं मंदिर में विराजमान हूँ*। असुरों का सँहार और अपने भक्तों की रक्षा करने वाली असुर सँहारनी माँ दुर्गा के रूप में अपने भक्तो की मनोकामनाओं को मैं अपने वरदानी हस्तों से पूर्ण कर रही हूँ।

 

_ ➳  अपने परमपवित्र पूज्य स्वरूप का अनुभव करके अब मैं अपने सर्वश्रेष्ठ पदमापदम सौभागशाली ब्राह्मण स्वरूप को देख रही हूँ। *परम पिता परमात्मा की देन अपने, डायमंड तुल्य ब्राह्मण जीवन की अखुट प्राप्तियों की स्मृति, परमात्म प्यार और परमात्म पालना का अनुभव, स्वयं भगवान द्वारा प्राप्त सर्व सम्बन्धो का सुख, अतीन्द्रीय सुख के झूले में झूलने का सुखदाई अनुभव, आत्मा परमात्मा के मिलन से प्राप्त होने वाले परमआनन्द की अनुभूति, इन सभी प्राप्तियों का अनुभव करके मैं गहन आनन्द से भरपूर होकर अब अपने फ़रिश्ता स्वरूप को देखते हुए, अपने लाइट माइट स्वरूप को धारण कर रही हूँ*।

 

_ ➳  लाइट की सूक्ष्म आकारी देह धारण कर, मैं फ़रिश्ता देह और देह की दुनिया से हर रिश्ता तोड़, इस नश्वर दुनिया को छोड़ कर अब फरिश्तो की आकारी दुनिया की ओर जा रहा हूँ। पाँच तत्वों की साकारी दुनिया को पार कर, उससे और ऊपर उड़ते हुए मैं फ़रिश्ता अपने अव्यक्त वतन में पहुँच गया हूँ। *सफेद प्रकाश की इस दुनिया में अपने प्यारे बापदादा के पास जाकर उनसे मीठी दृष्टि और वरदान ले रहा हूँ*। उनकी शक्तियों से स्वयं को भरपूर कर रहा हूँ। उनके साथ कम्बाइंड हो कर सारे विश्व को सकाश दे रहा हूँ। *ऐसे अपने फरिश्ता स्वरूप का अनुभव करके, अपने निराकार स्वरूप में स्थित होकर मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया मे लौटती हूँ*।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, इस सृष्टि रूपी कर्म भूमि पर कर्म करते, हम सो - सो हम की स्मृति से स्वदर्शन चक्र फिराते मन बुद्धि से अपने सभी स्वरूपों को देखते और उनका भरपूर आनन्द लेते हुए एक अलौकिक रूहानी नशे से अब मैं सदा भरपूर रहती हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं एक बाप की याद में सदा मगन रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं एकरस अवस्था बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं साक्षी द्रष्टा आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा दृढ़ निश्चय से अपने भाग्य को निश्चित कर देती हूँ  ।*

   *मैं सदा निश्चिंत आत्मा हूँ  ।*

   *मैं निश्चय बुद्धि निश्चिंत आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  कभी-कभी सक्सेसफुल क्यों नहीं होतेउसका कारण क्या है? *जब अपना जन्म सिद्ध अधिकार हैतो अधिकार प्राप्त होने में, अनुभव होने में कमी क्यों?* कारण क्या?बापदादा ने देखा है - मैजारिटी अपने कमजोर संकल्प पहले ही इमर्ज करते हैंपता नहीं होगा या नहीं! *तो यह अपना ही कमजोर संकल्प प्रसन्नचित्त नहीं लेकिन प्रश्नचित्त बनाता है।* होगानहीं होगाक्या होगापता नहीं..... *यह संकल्प दीवार बन जाती है और सफलता उस दीवार के अन्दर छिप जाती है।*

 

 _ ➳  *निश्चयबुद्धि विजयी - यह आपका स्लोगन है ना!* जब यह स्लोगन अभी का हैभविष्य का नहीं हैवर्तमान का है तो सदा प्रसन्नचित्त रहना चाहिए या प्रश्नचित्त? *तो माया अपने ही कमजोर संकल्प की जाल बिछा लेती है और अपने ही जाल में फँस जाते हो। विजयी हैं ही - इससे इस कमजोर जाल को समाप्त करो।* फँसो नहीं, लेकिन समाप्त करो। समाप्त करने की शक्ति है? धीरे-धीरे नहीं करो, फट से सेकण्ड में इस जाल को बढ़ने नहीं दो। अगर एक बार भी इस जाल में फँस गये ना तो निकलना बहुत मुश्किल है। विजय मेरा बर्थराइट हैसफलता मेरा बर्थराइट है। यह बर्थराइट, परमात्म बर्थराइट हैइसको कोई छीन नहीं सकता - *ऐसा निश्चयबुद्धिसदा प्रसन्नचित्त सहज और स्वतः रहेगा। मेहनत करने की भी जरूरत नहीं।* 

 

✺   *ड्रिल :-  "निश्चयबुद्धि विजयी बन सदा प्रसन्नचित्त रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं शिव शक्ति आत्मा हूँ... मैं परमपिता शिव बाबा की संतान हूँ... मैं आत्मा इस साकारी तन से निकल... उड़ कर पहुंच गयी हूँ... अपने परमपिता की छत्रछाया के नीचे... जैसे ही बाबा ने मुझे देखा... वैसे ही उन्होंने मुझे करीब बुलाया... और मुझे अपनी प्यार भरी गोद में बिठा लिया... *बाबा ने मेरे मस्तक पर अपना वरदानी हाथ रख दिया... और कहा बच्ची निश्चय बुद्धि सदा विजयन्ती...*

 

 _ ➳  बाबा ने कहा बच्चे- *सफलता तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है...* बाबा के इतना कहते ही... *मैंने अपने सारे कमजोर संकल्पों को बाबा की झोली में डाल दिया...* क्या, क्यूँ, होगा या नहीं होगा ऐसे कमजोर संकल्पों को बाबा के सम्मुख रख दिया... बाबा मुझे हाथ पकड़कर एक दीवार के पास ले गए... जो मेरे ही कमजोर संकल्पों से बनी थी... बाबा ने इस दीवार को तोड़ दिया...

 

 _ ➳  फिर बाबा ने कहा देखो बच्ची तुम्हारी सफलता के बीच... ये तुम्हारे कमजोर संकल्पों की दीवार थी... मैं अपनी सफलता को देख नाचने लगी... और बाबा से वादा किया... बाबा आज के बाद मैं हमेशा दृढ़ निश्चयी बन कर... हमेशा सफलता को प्राप्त करूंगी... इन कमजोर संकल्पों का जाल अब कभी नहीं बनने दूँगी... *और ना इन कमजोर संकल्पों के जाल में कभी फसुंगी... सारे जाल एक सेकंड में फट से समाप्त हो गए...*

 

 _ ➳  जब से मेरा ईश्वरीय जनम हुआ... तब से ही विजय मेरा बर्थराइट है... *यह मेरा बर्थराइट, परमात्म बर्थराइट है... इसको अब मुझसे कोई छीन नहीं सकता है...* मैं परमपिता की संतान हूँ... इस दृढ़ निश्चय के नशे को अब कभी उतरने नहीं दूँगी... *मैं आत्मा अब सदा प्रसन्न चित्त रहूँगी...* आज से यह सहज और स्वत: ही होगा... इसके लिए अब मुझे *मेहनत की जरूरत नहीं है...* मैं सफलता के सागर शिवपिता की संतान हूँ... *सफलता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है... इसका नशा मुझे हमेशा रहेगा...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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