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 08 / 10 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपनी अवस्था मज़बूत बनायी ?*

 

➢➢ *ड्रामा की भावी पर अडोल रहे ?*

 

➢➢ *दाता बन हर सेकंड, हर संकल्प में दान दिया ?*

 

➢➢ *गंभीरता का गुण धारण किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *कर्म करते तन का भी हल्कापन, मन की स्थिति में भी हल्कापन। कर्म की रिजल्ट मन को खींच न ले। जितना ही कार्य बढ़ता जाये उतना ही हल्कापन भी बढ़ता जाये।* कर्म अपनी तरफ आकर्षित नहीं करे लेकिन मालिक होकर कर्म कराने वाला करा रहा है और करने वाले निमित्त बनकर कर रहे हैं- *यह अभ्यास बढ़ाओ तो सम्पन्न कर्मातीत सहज ही बन जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं एकरस रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  सभी सदा एकरस स्थिति में स्थित रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो ना। *अनुभवी आत्मायें बन गई ना। सब दुनिया के रस अनुभव कर लिये। अब इस ईश्वरीय रस का अनुभव किया, तो वह रस क्या लगते है? फीके लगते हैं ना। जब है ही एक रस मीठा तो एक ही तरफ अटेन्शन जायेगा ना।*

 

  *एक तरफ मन लग ही जाता है, मेहनत नहीं लगती है। बाप का स्नेह, बाप की मदद, बाप का साथ, बाप द्वारा सर्व प्राप्तियां सहज बना देती है। हरेक इसी अनुभव से आगे बढ़ रहे हो, यह देख बाप भी हर्षित होते हैं।|*

 

  जितना भी देश में दूर स्थान पर हो, उतना ही दिल में नजदीक हो। बापदादा सेकेण्ड में सभी बच्चों को आह्वान कर इमर्ज कर लेते हैं, भल वह कितना भी दूर हो। आपको भी अनुभव होता है ना - बाप अमृतवेले कैसे मिलन मनाते हैं!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अपने आपको सफलता के सितारे हैं - ऐसे अनुभव करते हो? *जहाँ सर्व शक्तियाँ हैं, वहाँ सफलता जन्म-सिद्ध अधिकार है।* कोई भी कार्य करते हो, चाहे शरीर निर्वाह अर्थ, चाहे ईश्वरीय सेवा अर्थ, कार्य में कार्य करने के पहले यह निश्चय रखो।

 

✧   निश्चय रखना अच्छी बात है लेकिन प्रैक्टिकल अनुभवी आत्मा बन निश्चय और नशे में रहो'। *सर्वशक्तियाँ इस ब्राह्मण जीवन में सफलता के सहज साधन हैं।* सर्व शक्तियों के मालिक हो इसलिए किसी भी शक्ति को जिस समय ऑर्डर करो, उस समय हाजिर हो।

जैसे कोई सेवाधारी होते हैं, सेवाधारी को जिस समय ऑर्डर करते हैं तो सेवा के लिए तैयार होता हैं। ऐसे सर्व शक्तियाँ आपके ऑर्डर में हो।

 

✧  *जितना-जितना मास्टर सर्वशक्तिवान की सीट पर सेट होंगे उतना सर्वशक्तियाँ सदा ऑर्डर में रहेंगी।* थोडा भी स्मृति की सीट से नीचे आते हैं तो शक्तियाँ ऑर्डर नहीं मानेंगी। सर्वेन्ट भी होते है तो कोई ओबीडियेन्ट होते हैं, कोई थोडा नीचे-ऊपर करने वाले होते हैं। तो आपके आगे सर्व शक्तियाँ कैसे हैं? *ओबिडियेन्ट हैं या थोडी देर के बाद पहुँचती है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जिस बात में कमजोर होंगे, उसी रूप में जान बूझकर भी माया लास्ट पेपर लेगी। इसलिए विदेही बनने का अभ्यास बहुत ज़रूरी है।* कोई भी रूप की माया आये, समझ तो है ही। *एक सेकण्ड में विदेही बन जायेंगे तो माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा। जैसे कोई मरा हुआ व्यक्ति हो, उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ना* विदेही माना देह से न्यारा हो गया तो देह के साथ ही स्वभाव, संस्कार, कमजोरियाँ सब देह के साथ हैं, और देह से न्यारा हो गया तो सबसे न्यारा हो गया। इसलिए यह ड्रिल बहुत सहयोग देगी, *इसमें कण्ट्रोलिंग पावर चाहिए। मन को कण्ट्रोल कर सकें, बुद्धि को एकाग्र कर सकें। नहीं तो आदत होगी तो परेशान होते रहेंगे। पहले एकाग्र करें तब ही विदेही बनें।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  विदेही बनने का अभ्यास करना"*

 

_ ➳  *वर्षा के बाद आसमान में निकले इन्द्रधनुष को मैं आत्मा निहार रही हूँ... इन्द्रधनुषी रंगों से सजा ये आसमान ऐसे लग रहा, जैसे आसमान ने अपने माथे पर रंग-बिरंगी बिंदिया लगाईं हो...* गले में सतरंगी माला पहनी हो... एक तरफ बादलों के पीछे से सूरज निकल रहा जैसे ज्ञान सूर्य बाबा मुझे ऊपर बुला रहे हों... मैं आत्मा इस देह से न्यारी होती हुई ऊपर उडती हुई पहुँच जाती हूँ वतन में बाबा के पास...

 

  *प्यारे बाबा मुझे अपने निज स्वरुप की स्मृति दिलाते हुए कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... इस देह और देहधारियों के सम्बन्धो में फसकर स्वयं के सच्चे दमकते आत्मिक स्वरूप को ही भूल गए हो... इस खेल को ही अपना वजूद समझ दुखी हो गए हो... *अब अपने उसी सच्चे स्वरूप के भान में खो जाओ... और अपने सच्चे पिता शिवबाबा को याद करो... और दूसरों को भी बाप की याद दिलाओ... यह याद ही सारे सुखो का आधार है..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा के प्यार में मीठी डुबकी लगाती हुई कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके बिना तो देह के दलदल में गर्दन तक गहरे धँसी थी... आपने प्यारे बाबा मुझे मेरे दमकते सौंदर्य का अहसास कराया... और सच्चे पिता का सच्चा रिश्ता मेरे दिल में सजाया... *मै आत्मा आपकी अथाह प्यार की गहराई में डूब गयी हूँ..."*

 

  *मीठा बाबा मेरे देहभान का आवरण उतारते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... इस देह में मात्र खेल के लिए अवतरित हुए हो... *अपने अविनाशी सुन्दरतम स्वरूप के नशे में डूब जाओ... किसके हो क्या हो और कहाँ से आये हो इस खुमारी में खो जाओ...* एकमात्र सच्चे सहारे वफादार साथी शिवबाबा को ही याद करो जो सदा की वफादारी निभायेगा..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा सच्चे साफ दिल में सिर्फ प्यारे बाबा को बिठाकर कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपने रूप के नशे में खो गई हूँ... *विदेही बन मुस्करा रही हूँ और मीठे बाबा की प्यारी सी बाँहों में राजकुमारी सी इठला रही हूँ...* भगवान मुझे प्यार कर रहा है और मै उसके प्यार डूबती जा रही हूँ..."

 

  *मेरे बाबा अविनाशी सुखों के रस का पान कराते हुए कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... विनाशी रिश्तो को विनाशी देह को प्यार करके अपनी सारी शक्तियो और गुणो को गवांया... अब इस भ्रम से बुद्धि को निकालो... *अपने सुंदर आत्मिक नशे में झूम उठो... विदेही हो... इस भान में आकर प्यारे बाबा को प्यार करो और असीम आनन्द से भर जाओ..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा देहधारियों से बुद्धियोग निकाल एक विदेही बाबा की याद में मग्न होकर कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा विदेही बन मुस्करा रही हूँ... मीठे बाबा से अपने अविनाशी स्वरूप को जानकर... अनन्त खुशियो में खिलखिला रही हूँ... *प्यारे बाबा के प्यार की गहराई में डूबी हुई अपने और दूसरों के शानदार भाग्य को सहार रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ड्रामा की भावी पर अडोल रहना है*"

 

_ ➳  ड्रामा के पट्टे पर खड़े होकर, इस बेहद के ड्रामा में वैरायटी आत्माओं के वैरायटी पार्ट को देख मन ही मन मैं विचार करती हूँ कि कितना वन्डरफुल है ये ड्रामा! *इस सृष्टि ड्रामा में हर आत्मा अपना - अपना पार्ट प्ले कर रही है और एक का पार्ट भी दूसरे के पार्ट से मैच नही करता। हर आत्मा कल्प पहले मुआफ़िक अपना पार्ट बिल्कुल ऐक्यूरेट बजा रही है*। बाबा ने ड्रामा के इस राज को स्पष्ट करके जीवन को कितना सहज बना दिया है। इस राज को जानने से क्या, क्यो और कैसे की क्यू में उलझने की बजाए  सेकण्ड में फुल स्टॉप लगाना कितना सरल हो गया है। *ड्रामा के पट्टे पर खड़े होकर, ड्रामा के हर राज को अच्छी रीति समझ लेने से जीवन को जैसे एक नई दिशा मिल गई है*।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण जीवन मे निरन्तर आगे बढ़ते हुए, ड्रामा के हर राज को अच्छी रीति समझ अडोल रहने का पुरुषार्थ करते हुए, अब मुझे अपने सम्पूर्णता के लक्ष्य को जल्द से जल्द प्राप्त करना है *मन ही मन स्वयं से दृढ़ प्रतिज्ञा कर, ड्रामा के हर खूबसूरत पहलू से परिचित कराने वाले अपने प्यारे मीठे बाबा से मीठी मीठी रूहरिहान करने, उनसे मंगल मिलन मनाने और ड्रामा के पट्टे पर सदा अचल, अडोल रहने का उनसे वरदान प्राप्त करने के लिए मैं अपने प्यारे बाबा की याद में अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करती हूँ* और सेकेण्ड में अशरीरी होकर, देह से बिल्कुल न्यारा एक अति सूक्ष्म चैतन्य सितारा बन भृकुटि के अकालतख्त से बाहर आ जाता हूँ और अपने बिंदु बाप के पास उनके धाम की ओर चल पड़ता हूँ।

 

 

_ ➳  परमधाम में स्थित मेरे बिंदु बाप से आ रही परमात्म शक्तियों की लाइट मुझ बिंदु सितारे के साथ कनेक्ट होकर मुझे बिल्कुल सहज रीति ऊपर की ओर खींच रही है और *मैं चैतन्य सितारा, इस परमात्म लाइट के साथ कनेक्ट होकर, स्वयं को हर चीज से उपराम अनुभव करते हुए, धीरे - धीरे ऊपर आकाश की ओर उड़ता जा रहा हूँ*। मेरे बिंदु पिता से आ रही परमात्म शक्तियों की लाइट मुझे अति शीघ्र 5 तत्वों की बनी साकारी दुनिया को पार कराये, फरिश्तो की आकारी दुनिया से ऊपर, आत्माओं की उस निराकारी दुनिया में ले आई है जहाँ पहुँच कर मैं आत्मा गहन विश्राम की स्थिति का अनुभव कर रही हूँ। 

 

_ ➳  एक ऐसी दुनिया में मैं स्वयं को देख रही हूँ जहाँ ना साकार देह का कोई बन्धन है और ना ही सूक्ष्म देह का कोई भान है केवल चमकती हुई निराकारी बिंदु आत्मायें अपने बिंदु बाप की अनन्त शक्तियों की किरणों रूपी बाहों में सिमट कर, उनके प्यार और उनकी शक्तियों से स्वयं को भरपूर कर रही हूँ। *बिंदु बाप के साथ अपने बिंदु बच्चो का यह मंगल मिलन मन को असीम आनन्द का अनुभव करवा रहा है*। अपने बिंदु पिता से मिलन मनाने के लिए मैं बिंदु आत्मा अब धीरे - धीरे उनके पास पहुँचती हूँ ओर उनकी सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे जाकर बैठ जाती हूँ। 

 

_ ➳  विकारों की प्रवेशता के कारण मुझ आत्मा की बैटरी जो डिसचार्ज हो गई थी वो अब परमात्म शक्तियों से चार्ज हो गई है और मैं आत्मा जैसे लाइट हाउस बन गई हूँ। *परमात्म शक्तियों से भरपूर होकर स्वयं को मैं बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। शक्तियों का पुंज बनकर, बेहद के सृष्टि ड्रामा में अपना खूबसूरत पार्ट बजाने के लिए मैं वापिस साकार सृष्टि पर लौट आती हूँ*। फिर से 5 तत्वों की साकारी दुनिया में, अपने साकारी तन में प्रवेश कर ड्रामा के पट्टे पर आकर खड़ी हो जाती हूँ। 

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर ड्रामा के हर राज को गहराई से समझ, साक्षी दृष्टा बन, ड्रामा की हर सीन को साक्षी होकर देखते हुए, हर परिस्थिति में अचल अडोल रहने का अब मैं पुरुषार्थ कर रही हूँ। *"सृष्टि का यह नाटक अब पूरा हो रहा है" यह स्मृति मुझे हर आकर्षण से मुक्त और हर चीज से उपराम करके, ड्रामा के राज को अच्छी रीति समझ, स्वयं को अचल, अडोल और एकरस बनाने में सहयोग दे रही है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं दाता बन हर सेकण्ड, हर संकल्प में दान देने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं उदारचित्त आत्मा हूँ।*

   *मैं महादानी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा गंभीरता का गुण धारण करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा हर सब्जेक्ट में फुल मार्क्स जमा करती हूँ  ।*

   *मैं सर्वगुण संपन्न आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. *अनुभवी होजब कोई अच्छा कर्म करते हो तो कर्म का फल उसी समय प्रत्यक्ष रूप में खुशीशक्ति और सफलता के कारण डबल लाइट रहते हो क्योंकि याद रहता है बाप के साथ से कर्म किया।* और अगर अभी कोई विकर्म होता है तो उसका पश्चाताप बहुत लम्बा है। वैसे *अभी विकर्म तो कोई होना नहीं चाहिएवह तो टाइम अभी बीत गया,* लेकिन अभी कोई व्यर्थ संकल्प वा व्यर्थ कर्म, व्यर्थ बोलव्यर्थ संबंध-सम्पर्क भी न हो। क्योंकि व्यर्थ संबंध-सम्पर्क भी बहुत धोखा देता है। जैसा संग वैसा रंग लग जाता है। कई बच्चे बड़े चतुर हैं कहते हैं हम तो संग नहीं करतेलेकिन वह मेरे को नहीं छोड़तेमैं नहीं करतीवह नहीं छोड़ते। तो क्या किनारा करना नहीं आता?  *अगर कोई बुरी चीज दे तो आप लेते क्यों हो! लेने वाला नहीं लेगा तो देने वाला क्या करेगा?* इसीलिए व्यर्थ सम्बन्ध और सम्पर्क भी एकाउण्ट खाली कर देता है।

 

 _ ➳  2. बापदादा को बच्चों के भिन्न-भिन्न खेल देख हँसी भी आती हैरहम भी आता है और *बापदादा उस समय टच करता हैयह भी अनुभव करते हैं। नहीं करना चाहिएश्रीमत नहीं हैयह बाबा समान बनना नहीं हैटच भी होता है लेकिन अलबेलापन सुला देता है।* इसलिए अभी स्व के प्रति ज्यादा खजाने खर्च नहीं करो। *जमा भले करो लेकिन खर्च नहीं करो। सेवा भले करोव्यर्थ खर्च नहीं करो। बहुत जमा करना है ना!*

 

✺   *ड्रिल :-  "व्यर्थ संकल्प वा व्यर्थ कर्म, व्यर्थ बोल, व्यर्थ संबंध-सम्पर्क से किनारा करना"*

 

 _ ➳  व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करती मैं आत्मा... बैठी हूँ... बाबा के कमरे में... मन के तार एक बाप से जुड़ते ही... पहुँच जाती हूँ... एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर...शांत... खुशनुमा... वातावरण... ठंडे ठंडे पवन के झोंको के बीच बैठी मैं आत्मा... देख रही हूँ... *बापदादा के अलौकिक... दिव्य रूप... का आगमन... इस पावन धरती पर...* प्रकृति भी बापदादा के स्वागत में सुगन्धित फूलों की बौछार कर रही हैं... मैं दौड़ कर बाबा के गले लग जाती हूँ... बापदादा अपना रूहानी हाथ मेरे मस्तक पर रखते हैं और मुझ आत्मा को अपनी शक्तियों से भर रहे हैं... *63 जन्मों की थकान... 63 जन्मों के विकार... पल भर में दूर हो जाते हैं...*

 

 _ ➳  बापदादा के साथ मैं आत्मा... पहुँच जाती हूँ... मधुबन... जहां हज़ारों आत्मायें... *बाबा को मिलने... बाबा की एक नजर से निहाल होने आयें हैं...* मैं आत्मा फ़रिश्ता स्वरुप में डायमंड हॉल में भव्य अलौकिक नजारे को साक्षी होकर देख रही हूँ... ब्रह्मा बाबा के साथ खड़ी मैं आत्मा... देख रही हूँ... *एक दिव्य परम पवित्र ज्योति का अवतरण...* सभी आत्माओं की झोली... प्यार का सागर... प्यार से भर रहा है... अखूट खजाने से सबको मालामाल कर रहा है... सभी आत्मायें... धन्यता से भरपूर हो गई हैं... *बापदादा के एक एक बोल को अपने मन बुद्धि में सुनहरे अक्षरों से अंकित करती सभी आत्मायें...* अलौकिक मिलन को अपनी स्मृति में छुपाकर अपने साथ लौकिक जीवन में लेकर जाते हैं...

 

 _ ➳  मैं आत्मा... बापदादा के साथ सभी ब्राह्मण आत्मायें जो बाबा मिलन प्रत्यक्ष मनाकर आये थे... उनकी बाबा मिलन के बाद की स्थिति का अवलोकन करने चल पड़ती हूँ... बापदादा मेरा हाथ थाम कर ले चलते हैं मुझे सभी ब्राह्मण आत्माओं के लौकिक घर पर... सुख... शांति... पवित्रता से सजा हुआ वातावरण... *अलौकिक प्यार और अलौकिक पवित्रता के पालने में झूलते बच्चे... श्रीमत पर बलिहार जाते पवित्र गृहस्थ जीवन...* मन ख़ुशी में झूम उठा जब देखा *बाबा का झंडा* हर ब्राह्मण आत्मा के घर पर लहरा रहा हैं... *बापदादा की श्रीमत "व्यर्थ संकल्प वा व्यर्थ कर्मव्यर्थ बोलव्यर्थ संबंध-सम्पर्क से किनारा करना"* को फॉलो कर हर ब्राह्मण आत्मायें अपने पुरुषार्थ को हाई जम्प दे रहे हैं... ब्राह्मण होने का प्रत्यक्ष सबूत हर सपूत बच्चा दे रहा हैं...

 

 _ ➳  बहुत सी ऐसी ब्राह्मण आत्माओं को भी देखा जो अलबेले थे... पुरुषार्थ के प्रति सजग नहीं थे... अपने ब्राह्मण संस्कारों को... व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ कर्मव्यर्थ बोल, व्यर्थ संबंध-सम्पर्क में उलझें हुए थे... *संगमयुग की अनमोल घड़ियों को व्यर्थ गवां रहे थे...* पुरुषार्थ से प्रालब्ध तक के रूहानी सफर को अलबेलेपन के संस्कारों द्वारा कांटों का जंगल बना रहे थे... व्यर्थ संकल्प... व्यर्थ कर्म... व्यर्थ बोल और व्यर्थ सम्बन्ध-संपर्क से किनारा नहीं कर पा रहे थे... *बापदादा अपनी शक्तियों रूपी रंग बिरंगी किरणों को सभी अलबेली ब्राह्मण आत्माओं पर फैलाने लगें... अपनी ज्ञान रूपी अनंत किरणों को सभी पर न्यौछावर कर रहे हैं...*

 

 _ ➳  सभी ब्राह्मण आत्मायें अपने अलबेले संस्कारों का त्याग कर... पुरुषार्थ की उड़ती कला के भागीदार बन गये हैं... चढ़ती कला के हक़दार बन गये हैं... बाबा की श्रीमत को सुनहरे अक्षरों से मन बुद्धि में अंकित कर फॉलो कर रहे हैं... उतरती कला से चढ़ती कला में परिवर्तन कर अपने कुल का उद्धार कर रहे हैं... *बापदादा का झंडा लहरा कर आने सपूत बच्चे होने का सबूत दे रहे हैं...* मैं आत्मा बापदादा के साथ यह परिवर्तन का दिव्य नजारा देख भाव विभोर हो जाती हूँ... अब तो घर घर में *बापदादा का झंडा* लहराता हुआ दिखाई दे रहा हैं... सभी आत्मायें बापदादा की बन चुकी हैं... व्यर्थ संकल्प... व्यर्थ बोल... व्यर्थ कर्म और व्यर्थ सम्बन्ध-संपर्क से मुक्त हो कर अपने बुद्धि को सिर्फ एक बाप में लगा रहे हैं... और मैं आत्मा... बापदादा का हाथ अपने हाथों में रख... *"व्यर्थ संकल्प... व्यर्थ बोल... व्यर्थ कर्म और व्यर्थ सम्बन्ध-संपर्क से किनारा करने का संकल्प करती हूँ... और संगमयुग की अनमोल घड़ियों को व्यर्थ न गवां कर समर्थ घड़ियों में परिवर्तित कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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