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 08 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ बाप, टीचर और सतगुरु तीनो को याद किया ?

 

➢➢ आत्माओं को अपन्बे स्वधर्म की पहचान दी ?

 

➢➢ सवा के राज्य द्वारा अपने सताहियों ओ स्नेही सहयोगी बनाया ?

 

➢➢ सर्व प्राप्तियों के साधन होते हुए भी वृत्ति उपराम रही ?

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  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

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〰✧  चेक करो - जो भी संकल्प उठता है वह स्वयं वा सर्व के प्रति कल्याण का है? सेकेण्ड में कितने संकल्प उठे - उसमें कितने सफल हुए और कितने असफल हुए? संकल्प और कर्म में अन्तर न हो। संकल्प जीवन का अमूल्य खजाना है। जैसे स्थूल खजाने को व्यर्थ नहीं करते वैसे एक संकल्प भी व्यर्थ न जाये।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

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अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

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   "मैं बेफिकर बादशाह हूँ"

 

  सदा बेफिकर बादशाह हो ना। जब बाप को जिम्मेवारी दे दी तो फिर किस बात का? जब अपने ऊपर जिम्मेवारी रखते हो तो फिर फिकर होता है - क्या होगा, कैसे होगा.., और जब बाप के हावाले कर दिया तो फिकर किसको होना चाहिए, बाप को या आपको? और बाप तो सागर है, उसमें फिकर रहेगा ही नहीं।

 

  तो बाप भी बेफिकर और बच्चे भी बेफिकर हो गये। तो जो भी कर्म करो, कर्म करने से पहले यह सोचे कि मैं ट्रस्टी हूँ। ट्रस्टी काम बहुत प्यार से करता है लेकिन बोझ नहीं होता है। ट्रस्टी का अर्थ ही है सब कुछ, बाप तेरा। तो तेरे में प्राप्ति भी ज्यादा और हल्के भी रहेंगे, काम भी अच्छा होगा क्योंकि जैसी स्मृति होती है, वैसी स्थित होती है। तेरा माना बाप की स्मृति। कोई रिवाजी महान आत्मा नहीं है, बाप है! तो जब तेरा कह दिया तो कार्य भी अच्छा और स्थिति भी सदा बेफिकर। जब बाप आफर कर रहा है कि फिकर दे दो, फिर भी अगर आफर नहीं मानें तो क्या कहेंगे?

 

  बाप की आफर है - बोझ छोड़ो तो सदा बेफिकर रहना है और दूसरों को बेफिकर बनाने की, अनुभव से विधि बतानी है। बहुत आशीर्वाद मिलेगी! किसका बोझ वा फिकर ले लो तो दिल से दुआयें देंगे। तो स्वयं भी बेफिकर बादशाह और दूसरों की भी शुभ-भावना की दुआयें मिलेंगी। तो बादशाह हो, अविनाशी धन के बादशाह हो! बादशाह को क्या परवाह! विनाशी बादशाहों को तो चिंता रहती है लेकिन यह अविनाशी है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

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         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

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✧  बिन्दु स्वरूप में स्थित होना अर्थात डबल लाइट बनना। बडी चीज को उठाना मुश्किल होता है, छोटी चीज को उठाना सहज होता है। छोटे बिन्दु रूप को स्मृति में रखते हो या लम्बे शरीर को याद रखते हो?

 

✧  याद के लिए कहा जाता है - बुद्धि में याद रखना। मोटी चीज को याद रखते हो और छोटी चीज को छोड देते हो, इसलिए मुश्किल हो जाता है। लाइफ में भी देखो - छोटा बनना अच्छा है वा बडा बनना अच्छा है? छोटा बनना अच्छा है। तो छोटा स्वरूप याद रखना अच्छा है ना।

 

✧  क्या याद रखेंगे? बिन्दु। सहज काम दिया है या मुश्किल? तो फिर कभी-कभी क्यों करते हो? सहज काम तो सदा' हो सकता है ना। जब बाप भी बिन्दु, आप भी बिन्दु काम भी बिन्दु से है तो बिन्दु को याद करना चाहिए। तो अभी डॉट को नहीं भूलना बोझ नहीं उठाना। अच्छा! यह वैरायटी गुलदस्ता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

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         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

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〰✧  अव्यक्त में सर्विस कैसे होती है- यह अनुभव होता जाता है? अव्यक्त में सर्विस का साथ कैसे सदैव रहता है यह भी अनुभव होता है? जो वायदा किया है कि स्नेही आत्माओं के हर सेकेण्ड साथ ही हैं, ऐसे सदैव साथ का अनुभव होता है? सिर्फ रूप बदला है लेकिन कर्तव्य वही चल रहा है। जो भी स्नेही बच्चे हैं उन्हों के ऊपर छत्र रूप में नज़र आता है। छत्रछाया के नीचे सभी कार्य चल रहा है- ऐसी भासना आती है। व्यक्त से अव्यक्त, अव्यक्त से व्यक्त में आना यह सीढ़ी उतरना और चढ़ना जैसे आदत पड़ गई है। अभी-अभी वहाँ, अभी-अभी यहाँ। जिसकी ऐसी स्थिति हो जाती है, अभ्यास हो जाता है उसको यह व्यक्त देश भी जैसे अव्यक्त भासता है। स्मृति और दृष्टि बदल जाती है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- अविनाशी वैद्य के महामंत्र से दुखो से मुक्त होना"

➳ _ ➳ मैं आत्मा पंछी बन मन के द्वारे उड़ते हुए बाबा की कुटिया में बाबा के सामने बैठ जाती हूँ... बापदादा अपनी मोहिनी सूरत से मुझ आत्मा को निहाल कर रहे हैं... बाबा अपनी रंग बिरंगी किरणों की बारिश मुझ आत्मा पर बरसा रहे हैं... मैं आत्मा इन सुंदर शीतल किरणों को अपने में समाती जा रही हूं... मैं बाबा की किरणों को अपने में समाकर अंतर्मुखी होती जा रही हूँ... बाबा की ये किरणें मुझ आत्मा के सभी विकार भस्म कर रहे हैं... मैं आत्मा संपूर्ण पवित्रता का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा एक बाबा के प्यार में लवलीन होती जा रही हूँ...

❉ मनमनाभव का मन्त्र पक्का कराते हुए एक बाबा को सदा फॉलो करने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:- मेरे लाडले बच्चे... सदा दिल में पिता को समाये रहो... उसे ही अपनी यादो में बसाये रहो... उसे ही चाहो और प्यार करो... मन ही मन उससे प्रेम की बाते करो... उसका ही अनुसरण करो... तो यही सच्चा सहयोग है... अपनी सुंदर स्थिति ही सर्वोत्तम सहयोग है...

➳ _ ➳ मधुबन के चमन की बहार बनकर मीठे बाबा के गीतों को गुनगनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:- हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा ज्ञानसागर बाबा के गुण और शक्तियो को स्वयं में भर कर गुणवान शक्तिवान हो रही हूँ... और पूरी धरा को भी इन खजानो से भरपूर कर मीठे बाबा की सहयोगी बन रही हूँ...

❉ अपनी बगिया का फूल बना रूहानी सुगंध से महकाकर मुझे इस सृष्टि का श्रृंगार बनाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:- मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वरीय ज्ञान से स्वयं को सजाओ संवारो और एक की लगन में मगन हो जाओ... प्यारे पिता को ही फॉलो करो... तो यह अवस्था ही पिता का सहयोगी बनना है... अपनी सुंदर स्थिति और ईश्वर पिता की यादो में डूबे रहना ही मनमनाभव अवस्था है...

➳ _ ➳ वंडरफुल बाबा के वंडरफुल यादों में समाकर वंडरफुल स्थिति के अनुभवों में डूबकर मैं आत्मा कहती हूँ:- मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा मनमनाभव के मन्त्र को प्राणों में बसाकर खूबसूरत भाग्य से राजरानी बन रही हूँ... प्यारे बाबा की शिक्षाओ को आत्मसात कर उजली सी दमक उठी हूँ... अपनी खुशनुमा स्थिति की तरंगे पूरे विश्व को दे रही हूँ...

❉ दिव्य गुणों से चमकाकर मुझे इस जहाँ का नूर बना मेरी जिन्दगी की राहों में सुखों के फूल बिछाकर मेरे बाबा कहते हैं:- प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अपने हर साँस संकल्प को ईश्वरीय यादो में पिरो दो... यादो के मोतियो से हर पल श्रृंगारित रहो... सच्चे पिता की यादो में खोये रहो... और पिता के ही नक्शे कदम पर चल हर कदम पर पदम् बिछा दो... यही तो सच्चा सहयोगी बनना है... अपनी श्रेष्ठ स्थिति ही सबसे बड़ा सहयोग है...

➳ _ ➳ एक बाबा को ही मन का मीत बनाकर प्रीत की रीत निभाते हुए एक की लगन में मगन होते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:- हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपने मन और बुद्धि को आपके प्रेम में समर्पित कर आपकी मीठी यादो में महक उठी हूँ... मीठे पिता के कदमो की छाप पर अपने कदमो में पदम् भर रही हूँ... ईश्वर पिता की सहयोगी बन मुस्करा रही हूँ...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- पांच विकारों में जो फंसे हैं उन्हें निकालना है"

➳ _ ➳ अपने पांच स्वरूपों को स्मृति में ला कर, स्वदर्शन चक्र फिराते हुए अपने फ़रिशता स्वरूप में स्थित हो कर मैं विश्व की सेवा अर्थ जैसे ही विश्व भ्रमण के लिए निकलता हूँ। एक दृश्य देख कर मैं अचंभित हो जाता हूँ। मैं देख रहा हूँ कहीं दूर एक बहुत बड़ा तालाब दिखाई दे रहा है जिसका पानी सोने के समान चमक रहा है और दूर से देखने पर बहुत ही आकर्षित लग रहा है। सभी मनुष्य उस तालाब को देख, आकर्षित हो कर, उस तलाब के अंदर प्रवेश कर रहें हैं और जैसे ही वो तलाब में प्रवेश करते हैं तालाब का पानी दलदल बन जाता है और सभी उसमें डूबने लगते हैं। बाहर निकलने के लिए अपने हाथ - पैर चलाते हैं किंतु उसमे और ही गहराई तक धँसते चले जाते हैं और अंत मे उसी दलदल में डूब कर मर जाते हैं।

➳ _ ➳ तभी मैं अनुभव करता हूँ कि वो तालाब वास्तव में सारी विश्व है और दलदल वास्तव में विकारों की दुबन है जिसमे आज हर मनुष्य डूबा हुआ है। विकारों की इस दुबन मे जो उन्हें क्षणभंगुर विनाशी सुख भासता है वही बाद में असहनीय दुख का कारण बन जाता है। सभी इस दुबन से निकलना भी चाहते हैं, प्रयास भी करते हैं किंतु सही विधि ना जानने के कारण उनका हर प्रयास निष्फल हो जाता है और उस दलदल से बाहर निकलने के बजाए उसमें और ही गहरे धंस जाते हैं।

➳ _ ➳ अब पूरा विश्व मुझे विकारों की दुबन से भरा हुआ तालाब दिखाई दे रहा है और उस दुबन मे फँसे अपने ही आत्मा भाइयों को देख मुझे उन पर रहम आ रहा है। उन्हें विकारों की उस दुबन से बाहर निकालने के लिए अपने प्यारे शिव परम पिता परमात्मा का मैं आह्वान करता हूँ। सेकण्ड में मैं अनुभव करता हूँ कि मेरे शिव पिता परमात्मा मेरी पुकार सुनते ही ब्रह्मा बाबा के लाइट के शरीर में मेरे सामने उपस्थित हो जाते हैं। बापदादा के साथ कम्बाइंड हो कर अब मैं विकारों की दलदल में फंसे अपने आत्मा भाइयो को निकालने की सेवा में लग जाता हूँ।

➳ _ ➳ मैं अनुभव करता हूँ कि बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की रंग बिरंगी किरणे मुझ फ़रिश्ते में समा रही हैं और लाइट की एक तेज धार के रुप में मुझ फ़रिश्ते के मस्तक से निकल कर उन सभी आत्माओं पर पड़ रही है। लाइट की तेज धार उस दुबन मे फंसी एक - एक आत्मा को अपनी शक्ति से बाहर खींच रही है। एक - एक करके अपने सभी आत्मा भाइयों को मैं बाबा द्वारा मिली शक्ति से खींच कर बाहर निकाल रहा हूँ। हर आत्मा उस दुबन से बाहर निकल कर जैसे सुख की सांस ले रही है।

➳ _ ➳ अपने सभी आत्मा भाइयों को विकारों की उस दलदल से निकाल एक सुंदर बगीचे में ला कर, कम्बाइंड स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं उन्हें सदा के लिए विकारो की दुबन से निकलने का सत्य मार्ग बता रहा हूँ। परमपिता का संदेशवाहक बन अपने उन सभी आत्मा भाइयों को परमात्मा के इस धरा पर अवतरित होने का संदेश दे रहा हूँ। आत्मा और परमात्मा का वास्तविक परिचय पा कर और विकारो की दुबन से सदा के लिए निकलने का सत्य मार्ग जान कर सभी के चेहरों पर एक दिव्य अलौकिक मुस्कान दिखाई देने लगी है। परमात्म शक्तियां सर्व आत्माओं के ऊपर निरन्तर पड़ रही हैं और सभी परमात्म पालना के अनुभव का सुख प्राप्त कर रहें हैं।

➳ _ ➳ सबको परमात्म ज्ञान दे कर, विकारों की दुबन से निकलने का रास्ता बता कर अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट आती हूँ। अब मैं सदैव इस बात को स्मृति में रखती हूँ कि मेरे शिव पिता परमात्मा ने मुझे अपने सभी आत्मा भाइयों को विकारो की दुबन से निकालने की सेवा अर्थ मुझे इस धरा पर भेजा है। इस स्मृति में स्थित हो कर अब मैं अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सभी आत्माओं को जो विकारों की दलदल में फंसी हुई है, उन्हें ईश्वरीय ज्ञान दे कर इस दुबन से बाहर निकालने की सेवा में सदा बिज़ी रहती हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺  मैं स्व के राज्य द्वारा अपने साथियों को स्नेही सहयोगी बनाने वाली मास्टर दाता हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ मैं सर्व प्राप्ति के साधन होते भी वृत्ति को उपराम रख बेहद की वैराग्य वृत्ति धारण करने वाली आत्मा हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  विश्व में एक तरफ भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि होगी, दूसरे तरफ आप बच्चों का पावरफुल योग अर्थात् लगन की अग्नि ज्वाला रूप में आवश्यक है। यह ज्वाला रूप इस भ्रष्टाचार, अत्याचार के अग्नि को समाप्त करेगी और सर्व आत्माओं को सहयोग देगी। आपकी लगन ज्वाला रूप की हो अर्थात् पावरफुल योग होतो यह याद की अग्निउस अग्नि को समाप्त करेगी और दूसरे तरफ आत्माओं को परमात्म सन्देश कीशीतल स्वरूप की अनुभूति करायेगी। बेहद की वैराग्य वृत्ति प्रज्जवलित करायेगी। एक तरफ भस्म करेगी दूसरे तरफ शीतल भी करेगी। बेहद के वैराग्य की लहर फैलायेगी।

 

 _ ➳  बच्चे कहते हैं - मेरा योग तो हैसिवाए बाबा के और कोई नहींयह बहुत अच्छा है। परन्तु समय अनुसार अभी ज्वाला रूप बनो। जो यादगार में शक्तियों का शक्ति रूप, महाशक्ति रूप, सर्व शस्त्रधारी दिखाया है, अभी वह महा शक्ति रूप प्रत्यक्ष करो। चाहे पाण्डव हैंचाहे शक्तियां हैं, सभी सागर से निकली हुई ज्ञान नदियां हो, सागर नहीं होनदी हो। ज्ञान गंगाये हो।तो ज्ञान गंगायें अब आत्माओं को अपने ज्ञान की शीतलता द्वारा पापों की आग से मुक्त करो। यह है वर्तमान समय का ब्राह्मणों का कार्य।

 

✺   ड्रिल :-  "ज्वाला रूप की योग अग्नि से भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि को समाप्त करना"

 

 _ ➳  भृकुटी की कुटिया में बैठी मैं शिव सूर्य को एकटक निहारती हुई... उनके रूहानी नयनों के प्यालों से बहता रूहानी प्रकाश... शक्तियों को मेरे रोम-रोम में भरता हुआ... प्रकाश की एक तीव्र धारा मेरे मस्तिष्क में समाती हुई... मन के सभी प्रकार के व्यर्थ के अंश को भस्म करती हुई... किसी तेज शावर की तरह यह मस्तिष्क से आँखों तक पहुँच रही है, और आँखो में बसे हर भ्रष्ट आचरण के अंश को पूरी तरह नष्ट कर रही है... और बस आँखों में एक की ही सूरत... और उसी से लगी है पूरी लगन... बाकी अन्य सभी लगन विदाई लेती हुई... ये तेज शावर सभी ज्ञानेन्द्रियों से विकार के अंश को जलाकर भस्म कर रहा है... प्रकाश की दूसरी धारा शीतल पावन गंगाजल की भाँति मेरे रोम रोम में शीतलता प्रवाहित करती हुई... विकारों की भस्म को धोकर पूरी तरह साफ करती हुई...

 

 _ ➳  किसी पारदर्शी पावन दर्पण की तरह जगमगा उठा है मेरा अस्तित्व... शीशे की दीवारो में जगमगाती हुई जैसे कोई जगमग ज्योति... एक विशाल ज्योति के रूप में मेरे ठीक ऊपर शिव पिता... मेरे साथ साथी बनकर... सैकडों मील दूर तक फैली आकाश गंगा की भाँति उनसे निरन्तर मुझ तक आती हुई प्रकाश की धारा... और अब ये प्रकाश ज्वाला का रूप धारण कर सारी सीमाओं को तोडता हुआ स्वछन्दता से आस पास के वातावरण में फैल रहा है... दूर दूर तक फैले हुए भ्रष्टाचार, और अत्याचार के कंटीले जंगल को जलाता हुआ...  उसके अंश को भस्म करता हुआ... ये घने कैक्टस की झाडियाँ, ये विषैली नागफनियाँ... जिन्होनें  शिष्टाचार की कोमल कलियों को बंधक बना लिया था... आज जलकर भस्म हो रही है... शिव के साथ निरन्तर कम्बांइन्ड रूप में, मैं आत्मा शीतलता की धारा से इन कोमल कलियों को शीतल कर रही हूँ... मुक्त हुई ये कलियाँ बेहद के वैराग्य से भरकर निहार रही है शिव पिता की ओर... और हर एक अपने शक्ति स्वरूप को इमर्ज कर महाशक्ति रूप धारण कर रही है... देखते ही देखते इनसे एक साथ असंख्य ज्वालाएँ प्रकट होकर चारों दिशाओं में फैल गयी है... भ्रष्टाचार के वंश मात्र को भस्म करती हुई...

 

 _ ➳  और अब मैं आत्मा, शीतल गंगा की धारा बन, भ्रष्टाचार की इस भस्म को, इन पाँच तत्वों से बहुत दूर बहाकर ले जा रही हूँ... अपने पीछे की सृष्टि को सतोप्रधान बनाती हुई... एक नई ऊर्जा से भरकर ये धरा मुस्कुरा रही है... सदाचार और नैतिकता के नन्हें अंकुर इसकी गोद में मुस्कुरानें लगें है... हवाऐं सौरभ लेकर गुनगुना रही है... मानों जगती का चप्पा चप्पा आज यही कह रहा है... जन्नत ने द्वार खटखटाया है आज... खोल सखी पट घूँघट के संदेशा प्रियतम का कोई लाया है आज... निरन्तर अटैन्शन से, मैं आत्मा शिव बाबा के साथ कम्बाइन्ड रूप में... अब प्रवेश कर रही हूँ अपनी शीशे के समान पारदर्शी देह में... शिव शक्ति रूप में हर भ्रष्ट संकल्प के प्रति अटैन्शन रखती हुई... ओम शान्ति...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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