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 08 / 12 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *देह के सर्व संबंधो से बुधीयोग निकाल एक बाप से बुधीयोग जोड़ा ?*

 

➢➢ *निरहंकारी बन साइलेंस में रह कांटो को फूल बनाने की मेहनत की ?*

 

➢➢ *वाचा के साथ मनसा द्वारा शक्तिशाली सेवा की ?*

 

➢➢ *अपनी हर चलन से बाप का नाम बाला करने वाले सच्चे सच्चे खुदाई खिदमतगार बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  जैसे एटम बम एक स्थान पर छोड़ने से चारों ओर उसके अंश फैल जाते हैं - *वह एटम बम है और यह आत्मिक बम है। इसका प्रभाव अनेक आत्माओं को आकर्षित करेगा और सहज ही प्रजा की वृद्धि हो जायेगी इसलिए संगठित रुप में आत्मिक स्वरूप के अभ्यास को बढ़ाओ, स्मृति स्वरुप बनो तो वायुमण्डल पॉवरफुल हो जायेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं निश्चयबुद्धि आत्मा हूँ"*

 

✧  जो कुछ भी ड्रामा में होता है उसमें कल्याण ही भरा हुआ है, अगर यह स्मृति में सदा रहे तो कमाई जमा होती रहेगी। समझदार बच्चे यही सोचेंगे कि जो कुछ होता है वह कल्याणकारी है। क्यों, क्या का क्वेशचन समझदार के अन्दर उठ नहीं सकता। *अगर स्मृति रहे कि यह संगमयुग कल्याणकारी युग है, बाप भी कल्याणकारी है तो श्रेष्ठ स्टेज बनती जायेगी। चाहे बाहर की रीति से नुकसान भी दिखाई दे लेकिन उस नुकसान में भी कल्याण समाया हुआ है, ऐसा निश्चय हो। जब बाप का साथ और हाथ है तो अकल्याण हो नहीं सकता।*

 

✧  अभी पेपर बहुत आयेंगे, उसमें क्या, क्यों का क्वेशचन न उठे। कुछ भी होता है होने दो। *बाप हमारा, हम बाप के तो कोई कुछ नहीं सकता, इसको कहा जाता है 'निश्चय बुद्धि'।* बात बदल जाए लेकिन आप न बदलो - यह है निश्चय। कभी भी माया से परेशान तो नहीं होते हो? कभी वातावरण से, कभी घर वालों से, कभी ब्रह्मणों से परेशान होते हो? अगर अपने शान से परे होते तो परेशान होते हो। 'शान की सीट पर रहो'।

 

✧  साक्षीपन की सीट शान की सीट है इससे परे न हो तो परेशानी खत्म हो जायेगी। *प्रतिज्ञा करो कि 'कभी भी कोई बात में न परेशान होंगे, न करेंगे'।* जब नालेजफुल बाप के बच्चे बन गये, त्रिकालदर्शी बन गये, तो परेशान कैसे हो सकते? संकल्प में भी परेशानी न हो। 'क्यों' शब्द को समाप्त करो। 'क्यों' शब्द के पीछे बड़ी क्यू है।  

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  नाम सेवा लेकिन होता है स्वार्थी अपने को आगे बढाना है लेकिन बढ़ाते हुए बैलेन्स को नहीं भूलना है क्योंकि सेवा में ही स्वभाव, संबंध का विस्तार होता है और माया चांस भी लेती है। *थोडा-सा बैलेन्स कम हुआ और माया नया रूप धारण कर लेती है, पुराने रूप में नहीं आयेगी।*

 

✧  नये-नये रूप में, नई-नई परिस्थिति के रूप में, सम्पर्क के रूप में आती है। तो *अलग में सेवा को छोडकर अगर बापदादा बिठा दे, एक मास बिठाये, 15 दिन बिठाये तो कर्मातीत हो जायेंगे?* एक मास दें, बस कुछ नहीं करो, बैठे रहो, तपस्या करो, खाना भी एक बार बनाओ बसा फिर कर्मातीत बन जायेंगे? नहीं बनेंगे?

 

✧  *अगर बैलेन्स का अभ्यास नहीं है तो कितना भी एक मास क्या, दो मास भी बैठ जाओ लेकिन मन नहीं बैठेगा, तन बैठ जायेगा।* और बिठाना है मन को, न कि तन को। तन के साथ मन को भी बिठाना है, बैठ जाए बस, बाप और मैं, दूसरा न कोई। तो एक मास ऐसी तपस्या कर सकते हो या सेवा याद आयेगी?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  वाह रे मैं!' का नशा याद है? वह दिन, वह झलक और फलक स्मृति आती है? वह नशे के दिन अलौकिक थे। ऐसे नशे के दिन स्मृति में आते ही नशा चढ़ जाता है- इतना नशा, इतनी खुशी जो स्थूल पाँव भी चलते-फिरते नैचुरल डांस करते हैं- प्रोग्राम से डांस नहीं। *मन में भी नाच और तन भी नैचुरल नाचता रहे। यह नैचुरल डांस तो निरन्तर हो सकता है? आँखों का देखना, हाथों का हिलना और पाँव का चलना सब खुशी में नैचुरल डांस करते हैं। उनको फ़रिश्तों का डांस कहते हैं- ऐसे नैचुरल डांस चलता रहता है?* जैसे कहते हैं कि फ़रिश्तों के पाँव धरती पर नहीं टिकते। ऐसे फ़रिश्ते बनने वाली आत्मायें भी इस देह अर्थात् धरती- जैसे वह धरती मिट्टी है वैसे यह देह भी मिट्टी है ना? तो फ़रिश्तों के पाँव धरती पर नहीं रहते अर्थात् फ़रिश्ते बनने वाली आत्माओं के पाँव अर्थात् बुद्धि इस देह रूपी धरती पर नहीं रह सकती। यही निशानी है फ़रिश्तेपन की। जितना फ़रिश्तेपन की स्थिति के समीप जाते रहते, उतना देह रूपी धरती से पाँव स्वत: ही ऊपर होंगे। अगर ऊपर नहीं हैं, धरती पर रहते हैं तो समझो बोझ है। बोझ वाली वस्तु ऊपर नहीं रह सकती। हल्कापन न है, बोझ है तो इस देह रूपी धरती पर बार-बार पाँव आ जायेंगे, फ़रिश्ता अर्थात् हल्का नहीं बनेंगे। *फ़रिश्तों के पाँव धरती से ऊँचे स्वत: ही रहते हैं, करते नहीं हैं। जो हल्का होता है उनके लिए कहते हैं कि यह तो जैसे हवा में उड़ता रहता है। चलता नहीं है, उड़ता है। ऐसे ही फ़रिश्ते भी ऊँची स्थिति में उड़ते हैं।* ऐसे नैचुरल फ़रिश्तों का डांस देखने और करने में भी मजा आता है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आत्मा और परमात्मा का मिलन ही सच्चा-सच्चा संगम है"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन के डायमंड हाल में पहुँच जाती हूँ अपने प्यारे पिता से मिलने... मेरे पिता परमधाम से आयें हैं मुझे पतित से पावन बनाने... अपने साथ घर ले जाने... सभी फ़रिश्ते प्यार के सागर में डूबने बड़े ही आतुरता से प्यार के सागर मेरे बाबा का इन्तजार कर रहे हैं...* फिर वो मिलन की घडी आ जाती है और प्यारे बापदादा दादी के तन में विराजमान होकर दृष्टि देकर सबको निहाल कर रहे हैं... और मुझे अपने पास बुलाकर मेरे मन के मीत बाबा मुझसे प्यारी-प्यारी बातें करते हैं...

 

  *रूहानी मिलन मेले में सबको अविनाशी सौगातों को बांटते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... *प्यारे पिता से मिलन के यह खूबसूरत पल सदा के है... यह ख़ुशी अविनाशी है एक दिन की नही... सदा की ख़ुशी सदा का आनन्द... सदा ज्ञान गुणो का श्रृंगार है...* ईश्वरीय पिता के बच्चे सदा ही उमंगो के उत्सव् में है... दुनिया एक दिन के त्योहारो में खुशियां पाती है आप हर पल त्योहारो को जीते हो...

 

_ ➳  *मिलन मेले में खुशियों के खजानों को समेटते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा खुशियो की कितनी प्यासी थी... एक दिन की ख़ुशी का बरस भर इंतजार सा था... *आज हर दिन खुशियो के मेले में मस्त हूँ... हर लम्हा श्रृंगार है हर पल ख़ुशी का खजाना मेरे पास है...*

 

  *खुशियों की बरसात कर श्रेष्ठ भाग्य के झूले में झुलाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे बच्चे... *परमात्मा से मिलन के मेले में पिता समान श्रेष्ठ हो गए हो... गुणो और शक्तियो से सजेधजे मुस्करा उठे हो... आपस में गुणो को लिए दिए चले जा रहे हो...* और खुशियो संग यूँ खेलते ही चले जा रहे हो... कितना मीठा और प्यारा यह महा सौभाग्य आप बच्चों का है कि सदा की खुशियो में जीते जा रहे हो...

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यार के सागर के प्यार की लहरों में उछलती हुई कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा प्यार के पल आपकी यादो में जीती जा रही हूँ... खुशियो में खिलती ही जा रही हूँ.... *गुणो के लेन देन में सुखी होती जा रही हूँ... मिलन के मेले में खुशियो भरी तकदीर जगाती जा रही हूँ...*

 

  *ज्ञान सूर्य मेरे बाबा चारों ओर ज्ञान की किरणों की बौछारें करते हुए कहते हैं:-* मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... *मधुर परमात्म मिलन के मेले में खोये रहो... प्रवृत्ति में रहते हुए भी सदा न्यारे और प्यारे बन पिता के दिल पर सितारे रहो... राजऋषि बन मुस्कराते रहो...* निर्विघ्न रह विजय पताका लहराते ही रहो... लक्की सितारे होकर बाबा के दिल पर इठलाते रहो... और चमकदार हीरे बन अपनी रश्मियों से संसार में आभा फैलाते रहो...

 

_ ➳  *प्रेम की लहरों में समाकर अमूल्य मणि बन चमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... आपकी खूबसूरत सी छत्रछाया में जादू हो गया है... *मै आत्मा चमकता हीरा हो गई हूँ हर विघ्न पर विजयी हो कर न्यारी सी प्यारी सी अनोखी बन जहान में खुशियो की जादुई परी हो गयी हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- निरहंकारी बन साइलेन्स में रह कांटो को फूल बनाने की मेहनत करनी है*"

 

_ ➳  इस काँटो के जंगल (दुखधाम) को फूलों का बगीचा (सुखधाम) बनाने का जो कर्तव्य करने के लिए परमपिता परमात्मा शिव बाबा इस धरा पर अवतरित हुए है उस कार्य में उनका मददगार बनने के लिए मुझे काँटे से फूल बन सबको फूल बनाने का पुरुषार्थ अवश्य करना है और सबको शान्तिधाम, सुखधाम का रास्ता बताना है। मन ही मन अपने आपसे यह प्रतिज्ञा करते हुए अपने दिलाराम बागवान बाप की मीठी यादों में मैं खो जाती हूँ। *प्रभु यादों की डोली में बैठ अव्यक्त फ़रिशता बन इस साकारी दुनिया और दुनियावी सम्बन्धो से किनारा कर मैं चल पड़ती हूँ उस अव्यक्त वतन में जहां मेरे दिलाराम बाबा मेरे आने की राह में पलके बिछाए बैठे हैं*।

 

_ ➳  वतन में पहुंच कर अब मैं वतन का खूबसूरत नजारा मन बुद्धि रूपी दिव्य नेत्रों द्वारा स्पष्ट देख रही हूं। पूरा वतन रंग बिरंगे फूलों की खुशबू से महक रहा है। मेरे ऊपर लगातार पुष्पो की वर्षा हो रही हैं। *जहाँ - जहाँ मैं पाव रखती हूं मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे मेरे पैरों के नीचे मखमली फूंलो का गलीचा बिछा हुआ है*। सामने मेरे दिलाराम मेरे बागवान बाबा अपने लाइट माइट स्वरूप में रंग बिरंगे फूलो से सजे एक बहुत सुंदर झूले पर बैठे मेरा इन्जार कर रहें हैं। मुझे देखते ही बाबा मुस्कराते हुए स्वागत की मुद्रा में खड़े हो कर अपनी बाहें फैला लेते हैं और आओ मेरे रूहे गुलाब बच्चे कह कर अपने गले लगा लेते हैं।

 

_ ➳  बाबा की बाहों के झूले में झूलते, अपनी आंखें बन्द कर मैं असीम सुख की अनुभूति में खो जाती हूँ। *अतीन्द्रिय सुखमय स्थिति का गहराई तक अनुभव करने के बाद मैं जैसे ही अपनी आंखें खोलती हूं तो देखती हूँ कि बाबा के साथ मैं एक बहुत बड़े फूंलो के बगीचे में खड़ी हूँ*। बाबा बड़े प्यार से एक एक - एक फूल पर दृष्टि डाल कर, हर फूल को बड़े प्यार से सहलाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। मैं भी बाबा के पीछे - पीछे चलते हुए हर फूल को बड़े ध्यान से देख रही हूं। *कुछ फूल तो एक दम खिले हुए बड़ी अच्छी खुशबू फैला रहे हैं, कुछ अधखिलें हैं और कुछ थोड़े थोड़े मुरझाए हुए भी दिखाई दे रहें हैं*। लेकिन हर फूल के ऊपर प्यार भरी दृष्टि डाल कर अब बाबा वापिस उस झूले पर आ कर बैठ जाते हैं और मुझे भी अपने पास बैठने का ईशारा करते हैं।

 

_ ➳  मेरे मन मे चल रही दुविधा को जैसे बाबा मेरे चेहरे से स्पष्ट पढ़ रहे हैं इसलिए मेरे कुछ भी पूछने से पहले बाबा मुझसे कहते हैं, मेरे रूहे गुलाब बच्चे:- *"इस काँटो की दुनिया को फूलो की नगरी बनाने के लिए ही बाबा ये सैपलिंग लगा रहें हैं" और ये सभी फूल मेरे वो मीठे, सिकीलधे बच्चे हैं जो श्रीमत पर चल काँटे से फूल बनने का पुरुषार्थ कर रहें हैं, लेकिन नम्बरवार हैं*। इसलिए कुछ फूल तो पूरी तरह खिले हुए हैं जो अपनी रूहानियत की खुशबू सारे विश्व में फैला रहें हैं। कुछ अधखिले हैं जो अभी खिलने के लिए तैयार हो रहें हैं। और कुछ मुरझाए हुए भी हैं जो बार बार माया से हार खाते रहते हैं। लेकिन बाबा अपने हर बच्चे को नम्बर वन रूहे गुलाब के रूप में देखना चाहते हैं इसलिए हर बच्चे को सूक्ष्म में इमर्ज कर उन्हें बल देते रहते हैं।

 

_ ➳  अपने मन में चल रहे सभी सवालों के जवाब सुन कर अब मैं मन ही मन दृढ़ संकल्प करती हूं कि अब मुझे नम्बर वन रूहे गुलाब अवश्य बनना है। इसलिए *काँटे से फूल बन, सबको फूल बनाने का ही अब मुझे पुरुषार्थ करना है*। बाबा मेरे मन के हर संकल्प को पढ़ कर बड़ी गुह्य मुस्कराहट के साथ मुझे देखते हैं और अपना वरदानीमूर्त हाथ मेरे सिर पर रख देते है। मुझे माया जीत भव और सफलता मूर्त भव का वरदान देते हुए मेरे मस्तक पर विजय का तिलक लगाते हैं।

 

_ ➳  विजय का स्मृति तिलक लगाकर, काँटे से फूल बनने के पुरुषार्थ में आने वाले माया के हर विघ्न का डटकर सामना करने के लिए अब मैं *स्वयं को बलशाली बनाने के लिए निराकारी ज्योति बिंदु आत्मा बन चल पड़ती हूँ अपने निराकार काँटो को फूल बनाने वाले बबूलनाथ अपने प्यारे परमपिता परमात्मा शिव बाबा के पास परमधाम और जा कर उनके सानिध्य में बैठ स्वयं को उनकी सर्वशक्तियो से भरपूर करने लगती हूँ*। स्वयं में परमात्म बल भर कर अब मैं वापिस लौट रही हूँ।

 

_ ➳  साकारी दुनिया मे, अपने साकारी ब्राह्मण तन में प्रवेश कर, अब मैं अपने सम्बन्ध संपर्क में आने वाली हर आत्मा को सच्चा - सच्चा परमात्म ज्ञान सुना कर उन्हें शान्तिधाम, सुखधाम जाने का रास्ता बता रही हूँ। *रूहानियत की खुशबू चारों और फैलाते हुए अपनी पवित्रता की शक्ति से मैं विकारों रूपी काँटो की चुभन से पीड़ित आत्माओं को उस चुभन से निकाल उन्हें फूलो की मखमली शैया का सुखद अनुभव करवा कर उन्हें भी काँटे से फूल बनने का सत्य मार्ग दिखा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं वाचा के साथ मनसा द्वारा शक्तिशाली सेवा करने वाली सहज सफलता मूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं अपनी हर चलन से बाप का नाम बाला करने वाली सच्ची सच्ची खुदाई खिदमतगार आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *बापदादा आज देख रहे थे कि एकाग्रता की शक्ति अभी ज्यादा चाहिए। सभी बच्चों का एक ही दृढ़ संकल्प हो कि अभी अपने भाई-बहिनों के दु:ख की घटनायें परिवर्तन हो जाएं।* दिल से रहम इमर्ज हो। क्या जब साइन्स की शक्ति हलचल मचा सकती है तो इतने सभी ब्राह्मणों के साइलेन्स की शक्तिरहमदिल भावना द्वारा वा संकल्प द्वारा हलचल को परिवर्तन नहीं कर सकती! जब करना ही है, होना ही है तो इस बात पर विशेष अटेन्शन दो। *जब आप ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर के बच्चे हैंआपके ही सभी बिरादरी हैंशाखायें हैं, परिवार हैआप ही भक्तों के ईष्ट देव हो।* यह नशा है कि हम ही ईष्ट देव हैंतो भक्त चिल्ला रहे हैंआप सुन रहे हो! वह पुकार रहे हैं - हे ईष्ट देव, आप सिर्फ सुन रहे होउन्हों को रेसपान्ड नहीं करते होतो *बापदादा कहते हैं हे भक्तों के ईष्ट देव अभी पुकार सुनोरेसपान्ड दो, सिर्फ सुनो नहीं।* क्या रेसपान्ड देंगेपरिवर्तन का वायुमण्डल बनाओ। आपका रेसपान्ड उन्हों को नहीं मिलता तो वह भी अलबेले हो जाते हैं। चिल्लाते हैं फिर चुप हो जाते हैं।   

 

✺   *ड्रिल :-  "साइलेन्स की शक्ति और रहमदिल भावना से हलचल को परिवर्तन करना"*

 

 _ ➳  अमृतवेले बाबा की यादों में खोई मुझ आत्मा को ये सुहानी वेला ऐसे लगती है जैसे प्यासा अपनी प्यास बुझा रहा है... अमृत की बूंदें ऊपर से टप टप कर मुझ आत्मा को तृप्त कर रही हैं... *ये रूहानी अमृत और इसका नशा वाह वाह क्या कहने!* मैं मन ही मन बाबा से कहती हूँ कि क्यों अब तक दूर रखा मुझे इस अमृत से... 

 

 _ ➳  बाबा की याद में डूबी मैं आत्मा वापिस आती हूं साकारी लोक में, तभी एक दृश्य सामने आता है *"भक्त आत्माएँ मंदिर जा रही हैं सुख चैन की तलाश में उनको देख तरस आता है, कि ये कहाँ जड़ चित्रों में सुख शांति ढूंढ रही हैं* ये मेरे भाई बहन इनके चित्त को कैसे आराम मिले... मैंने जो अमृत पान किया है, वो ये भी अगर चख लें तो इनके चित्त को भी आराम मिल जाये... बाबा ने मुझे जो दिया है, वो मुझे अपने इन भाई बहनों को भी देना है...

 

 _ ➳  *इसी भावना के साथ बाबा को याद कर एकाग्रचित्त हो मैं आत्मा समा जाती हूं जड़ मूर्ति में...* देखती हूँ उन भक्त आत्माओं को जो अपने दुःख में दुखी इन मूर्तियों के आगे माथा टिका रहे हैं कि कैसे भी दो पल का सुख चैन मिल जाये...

 

 _ ➳  *मैं ईष्टदेवी हूँ... इस स्वमान में सैट होकर रहमदिल बन मैं इन आत्माओं को सुख शान्ति की किरणें दे रही हूं... बाबा से निरंतर किरणें मुझ पर आ रही हैं... और मुझ से होती हुई उन भक्त आत्माओं तक पहुंच रही हैं...* सभी आत्माऐं प्रसन्न हो रही हैं... उनके अंदर की हलचल समाप्त हो गई है, और उनके मन शांत हो गए हैं... वो सब अपने ईष्टदेवी की जय-जय कार कर रहे हैं... इन आत्माओं का अलबेलापन हलचल सब समाप्त हो गई है... वातावरण पूरी तरह से परिवर्तन हो गया है... *बाबा के प्यार की किरणें चारों और फैली हुईं हैं जो सबके दिलों को छू रही हैं...*

 

 _ ➳  ऐसा लग रहा है जैसे मुरझाए पड़े वृक्ष को पानी मिल गया है... पत्ता-पत्ता... शाखा-शाखा... हर टहनी लहलहाने... खिलखिलाने लग गई है *वाह वाह रे मेरे बाबा क्या अद्धभुत तेरा कमाल "करते हो तुम बाबा मेरा नाम हो रहा है"*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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