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 09 / 01 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"मैं शरीर से न्यारी आत्मा हूँ" - यह स्मृति रही ?*

 

➢➢ *बाप को अपना सच्चा सच्चा समाचार दिया ?*

 

➢➢ *सर्व खाते और रिश्ते एक बाप से रखे ?*

 

➢➢ *अपनी विशेषताओं को प्रयोग में लाकर हर कदम में प्रगति का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अशरीरी बनने के लिए समेटने की शक्ति बहुत आवश्यक है।* अपने देह-अभिमान के संकल्प को, देह के दुनिया की परिस्थितियों के संकल्प को समेटना है। शरीर और शरीर के सर्व सम्पर्क की वस्तुओं को, अपनी आवश्यकताओं के साधनों की प्राप्ति के संकल्प को भी समेटना है। *घर जाने के संकल्प के सिवाय अन्य किसी संकल्प का विस्तार न हो-बस यही संकल्प हो कि अब अपने घर गया कि गया।* अनुभव करो कि मैं आत्मा इस आकाश तत्व से भी पार उड़ती हुई जा रही हूँ, इसके लिये अब से अकाल तख्तनशीन होने का अभ्यास बढ़ाओ।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं अंधकार में रोशनी करने वाला चैतन्य दीपक हूँ"*

 

   अपने को सदा जगे हुए दीपक समझते हो? *आप विश्व के दीपक, अविनाशी दीपक हो जिसका यादगार अभी भी 'दीपमाला' मनाई जाती है। तो यह निश्चय और नशा रहता है कि हम दीपमाला के दीपक हैं? अभी तक आपकी माला कितनी सिमरण करते रहते हैं?* क्यों सिमरण करते हैं? क्योंकि अधंकार को रोशन करने वाले बने हो। स्वयं को ऐसे सदा जगे हुए दीपक अनुभव करो। टिमटिमाने वाले नहीं। 

 

  *कितने भी तूफान आयें लेकिन सदा एकरस, अखण्ड ज्योति के समान जगे हुए दीपक। ऐसे दीपकों को विश्व भी नमन करती है और बाप भी ऐसे दीपकों के साथ रहते हैं।*

 

  टिमटिमाते दीपकों के साथ नही रहते। *बाप जैसे सदा जागती ज्योति है, अखण्ड ज्योति है, अमर ज्योति है, ऐसे बच्चे भी सदा अमरज्योति! अमर ज्योति के रुप में भी आपका यादगार है। चैतन्य में बैठे अपने सभी जड़यादगारों को देख रहे हो। ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें हो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  संस्कार के ऊपर भी कन्ट्रोल होना चाहिए। जब चाहो, जैसे चाहो - जब यह अभ्यास पक्का होगा तब समझो पास विद ऑनर होंगे। तो *बनना लक्ष्मी-नारायण है, तो राज्य कन्ट्रोल करने के पहले स्व-राज्य अधिकारी तो बनो तब राज्य अधिकारी बनेंगे।*

 

✧  इसका भी साधन यही है कि खजाने जमा करो। समझा। अच्छा - इस वायुमण्डल में, मधुबन में बैठे हो। *मधुबन का वायुमण्डल पॉवरफुल है, इस वायुमण्डल में इस समय मन को कन्ट्रोल कर सकते हो?*

 

✧  चाहे मिनट में करो, चाहे सेकण्ड में करो लेकिन कर सकते हो? *ऑर्डर दो मन को, बस आत्मा परमधाम निवासी बन जाओ।* देखो मन ऑर्डर मानता है या नहीं मानता है? (बापदादा ने ड़िल कराई) अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् इच्छा मात्रम अविद्या।* जैसे देवताओं के लिए गायन है- इच्छा मात्रम् अविद्या। यह है फ़रिश्ता जीवन की विशेषता। देवताई जीवन में तो इच्छा की बात ही नहीं। *ब्राह्मण जीवन सो फ़रिश्ता जीवन बन जाती अर्थात् कर्मातीत स्थिति को प्राप्त हो जाते।* किसी भी शुद्ध कर्म वा व्यर्थ कर्म वा विकर्म वा पिछला कर्म, किसी भी कर्म के बन्धन में बंध कर करना- इसको कर्मातीत अवस्था नहीं कहेंगे। एक है कर्म का सम्बन्ध, एक है बन्धन। तो जैसे यह गायन है- हद की इच्छा से अविद्या, ऐसे फ़रिश्ता जीवन वा ब्राह्मण जीवन अर्थात् 'मुश्किल' शब्द की अविद्या, बोझ से अविद्या, मालूम ही नहीं कि वह क्या होता है! *तो वरदानी आत्मा अर्थात् मुश्किल जीवन से अविद्या का अनुभव करने वाली।* इसको कहा जाता है- वरदानी आत्मा। तो *बाप समान बनना अर्थात् सदा वरदाता से प्राप्त हुए वरदानों से पलना, सदा निश्चिन्त, निश्चित विजय अनुभव करना।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बेहद के बाप को याद करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एकांत में सागर के किनारे बैठ सागर में उछलती लहरों को देख रही हूँ... मेरे जीवन में उछलती दुःख-अशांति की लहरों को ख़त्म कर... सदा के लिए सुख-शांति, प्रेम की लहरों में मुझे लहराने वाले... सर्व गुणों-शक्तियों के सागर बाबा के पास पहुँच जाती हूँ शांतिधाम में...* परमधाम की परम शांति का अनुभव कर रही हूँ... बस एक बाबा और मैं... बाबा से निकलती किरणें मुझमें दिव्य अलौकिक शक्तियों को भर रही हैं... *फिर मैं आत्मा शांति की दुनिया से नीचे उतरकर बिंदु रूप से फ़रिश्ता स्वरुप धारण कर फरिश्तों की दुनिया में पहुँच जाती हूँ... बापदादा के सम्मुख बैठ जाती हूँ...*

 

  *सच्चे प्रेम के अहसासों में मुझे डुबोकर मेरे प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... सच्चे प्यार की मुस्कराती मदमाती यादो में रग रग को डुबो दो... *सच्चे माशूक के साथ अपनी प्रीत जोड़कर... प्यार के अहसासो में डूब जाओ और प्राप्तियों के अनन्त खजाने अपने दामन में सजाओ*... योग और पढ़ाई की जादूगरी से सहज ही विश्व का अधिकार पाओ..."

 

_ ➳  *बाबा की यादों में पवित्र, निर्मल, ओजस्वी बनकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... *मै आत्मा सच्चे प्यार को पाने वाली... ईश्वर माशूक संग हर पल मुस्कराने वाली सच्ची आशिक हूँ...* कभी मनुष्यो में प्यार की बून्द खोजने वाली... आज प्यार के सागर को ही पाकर... अपने महान भाग्य पर धन्य धन्य हो उठी हूँ... कितना प्यारा मेरा भाग्य है.."

 

  *मीठे प्रेम के तराने सुनाकर मुझे मदमस्त करते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वरीय यादो में अनन्त खजाने सहज ही पाकर... सबसे महान भाग्य से भर जाओ... *ईश्वर पिता के सारे खजानो को प्यार में सहज ही लूट लो... प्यार के तार जोड़कर विश्व की अमीरी को बाहों में भर लो... आशिक बनकर सच्चे माशूक को अपनी यादो का दीवाना बना दो..."*

 

_ ➳  *एक बाबा के दिल की तिजोरी में चमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मैं आत्मा भगवान को ही माशूक रूप में पाकर सच्चे प्यार का सुख हर पल हर साँस ले रही हूँ...* भगवान मुझे यूँ मिल जायेगा यूँ प्यार करेगा, और प्यार से भर जाएगा यह तो कल्पना में भी न था... *प्यारे बाबा किन शब्दों में आपका शुक्रिया करूँ..."*

 

  *महकता फूल बनाकर अपने गुलिस्तां में सजाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... *अपने सत्य स्वरूप में डूबकर, सच्चे पिता की मीठी महकती यादो में रोम रोम से भीग जाओ... इन सच्ची यादो में ही सच्चे सुखो के भण्डार समाये है... यह यादे ही सच्चे प्यार का पर्याय है.. सारे सुख इन यादो में निहित है...* इन यादो और ज्ञान रत्नों से जीवन को अनन्त ऊंचाइयों पर ले जाओ..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी यादों में डूबकर बाबा की दीवानी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके प्रेम में खोयी हुई अतीन्द्रिय सुख में डूबी हुई हूँ... *मीठे बाबा आपको पाकर मैंने सब कुछ पा लिया है... सच्चे प्रेम को दामन में सजा लिया है... और इसकी मीठी अनुभूतियों में हर पल खोयी खोयी सी हूँ..."*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पास विद ऑनर होने का पुरुषार्थ करना है*"

 

_ ➳  स्वयं भगवान द्वारा पढ़ाई जाने वाली इस ईश्वरीय पढ़ाई में पास विद ऑनर होने के लक्ष्य को पाने के लिये मुझे इस बात का पूरा ख्याल रखना है कि कभी भी मनसा - वाचा - कर्मणा मुझ से कोई भी भूल ना हो। *मन ही मन स्वयं से यह दृढ़ प्रतिज्ञा कर मैं एकांत में बैठ अपनी चेकिंग करती हूँ कि क्या मेरे हर संकल्प, बोल और कर्म में सर्व के प्रति कल्याण की भावना समाई रहती है*! मेरे संकल्प व्यर्थ और अकल्याणकारी तो नही होते! मेरे बोल दूसरों को दुख देने का कारण तो नही बनते और मुझसे ऐसा कोई कर्म तो नही होता जिससे किसी को कष्ट हो! 

 

_ ➳  यह सोचते और अपनी चेकिंग करते हुए मैं विचार करती हूँ कि दुख हर्ता सुख कर्ता बाप की सन्तान मैं आत्मा भी तो उनके समान मास्टर दुख हर्ता सुख कर्ता हूँ तो *बाप समान सर्व आत्माओं को दुःखो से छुड़ा कर उन्हें सुख देना मेरा परम कर्तव्य है और इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने हर संकल्प, बोल और कर्म पर मुझे विशेष अटेंशन अवश्य देना है*। इसी दृढ़ संकल्प के साथ मनसा वाचा कर्मणा तीनो रूपों से स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए अब मैं अपने शिव पिता के पास जाने का संकल्प कर, अशरीरी स्थिति के अभ्यास द्वारा अपने दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप में स्थित होती हूँ और मन बुद्धि को हर चीज के प्रभाव से मुक्त कर, अपने सम्पूर्ण ध्यान को केवल भृकुटि पर एकाग्र कर लेती हूँ।

 

_ ➳  एकाग्रता की शक्ति सेकण्ड में मुझे देह और देह की दुनिया के हर प्रकार के आकर्षण से मुक्त कर अति न्यारी और प्यारी स्थिति में स्थित कर देती है। *ज्ञान के दिव्य चक्षु से मुझे मेरा पूर्ण प्रकाशित स्वरूप स्पष्ट दिखाई देने लगता है*। मेरा यह अति सुन्दर न्यारा और प्यारा स्वरूप मुझे डीप साइलेन्स का गहराई तक अनुभव करवा रहा है। देह, देह से जुड़ी हर वस्तु से मैं स्वयं को पूर्णतया मुक्त अनुभव करने लगी हूँ।

 

_ ➳  इस न्यारी अवस्था में स्थित होते ही मैं स्वयं को विदेही, निराकार और मास्टर बीज रुप स्थिति में अपने बीच रुप परम पिता परमात्मा, संपूर्णता के सागर, पवित्रता के सागर, सर्वगुण और सर्व शक्तियों के अखुट भंडार, ज्ञान सागर, पारसनाथ बाप के सामने परम धाम में देख रही हूँ। *कोई संकल्प कोई विचार अब मेरे मन में नही है। एकदम निर्संकल्प अवस्था। बस बाबा और मैं। बीज रुप बाप के सामने मैं मास्टर बीज रुप आत्मा डेड साइलेंस की स्थिति में स्थित हो कर अतीन्द्रिय सुख का सहज अनुभव कर रही हूँ*। 

 

_ ➳  स्वयं को निराकार महाज्योति अपने प्यारे परम पिता परमात्मा शिव बाबा के सम्मुख देखते हुए उनसे निकल रही अनन्त शक्तियों को स्वयं में समा कर मैं स्वयं को शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। उनकी किरणों की शीतल छाया मुझे गहन शांति का अनुभव करवा रही हैं। *सर्वशक्तियों से भरपूर हो कर मैं आ जाती हूँ परमधाम से नीचे फरिश्तों की जगमग करती हुई दुनिया में*। सफेद चमकीली फरिश्ता ड्रेस धारण कर मैं फरिश्ता पहुँच जाता हूँ अव्यक्त वतन वासी अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा के सामने जिनकी भृकुटि में शिवबाबा चमक रहें हैं। *बापदादा बड़े प्यार से निहारते हुए अपनी मीठी दृष्टि मुझ पर डाल रहे हैं। उनकी शक्तिशाली दृष्टि से मुझ फरिश्ते के अंदर परमात्म बल भरता जा रहा है जो मुझे शक्तिशाली बना रहा है*। 

 

_ ➳  परमात्म बल, परमात्म शक्तियों से भरपूर हो कर मैं आत्मा अब वापिस अपनी कर्मभूमि पर लौट आती हूँ और अपना देह रूपी वस्त्र धारण कर पास विद ऑनर होने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपनी अवस्था जमाने के लिए मैं हर कर्म अब अपने प्राण प्रिय शिव बाबा की याद मे रहकर करती हूँ*। चलते फिरते बुद्धि का योग केवल अपने शिवपिता के साथ जोड़ कर, अपनी मनसा, वाचा, कर्मणा पर मैं सम्पूर्ण अटेंशन देती हूँ। मनसा वाचा कर्मणा तीनो रूपों में किसी को भी मेरे कारण दुख न पहुंचे, इस बात पर सम्पूर्ण ध्यान देते हुए, अपने सम्पूर्णता के लक्ष्य को पाकर पास विद होने का पुरुषार्थ अब मैं निरन्तर कर रही हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सर्व खाते और रिश्ते एक बाप से रखने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं डबल लाइट फरिश्ता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा अपनी विशेषताओं को सदा प्रयोग में लाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा हर कदम में सदैव प्रगति का अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा सफलता स्वरूप हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  औरों के सेवा की बहुत-बहुत बहुत-बहुत आवश्यकता है। यह तो कुछ भी नही हैबहुत नाजुक समय आना ही है। ऐसे समय पर *आप उड़ती कला द्वारा फरिशता बन चारों ओर चक्कर लगाते, जिसको शान्ति चाहिएजिसको खुशी चाहिएजिसको सन्तुष्टता चाहिएफरिशते रूप मे साकाश देने का चक्कर लगायेंगे* और वह अनुभव करेंगे। जैसे अभी अनुभव करते है नापानी मिल गया बहुत प्यास मिटी। खाना मिल गयाटेन्ट मिल गयासहारा मिल गया। ऐसे अनुभव करेंगे शांति मिल गई फरिशतों द्वारा। शक्ति मिल गई। खुशी मिल गई। *ऐसे अन्तःवाहक अर्थात् अन्तिम स्थितिपावरफुल स्थिति आपका अन्तिम वाहन बनेगा। और चारों ओर चक्कर लगाते सबको शक्तियाँ देंगे। साधन देंगे।* अपना रूप सामने आता है । *इमर्ज करो। कितने फरिस्ते चक्कर लगा रहे है! सकाश दे रहे है,* तब कहेंगे जो आप एक गीत बजाते हो ना - *शक्तियां आ गई... शक्तियों द्वारा ही सरवशक्तिवान स्वतः ही सिद्ध हो जायेगा। सुना।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अपने अन्तः वाहक शरीर द्वारा सेवा का अनुभव"*

 

 _ ➳  देख रही हूँ मैं आत्मा स्वयं को एक बड़ी सी ऊंची पहाड़ी पर प्रकृति के सानिध्य में बैठे हुए... चारों तरफ एक गहन शांति है... कोई आवाज नहीं... *अब मैं आत्मा चलती हूँ अन्तर यात्रा की ओर... समस्त चेतना को भृकुटि के मध्य केन्द्रित करती हूँ...* केवल अपने इस ज्योतिमय स्वरूप को देख रही हूँ *मैं आत्मा, महसूस कर रही हूँ अपने इस प्रकाशमय स्वरूप को बहुत गहराई से...* जितना गहराई से मैं आत्मा अपने इस स्वरूप को अनुभव करती जा रही हूँ उतना ही *मुझ आत्मा की आंतरिक शक्तियाँ जागृत हो रही है... मुझ आत्मा का प्रकाश बढ़ रहा है...* देख रही हूँ मैं आत्मा अपने इस जगमगाते शक्तिशाली स्वरूप को... तभी मुझ आत्मा की मन रूपी स्लेट पर बाबा के द्वारा कहे महावाक्य उभरने लगते है...

 

 _ ➳  *अन्त:वाहक अर्थात अन्तिम स्थिति, पावरफुल स्थिति आपका अन्तिम वाहन बनेगा । इमर्ज करो अपना यह स्वरूप इमर्ज करो* यह शब्द जैसे कानों में गुंजने लगते है... *मैं आत्मा ड्रामा की रिल को फारवर्ड करती हूँ... और अब मैं आत्मा पहुंच चुकी हूँ, ड्रामा के उस अन्तिम चरण में जहाँ चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है... बेहद दर्दनाक सीन सामने आ रहे हैं... आत्माएँ चिल्ला रही है... रो रही है...* दु:खों के पहाड़ उनके जीवन पर गिर पड़े है... *प्रकृति भी अपना विकराल रूप दिखा रही है... चारों तरफ प्रकृति का प्रकोप है... ना कोई साधन कार्य कर रहे है... ना ही विनाशी धन काम आ रहा है...* एक पल की शांति, खुशी की प्यासी आत्माएँ भटक रही है...

 

 _ ➳  उन्हें कहीं से कोई आशा की किरण नजर नहीं आ रही है... *जहाँ-तहाँ आत्माएँ दर्द में चिल्ला रही है... इस दुनिया की अन्तिम सीन बेहद दर्दनाक है...* आत्माएँ तड़फ रही है... उनकी आँखों में दर्द-दु:ख साफ दिखाई दे रहा है... *इसी अन्तिम सीन में मैं आत्मा देख रही हूँ स्वयं को... अपनी बेहद पावरफुल स्टेज को... अपनी इस अन्तिम स्थितिकर्मातीत स्टेज को... यहाँ रहते भी साक्षी दृष्टा हर प्रकार से उपराम अवस्था का अनुभव मैं आत्मा कर रही हूँ...* देख रही हूँ मैं आत्मा अपने इस शक्ति स्वरूप को... जिसमें *संहारी और अलंकारी दोनों स्वरूप एक साथ इमर्ज रूप में है... देख रही हूँ अपने इस कम्बाइंड शिवशक्ति स्वरूप को... लाइट माइट सम्पन्न इस स्थिति को... अपनी इस फरिश्ता स्थिति को...* देख रही हूँ मैं आत्मा...

 

 _ ➳  अब मैं फरिश्ता एक सेकंड में अलग-अलग स्थान पर पँहुच कर सभी दु:खी अशांत आत्माओं को सुख-शांति और खुशी की सकाश दे रहा हूँ... *मैं फरिश्ता जिन्हें शांति चाहिए, उन्हें शांति दाता बन शांति दे रहा हूँ... जिन्हें खुशी चाहिए उन्हें खुशी दे रहा हूँ... जिन्हें सुख चाहिए उन्हें सुख की अनुभूति करा रहा हूँ...* मुझ फरिश्ते के साथ बाबा के सभी बच्चे अपने अन्त: वाहक शरीर द्वारा इस पूरे विश्व में जहाँ जिसे जिस चीज की आवश्यकता है उन्हें दे रही है... *हम सभी फरिश्ते मिलकर सुख, शांति की सकाश इस पूरे विश्व को दे रहे है... चारों ओर चक्कर लगा रहे है... सबको सकाश दे रहे है...* आत्माएँ शांति की अनुभूति कर रही है... सुख की अनुभूति कर रही है...

 

 _ ➳  हम फरिश्तों को देखकर बेसहारा आत्माएँ सहारे का अनुभव कर रही है... *हमें देख भक्त आत्माएँ भी अपने ईष्टों का साक्षात्कार कर सन्तुष्ट हो रही है...* जयजयकार कर रही है... और अब यह गायन प्रत्यक्ष हो रहा है... *शिव शक्तियाँ आ गई धरती पर शिव शक्तियाँ आ गई... घर-घर में होती है जिनकी पूजा... चेतन में वो देवियाँ आ गई... हम फरिश्तों से सबको अनेक साक्षात्कार हो रहे है... हम शिव शक्तियों द्वारा सर्वशक्तिवान प्रत्यक्ष हो रहा है...* हाहाकार से जय-जयकार हो रही है... हम एक-एक फरिश्ते द्वारा एक बाबा प्रत्यक्ष हो रहा है... *सभी आत्माएँ अपने सच्चे पिता, अपने प्यारे पिता को पहचान रही है... एक-एक आत्मा के मुख से निकल रहा है मेरा बाबा आ गया मेरा बाबा आ गया...* उन्हें अपने सत्य स्वरूप का साक्षात्कार हमारे द्वारा हो रहा है... उन्हें अब अपने घर का सही रास्ता मिल गया है... अपने सच्चे पिता और अपने असली घर का पता पाकर *सभी आत्माएँ खुश हो रही है... सच्ची शांति, सुख खुशी सच्चे प्यार की अनुभूति कर रही है... ओम शांति...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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