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 09 / 02 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *पुरानी दुनिया के आकर्षण से मुक्त रहे ?*

 

➢➢ *"अप्राप्त नहीं कोई वास्तु ब्राह्मणों के संसार में" - यह अनुभव किया ?*

 

➢➢ *परमात्म गोदी के झूले में झूलते रहे ?*

 

➢➢ *स्मृति स्वरुप बन सहज ही नष्टोमोहा स्थिति का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  आजकल के जमाने में डाक्टर्स कहते हैं दवाई छोड़ो, एक्सरसाइज करो, *तो बापदादा भी कहते हैं कि युद्ध करना छोड़ो, मेहनत करना छोड़ो, सारे दिन में 5-5 मिनट मन की एक्सरसाइज करो। वन मिनट में निराकारी, वन मिनट में आकारी, वन मिनट में सब तरह के सेवाधारी, यह मन की एक्सरसाइज 5 मिनट की सारे दिन में भिन्न-भिन्न टाइम करो तो सदा तन्दरूस्त रहेंगे, मेहनत से बच जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं निर्विघ्न स्थिति द्वारा हर कदम में तीव्रगति से आगे बढ़ने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा निर्विघ्न, सदा हर कदम में आगे बढ़ने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो ना! किसी प्रकार का विघ्न रोकता तो नहीं है? *जो निर्विघ्न होगा उसका पुरुषार्थ भी सदा तेज होगा क्योंकि उसकी स्पीड तेज होगी। निर्विघ्न अर्थात् तीव्रगति की रतार।* विघ्न आये और फिर मिटाओ इसमें भी समय जाता है। अगर कोई गाड़ी को बार-बार स्लो और ते]ज करे तो क्या होगा? ठीक नहीं चलेगी ना। विघ्न आवे ही नहीं उसका साधन क्या है?

 

  *सदा मास्टर सर्वशक्तिवान की स्मृति में रहो। सदा की स्मृति शक्तिशाली बना देगी। शक्तिशाली के सामने कोई भी माया का विघ्न आ नहीं सकता। तो अखण्ड स्मृति रहे। खण्डन न हो।* खण्डित मूर्ति की पूजा भी नहीं होती है। विघ्न आया फिर मिटाया तो अखण्ड अटल तो नहीं कहेंगे। इसलिए 'सदा' शब्द पर और अटेन्शन। सदा याद में रहने वाले सदा निर्विघ्न होंगे।

 

  संगमयुग विघ्नों को विदाई देने का युग है। जिसको आधा कल्प के लिए विदाई दे चुके उसको फिर आने न दो। सदा याद रखो कि हम विजयी रत्न हैं। विजय का नगाड़ा बजता रहे। विजय की शहनाईयाँ बजती रहती हैं, ऐसे याद द्वारा बाप से कनेक्शन जोड़ा और सदा यह शहनाईयाँ बजती रहें। *जितना-जितना बाप के प्यार में, बाप के गुण गाते रहेंगे तो मेहनत से छूट जायेंगे। सदा स्नेही, सदा सहजयोगी बन जाते हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *बापदादा ने जो रूहानी एक्सरसाइज दी है, वह सारे दिन में कितने बार करते हो?* और कितने समय में करते हो? निराकारी और फरिश्ता।

 

✧  बाप और दादा, अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता स्वरूप। दोनों में देह-भान नहीं है। तो *देहभान से परे होना है तो यह रूहानी एक्सरसाइज कर्म करते भी अपनी डयुटी बजाते हुए भी एक सेकण्ड में अभ्यास कर सकते हो।*

 

✧  *यह एक नेचुरल अभ्यास हो जाए - अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता।* अच्छा (बापदादा ने ड़िल कराई)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *सिर्फ अपनी विस्मृति इन सब बातों को उत्पन्न करती है। चाहे पिछले संस्कार, चाहे पिछले कर्म-बन्धन, चाहे वर्तमान की भूले - जो भी कुछ होता है, उनका मूल कारण अपनी विस्मृति है।* अपनी विस्मृति के कारण यह सभी व्यर्थ बातें सहज को मुश्किल बना देती हैं। स्मृति रहने से क्या होगा? जो लक्ष्य रखकर के आये हो स्मृति सम्पूर्ण विस्मृति असम्पूर्ण। *विस्मृति है तो बहुत ही विघ्न हैं और स्मृति है तो सहज और सम्पूर्णता।* अपनी बुद्धि को कण्ट्रोल करने के लिए कई बातों को हल्का करना पड़ता हैं। सभी से हल्की क्या चीज़ होती है? आत्मा (बिन्दी)। तो जब अपने को कण्ट्रोल करने लिए फुलस्टाप करना होता है। तो आप भी बिन्दी लगा दो। जो बीत चुका उसको बिल्कुल भूल जाओ।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- संगमयुगी ब्राह्मणों का न्यारा, प्यारा श्रेष्ठ संसार"*

➳ _ ➳ *भोली -सी पथिक, और डगर अनजान... जब से मिले, वो, मै बनी, चतुर सुजान*... *संगम पर मेरे श्रेष्ठ भाग्य की अनोखी सी सौगात लेकर हाजिर हुए वो सच्चें- सच्चे रूहानी रत्नाकर*... मुझ आत्मा को सौदागरी सिखा रहे है... पदमापदम भाग्यशाली हूँ मैं आत्मा, मेरे भाग्य का दर्पण दिखा रहे है, और इस भाग्य के दर्पण में कोहिनूर की भाँति जगजगाती मैं आत्मा बैठी हूँ बापदादा के सम्मुख, *और दिलोजान से ग्रहण कर रही हूँ उनकी हर मीठी समझानी को*...

❉ *रत्नों के खजानों से मालामाल करने वाले चतुर सुजान बाप मुझ आत्मा से बोले:-* "दुनिया के हिसाब से भोली, मगर बाप को पहचानने की दिव्य नेत्रधारी मेरी बच्ची... आपने मेरा बाबा कहकर पदमों की कमाई का अधिकार पा लिया,.. *दिन रात ज्ञान रत्नों से खेलते आप बच्ची स्वयं का महत्व समझी हो, बापदादा आप बच्ची को जिस नजर से देखते है अब उन नजरों को साकार करों..."*

➳ _ ➳ *मुझ आत्मा को सच्चा सौदा सिखा सौदागर बनाने वाले बाप से मैं दिव्य नेत्र धारी आत्मा बोली:-* "मीठे बाबा... *मुरीद हूँ मैं इन आँखों की, जिसने आपको पहचाना है, हर शुक्रिया आपको ही जाता है, क्योंकि ये आँखें भी तो आपका ही नजराना है*... मीठे बाबा, ये बुद्धि अब दिव्य हो गई है, जीवन ही दिव्यता में ढल रहा है, इस रूह के ताने बाने में आपके गुण और शक्तियों के रंग और भी गहरे हो गये है... देखो, मेरा हर संस्कार बदल रहा है... *आपकी आँखों मे मैं अपना सम्पूर्ण स्वरूप देखती हूँ बाबा और हर पल उसी का स्वरूप बन रही हूँ..."*

❉ *हर पल उमंगो की बरसात कर मेरे रोम- रोम को उमंगों से भरपूर करने वाले बापदादा बोले:-* "इनोसैन्ट से सैन्ट बनी मेरी राॅयल बच्ची... देखो, अनेक बातों को समझने वाले समझदार अरबों- खरबो की गिनती कर रहे है... समय स्वाँस और संकल्प का खजाना कौडियों के भाव लुटा घाटे का सौदा कर रहे है... *ये वैरी वैरी इनोसैन्ट परसन है जो खुद को बहुत समझू सयाने समझ रहे है... अब इन सबको भी आप समान सौदागर बनाओं... जो अपनी आँखों से पहचाना है उसकी पहचान इनको भी कराओं..."*

➳ _ ➳ *अमृत वेले से अमृत का पान कर दिन भर ज्ञान रत्नों से खेलने वाली मैं आत्मा रत्नागर बाप से बोलीं:-* "मीठे बाबा... *उंमगों के उडनखटोले में आपने संग बैठाकर उडना सिखाया है... आपकी अनोखी पालना ने हर पल मुझे मेरे श्रेष्ठ भाग्य का अनुभव कराया है*... आपकी हर चाहत अब मेरी धडकन बन रही है... *बैक बोन बने आप निमित्त बन चला रहे हो, वैरी वैरी इनोसैन्ट इन आत्माओं को ज्ञान रत्नों का अनोखा खेल भाने लगा है*... सांइलेंस की जादूगरी से बाबा इनको खेल पदमों का समझ आने लगा है..."

❉ *हर प्रकार की माया से सेफ रख मायाजीत बनाने वाले रूहानी जादूगर मुझ आत्मा से बोले:-* "अपनी निर्विघ्न स्थिति द्वारा वायुमंडल को पावर फुल बनाने वाली मेरी श्रेष्ठ ब्राह्मण बच्ची... *एकता और दृढता के बल से सर्व के प्रति शुभसंकल्पों की लहर फैलाओं, सब के प्रति शुभ संकल्पो से हर आत्मा को बदलकर अब बाप की प्रत्यक्षता का झंडा फहराओं...* संकल्पों के इस खजाने से अब हर आत्मा का परिचय कराओं... संगठन की एकता में अब बस शुभभावो की लहर फैलाओं..."

➳ _ ➳ *बाप को कदम हर कदम फाॅलो करने वाली मैं मास्टरज्ञान सागर आत्मा, ज्ञान सागर बापदादा से बोली:-* "मीठे बाबा... संकल्पों की दृढता, संगठन की एकता और साइलेंस के बल से आत्माओं को आपका निरन्तर संदेश जा रहा है...* संगम युगी मुझ श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा का भाग्य देखकर हर आत्मा परम सुख पा, इस ओर आ रही है... बस *एक बाबा* कहकर *पदमो की कमाई का सुख पाकर अपने भाग्य की सराहना करने वाली ये भोली आत्माए बाप समान चतुर सुजान बनती जा रही है...* और बापदादा मुझे गले से लगाकर सफलता का वरदान दे रहे है..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पुरानी दुनिया के आकर्षण से मुक्त रहना*"

➳ _ ➳ 
साक्षीदृष्टा बन ज्ञान के दिव्य नेत्र से मैं जैसे ही इस सृष्टि को देखती है यह सम्पूर्ण सृष्टि मुझे एक विशाल रंगमंच, एक नाटकशाला के रुप में दिखाई देती है जिस पर बेहद का नाटक चल रहा है। *मैं देख रही हूँ कि जैसे - जैसे इस नाटक में जिसका पार्ट है अपने - अपने समय अनुसार वो आत्मा परमधाम से नीचे आ रही है और मनुष्य शरीर धारण कर अपना पार्ट बजा रही है*। जिस आत्मा को जैसा पार्ट मिला है वो अपने उस पार्ट को एकदम एक्यूरेट बजा रही है।
 
➳ _ ➳ 
इस दृश्य को देखते - देखते मैं विचार करती हूँ कि 5 हजार वर्ष से चल रहा यह नाटक अब पूरा हो रहा है। सब पार्टधारियों को अपना पार्ट बजा कर अब वापिस अपने धाम लौटना है और *अब जबकि बाबा ने आकर हमे इस सत्यता का बोध करवा दिया है कि यह पुरानी दुनिया अब जल्दी ही समाप्त होनी है तो अब हमें उनके फरमान पर चल इस पुरानी दुनिया से उपराम रहने का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए* नही तो देह और देह की इस झूठी दुनिया के चक्रव्यूह में फंस कर अपनी तकदीर को लकीर लगा बैठेंगे और इस बेहद नाटक में फिर कल्प - कल्प के लिए हमारा ऐसा ही पार्ट निर्धारित हो जायेगा।

➳ _ ➳ 
यही वह समय है जबकि स्वयं भाग्य विधाता बाप आये हुए हैं और आकर श्रेष्ठ मत देकर हमारा सर्वश्रेष्ठ भाग्य बना रहें हैं। तो ऐसे बाप की श्रीमत पर अच्छी रीति चल इस अन्तिम समय मे अब मुझे इस पुरानी दुनिया से उपराम रहने का तीव्र पुरुषार्थ अवश्य करना है। *इस देह और देह की इस दुनिया से जुड़ा हर सम्बन्ध नश्वर और दुख देने वाला ही तो है और भगवान के साथ जुड़ा हर सम्बन्ध अपरमअपार सुख देने वाला है*। यह स्मृति आते ही मन में इस पुरानी दुनिया के लिये वैराग्य उतपन्न होने लगता है और मन अपने प्यारे बाबा की तरफ खिंचने लगता है। *उनके प्यार का वो एहसास याद आते ही मन बुद्धि देह और देह की दुनिया से उपराम हो कर शिव पिता पर एकाग्र हो जाते हैं*।

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मन बुद्धि की तार बाबा के साथ जुड़ते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे परमधाम से परमात्म लाइट सीधी मुझ आत्मा के साथ आ कर कनेक्ट हो गई हैं। *शक्तियों का तेज करंट मुझ आत्मा में प्रवाहित होने लगा है जो मुझे इस देह से उपराम कर, ऊपर अपनी ओर खींच रहा है*। इस परमात्म लाइट के साथ कनेक्ट होकर अब मैं आत्मा देह से निकल कर इस लाइट के साथ - साथ ऊपर जा रही हूँ। यह परमात्म लाइट मुझे खींच कर 5 तत्वों की इस दुनिया से पार ले कर जा रही है। *साकारी  और आकारी दोनों दुनियाओं को पार कर अब मैं अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की इस लाइट के साथ पहुँच गई हूँ परमधाम उनके पास*।

➳ _ ➳ 
अनन्त शक्तियों का पुंज, वो पॉवर हाउस मेरे शिव पिता परमात्मा अब मेरे बिल्कुल समीप है उनकी समस्त पॉवर उनकी सर्वशक्तियों की किरणों के रूप में मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं। *मुझ आत्मा की बैटरी चार्ज हो रही है और मैं लाइट हाउस बनती जा रही हूँ*। परमात्म लाइट स्वयं में भर कर मैं अपने आप को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। ऊर्जा का भण्डार बन, वापिस साकारी लोक में आ कर अपने साकारी तन में विराजमान हो कर इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अब मैं अपना पार्ट फिर से बजा रही हूँ।
 
➳ _ ➳  "
सृष्टि का यह नाटक अब पूरा हो रहा है" यह स्मृति मुझे देह और देह की दुनिया से उपराम बनाती जा रही है। *देह और देह के सम्बन्धियों के बीच रहते, उनसे तोड़ निभाते, बुद्धि का योग अपने शिव पिता के साथ जोड़, मन बुद्धि से अब मैं ऊपर वास करती रहती हूँ और अपने शिव पिता के प्यार से स्वयं को सदा भरपूर रखते हुए, नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप बन कर रहती हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं संगठन में रहते लक्ष्य और लक्षण को समान बनाने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं सदा शक्तिशाली आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ *मैं लास्ट में फास्ट जाने वाली आत्मा हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा साधारण और व्यर्थ संकल्पों में समय नहीं गंवाती हूँ ।*
✺ *मैं समर्थ आत्मा हूँ ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  वैसे बापदादा ने देखा है कि सेवा से लगन अच्छी है। सेवा के लिए एवररेडी हैं, चाँस मिले तो प्यार से सेवा के लिए एवररेडी हैं। लेकिन अभी सेवा में एडीशन करो - *वाणी के साथ-साथ मनसा, अपनी आत्मा को विशेष कोई- न-कोई प्राप्ति के स्वरूप में स्थित कर वाणी से सेवा करो*। मानो भाषण कर रहे हो तो वाणी से तो भाषण अच्छा करते ही हो लेकिन उस समय अपने आत्मिक स्थिति में विशेष चाहे शक्ति की, चाहे शान्ति की, चाहे परमात्म-प्यार की, कोई-न-कोई विशेष अनुभूति की स्थिति में स्थित कर मनसा द्वारा आत्मिक स्थिति का प्रभाव वायुमण्डल में फैलाओ और वाणी से साथ-साथ सन्देश दो। *वाणी द्वारा सन्देश दो, मनसा आत्मिक स्थिति द्वारा अनुभूति कराओ*।

 

 _ ➳  *भाषण के समय आपके बोल आपके मस्तक से, नयनों से, सूरत से उस अनुभूति की सीरत दिखाई दे* कि आज भाषण तो सुना लेकिन परमात्म प्यार की बहुत अच्छी अनुभूति हो रही थी। *जैसे भाषण की रिजल्ट में कहते हैं बहुत अच्छा बोला, बहुत अच्छा, बहुत अच्छी बातें सुनाई, ऐसे ही आपके आत्म-स्वरूप की अनुभूति का भी वर्णन करें। मनुष्य आत्माअों को वायब्रेशन पहुँचे, वायुमण्डल बने। जब साइंस के साधन ठण्डा वातावरण कर सकते हैं, सबको महसूस होता है बहुत ठण्डाई अच्छी आ रही है। गर्म वायुमण्डल अनुभव करा सकते हैं। साइंस सर्दी में गर्मी का अनुभव करा सकती है, गर्मी में सर्दी का अनुभव करा सकती है, तो आपकी साइलेन्स क्या प्रेम स्वरूप, सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप वायुमण्डल अनुभव नहीं करा सकती*। यह रिसर्च करो। सिर्फ अच्छा-अच्छा किया लेकिन अच्छे बन जायें, तब समाप्ति के समय को समाप्त कर अपना राज्य लायेंगे।

 

✺   *ड्रिल :-  "भाषण के साथ-साथ परमात्म प्यार की अनुभूति कराना "*

 

 _ ➳  प्राप्ति स्वरूप मैं आत्मा संगम की प्राप्तियों को साक्षी होकर देख रही हूँ... *समय, स्वाँस और संकल्पों के खजाने से मालामाल मैं आत्मा, मेरे पास सेवा के ये अनूठे से साधन...* मनसा वाचा और कर्मणा... मेरे लिए अखुट कमाई का साधन है...

 

 _ ➳  प्रेम स्वरूप मैं आत्मा, परमात्म प्यार में लीन देख रही हूँ स्वयं को भृकुटी के मध्य में... सुनहरे लाल प्रकाश से झिलमिलाती मैं मणि सम्पूर्ण देह को आलोकित कर रही हूँ... *मन में उठने वाले हर सकंल्प को पवित्रता की शक्ति से भरपूर करती मैं आत्मा, वाचा शक्ति को परमात्म प्रेम और गुणों के प्रकाश से भरपूर कर रही हूँ*... मेरी वाचा परमात्म प्यार और शक्तियों का स्वरूप प्रतीत हो रही है... 

 

 _ ➳  *देह में विराजमान मैं आत्मा नयन, बोल, मस्तक और सम्पूर्ण सूरत से परमात्म सीरत की अनुभूति करा रही हूँ*... प्रभु प्रेम में  मगन *मेरा बाबा मीठा बाबा* बोलती ये आँखें हर आत्मा को मेरे शान्त स्वरूप की अनुभूति करा रही है... मस्तक पर दमकती भाग्य रेखा मेरे उच्च भाग्य की झलक दिखा रही है... सूरत में और मेरे हर कर्म में बापदादा की सीरत प्रत्यक्ष हो रही है...

 

 _ ➳  *मुझसे निकलते प्रेम पवित्रता शान्ति और शक्तियों के वायब्रैशन शक्तिशाली वातावरण का निर्माण कर रहे है... अंग प्रत्यंग अपनी अपनी मूक भाषा में भाषण करते प्रतीत हो रहे है... वाणी से परमात्म गुणों का वर्णन करती मैं उन्हीं के गुण स्वरूप बनती जा रही हूँ*... मैं मनसा वाचा और कर्मणा परमात्म प्रेम की गहरी अनुभूति कर आस- पास की सभी आत्माओं को उन अनुभूतियों से भरपूर कर रही हूँ...

 

 _ ➳  *प्रकाश का झरना बहाते शिव बिन्दु मेरे सिर के ठीक ऊपर*... मैं नहाती जा रही हूँ इस लाल रंग के गहरे प्रकाश में... मेरे रोम रोम को अथाह ऊर्जा से भरपूर कर रहा है, ये  प्रकाश... असीम शक्तियों की मैं मालिक मास्टर सर्व शक्तिमान की सीट पर सेट होकर मनसा द्वारा आत्मिक शक्तियों का प्रकाश फैलाती हुई... दूर दूर तक वातावरण में फैलता परमात्म प्यार फैलता जा रहा है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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