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 09 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अशुद्ध खान पान का त्याग किया ?*

 

➢➢ *विनाश के पहले अपना सब कुछ सफल करने पर अटेंशन दिया ?*

 

➢➢ *त्याग और तपस्या द्वारा सेवा में सफलता प्राप्त की ?*

 

➢➢ *अपनी तपस्या द्वारा शांति के वाइब्रेशन फैलाए ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  आजकल के जमाने में डाक्टर्स कहते हैं दवाई छोड़ो, एक्सरसाइज करो, *तो बापदादा भी कहते हैं कि युद्ध करना छोड़ो, मेहनत करना छोड़ो, सारे दिन में 5-5 मिनट मन की एक्सरसाइज करो। वन मिनट में निराकारी, वन मिनट में आकारी, वन मिनट में सब तरह के सेवाधारी, यह मन की एक्सरसाइज 5 मिनट की सारे दिन में भिन्न-भिन्न टाइम करो तो सदा तन्दरूस्त रहेंगे, मेहनत से बच जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं निर्विघ्न स्थिति द्वारा हर कदम में तीव्रगति से आगे बढ़ने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा निर्विघ्न, सदा हर कदम में आगे बढ़ने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो ना! किसी प्रकार का विघ्न रोकता तो नहीं है? *जो निर्विघ्न होगा उसका पुरुषार्थ भी सदा तेज होगा क्योंकि उसकी स्पीड तेज होगी। निर्विघ्न अर्थात् तीव्रगति की रतार।* विघ्न आये और फिर मिटाओ इसमें भी समय जाता है। अगर कोई गाड़ी को बार-बार स्लो और ते]ज करे तो क्या होगा? ठीक नहीं चलेगी ना। विघ्न आवे ही नहीं उसका साधन क्या है?

 

  *सदा मास्टर सर्वशक्तिवान की स्मृति में रहो। सदा की स्मृति शक्तिशाली बना देगी। शक्तिशाली के सामने कोई भी माया का विघ्न आ नहीं सकता। तो अखण्ड स्मृति रहे। खण्डन न हो।* खण्डित मूर्ति की पूजा भी नहीं होती है। विघ्न आया फिर मिटाया तो अखण्ड अटल तो नहीं कहेंगे। इसलिए 'सदा' शब्द पर और अटेन्शन। सदा याद में रहने वाले सदा निर्विघ्न होंगे।

 

  संगमयुग विघ्नों को विदाई देने का युग है। जिसको आधा कल्प के लिए विदाई दे चुके उसको फिर आने न दो। सदा याद रखो कि हम विजयी रत्न हैं। विजय का नगाड़ा बजता रहे। विजय की शहनाईयाँ बजती रहती हैं, ऐसे याद द्वारा बाप से कनेक्शन जोड़ा और सदा यह शहनाईयाँ बजती रहें। *जितना-जितना बाप के प्यार में, बाप के गुण गाते रहेंगे तो मेहनत से छूट जायेंगे। सदा स्नेही, सदा सहजयोगी बन जाते हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *बापदादा ने जो रूहानी एक्सरसाइज दी है, वह सारे दिन में कितने बार करते हो?* और कितने समय में करते हो? निराकारी और फरिश्ता।

 

✧  बाप और दादा, अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता स्वरूप। दोनों में देह-भान नहीं है। तो *देहभान से परे होना है तो यह रूहानी एक्सरसाइज कर्म करते भी अपनी डयुटी बजाते हुए भी एक सेकण्ड में अभ्यास कर सकते हो।*

 

✧  *यह एक नेचुरल अभ्यास हो जाए - अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी फरिश्ता।* अच्छा (बापदादा ने ड़िल कराई)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *सिर्फ अपनी विस्मृति इन सब बातों को उत्पन्न करती है। चाहे पिछले संस्कार, चाहे पिछले कर्म-बन्धन, चाहे वर्तमान की भूले - जो भी कुछ होता है, उनका मूल कारण अपनी विस्मृति है।* अपनी विस्मृति के कारण यह सभी व्यर्थ बातें सहज को मुश्किल बना देती हैं। स्मृति रहने से क्या होगा? जो लक्ष्य रखकर के आये हो स्मृति सम्पूर्ण विस्मृति असम्पूर्ण। *विस्मृति है तो बहुत ही विघ्न हैं और स्मृति है तो सहज और सम्पूर्णता।* अपनी बुद्धि को कण्ट्रोल करने के लिए कई बातों को हल्का करना पड़ता हैं। सभी से हल्की क्या चीज़ होती है? आत्मा (बिन्दी)। तो जब अपने को कण्ट्रोल करने लिए फुलस्टाप करना होता है। तो आप भी बिन्दी लगा दो। जो बीत चुका उसको बिल्कुल भूल जाओ।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अमरलोक स्थापन करने के निमित्त बनना"*

 

_ ➳  इन भारत की वादियों में खुशबू से भरी वायु का वेग, मधुर संगीत सा प्रतीत हो रहा हैं, मुझ आत्मा को... अपने सातो रंगों का जैसे साक्षात्कार हो गया हैं... *मेरे रूहानी पिता ने जैसे मेरे रूहानी सोशल वर्कर के संस्कार को प्रत्यक्ष कर दिया है*... सारे विकार न जाने कहाँ भस्म हो गए... और मैं आत्मा खुद को एक रूहानी सोशल वर्कर के रूप मे इस भारत भूमि पर स्वर्ग स्थापन करता देख रही हूँ... *अब मैं आत्मा अपने पिता से रूह रिहान करने सूक्ष्म वतन पहुंचती हूँ...*

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को देखकर मुस्कुराते हुए कहा:-* "मीठे सर्व गुणों से सम्पन्न प्यारे बच्चे... *शिव बाबा ने धरा पर आकर, आप बच्चों को एक एक कर बड़े प्यार से चुना हैं, ताकि तुम इस पवित्र भूमि भारत को फिर से स्वर्ग बना सको...* इस कार्य में परमपिता तुम्हारे साथ है...  तुम्हें योग्य बन, ये कार्य बड़ी परिपक्वता से करना है... मुस्कुराते हुए रूहानी सोशल वर्कर बन इस धरा पर स्वर्ग स्थापन करना है..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने मीठे बाबा के ज्ञान को दिल मे बड़े प्यार से धारण करते हुए कहती हूँ:-* "मेरे मीठे मीठे बाबा... *मै आत्मा कितनी भाग्यशाली हूँ... कि स्वयम भगवान ने मुझे चुना हैं...  सारे विकर्मो को दग्ध कर मुझे मेरे पिता ने... इस भारत खंड को, एक रूहानी सोशल वर्कर बन... स्वर्ग बनाने का कार्य सौंपा हैं*... मैं आत्मा... रूहानियत से सराबोर होकर बाबा का कार्य करने का प्लान बाबा से मिलकर बना रही हूँ..."

 

  *प्यारे बाबा मुझे रूहानियत से भरपूर कर अपने प्यार में डुबोते हुए मुझ आत्मा से कहता हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे *इस संगम युग में... इस वरदानी समय में... पिता के साथ मिलकर... दिव्यता औऱ पवित्रता से भरपूर होकर... सोशल वर्कर बनकर... इस भारत को स्वर्ग बनाने के निमित्त बनकर... तुम पूज्य बन रहे हो...* तुम इस सृष्टि का उद्धार कर रहे हो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने भाग्य पर इतराती हुई कहती हूं:-* "मीठे बाबा... *मैं आत्मा तो स्वयम को भूली हुए थी, आपने संगम पर आ कर मुझे चुना*... मेरी रूहानी सोशल वर्कर की काबलियत को निखारा... मुझे दिव्यता का दान दिया, मुझ को अपनी छत्रछाया मे रखकर... इस भारत को स्वर्ग बनाने का कार्य दिया... *मेरा खोया हुआ स्वरूप लौटाया... मेरा खोया हुआ गौरव वापिस दिला कर मुझे पूज्य बना दिया..."*

 

  *मेरे मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सोशल रूहानी सर्विस देखकर...भारत भूमि को स्वर्ग बनाने के कार्य में अपना सहयोगी बनाते हुए कहा:-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... इस रूहानियत के कार्य में... *तुम ब्राह्मण बच्चे ही... इस धरा पर स्वर्ग लाने का कार्य कर सकते हो...* फिर आप ही रूहे गुलाब बन कर... दिव्यता व पवित्रता की दौलत का भरपूर भंडार बन कर, इस स्थापित किये गए स्वर्ग का राज्ये पाते हो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा बाबा के मुख से अपने लिए इतने उच्च महवाक्य सुनकर भावविभोर होकर दिल की गहराई से बाबा से कहती हूं:-* "मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा कांटो से फूल बन गईं आपकी गोद मे बैठकर... *आपने जो शक्तिओ, वरदानों से मुझ आत्मा को सवारा हैं... तभी तो मैं आत्मा इस धरती पर स्वर्ग स्थापना की निमित बन पा रही हूँ*... औऱ आपसे प्राप्त सभी देवताई सुखों का अधिकार प्राप्त कर रही हूँ... मीठे बाबा से बेहद की रुहानियत, प्यार, समझ लेकर... मैं आत्मा वापिस इस कर्म क्षेत्र पर आकर... भारत को स्वर्ग बनाने के कार्य मे पूरी लगन से जुट जाती हूं..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कोई भी विकर्म ना हो इसका ध्यान रखना है*

 

_ ➳  स्वराज्यअधिकारी की सीट पर सेट होकर, अपनी कर्मेन्द्रियों की राजदरबार लगाकर मैं चेक कर रही हूँ कि सभी कर्मेन्द्रियाँ सुचारू रूप से कार्य कर रही हैं! *यह चेकिंग करते - करते मैं मन ही मन विचार करती हूँ कि पूरे 63 जन्म इन कर्मेन्द्रियों ने मुझ आत्मा राजा को अपना गुलाम बना कर ना जाने मुझ से क्या - क्या विकर्म करवाये*। इन विकर्मो का बोझ मुझ आत्मा के ऊपर इतना अधिक हो गया कि मैं अपने सत्य स्वरुप को ही भूल गई। मैं आत्मा अपना ही स्वधर्म, जो कि सदा शान्त और सुखमय है, उसे भूल कितनी दुखी और अशांत हो गई। किन्तु अब जबकि मेरे प्यारे पिता ने आकर मुझे फिर से मेरे सत्य स्वरूप की पहचान दे दी है कि मैं आत्मा कर्मेन्द्रियों की गुलाम नही हूँ, मैं तो राजा हूँ।

 

_ ➳  इसलिए इस सत्य पहचान के साथ अब मुझे स्व स्वरूप में सदा स्थित रहकर, इन कर्मेन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रखना है। *पुराने स्वभाव संस्कारो के कारण अगर कभी मन मे कोई विकल्प उतपन्न होता भी है तो भी मुझे कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नही होने देना है और यह तभी होगा जब मैं सदैव स्व स्वरूप की स्थिति में स्थित रहूँगी*। मन ही मन यह चिन्तन करते हुए अपने स्व स्वरूप में स्थित होकर अब मैं अपने ही स्वरूप को देखने मे मगन हो जाती हूँ। सातों गुणों और अष्ट शक्तियों से सम्पन्न अपने अति सुन्दर निराकारी स्वरूप को मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्र से देख रही हूँ। *दोनों आईब्रोज के बीच मस्तक पर चमकता हुए एक चैतन्य सितारे के रूप में मुझे मेरा यह स्वरूप बहुत ही लुभायमान लग रहा है*। देख रही हूँ 7 रंगों की रंगबिरंगी किरणों को मैं अपने मस्तक से निकलते हुए जिसका भीना - भीना प्रकाश मन को आनन्दित कर रहा है।

 

_ ➳  इस प्रकाश में विद्यमान वायब्रेशन्स धीरे - धीरे मस्तक से बाहर निकल कर मेरे चारो और फैल कर मेरे आस पास के वायुमण्डल को शुद्ध और पावन बना रहे हैं।  वातावरण में एक दिव्य रूहानी खुशबू फैलती जा रही है, जो मुझे देह से डिटैच कर रही है। *देह, देह की दुनिया, देह के वैभवों, पदार्थो को भूल अब मैं पूरी तरह से अपने स्वरूप में स्थित हो गई हूँ और बड़ी आसानी से अपने अकाल तख्त को छोड़, देह से बाहर आ गई हूँ*। देह से बाहर आकर देख रही हूँ अब मैं स्वयं को देह से बिल्कुल न्यारे स्वरूप में। हर बन्धन से मुक्त इस डबल लाइट स्वरूप में स्थित होकर अब मैं धीरे - धीरे ऊपर की और जा रही हूँ।

 

_ ➳  मन बुद्धि की एक खूबसूरत रूहानी यात्रा पर चलते - चलते मैं पांचो तत्वों की साकारी दुनिया को पार कर पहुँच गई हूँ आकाश से ऊपर और इससे भी ऊपर सौरमण्डल, तारामण्डल को पार करके, सूक्ष्म लोक से होकर अब मैं अपनी निराकारी दुनिया मे आ गई हूँ। *इस अनन्त प्रकाशमय अंतहीन निर्वाणधाम घर में अब मैं विचरण कर रही हूँ और यहाँ फैले शान्ति के वायब्रेशन्स को स्वयं में समाकर डीप साइलेन्स का अनुभव कर रही हूँ*। यह डीप साइलेन्स की अनुभूति मुझे ऐसा अनुभव करवा रही है जैसे मैं शांति की किसी गहरी गुफा में बैठी हूँ जहाँ संकल्पो की भी कोई हलचल नही। शांति की गहन अनुभूति करके अब मैं सर्वगुणों, सर्वशक्तियों के सागर अपने प्यारे पिता के पास पहुँचती हूँ । *एक अति प्रकाशमय ज्योतिपुंज के रूप में अपने शिव पिता को मैं अपने सामने देख रही हूँ*।

 

_ ➳  उनके सानिध्य में गहन सुख और शांति की अनुभूति करते हुए मैं उनके बिल्कुल समीप पहुँच कर उन्हें टच करती हूँ। सर्वशक्तियों की तेज धारायें मुझ आत्मा में प्रवाहित होने लगती है और मुझ आत्मा पर चढ़े विकर्मो की कट उतरने लगती है। *पुराने सभी स्वभाव संस्कार सर्वशक्तियों की तेज आंच से जलने लगते हैं और मैं आत्मा स्वयं को एकदम हल्का अनुभव करने लगती हूँ*। मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकर्मो की कट को उतारने के साथ - साथ, कर्मेन्द्रियों पर जीत पाने के लिए बाबा अपनी सर्वशक्तियों का बल मेरे अंदर भरकर मुझे शक्तिशाली बना रहे हैं। सर्व शक्तियों से भरपूर होकर मैं आत्मा अब वापिस साकारी दुनिया की ओर लौट रही हूँ।

 

_ ➳  अपने साकार तन में भृकुटि के भव्यभाल पर मैं आत्मा फिर से विराजमान हूँ और इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अपना पार्ट बजा रही हूँ। हर कर्म अब मैं बाबा को अपने साथ रखकर, कम्बाइंड होकर करती हूँ। *बाबा की याद मेरे चारों और शक्तियों का एक ऐसा सुरक्षा कवच बना कर रखती है जिससे मैं आत्मा माया के धोखे से सदा बची रहती हूँ*। अपनी शक्तिशाली स्व स्थिति में अब मैं सदा स्थित रहती हूँ। मनसा में कोई विकल्प कभी आ भी जाये तो भी परमात्म बल के प्रयोग द्वारा, कर्मेन्द्रियों पर जीत पाकर, उनसे कोई भी विकर्म अब मैं कभी भी नही होने देती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं त्याग और तपस्या द्वारा सेवा में सफलता प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा अपनी तपस्या द्वारा सदैव शांति के वाइब्रेशन फैलाती हूँ  ।*

   *मैं विश्व सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं शांति का फरिश्ता हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  वैसे बापदादा ने देखा है कि सेवा से लगन अच्छी है। सेवा के लिए एवररेडी हैं, चाँस मिले तो प्यार से सेवा के लिए एवररेडी हैं। लेकिन अभी सेवा में एडीशन करो - *वाणी के साथ-साथ मनसा, अपनी आत्मा को विशेष कोई- न-कोई प्राप्ति के स्वरूप में स्थित कर वाणी से सेवा करो*। मानो भाषण कर रहे हो तो वाणी से तो भाषण अच्छा करते ही हो लेकिन उस समय अपने आत्मिक स्थिति में विशेष चाहे शक्ति की, चाहे शान्ति की, चाहे परमात्म-प्यार की, कोई-न-कोई विशेष अनुभूति की स्थिति में स्थित कर मनसा द्वारा आत्मिक स्थिति का प्रभाव वायुमण्डल में फैलाओ और वाणी से साथ-साथ सन्देश दो। *वाणी द्वारा सन्देश दो, मनसा आत्मिक स्थिति द्वारा अनुभूति कराओ*।

 

 _ ➳  *भाषण के समय आपके बोल आपके मस्तक से, नयनों से, सूरत से उस अनुभूति की सीरत दिखाई दे* कि आज भाषण तो सुना लेकिन परमात्म प्यार की बहुत अच्छी अनुभूति हो रही थी। *जैसे भाषण की रिजल्ट में कहते हैं बहुत अच्छा बोला, बहुत अच्छा, बहुत अच्छी बातें सुनाई, ऐसे ही आपके आत्म-स्वरूप की अनुभूति का भी वर्णन करें। मनुष्य आत्माअों को वायब्रेशन पहुँचे, वायुमण्डल बने। जब साइंस के साधन ठण्डा वातावरण कर सकते हैं, सबको महसूस होता है बहुत ठण्डाई अच्छी आ रही है। गर्म वायुमण्डल अनुभव करा सकते हैं। साइंस सर्दी में गर्मी का अनुभव करा सकती है, गर्मी में सर्दी का अनुभव करा सकती है, तो आपकी साइलेन्स क्या प्रेम स्वरूप, सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप वायुमण्डल अनुभव नहीं करा सकती*। यह रिसर्च करो। सिर्फ अच्छा-अच्छा किया लेकिन अच्छे बन जायें, तब समाप्ति के समय को समाप्त कर अपना राज्य लायेंगे।

 

✺   *ड्रिल :-  "भाषण के साथ-साथ परमात्म प्यार की अनुभूति कराना "*

 

 _ ➳  प्राप्ति स्वरूप मैं आत्मा संगम की प्राप्तियों को साक्षी होकर देख रही हूँ... *समय, स्वाँस और संकल्पों के खजाने से मालामाल मैं आत्मा, मेरे पास सेवा के ये अनूठे से साधन...* मनसा वाचा और कर्मणा... मेरे लिए अखुट कमाई का साधन है...

 

 _ ➳  प्रेम स्वरूप मैं आत्मा, परमात्म प्यार में लीन देख रही हूँ स्वयं को भृकुटी के मध्य में... सुनहरे लाल प्रकाश से झिलमिलाती मैं मणि सम्पूर्ण देह को आलोकित कर रही हूँ... *मन में उठने वाले हर सकंल्प को पवित्रता की शक्ति से भरपूर करती मैं आत्मा, वाचा शक्ति को परमात्म प्रेम और गुणों के प्रकाश से भरपूर कर रही हूँ*... मेरी वाचा परमात्म प्यार और शक्तियों का स्वरूप प्रतीत हो रही है... 

 

 _ ➳  *देह में विराजमान मैं आत्मा नयन, बोल, मस्तक और सम्पूर्ण सूरत से परमात्म सीरत की अनुभूति करा रही हूँ*... प्रभु प्रेम में  मगन *मेरा बाबा मीठा बाबा* बोलती ये आँखें हर आत्मा को मेरे शान्त स्वरूप की अनुभूति करा रही है... मस्तक पर दमकती भाग्य रेखा मेरे उच्च भाग्य की झलक दिखा रही है... सूरत में और मेरे हर कर्म में बापदादा की सीरत प्रत्यक्ष हो रही है...

 

 _ ➳  *मुझसे निकलते प्रेम पवित्रता शान्ति और शक्तियों के वायब्रैशन शक्तिशाली वातावरण का निर्माण कर रहे है... अंग प्रत्यंग अपनी अपनी मूक भाषा में भाषण करते प्रतीत हो रहे है... वाणी से परमात्म गुणों का वर्णन करती मैं उन्हीं के गुण स्वरूप बनती जा रही हूँ*... मैं मनसा वाचा और कर्मणा परमात्म प्रेम की गहरी अनुभूति कर आस- पास की सभी आत्माओं को उन अनुभूतियों से भरपूर कर रही हूँ...

 

 _ ➳  *प्रकाश का झरना बहाते शिव बिन्दु मेरे सिर के ठीक ऊपर*... मैं नहाती जा रही हूँ इस लाल रंग के गहरे प्रकाश में... मेरे रोम रोम को अथाह ऊर्जा से भरपूर कर रहा है, ये  प्रकाश... असीम शक्तियों की मैं मालिक मास्टर सर्व शक्तिमान की सीट पर सेट होकर मनसा द्वारा आत्मिक शक्तियों का प्रकाश फैलाती हुई... दूर दूर तक वातावरण में फैलता परमात्म प्यार फैलता जा रहा है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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