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 09 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *धारणा कर फिर दूसरों को कराई ?*

 

➢➢ *किसी भी बात में ज़रा भी अहंकार तो नहीं दिखाया ?*

 

➢➢ *समय प्रमाण हर कार्य में सफलता का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *अपने आदि अनादी संस्कार स्वभाव को स्मृति में रख अचल अडोल स्थिति का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  प्रयोगी आत्मा संस्कारों के ऊपर, प्रकृति द्वारा आने वाली परिस्थितियों पर और विकारों पर सदा विजयी होगी। *योगी वा प्रयोगी आत्मा के आगे ये पांच विकार रूपी सांप गले की माला अथवा खुशी में नाचने की स्टेज बन जाते हैं।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सहजयागी आत्मा हूँ"*

 

✧  सभी सहजयोगी आत्मायें हो ना। *सदा बाप के सर्व सम्बन्धों के स्नेह में समाये हुए। सर्व सम्बन्धों का स्नेह ही सहज कर देता है। जहाँ स्नेह का सम्बन्ध है वहाँ सहज है। और जो सहज है वह निरंतर है।* तो ऐसे सहजयोगी आत्मा बाप के सर्व स्नेही सम्बन्ध की अनुभूति करते हो? ऊधव के समान हो या गोपियों के समान? ऊधव सिर्फ ज्ञान का वर्णन करता रहा। गोप-गोपियाँ प्रभु प्यार का अनुभव करने वाली।

 

  *तो सर्व सम्बन्धों का अनुभव यह है विशेषता। इस संगमयुग में यह विशेष अनुभव करना ही वरदान प्राप्त करना है। ज्ञान सुनना सुनाना अलग बात है। सम्बन्ध निभाना, सम्बन्ध की शक्ति से निरंतर लगन में मगन रहना वह अलग बात है।*

 

*तो सदा सर्व सम्बन्धों के आधार पर सहयोगी भव। इसी अनुभव को बढ़ाते चलो। यह मगन अवस्था गोपगोपि यों की विशेष हैं। लगन लगाना और चीज है लेकिन लगन में मगन रहना यही श्रेष्ठ अनुभव हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *अब मुख्य पुरुषार्थ यही करना है कि आवाज में आना जितना सहज है उतना ही आवाज से परे जाना सहज हो*। इसको ही सम्पूर्ण स्थिती के समीप की स्थिती कहा जाता है। जैसे बुद्धि से छोटा बिन्दु खिसक जाता है। ऐसे यह छोटा बिन्दु भी हाथ से खिसक जाता है।

 

✧   *जितना - जितना अपने देह से न्यारे रहेंगे उतना समय बात से भी न्यारे*। जैसे वस्त्र उतारना और पहनना सहज है कि मुश्किल? इस रीति न्यारे होंगे तो शरीर भान में आना, शरीर के भान से निकलना यह भी ऐसे लगेगा।

 

✧  *अभी - अभी शरीर का वस्त्र धारण किया, अभी - अभी उतारा*। मुख्य पुरुषार्थ आज इस विशेष बात पर करना है। जब यह मुख्य पुरुषार्थ करेंगे तब मुख्य रत्नों में आयेंगे। यह बिन्दी लगाना कितना सहज है। एसे ही बिन्दी रूप है जाना सहज है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जैसे एक सेकंड में स्विच आन आफ किया जाता है, ऐसे ही एक सेकेण्ड में शरीर का आधार लिया और फिर एक सेकेण्ड में शरीर से परे अशरीरी स्थिति में स्थित हो सकते हो? अभी-अभी शरीर में आये, फिर अभी-अभी अशरीरी बन गये - यह प्रैक्टिस करनी है। इसी को ही कर्मातीत अवस्था कहा जाता है।* ऐसा अनुभव होगा। जब चाहे कोई कैसा भी वस्त्र धारण करना वा न करना - यह अपने हाथ मे रहेगा। आवश्यकता हुई धारण किया, आवश्यकता न हुई तो शरीर से अलग हो गये। ऐसे अनुभव इस शरीर रूपी वस्त्र में हो। *कर्म करते हुए भी अनुभव ऐसा ही होना चाहिए जैसे कोई वस्त्र धारण कर और कार्य कर रहे हैं। कार्य पूरा हुआ और वस्त्र से न्यारे हुए।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बाप को प्यार से याद कर सतोप्रधान बनना"*

 

_ ➳  *जीवन अपनी गति से चलते ही जा रहा था... कि अचानक जनमो के पुण्यो का फल सामने आ गया... मन्दिरो में प्रतिमा में खुदा छुपा था... वह मेरा मीठा बाबा बनकर सामने आ गया... और जीवन सच्चे प्यार का पर्याय बन गया... ईश्वरीय प्रेम को पाकर मै आत्मा... दुखो की तपिश की भूल निर्मल हो गयी...* मीठे बाबा के प्यार की मीठी अनुभूतियों में डूबी हुई मै आत्मा... बाबा की यादो में खोई सी, ठिठक जाती हूँ... और देखती हूँ... सम्मुख मेरा बाबा बाहें फैलाये मुस्करा रहा है...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को बेहद के सुखो का अधिकारी बनाते हुए कहते है:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *अपने समय साँस और संकल्पों को निरन्तर मीठे बाबा की मीठी यादो में पिरो दो... यह यादे ही असीम सुखो का खजाना दिलायेगी... मीठे बाबा की यादो में सतोप्रधान बन बाबा संग घर चलने की तैयारी करो...* सिर्फ और सिर्फ मीठे बाबा को हर पल याद करो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा को अपनी बाँहों में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *अब जो मीठे भाग्य ने आपका हाथ और साथ मुझ आत्मा को दिलाया है... मै आत्मा हर घड़ी हर पल आपकी ही यादो में खोयी हुई हूँ...* देह और देहधारियों के ख्यालो से निकल कर अपने मीठे बाबा की मधुर यादो में मगन हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अनन्त शक्तियो से भरते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता की यादो में निरन्तर खो जाओ... *इन यादो में गहरे डूबकर, स्वयं को असीम सुखो से भरी खुबसूरत दुनिया का मालिक बनाओ... और यादो में सतोप्रधान बनकर, विश्व धरा पर देवताई ताजोतख्त को पाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा से अमूल्य ज्ञान खजाने को पाकर, खुशियो से भरपूर होकर कहती हूँ :-* " मीठे मीठे बाबा मेरे... *मै आत्मा आपको पाकर कितनी खुशनसीब हो गयी हूँ.. श्रीमत को पाकर ज्ञानधन से भरपूर हो, मालामाल हो गयी हूँ... आपके खुबसूरत साथ को पाकर सत्य से निखर गयी हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को बेहद के सतोप्रधान पुरुषार्थ के लिए उमंगो से सजाते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... *यह अंतिम जन्म में देह के भान और परमत से निकल कर, आत्मिक सुख की अनुभूतियों में खो जाओ... हर साँस ईश्वरीय यादो में लगाओ... यह यादे ही समर्थ बना साथ निभाएगी...* देह धारियों के याद खाली कर ठग जायेंगी... इसलिए हर पल यादो को गहरा करो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने शानदार भाग्य पर मुस्कराते हुए मीठे बाबा से कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे... मेरे हाथो में अपना हाथ देकर, *आपने मुझे कितना असाधारण बना दिया है... ईश्वरीय खूबसूरती से सजाकर, मुझे पूरे विश्व में अनोखा बना दिया है... मै आत्मा रग रग से आपकी यादो में डूबी हुई दिल से शुक्रिया कर रही हूँ...* मीठे बाबा को अपने प्यार की कहानी सुनाकर, मै आत्मा... साकारी तन में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  किसी भी बात में जरा भी अहंकार नही दिखाना है, बहुत - बहुत मीठा और निर्माणचित बनना है*

 

_ ➳  अपने प्यारे बाबा के मीठे मधुर महावाक्यों को पढ़ते हुए मैं विचार करती हूँ कि कितने निरहंकारी है बाबा। कैसे हम बच्चों की गुप्त रीति पालना कर रहें हैं! कितना सम्मान देते हैं हमे! सब कुछ खुद कर रहें हैं और मान हम बच्चों को देते हैं! रोज मीठे बच्चे कहकर याद प्यार देते हैं, बच्चो को नमस्ते करते हैं। *वाह मेरा भाग्य वाह जो ऐसे ईश्वर बाप की पालना में पलने का सर्वश्रेष्ठ सौभाग्य मुझे प्राप्य हुआ। अपना असीम स्नेह बरसाने वाले अपने प्यारे मीठे बाबा की मीठी सी याद की मीठी सी मस्ती में डूबी मैं आत्मा मन बुद्धि के विमान पर सवार हो कर अब पहुँच जाती हूँ अपने उस मीठे से मधुबन घर में जहाँ भगवान स्वयं आकर अपने बच्चों के साथ उनके जैसा साकार रूप धारण करके उनसे मिलते हैं*, उनसे रूह रिहान करते हैं और उनसे मंगल मिलन मनाकर, अपना प्यार उन पर बरसा कर वापिस अपने धाम लौट जाते हैं।

 

_ ➳  परमात्मा की इस दिव्य अवतरण भूमि अपने मीठे मधुबन घर में पहुंचते ही हवाओं में फैली रूहानी खुशबू को मैं महसूस कर रही हूँ। *अपने इस घर के आंगन मे प्रवेश करते ही मैं देखती हूँ सामने ब्रह्मा बाबा के एक बहुत बड़े चित्र को जिसमे बाबा बाहें पसारे अपने बच्चों के स्वागत में खड़े हैं*। अपने इस साकार रथ पर विराजमान होकर भगवान कैसे अपने बच्चों का आह्वान करते हैं यह देखकर मन में खुशी की लहर दौड़ रही है और मन खुशी में गा रहा है "वाह बाबा वाह"। *अपने इस मीठे मधुबन घर मे आकर अब मैं देख रही हूँ यहाँ के कण - कण में समाई ब्रह्मा बाबा की साकार यादों को जिन्हें उनके हर कर्म के यादगार चित्रों के रूप में चित्रित किया गया है*।

 

_ ➳  हर चित्र में कर्म करते हुए बाबा का स्वरूप कितना न्यारा और प्यारा दिखाई दे रहा है। उनके ओरिजनल निराकारी स्वरुप की दिव्य चमक और निरहंकारिता की झलक उनके हर चित्र में मैं देख रही हूँ और उन चित्रों को देखते हुए उसी साकार पालना का अनुभव कर रही हूँ। *बाप समान बनने का दृढ़ संकल्प करके अब मैं मन बुद्धि के विमान पर बैठ पहुँच जाती हूँ बाबा के कमरे में जहाँ बाबा बैठे है अपने हर बच्चे को आप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनाने के लिए*। बाबा के ट्रांस लाइट के चित्र के सामने बैठ, बाबा को निहारते - निहारते मैं महसूस करती हूँ जैसे अपने लाइट माइट स्वरुप में मेरे सामने बैठ कर बाबा अपनी सारी लाइट माइट मुझ में प्रवाहित कर मुझे आप समान बना रहें हैं।

 

_ ➳  अपने लाइट माइट फ़रिश्ता स्वरूप में स्थित होकर मैं देख रही हूँ जैसे बाबा की भृकुटि से प्रकाश की अनन्त धाराएं निकल कर पूरे कमरे में फैल रही हैं और पूरा कमरा एक अलौकिक दिव्य आभा से जगमगा रहा है। *इन दिव्य अलौकिक किरणों को स्वयं में समा कर मैं गहन आनन्द का अनुभव कर रही हूँ। बाबा के मस्तक से निकल रही शक्तियों की धारायें और भी तीव्र होती जा रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे ऊपर शक्तियों का कोई झरना बह रहा हो*। रूहानी मस्ती में खो कर शक्तियों की इन किरणों को स्वयं में समाते हुए मैं स्वयं को बहुत ही बलशाली अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  स्वयं को परमात्म बल से भरपूर करके, ब्रह्मा बाप समान निराकारी, निर्विकारी और निरहंकारी बनने का दृढ़ संकल्प करके मैं बापदादा से प्रोमिस करती हूँ कि *जैसे ब्रह्मा बाप निराकारी सो साकारी बन सदा सर्व से न्यारे और शिव बाप के प्यारे बन कर रहे, वाणी से सदा निरहंकारी अर्थात् सदा रूहानी मधुरता और निर्मानता से भरपूर रहे और कर्म में हर कर्मेन्द्रिय द्वारा निर्विकारी अर्थात् प्युरिटी की पर्सनैलिटी से सदा सम्पन्न रहे ऐसा पुरुषार्थ ही अब मुझे करना है और बाप समान सम्पन्न बनना है*। स्वयं से और बाबा से यह प्रतिज्ञा करते हुए मैं अनुभव कर रही हूँ जैसे बाबा अपने वरदानी हस्तों से मुझे वरदान देकर, मेरी इस प्रतिज्ञा को पूरा करने की शक्ति मेरे अंदर भर रहें हैं। आप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनाने का बल मेरे अंदर भरकर बाबा जैसे फिर से अपने उसी स्वरूप में स्थित हो गए है।

 

_ ➳  मन बुद्धि के विमान पर बैठ मैं भी अब फिर से अपनी कर्मभूमि पर लौट आई हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरुप में स्थित होकर ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रखते हुए, बाप समान निराकारी और निरहंकारी बनने का पूरा पुरुषार्थ अब मैं कर रही हूँ और अपने सम्पूर्णता के लक्ष्य को पाने की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं समय प्रमाण हर कार्य में सफल होने वाली ज्ञानी योगी तू आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं अपने आदि अनादि संस्कार स्वभाव को स्मृति में रखकर अचल-अडोल रहने वाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  अभी बापदादा सभी बच्चों को सदा निर्विघ्न स्वरूप में देखने चाहते हैं, क्यों? जब आप निमित्त बने हुए निर्विघ्न स्थिति में स्थित रहो तब विश्व की आत्माओं को सर्व समस्याओं से निर्विघ्न बना सके... इसके लिए *विशेष दो बातों पर अण्डरलाइन करो... करते भी हो लेकिन और अण्डरलाइन करो... एक तो हर एक आत्मा को अपने आत्मिक दृष्टि से देखो... आत्मा के ओरिजिनल संस्कार के स्वरूप में देखो...* चाहे कैसे भी संस्कार वाली आत्मा है लेकिन आपकी हर आत्मा के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना, परिवर्तन कर सकती है... आत्मिक भाव इमर्ज करो...

 

 _ ➳  जैसे शुरू-शुरू में देखो तो संगठन में रहते आत्मिक दृष्टि, आत्मिक वृत्ति, आत्मा-आत्मा से मिल रही है, बात कर रही है, इस दृष्टि से फाउण्डेशन कितना पक्का हो गया... अभी सेवा के विस्तार में, सेवा के विस्तार के सम्बन्ध में आत्मिक भाव से चलना, बोलना, समपर्क में आना मर्ज हो गया है... खत्म नहीं हुआ है लेकिन मर्ज हो गया है... *आत्मिक स्वमान, आत्मा को सहज सफलता दिलाता है* क्योंकि आप सभी कौन आकर इकट्ठे हुए हो? वही कल्प पहले वाले देव आत्मायें, ब्राह्मण आत्मायें इकट्ठे हुए हो... *ब्राह्मण आत्मा के रूप में सभी श्रेष्ठ आत्मायें हो, देव आत्माओं के हिसाब से भी श्रेष्ठ आत्मायें हो...* उसी स्वरूप से सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ...

 

 _ ➳  हर समय चेक करो - मुझ देव आत्मा, ब्राह्मण आत्मा का श्रेष्ठ कर्तव्य, श्रेष्ठ सेवा क्या है? 'दुआयें देना और दुआयें लेना'... आपके जड़ चित्र क्या सेवा करते हैं? कैसी भी आत्मा हो लेकिन दुआयें लेने जाते, दुआयें लेकर आते... और कोई भी अगर पुरुषार्थ में मेहनत समझते हैं तो *सबसे सहज पुरुषार्थ है, सारा दिन दृष्टि, वृत्ति, बोल, भावना सबसे दुआयें दो, दुआयें लो...*

 

✺   *ड्रिल :-  "निर्विघ्न स्थिति में स्थित रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अपने स्वधर्म में स्थित हो कर, अपने प्राणेश्वर बाबा की याद में बैठ गहन शांति की अनुभूति करने के बाद, कुछ समय के लिए मैं जैसे ही अपनी आंखों को हल्के - हल्के बन्द करती हूँ, मैं स्वयं को एक बहुत बड़े मन्दिर में अपने ही दैवी स्वरूप में देखती हूँ... *अपना वरदानी हाथ ऊपर उठाये मैं सबकी मनोकामनाओं को पूर्ण कर रही हूँ... चाहे कैसी भी आत्मा मेरे सम्मुख आ रही है मैं सबको दुआयें देती जा रही हूँ...* अपने इस दैवी स्वरूप को देखते - देखते मैं जैसे ही अपने ब्राह्मण स्वरूप में वापिस लौटती हूँ... मेरे कानों में अव्यक्त बापदादा की आवाज सुनाई देती है:- "हर समय चेक करो - मुझ देव आत्मा, ब्राह्मण आत्मा का श्रेष्ठ कर्तव्य, श्रेष्ठ सेवा क्या है?

 

 _ ➳  अव्यक्त बापदादा के इन महवाक्यों को सुन इस बात पर अटेंशन देते हुए अब मैं अपनी चेकिंग करती हूँ कि क्या सारा दिन अपनी दृष्टि, वृत्ति, बोल, भावना से मैं सबको दुआयें देती और दुआयें लेती हूँ? *चेकिंग करते - करते मैं विचार करती हूँ कि आज दिन तक मेरे जड़ चित्रों का जो गायन है कि उनके सामने कैसी भी आत्मायें आएं लेकिन दुआयें लेने जाते, दुआयें लेकर आते हैं वो गायन तो तभी होगा जब अभी ब्राह्मण जीवन में वो कर्म होगा...* और यह तभी होगा जब मेरा ब्राह्मण जीवन निर्विघ्न होगा... इसलिए अब मुझे अपने इस ब्राह्मण जीवन को निर्विघ्न बनाने का ही पुरुषार्थ करना है...

 

 _ ➳  अपने आप से दृढ़ प्रतिज्ञा कर अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप से अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होती हूँ... अशरीरी बन बाबा की याद में बैठते ही मैं देह की दुनिया से किनारा कर, ज्ञान और योग के पंख लगाये *अपने निराकार शिव पिता परमात्मा की उस सुंदर सितारों की अद्भुत दुनिया की ओर चल पड़ती हूँ...* कुछ क्षणों की सुंदर, लुभावनी रूहानी यात्रा करके मैं पहुंच जाती हूँ उस अद्भुत दुनिया परमधाम में अपने प्यारे मीठे बाबा के पास... *संकल्पों विकल्पों की हलचल से दूर शांति के सागर बाप के सामने मैं आत्मा गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ...* मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं अपलक शक्तियों के सागर अपने बाबा को निहार रही हूँ...

 

 _ ➳  धीरे - धीरे अब मैं आत्मा अपने मीठे प्यारे बाबा की ओर बढ़ रही हूँ... उनके समीप पहुंच कर मैं जैसे ही उन्हें टच करती हूँ... *शक्तियों का झरना फुल फोर्स के साथ बाबा से निकल कर अब मुझ आत्मा में समाने लगता है... मेरा स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली व चमकदार बनता जा रहा है...* मास्टर बीजरूप अवस्था में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के साथ यह मंगलमयी मिलन मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करवा रहा है... परमात्म लाइट मुझ आत्मा में समाकर मुझे पावन बना रही है... मैं स्वयं में परमात्म शक्तियों की गहन अनुभूति कर रही हूँ...

 

 _ ➳  शक्ति स्वरुप बनकर अब मैं परमधाम से नीचे आ रही हूँ... अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, अपने इस जीवन मे निर्विघ्न स्थिति का अनुभव करने के लिए अब मैं निरन्तर आत्मिक स्मृति में रह, सबको आत्मिक दृष्टि से देखने का अभ्यास कर रही हूँ... *सबके साथ बातें करते उनके मस्तक में चमकती हुई आत्मा को ही अब मैं देख रही हूँ... यह सब भी शिव बाबा की अजर-अमर संताने हैं इसी समृति से अब मैं हर संबंध में आती हूँ...* मेरे सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली आत्मा चाहे कैसे भी स्वभाव संस्कार वाली  हो लेकिन आत्मिक भाव इमर्ज करके मैं सबके प्रति शुभ भावना, शुभ कामना रखते हुए उन्हें परिवर्तन करने का पुरुषार्थ कर रही हूँ...

 

 _ ➳  *चाहे लौकिक परिवार हो या अलौकिक ब्राह्मण परिवार हो, दोनों में ही आत्मिक दृष्टि, आत्मिक वृति के आधार पर परिवार की फाउंडेशन को मजबूत करके* मैं निर्विघ्न स्थिति में स्थित रहने का अनुभव अब सहज ही करते हुए निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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